00:00एक समय था जब कुवेज से मोती, खजूर और शांदार नसल के घोड़े भारत जाते थे
00:16और भारत से भी बहुत सारा सामान यहां आता रहा है
00:23भारत के चावल, भारत की चाय, भारत के मसाले, पपडे, लकडी यहां आती थी
00:37भारत की टिकबुड से बनी नवकाओं में सवार होकर, कुवेज के नाविक लंभी यात्राएं करते थे
00:49कुवेज के मोती भारत के लिए किसी हीरे से कम नहीं रहे हैं
00:59आज भारत की ज्वैलरी की पूरी दुनिया में धूम है, तो उसमें कुवेज के मोतियों का भी योगदान है
01:13गुझरात में तो हम बड़े बुजुर्गों से सुनते आये हैं कि पिछली शताब्दियों में कुवेज से कैसे लोगों का व्यापारी कारोबारियों का आना जाना रहता था
01:33खास तोर पर 19th century में ही कुवेज से व्यापारी सूरत आने लगे थे तब सूरत कुवेज के मोतियों के लिए इंटरनेशनल मार्केट हुआ करता था
01:53सूरत हो पोरबंदर हो वेरावल हो गुझराद के बंदरगाह इन पुराने संवंदों के साक्षी है कुवेजी व्यापारियों ने गुझरादी भाषा में अनेक किताबे भी पब्लिस की है
02:19गुझराद के बाद कुवेज के व्यापारियों ने मुंबई और दूसरे बाजारों में भी उन्होंने अलग पहचान बनाई थी
02:31यहां के प्रसित व्यापारी अब्दूल लतीप अल अब्दूल रज्जा की किताब हाऊ टू केलिक्यूलेट कौल वेट मुंबई में छपी थी
02:47कुवेज के बहुत सारे व्यापारियों ने एक्सपोर्ट और इंपोर्ट के लिए मुंबई, कोलकत्ता, पूर्बंदर, वेरावल और गोवा में अपने अफिस खोले हैं
03:07कुवेज के बहुत सारे परिवार आज भी मुंबई की महमद अली स्टीट में रहते हैं
03:19कुवेज के बहुत सारे लोगों को ये जान कर हैराणी होगी, साट, 65 साल पहले कुवेज में भारतिय रुपये बैसे ही चलते थे जैसे भारत में चलते हैं
03:39यानि यहां किसी दुकान से कुछ खरीदने पर भारतिय रुपये ही श्विकार किये जाते थे तब भारतिय करंसी की जो शब्दा वली थी जैसे रुपया, पैसा, आना
04:04ये भी कुवेज के लोकों के लिए बहुती सामान्य था
04:10भारत दुनिया के उन पहले देशों में से एक है जिसने कुवेज की स्वतंतरता के बार उसे माननिता दी थी
04:23और इसलिए जिस देश से, जिस समाथ से इतनी सारी यादे जुड़ी हैं जिससे हमारा वर्तमान जुड़ा है वहाँ आना मेरे लिए बहुत यादगार है
04:49मैं कुवेज के लोगों का यहां की सरकार का बहुत आभारी हूँ मैं हिज हाइनेश दामीर का उनके इंविटेशन के लिए विशेष रुप से धन्यवाद देता हूँ