समलैंगिकों के हक के लिए लड़ने वालों को बड़ा झटका देते हुए भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंध को अपराध करार दिया है. हाई कोर्ट के फैसले को पटलते हुए अदालत ने कहा कानून में बदलाव संसद की जिम्मेदारी है.
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंध "अप्राकृतिक हरकत" हैं और यह गैरकानूनी है. इस तरह अब सुप्रीम कोर्ट ने गेंद संसद के पड़ले मे डाल दी है.
अब सवाल ये है की आज देश में गे कम्यूनिटी हक़ीक़त है, सड़क पर उतरे लोग धारा 377 का अँधा युग बता रहे है मसला यही है जो सच 26 लाख लोगों का वजूद है उससे इनकार क्यों? क्या आज की रोशनी मे उस विक्टोरियाँ क़ानून को बदला नही जा सकता या फिर ये अस्वाभाविक है, इससे देश के रीति रिवाज को ख़तरा है?
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