Skip to playerSkip to main content
  • 6 years ago
आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं,जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं ।। जिगर का ये शेर आज शहर पर बिलकुल सटीक बैठता है। कोरोना महामारी के चलते बीते चालीस दिन से अधिक समय से शहर बंद है, जिससे वो सड़कें जो हमेशा गुलजार रहतीं थीं लोगों की आवाजाही से आज वीरान हैं. नजर आतीं हैं तो चंद पुलिस की गाड़ियाँ या फिर खुद पुलिस वाले. यही नहीं शहर की गलियों से लेकर इबादत घर भी आज सूने पड़े हैं। जैसे खुद मुरादाबाद कह रहा हो कि अब मुझसे रहा नहीं जा रहा, जो लोग मेरे सीने पर जिन्दा हैं आखिर कहाँ हैं। लेकिन ये वीरानगी अभी और लम्बी चलेगी, क्यूंकि न जाने किसकी नजर लगी इस शहर को जिसकी गलियों में पीतल के दस्तकारों की ठक-ठक आवाज, रामगंगा किनारे का शोर, सब कुछ जैसे थम गया हो। लेकिन अगर कुछ दिन और सब घरों में थम रहे तो जिन्दगी फिर लौटेगी, चंचल मुस्काने फिर गलियों में दिखेंगी, स्कूल के बस्तों के साथ फिर बचपन दिखेगा, फिर वाही जामा मस्जिद चौराहे, गुरहट्टी, रेलवे स्टेशन बस अड्डों की चाय की दुकानों पर यारों की चुस्कियां होंगी. हम ईद और होली फिर खेलेंगे

Category

🗞
News

Recommended