आज हम बात करेंगे दंगे की. दंगे जिनके जख्म हमेशा ताजे रहते है. उन्हे बार बार कूरेदा जा रहा है और ये सब कर रहे है हमारे गणमान्य नेता. चाहे फिर वो 1984 का सिख विरोधी दंगा हो या 2002 का गुजरात दंगा या फिर 2013 का मुज़फ़्फ़रनगर दंगा. इन दंगो पर राजनीतिक दल रोटियाँ सेकने में लगे है.