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  • 5 months ago
1960 के दशक के मुंबई में, एक उद्यमी कपास व्यापारी जो मान्यता और सम्मान चाहता है, 'मटका' नाम का एक नया जुआ खेल शुरू करता है, जो शहर में तूफान ला देता है और एक ऐसे इलाके को सार्वजनिक बना देता है जो पहले अमीरों और कुलीन लोगों के लिए आरक्षित था।
Transcript
00:04जिन्दे की ब्रीज भट्टी हो आदमी था जिसने मौके पे खेल कर इसना पैसा कमाया कि सरकारी खादाना भी उसके
00:10सामने चिलर लगने लगा
00:12ओ, मटका किंग
00:13जिन्दे की एक सफर है सुहाना
00:18जिन्देगी मिसाली किती अजीद है सिर्फ एक चीज पे चलती है उमीद
00:22यहां चल्य क्या हो
00:24तंखा बड़ी? नहीं
00:26सिट पैसा जीए थुड़ा रचुच्छा हो यहां से
00:29इसने जाना
00:30जाहे वो अमीरों और कि गरीब सबको जिन्देगी में छलंग लगाने का हको नाजी है
00:36इसको जुआ सटा नहीं बुलेंग आज से
00:38आज से इसका नाम है मटका
00:44खेल इतना हिट था कि लोग अपने पैसों को लेकर रैंग से जादा मटके पी विश्वास करने लगे
00:49आज मालों से बढ़ना है आज के वो शाम को ये फोन लाइन सा बजी इस मटका सर बुरीज वट्टी
00:57के लोग फोन से कि जुवा कि सारे देश बर पैला थे हैं
01:00कोई कुछ कर क्यों नहीं रहा है सब फोन पर बात करना इलिगल थोड़ी है बढ़े क्राइम से कम भी
01:04नहीं है
01:07यह आपके सारे अड़े जितनी जल से जल्दबन हो इतना अच्छा है इंको मटके में इतना गुसना है तो इंको
01:17असली मटके का पारी बिलात दो
01:21आम आदमी को उमीद देने वाला ये केल खुद में एक और फुल और जहरीला सिस्टिंग बन गया है
01:27इसके मटके की वज़ा से सही घर बरबाद हो गया है तुझे दिकत कि चीज से है लोग मुझे बुरा
01:32आदमी समस्ते है से तुम केक से गोरे विता नहीं हो
01:36कि हारने वाले पे अभी बिच्छर नहीं बंती ना इरो हमेशा जीतता है बिच्छर मैं मैं मैं ब्रिज भट्टी आपके
01:44साथ खड़ा हूँ
02:00अब मैटर अबन अपने हाथ मिलेंगे कल तक बट्टी काला से यहां करें क्या हो इतने जाना

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