00:00इस तफसीली जाइजे में खुशामदीद, आज हम तारी के एक बहुत ही दिल्चस्प सफर पर निकल रहे हैं, हम साड़े
00:05चार हजार साल पुराने एक ऐसे शाहकार के राजों से परदा उठाएंगे, जिसने तारीख, सियासत और इनसानी नफसियात को आपस
00:13में उलजा कर र�
00:25पहरानी हो कि इतनी मशहूर होने के बावजूद, इस कदीम मुझस्मे की असल शनाख्त आज भी एक मुकमल मौमा है,
00:32हम सब इसे इसके मशहूर नाम से पुकारते तो हैं, लेकिन सच पूछिए, तो किसी को नहीं मालूम कि ये
00:38नोजवान लड़की हकीकत में कौन थी?
00:40जरा इसके जिसमानी साख्त और बारीकियों पर गौर करें, ये कांसी की एक छोटी सी मूर्ती है, जो मुकमल तोर
00:47पर बिरहना है, इसके बाएं बावजू को देखें, इस पर पूरे 25 कंगन सजे हुए हैं, और इसके खड़े होने
00:53का अंदास, बिलकुल बेखौफ और पुर
01:07जरा सोचें, ये मूर्ती सिर्फ 10.8 सेंटीमीटर लंबी है, इतनी चोटी सी चीज़ को इतनी महारत से बनाना कोई
01:17मामूली बात नहीं, ये वादिय सिंद की तहजीब की कमाल टेकनिकल महारत का सुबूत है, जिसे लॉस्ट वैक्स कास्टिंग यानि
01:25मॉम के मॉडल के जरिय
01:26धात ढालने का अमल कहा जाता है, चार हजार साल से भी पहले धात को पिगला कर इतनी पैचीदगी से
01:33ढालना ये वाकई उस दोर की साइंसी और फनी तरकी को जाहर करता है, अब ये जानना भी बहुत जरूरी
01:39है कि ये मिली कहां से थी, उननिस सुचब़ीस में महंजो दड़
01:56की किसी महफिल से जोडता हूँ, ये तो बस एक आम से घरेलू माहौल में दरियाफ्त हुई थी, तो फिर
02:02सवाल ये है कि इसे डांसिंग गर्ल का नाम कैसे मिला, ये हमारी इस बहस का पहला हिस्सा है, जहां
02:09हम देखेंगे कि कैसे नौबादियाती दौर में इस मौम्मे को ए
02:25जैनी नाच गर्ल का तास्र देती है, जिसका हाथ एक गुस्ताखाना अंदाज में उसके कूले पर रखा हुआ है, दरहसल
02:31नौबादियाती दौर के इन माहरीन ने उस वक्त के हिंदुस्तान के देवदासी और नाच गर्ल जैसी जदीद तसवरात को उठा
02:38कर एक कबलस तार
02:55किस तरह मगरबी माहरीन इस मुझसमे को देखकर अपने अपने अंदाजे लगा रहे थे और इस पर अपनी मर्जी की
03:01नसली और सकाफ्ती शनाखते थोप रहे थे, जिनका शायद तारीखी हकीकत से दूर दूर तक कोई वास्ता ना हो।
03:26जिन्होंने इसे जबरदस्ती एक रस्मी रकासा या घुलाम लड़की का रूप दे दिया। लेकिन कहानी यहां खतम नहीं होती। आईए
03:34अब इस कहानी के दूसरे हिस्से की तरफ चलते हैं जहां हम एक मुनकस्म विरसे और नुधरात की जुगराफियाई सियासत
03:42की बात क
03:46जरा उस मनजर का तसवर करें 1947 में बरिसगीर की तकसीम का वक्त करीब है और मोहंजो दड़ो और हडपा
03:55से दर्याफ्त होने वाले तकरीबन 12,000 नुधरात एक नुमाईश के लिए दिली में मौजूद हैं।
04:01फिर 1950 के दहाई में क्या होता है मार्टमर वेलर की मौजूद की में इन तारीखी नवादरात को इंडिया और
04:08पाकिस्तान के दर्मियान बिलकुल आधा आधा यानि 50-50 फीसद के तनासुब से बांट दिया जाता है और इस तारीखी
04:15बटवारे में मोहिंजो दड़ों की ये म
04:21इन तहाई मशूर मुजस्समा जिसे प्रीस्ट किंग कहा जाता है वो पाकिस्तान को मिल जाता है अब यहां एक बहुत
04:28ही दिल्चस्त तारीखी कियास आराई भी मौजूद है कुछ लोगों का मानना है कि चुँके डांसिंग गर्ल का मुजस्समा बरायना
04:33था इसलिए गदा
04:51जो के जदीद दोर की निसाबी कुतुब और माजी की सेंसर्शिप के बारे में हैं यह मुजस्समा सिर्फ गुजरे हुए
04:58कल की बात नहीं है बलकि आज भी यह सकाफ्ती, चानूनी और तालीमी बहसों का मरकज है जरह इस टाइम
05:04लाइन पर नज़र डालें उन्निस सो चब�
05:19में होने वाले सेंसर्शिप के तनाज़े तक, यह सब साबित करता है कि दहाईों बाद भी यह मुजस्समा मुलकियत और
05:25इखलाकियात की कितनी मुतनाज़े अलामत बना हुआ है।
05:50टेक्स्ट बुक डिवलप्मेंट कमिटी के मिशल डैनीनो के मुताबिक असल मुजस्समे को नावी जमात के तालिब बिल्मों की उमर के
05:57लहाज से नामुनासिब समझा गया।
06:19और यह फैसला किया गया कि डिजिटल किताबों में उसी वक्त असल तस्वीर बहाल की जाएगी और मुस्तक्बिल के तमाम
06:27प्रिंट शुदा एडिशन्स में भी इस तारीखी मुजस्समे को इसकी असल बगएर किसी तबदिली की हालत में ही दिखाया जाएगा।
06:53अगर हम गोर करें तो एक तरफ वो साड़े चार हजार साल पुराना बिलकुल खामोश और मुस्तकिल कांसी का मुजस्समा
07:02है।
07:02और दूसरी तरफ वो बेपना सकाफती, नजरियाती और सियासी बोज है जो हम इनसानों ने उसके नन्हे से कंधों पर
07:09डाल रखा है।
07:11और इतनी तवील बहसों और तनाजवात के बाद भी बुनियादी हकीकत आज भी नहीं बदली।
07:17हम आज भी नहीं जानते कि उसका नाम क्या था, इसे किस कारीगर ने अपने हाथों से तराशा था या
07:23हरपा के उन कदीम लोगों के लिए इसकी असल एहमियत क्या थी।
07:27आज हम इसे जिस चनाफ्त से जानते हैं, वो सो फीस्सद हम जदीद इनसानों की अपनी बनाई हुई है।
07:34तो आखिर में, एक बहुत ही गहरा सवाल हमारे जहनों में उभरता है।
07:38जब हम कदीम नवादराद को देखते हैं, तो क्या हम वाकई उस गुजरी हुई तारीख को दरियाफ्त कर रहे होते
07:45हैं?
07:45या फिर हम सिर्फ उन नवादराद के आईने में अपने ही जदीद तासुबात और सोच का अक्स देख रहे होते
07:51हैं?
07:52ये वो सवाल है जो तारीख को समझने की कोशिश करने वाले हर इनसान को खुद से जरूर पूछना चाहिए।