हवा की स्थिति दिन-ब-दिन ख़राब होती जा रही है और लगातार जानलेवा होती जा रही है, लेकिन बावजूद इसके देश के राजनीतिक विमर्शों का हिस्सा नहीं है. देश का राजनीतिक वर्ग वायु प्रदूषण की भयावहता पर न गंभीर दिखायी देता है, न ही इस सवाल पर जनता के बीच जाने की ज़रूरत ही उसे महसूस होती है. 2019 लोकसभा चुनाव जारी हैं और कोई भी राजनीतिक दल अपने चुनाव प्रचार में वायु प्रदूषण या पर्यावरण के सवाल पर बोलता नज़र नहीं आ रहा है.
वायु प्रदूषण के इतने भयावह स्तर तक पहुंच जाने के बावजूद, इसे लेकर जागरूकता क्यों नहीं दिखायी देती है? प्रदूषण की ऐसी मार के बीच भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए कैसा भविष्य इंतज़ार कर रहा है? तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में पर्यावरण से जुड़े बुनियादी सवाल पीछे क्यों छूट जा रहे हैं? इन तमाम सवालों पर वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी और ग्रीन पीस के एक्टिविस्ट सुनील दहिया से न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने बातचीत की.
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