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  • 3 months ago

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00:00आज की कवीता दो राहों के बीच, तो चलती ट्रेन की खिड़की से सोचू का सहर गुजरता है, मन के
00:08अंदर एक सवाल धीरे धीरे उभरता है, पढ़ाई भी है जरूरी मेरी, सपनों का भी भार है, रोजी रोटी की
00:18चिंता संग भविस्त का भी बिचार है,
00:20एक राह कहती, कमरा ले लो, अपनी पहचान बनाओ तूं, दूजी राह फुस्फुसाती, पहले खुद को तो सजाओ तूं, किताबों
00:31की खुस्बु बुलाती, चौक डस्ट भी पुकारे हैं, कल का अब सर बनने वाला, अज बच्चों के सहारे हैं, जे
00:41में सीमित सिक्के लेक
00:43होसलों की कमी नहीं, डर ये भी अगर ना आये बच्चे, तो मेहनत क्या थमी नहीं, घर की दूरी थकान
00:52की धूप, सपनों की ठंडी छाओं भी, एक दिल में सो उल्जने पर उमिदों की नाओं भी,
00:59सायद सही समय ही बोले, कब कदम बढ़ाना है, बीज अभी मन में बोना है, पेड कल उग जाना है,
01:09चलो, आज बस इतना कर ले, महनत को अपना मित्र बनाएं, रास्ते खुद साफ हो जाएंगे, बस हिम्मत को मत
01:18घटाएं,
01:19दो राहों के इस मोड पर मन इतना जान लिया, धीरे चलना हार नहीं, सोच समझ कर बढ़ना ही जीत
01:28का पहला दिया,