आज़ाद भारत में हर कोई आज़ाद रहना चाहता है और देश की राजनीतिक पार्टियाँ इस कोशिश में काफ़ी आगे है. जनता के लिए बड़ी-बड़ी कस्में खाने से नही थकते लेकिन जनता के प्रति जवाबदेही पर हज़मा खराब हो जाता है. पार्टियाँ चाहती है एक ऐसी आज़ादी जिसमे सब कुछ छिपाने की आज़ादी हो लेकिन क्या आज़ादी का यही मतलब है? सरकार चाहती है की राजनीतिक पार्टियों को आरटीआइ के दायरे से बाहर रखा जाए. जिसका विरोध पहले सीआइसी ने किया और अब अटॉर्नी जनरल भी कर रहे है. हमारा सवाल एक ही है की ये राजनीतिक पार्टिया क्या छिपाना चाहती है?