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  • 7 months ago
Bad Mother in law

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00:28मासूम बहु घमंडी सास
00:31लेकिन वे चाहा कर भी ना कुछ कह पाते ना कुछ कर पाते
00:34एक तरफ उसकी बानवे वर्षिय व्रिद्ध मा थी तो दूसरी तरफ उसकी धर्मपत्नी वो करता भी तो क्या करता
00:41वो और समन जसमें पढ़ गया था
00:43तबी एक दिन पुष्पा अपने पती आलोग से कहती है
00:47सुनो जी मैं सोच रही थी क्यों न अपने बेटे राहूल की भी शादी करा दे
00:51देखो न घर का सारा काम मुझे अकेले करना पड़ता है
00:54और वो बुढ़िया की देख रेक भी मुझे ही करने पड़ती है
00:57मुझसे नहीं होता यह सब
01:00ठीक है हम राहूल की लिए लड़की देखना शुरू करता है
01:04वासे भी आप उसके उमर हो चुकी है
01:07पुष्पा राहूल की शादी के बारे में सूच कर
01:09मानी ही मन खुश होने लगती है
01:11दरसल पुष्पा अपने लिए एक ऐसी बहू की तलाश में है
01:15जो गाय से भी ज्यादा सीधी और कोयल से भी ज्यादा मीठी हो
01:20बहुत ढूनने और जाज परकने के बाद
01:23देविका की साथ आखिरकार उसकी तलाश पूरी होती है
01:28वो देविका को राहुर के लिए पसंद कर लेती है
01:30और एक अच्छा सा मुरद देख कर उनकी शादी करा देती है
01:35उचे संसकार और सरलस वभाव वाली देविका ने
01:38ससुराल में पहले दिन से ही सब का दिल जीत लिया
01:41वो रोजाना अपने ससुराल में दिन की शुरुवात पूजा पाट से करती
01:46और सब का अच्छे से खयाल रखती
01:48एक दिन देविका सब के लिए डानिंग टेबल पर प्लेट लगाती है
01:52सबी लोग टेबल की पास आकर बैठ जाते हैं
01:54देविका अपनी दादी सास का भी हाथ पकड़ कर उन्हें डानिंग टेबल पर बिठाती है
01:59और उन्हें खाना परोसी रही होती है कि पुश्पा उसे रोक लेती है
02:03ठेहरो देविका
02:06क्या हुआ ममी जी?
02:08देविका तुम इस घर में नई हो इसलिए शायद तुम्हें पता नहीं
02:11तुम्हारी दादी सास के लिए अलग ठाली है
02:13वो इस ठाली में नहीं खाती
02:17देविका मुड़कर विमला की तरफ देखती है
02:19और फिर अपनी सास पुश्पा से प्रश्ण करती है
02:23लेकिन ममी जी, रसोई में तो यही प्लेट थी
02:27तुम यही ठैरो, मैं इनके लिए प्लेट लेकर आती हूँ
02:31पुश्पा रसोई में किसी कुड़े दान की तरफ पड़ी
02:33प्लास्टिकी प्लेट लेकर आती है
02:35और उसी में विमला के लिए खाना लगाती है
02:38जब यह सब देवी का देखती है, तो वो आश्यरे में पड़ जाती है
02:42और फॉरण उठकर रसोई घर से दूसरी प्लास्टिकी प्लेट भी ले आती है
02:48अरे, बिटा, यह दूसरी थाली तो किसके लिए लाई है?
02:52देवी का मा सुम्यत के साथ जवाब देती है
02:55अहाँ के लिए मम्मी जी
02:56हाँ? मेरे लिए? पर क्यों?
03:00मा जी, जब आपने अपनी सास, यानि मेरी दादी सास को प्लास्टिकी प्लेट में खाना लगाया
03:06तो मैं समझ गी, कि यह जरूर आपके घर के कोई परंपरा होगी
03:10इसलिए मैं आपके लिए भी यह प्लास्टिकी प्लेट ले आई
03:14अब आप अपनी सास के लिए इस प्लेट में खाना लगा दीजिए
03:18और मैं अपनी सास के लिए इसमें खाना लगा देती हूँ
03:22देवी का की बातों से पुश्पा हैरान हो जाती है
03:26वो सोच में पढ़ जाती है कि वो अपनी बहुत देविका की मासुम्यत पर खुश हो या फिर उसकी नास
03:34समझी पर दुखी
03:35इसी तरह दिन बीटते चले जाते हैं और अब देविका को घर का माहुल और सास का स्वभाव सब समझ
03:43में आने लगता है
03:43एक दिन सुबा पुशपा अपनी सास याने विमला को उसके कपड़े दूने के लिए कहती है और ये सब दूर
03:51से देविका देख लेती है उसकी कुछी समय बाद देविका आती है और अपनी सास पुशपा से कहती है
03:58मम्मी जी मैंने घर का सारा काम कर लिया है
04:01कपड़े, बरतन, जाड़ू, पूछा, सब लगा लिया है
04:05अब मैं आपके पैर दबा देती हूँ
04:08आरे लेकिन बेटा, तुने कपड़े नहीं दो है
04:11मेरे कपड़े तो अंदर कमरे में ज्यों केती हो पड़े है
04:15मैंने आपके कपड़े नहीं दो है मम्मी जी
04:18आप जब दादे से बोल रही थी ना
04:21कि आज उन्हें अपने कपड़े खुद दोने होंगी
04:23तो मैंने सब सुन लिया था
04:25फिर मुझे लगा आज पूर्णी मा भी है
04:28इसलिए शायद ये आपके घर की कोई रस्म होगी
04:31तो मैंने आपके कपड़े भी नहीं दो ये मम्मी जी
04:37देवी का की बाते सुन कर पुष्वा अपना सर पकड़ लेती है
04:41और मन ही मन कहती है
04:43ये तो जरूरत से कुछ ज़्यादा ही सीधी है
04:46अब क्या करूं मैं इसका
04:48इस बुढिया ने मुझे परिशान करके रखतिया है
04:51एक तरफ वो जरूरत से ज़्यादा सीधी मेरी बहू
04:54जो मेरी हर हरकत को इस घर का रिवास समझ लेती है
04:59और दूसरी तरफ ये बुढिया जो रोज अपना बिस्तर गंदा कर देती है
05:04आए बुढिया अब कौन करेगा ये बिस्तर साफ
05:07बाहर से नौकर बुलाने पड़ेंगे क्या
05:09चाल जल्दी से अपना बिस्तर साफ कर
05:12गंद मचा कर रखा है
05:16बहू तो ऐसा क्यों कहती है
05:19मैंने तेरा क्या बिगड़ा है
05:22मैंने तो कभी तुझसे उची आवाज में बात तक नहीं की
05:28पर तुमसे इतनी नफरत क्यों करती है
05:34तबी वहाँ आलोक, देवी का और उसका पती आ जाता है
05:40क्या हुआ पुश्पा, तुम मा पर ऐसे क्यों चिला रही हो
05:43अरे देखो न अपनी मा को
05:45इस बुढ़िया ने अपने बिस्तर का क्या हाल कर रखा है
05:48कितनी बद्बो आ रही है इस बिस्तर से
05:50किसी काम की नहीं ये बुढ़िया
05:53आप एक काम क्यों नहीं करते
05:55इस बुढ़िया को वृद्धाशम क्यों नहीं छोड़ाते
05:58आलोक ये सुनकर परिशान हो जाता है
06:01वो मन ही मन अपनी माँ से अपने गलतियों की माफी तो मांगता है
06:05लेकिन जुबान से कुछ नहीं बोलता
06:08बहुए सब मत कर बेटा
06:10तुझे सह बोलेगी मैं ठीक वैसा ही करूँगी
06:15मैं अभी इस बिस्तर को साफ कर देती हूँ
06:19पर प्लीज मुझे इस घर से मत निकाल
06:23ये घर मेरे पती की आखरी निशानी है
06:27मैं अपनी अंतिन सास तक इसी घर में रहना चाहती हूँ
06:33माजी दादी सास का बिस्तर मैं साफ कर दूँगी
06:36और अब से आपको कोई शिकायत का मौका भी नहीं दूगी
06:39आप प्लीज दादी को वृद्धा श्रम मत भीजिए
06:43हाँ मा दादी को रहने दीजिए ना यहीं पर
06:45उनके बिना ये घर बिलकुल अच्छा नहीं लगीगा
06:49देखो विटा इनका जाना जरूरी है
06:51अब इनकी उम्र हो चुकी है
06:53इसलिए आब इन्हें अपनी बाखी की जिंदगी वहीं बितानी पड़ेगी
06:58इतने में देविका वहां से चली जाती है
07:00और कुछ ही मिनट बाद एक बड़ा सा बैग लेकर वहां पांच जाती है
07:04देविका के हाथ में बैग देखकर सब अचमभे में पड़ जाती है
07:08अरे देविका तुम ये बैग कहां से लाई?
07:11तुम कहीं जा रही हो क्या?
07:13मा जी ने अभी तो बोला थोड़ी दिर पहले
07:15कि अब उनकी सास बूरी हो चुकी है
07:18और उनकी असली जगा व्रिद्धाश्रम में ही है
07:20तो मैं ये दूसरा बैग उनके लिए भी ले आई
07:23वो क्या है ना उम्रे तब ममी जी की भी हो चुकी है
07:27कल तो जाना ही है
07:28इससे अच्छा अभी चली जाएंगी
07:30तो दादी सास को भी एक सहारा मिल जाएगा
07:33क्या
07:34क्यों बहु तो मुझे व्रिद्धाश्रम बेजेगी
07:37है अपनी सास को
07:40ममी जी
07:40अगर आप इस परंपरा का पालन करेंगी
07:43तो मुझे भी तो इस परंपरा का पालन करना पड़ेगा ना
07:47मैं बिल्कुल आपकी तरह बनना चाहती हूँ
07:50मेरी मा कहा करती थी
07:52सिसुराल में बिल्कुल अपनी सास की नक्षी कदम पर ही चलना
07:56जैसा वो करें और जैसा वो रहे ठीक वैसा ही रहना
08:01तब ही में एक अच्छी बहु बनने में कामयाब हो पाऊंगी ना सासुमा
08:06देविका की ये बाती सुनकर पुष्पा की आँखों में आसु आ जाते हैं
08:11देविका की बातों में उसे मासुमित के साथ साथ आज बहुत सी चीज़े सुनाई दीती है
08:16जो चीख चीख कर बताती है कि वो आज तक कितना गलत करते आई है
08:23बेटा तूने तो मेरी आंखे खोल दी
08:25अपने सिसुर के देहान के बाद मैंने न जाने अपनी सास पर कितने अत्याचार किये
08:31उन्हें कितना जलील किया आखरी खोटी सुनाई
08:34आज अगर तू नहीं होती तो मुझे कभी अपनी गल्तियों का एसास तक नहीं होता
08:41देर सही सही आपको अच्छे बुरी का एहसास हुआ यही बहुत बड़ी बात है
08:45मम्मी जी तो अब आपके सामान का क्या करना है
08:50आरे जा जाकर इस मेरे कमरे में रखकर आजा
08:53अब कोई कहीं नहीं जाएगा
08:55सब यहीं साथ में रहेंगे
08:58बहु, मुझे समझ में नहीं आ रहा
09:01मैं तेरा किन शब्दों में धन्यवाद को हूँ
09:04जो चीज तुने दो दिन में पुश्पा को समझा दी
09:08वो मैं बरसों से कहने की हिम्मत तक ना कर सका
09:12पापा जी, जरूरी नहीं कि हर बात कह कर भी बताई जाए
09:16कभी-कभी अपनी गलतियों का एहसास कराना भी जरूरी होता है
09:20और मैंने भी ममी जी के साथ ठीक वैसा ही किया
09:23उन्हें उनकी गलतियों का एहसास कराया
09:26और देखिए, अज सब ठीक हो गया
09:30सच में देविका, तुमने आज हम सबको बहुत बड़ी सीखती है
09:34अब पुष्पा सुधर जाती है
09:37और घर की पूरी जिम्मेदारी देविका को साथ देती है
09:40और अब उनका परिवार एक सुखी और समर्द परिवार की तरह रहने लगता है
10:04झाल