00:00रात के लगभग धाई बच रहे थी। मैं हमेशा की तरह नाइट शिफ्ट के बाद अपने ओफिस से पैदल ही घर की ओर लोट रहा था। पिछले एक देर साल से वाहन का साथ छूट गया था और तब से महानगर की ये लंबी, सुनसान, बेयाबान सरकों ने जैसे मेरी दोस्
00:30पर अपने घर की ओर चल पड़ा था। रास्ता बिलकुल सुनसान था। कहीं कहीं खंभों की पीली रोशनी में सड़क नहाई हुई थी, तो कहीं ऐसा अंधकार पसरा था कि अगला कदम कहां पड़ेगा, ये समझ में ना आए। मई की गर्मी अपने चरम पर थी, पसीने से
01:00गुंगुनाते हुए आगे बढ़ने लगा। तभी मेरी नजरे एक जगें जाकर थाहर गई। सड़क के किनारे एक अधेर उनुकी महिला खड़ी थी, कंधे पर छोटा सा बैग लटका था और पैरों के पास एक ब्रीफ केस रखा था। सफीर प्रिंट वाली साड़ी से उ
01:30उसकी बस छूट कई हो, या घरवाले लेने आ रहे हो, या हो सकता है कोई आटो का इंतजार कर रही हो, मन में कई, शायद, कौन धे, सोचते सोचते मैं उसके करीब पहुच गया, हमारी नजरें आपस में तकराई, लेकिन अजीब बात ये थी कि वो जरा भी नहीं जज़की
02:00न कोई दर, मैं ही जीब गया, मैंने नजरें जुका ली, सोचा, पता नहीं कौन हो, मुझे क्या ले न देना, और तेजी से आगे बढ़ गया, पीछे मुड़कर देखना भी मुनासिब नहीं समझा, अब मैं एक दूसरी सड़क पर मुड़ चुका था, वो औरत मेरी नजर
02:30जैसे वहां से भागना चाहता हूँ, करीब एक किलोमीटर चला ही था कि मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई, मेरी आखे फटी की फटी रहे गई, वो ही महिला, बिलकुल उसी मुद्रा में सौगच आगे फिर से खड़ी थी, वही सफेद साड़ी, वही बैग, वही ब
03:00मेरे हाथ पाउ सुनन होने लगे, जैसे किसी अद्रिशे जाल ने मुझे जकर लिया हो, मैं एक पल भी और नहीं रुका, जान बचाने की गरज से बेतहाशा दोड़ने लगा, सड़के भागती रही, लाइटे जपकती रही, लेकिन वो चेहरा, वो आखे, वो मुसकान, मेर
03:30अगले दिन, शाम को ओफिस पहुचा तो मन बेहट बेचैन था, ये बात किसी से साज़ा किये बिना रहा नहीं गया, ओफिस के सबसे बुजर्ग कर्मचारी, नूर चचा, चाय पी रहे थे, मैंने पूरा वाक्या उन्हें सुना डाला, सुनते ही उनकी हसी छूट गई, अर
04:00भी वहां हाथ से बहुत होते हैं, तेज रफतार गारिया, ट्रक, बसे, नजाने कितनों को कुचल चुकी हैं, वो गंभीर हो गए, कहते हैं, कई साल पहले एक औरत, जो बस के इंतजार में वहीं खड़ी थी, एक तेज रफतार ट्रक की चपेप में आ गई थी, शरीर के चि
04:30पर बैट, पैरों के पास ब्रीफ केस, लेकिन दर्मत, बेटा, कहते हैं, वो रूव बुरी नहीं है, कभी किसी को नुकसान नहीं पहुचाती, बस, खड़ी रहती हैं, इंतजार करती हुई, शायद उस बस का जो कभी नहीं आएगी, या उस सफर का जो अधूरा रह गया, �
05:00सरसराती हैं, सडकों पर सननाता पसरता हैं, और कहीं से एक हलकी मुस्कान की कलतना होती हैं, तो लगता है वो आज भी खड़ी हैं, इंतजार करती हुई, अपने अधूरे सफर को पूरा करने के लिए, या शायद अगली आत्मा को अपने साथ चोड़ने के लिए, कभी मत र
05:30अगले कुछ तिनों तक मैं हर रात की ड्यूटी के बाद आटो या टैक्सी का सहारा लेने लगा, मन ही नहीं करता था उस रास्ते से गुजरने का, लेकिन महानगर में टैक्सी और आटो रोज रोज मिल पाना भी आसान नहीं, कभी मिलती, कभी घंटों इंतजार करना पड�
06:00कुछ दिमाग का वहम था, ठकावट में कुछ भी देख सकता है, लेकिन अंदर कहीं एक डर की लहर लगातार सिरहाने पर दस्तक दे रही थी, हवा बिलकुल स्थिर थी, न पत्ता हिल रहा था, न कोई आवाज, मैं धीमे धीमे कदमों से उसी मोर पर पहुंचा, जहां पहल
06:30गया, आवाज मेरी पीट के पीछे से आय थी, लेकिन मुडने की हिम्मत नहीं हो रही थी, पसीने की धार गर्दन से होती मी पीट तक जा पहुंची, कांपते हुए जैसे तैसे पीछे मुडा, और वही अधेर महिला, अब की बार वो मेरे बेहत करीब थी, उसी तरहे की सफ
07:00क, कौन हैं आप? महिला ने जवाब नहीं दिया, बस हाथ से इशारा किया, सामने की तरफ, उस बूचर खाने की ओर, फिर खुद ही मुडी और धीमे धीमे उस ओर चलने लगी, मैं न जाने क्यों उसके पीछे पीछे चल पड़ा, प्यारों पर जैसे किसी और का कबजा हो ग
07:30और एक पुराने लगणी की स्टूल के पास जाकर रुख गई, यहीं, यहीं मैं खड़ी थी, उस रात, बस का इंतजार कर रही थी, उसकी आवाज में कपकपी थी, ट्रक आया, तेज रफ्तार में, मैं देख भी नहीं पाई, बस एक जोरदार तक कर, और फिर सब खत्म, व
08:00अटक गई, हर रात, उसी इंतजार में, की कोई मुझे देखे, सुने, और मेरी कहानी समझे, मेरी आँखें भर आई, मैं कुछ कहें नहीं पाया, तुम पहले हो, जो दरे बिना रुके, जो मेरी आँखों में देख पाई, इसलिए मैं तुम्हें बुला रही थी, मेरी रू
08:30मेला की आँखों से आँसों बहने लगे, और उसकी आकरते धीमे धीमे धुंदली होने लगी, उसने आकली बार मुस्कुरा कर कहा, धन्यवाद, और फिर हवा में जैसे विलीन हो गई, मैं कुछ पल वहीं खड़ा रहा, फिर जैसे तैसे वापस धर पहुँचा, लेकिन कहा
09:00जाकर पूछा, क्या हुआ बहन जी, रात में यहां अकेली क्यों? उसने कापती आवाज में कहा, बस का इंतजार कर रही थी, लेकिन कोई आता नहीं, मेरे शरीर में सिहरन दोड़ गई, मैंने नीचे देखा, वही कंधे पर बैग और जमीन पर ब्रीफ केस, पर वो औरत तो
09:30सिवती को देख मैं सन रह गया, उम्र कोई 25-26 साल रही होगी, सावला रंग, सूती सलवार कुर्ता, चेहरे पर ठकावत और भबराहत, लेकिन जो चीज सबसे ज्यादा चुब रही थी, वो थी, कंधे पर बैग और जमीन पर रखा वही ब्रीफ केस, मैंने साहस चुटा कर �
10:00ये सुनते ही मेरी रेन में एक सड लहर दोड गई, ठीक यही जवाब पिछली बार उस अधेर महिला की आत्मा ने भी दिया था, मैंने फिर पूछा, आपको किस जगह जाना है, वो बोली, मुझे नहीं पता, मैं तो बस, यही तक आय थी, क्या मतलब, मैंने चौकते हुए क
10:30और अब, अब उसकी जगह मेरी है, मैं कापने लगा, बोला, पर तुम्हारी मा की आत्मा तो मुक्ती पा चुकी है, मैं खुद उसकी आँखों में शान्ती देख चुका हूँ, वो जोर से हासी, एक ठंडी, खोकली हासी, जो सीने में चुबने लगी, क्या तुम्ही लगता
11:00पूंजे, वो कभी किसी को नुकसान नहीं पहुचाती, पर वो जूट था, कई आत्माएं उस जगह से जुड़ी थी, उन सडकों से, उन मौतों से, उन अधुरी कहानियों से, और शायद, अब मेरी कहानी भी उन्ही में एक बन चुकी थी, मैंने देखा, सडक के दूसरी त
11:30शव के पास एक पुराना ब्रीफ केस मिला, प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, युवक किसी युवती से बात कर रहा था, जो बाद में घटनास्थल से गायब हो बई
11:39रात के दो बजे, एक नया शक्स वही सडक पकड़ता है, सामने एक युवती खड़ी है, कंधे पर बैग और जमीन पर रखा ब्रीफ केस, सुनिए, वो पुकारती है, बस नहीं आय, कुछ रूहे मुक्ती नहीं पाती, वो सिर्फ अपने जैसी एक और कहानी तलाशती है, सम