ग़रीब कौन है? क्या वो लोग जो गावों 27 रुपये से कम और शहरों में 33 रुपये से कम कमाते है या फिर वो लोग जो गावों में 11 रुपये से कम और शहरों में 18 रुपये से कम कमाते है?
जाहिर है की ग़रीबों की ये परिभाषा आपके गले नही उतार रही होगी लेकिन हमारे देश की सरकारें इन्ही परिभाषाओं को ध्यान में रख कर ग़रीबी का स्तर तय करती है.
केंद्र सरकार ने 32 रुपये और 27 रुपये का आँकड़ा दिया तो केंद्र से भी आयेज निकल कल गुजरात सरकार ने इसे 11 और 18 रुपये कर दिया.
भला इतने रुपये में किसका गुज़रा हो सकता है? शायद किसी का नही. जहाँ तक हम समझते है इतने पैसों से तो पेट भरकर खाना भी नही खाया जा सकता. लेकिन सरकारें ये समझने के लिए तैयार नही.
सरकारें बस ग़रीबी पर पॉलिटिक्स करने से बाज़ नही आ रही. इसी मुद्दे पर देखिए हमारा खास कार्यक्रम " आज का मुड़ा"