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  • 5 years ago
भारत के सामाजिक न्याय के आंदोलनों का स्वरूप बीते 4-5 सालों में पूरी तरह से बदल गया है. दलित-पिछड़ा-आदिवासी समाजों की परंपरागत राजनीति करने वाले राजनीतिक दल भाजपा की चतुर्दिक सफलता के धक्के से हाशिए पर पहुंच गए हैं. बहुजन समाज पार्टी, आरजेडी, सपा, जैसी ताकतें राजनीतिक हैसियत से शून्य पर पहुंच गई हैं. जदयू, रालोसपा, आरपीआई, रालोजपा जैसी दलित-पिछड़ा राजनीति करने वाली ताकतें खुद ही भाजपा के परचम तले ठीहा खोज चुकी हैं.

इसके चलते राजनीति के इस खित्ते में एक बड़ा शून्य इन सालों में पैदा हुआ है. जिसके जवाब में हमने देखा कि दलित-पिछड़ा समाजों के भीतर एक उग्र बेचैनी पैदा हुई है. उना से लेकर रेहित वेमुला तक की घटनाओं ने इस बेचैनी में जान फूंकने का काम किया. एससी-एसटी एक्ट के ऊपर की गई सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई ने उस बेचैनी को इस मुकाम तक बढ़ाया कि पूरे उत्तर भारत में आयोजित बंद एक आग के रूप में तब्दील हो गई. इसी बेचैनी ने हमारे बीच कुछ नए चेहरों को उभारा. ये चेहरे परंपरागत राजनीति करने वाले नहीं थे. चाहे वो गुजरात के जिग्नेश मेवाणी हों या फिर उत्तर प्रदेश के चंद्रशेखर आज़ाद. चंद्रशेखर आज़ाद का राजनीतिक उदय कई मायनों में उल्लेखनीय है.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले और आस-पासस के इलाके में उनके द्वारा स्थापित भीम आर्मी का व्यापक असर पिछले दो-तीन सालों में देखने को मिला है. उनकी राजनीति की संरचना आक्रामक दलित अस्मिता के इर्द-गिर्द रची गई थी. इसके स्लोगन “द ग्रेट चमार” ने इलाके में एक हलचल पैदा कर दी और देखते ही देखते उग्र युवा समूहों का भीम आर्मी के साथ नाता जुड़ने लगा. जाहिर है इस आक्रामक दावे के विरोध में तथाकथित अगड़ी जातियों के बीच से व्यापक हिंसक प्रतिरोध पैदा हुआ. सहारनपुर के शब्बीरपुर इलाके में इस टकराव की परिणति जबर्दस्त हिंसा के रूप में हुई. इस हिंसा की आड़ में चंद्रशेखर आज़ाद को साल भर के लिए जेल में डाल दिया गया. उनके ऊपर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून की संगीन धाराएं लगाई गईं.

लगभग एक साल बाद अब चंद्रशेखर जेल से बाहर आ चुके हैं. भीम आर्मी के झंडे तले अब वे पूरे देश में घूम-घूम कर दलितों को लामबंद करने में लगे हुए हैं. उनकी राजनीति से शुरुआती दौर की आक्रामकता नदारद है. वे चुनावी राजनीति को लेकर क्या सोचते हैं, उनका लक्ष

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