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  • 2 months ago
Aadhi Raat Ka Baans Ka Jungle Jahan Naam Lekar Maut Bulati Hai Hindi Horror Stories

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Transcript
00:00।
00:33बारिश से बचने के लिए मोहन पहले से ही दुकान के अंदर बैठा हुआ था
00:37उसके कपड़े भीग चुके थे
00:39वो दोनों हाथों से कुल्हण पकड़ कर चाय की गर्मी ले रहा था
00:44काका एक और चाय बना दो
00:46आज तो बारिश ने भी काम दुगना कर दिया
00:48रामू काका हलका सा मुस्कुराय
00:51बारिश का क्या है बेठा आती है और चली जाती है
00:56लेकिन कुछ रातें आने के बाद जल्दी नहीं जाती
01:03मोहन उनकी बात समच नहीं पाया
01:05तब ही बाहर से कोई दौडता हुआ दुकान के अंदर आया
01:08वो सुरेश था
01:10उसके कपलों से पानी टपक रहा था
01:13आज तो भीगते भीगते जान निकल गई है
01:16रामू काका ने तुरंट उसके सामने भी चाय रखती
01:20कुछ देर तक तीनों चुप चाब बारिश को देखते रहे
01:24दुकान की टीन की छट पर गिरती बारिश की आवाज
01:28पूरे माहौल में गुंज रही थी
01:32अचानक मोहन ने बाहर बांस के जंगल की तरफ देखा
01:36बारिश के बीच भी उसे ऐसा लगा
01:39जैसे वहाँ कोई खड़ा हो
01:42उसने दोबारा ध्यान से देखा
01:44लेकिन इस पार वहाँ सिर्फ हिलते हुए बांस दिखाई दे रहे थे
01:49काका एक बात पूछू
01:52पूछो गाउं वाले उस बांस के जंगल से इतना डरते क्यों है
01:57रामू काका कुछ पल तक चुप रहे
02:00फिर उन्होंने बाहर गिरती बारिश की तरफ देखा
02:04और धीमी आवाज में बोले
02:07क्योंकि इस गाउं में सबसे ज्यादा लोग बारिश की रातों में ही गायब हुए है
02:15दुकान की अंदर अच्चानक सन्नाटा चा गया
02:19सिर्फ बारिश की आवाज सुनाई दे रही थी
02:22दुकान की अंदर कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला
02:25बारिश लगा तार तेज होती जा रही थी
02:28टीन की छट पर गिरती बूंदों की आवाज पूरे मौहौल में गूंज रही थी
02:34मोहन ने चाय का आखरी घूट लिया
02:36उसे लगा शायद रामू काका मजाक कर रहे हैं
02:40लेकिन उनके चहरे पर जरा भी मुस्कान नहीं थी
02:43काका लोग गायब कैसे हो सकते हैं
02:46कोई ना कोई वजह तो रही होगी
02:48रामू काका ने चूलहे की आँच धीमी की
02:51फिर बाहर बांस के जंगल की तरफ देखते हुए बोले
02:54वजह थी लेकिन किसी ने मानी नहीं
02:58सुरेश ने हैरानी से पूछा
03:01कौन सी वजह
03:02रामू काका अगे कुछ पल सोचा
03:05फिर बोले
03:06आज से करीब 20 साल पहले
03:08इसी मौसम में
03:10इसी तरह की बारिश हो रही थी
03:12उस रात
03:14गाउं का लकड हारा
03:16हरी नारायन
03:17बांस काटने जंगल गया था
03:19उसने कहा था
03:21शाम होने से पहले लोट आएगा
03:23लेकिन
03:24वो कभी वापस नहीं आया
03:26पूरे गाउं ने उसे ढूड़ा
03:29लोग मशालें लेकर
03:31रात भर जंगल में घूंते रहे
03:32हर पगडंडी
03:34हर जाडी
03:35हर रास्ता तलाश किया गया
03:37लेकिन
03:38हरी नारायन का कोई निशान नहीं मिला
03:41सिर्फ उसकी कुलहाडी
03:43और कीचड में बने पैरों के कुछ निशान मिले
03:46जो जंगल के बीच जाकर
03:48अच्चानक खायब हो गए थे
03:50फिर
03:51वो मिले कैसे
03:54तीन दिन बाद
03:56वो खुद चल कर गाउं वापस आया
03:58तो फिर
04:00डर किस बात का था
04:01डर
04:02उसके वापस आने का नहीं था
04:05डर
04:06उसके बदल जाने का था
04:09रामु काका
04:10कुछ पल के लिए चुप हो गए
04:12उसी समय
04:14आसमान में जोड़दार बिजली चंगल
04:17पूरा बांस का जंगल
04:19एक पल के लिए रोशनी में दिखाई दिया
04:21मोहन की नजर
04:23फिर उसी तरफ चली गई
04:25इस पार
04:26उसे साफ लगा
04:28जैसे कोई आदमी बांस के पीछे
04:40का अभी भी वहाँ कोई खड़ा है
04:43उसकी तरफ मत देखो
04:45मोहन
04:45कुछ चीजें तभी तक दूर रहती है
04:49जब तक तुम उन्हें
04:51पहचानने की कोशिश नहीं करते
04:53मोहन ने तुरंत अपनी नजर
04:55नीचे कर ली
04:57लेकिन उसका दिल
04:59अब पहले से कहीं ज्यादा तेज धड़क रहा था
05:02उसी समय
05:03दुकान के बाहर
05:05किसी के पैरों की आवाज सुनाई दी
05:08चप
05:10चप
05:11चप
05:12ऐसा लग रहा था
05:14जैसे कोई बारिश में भीगता हुआ
05:16धीरे धीरे दुकान के सामने आकर रुख गया हो
05:21तीनों चुप हो गए
05:22काका
05:24लगता है बाहर कोई खड़ा है
05:26रामो काका ने दर्वाजे की तरफ देखा
05:29लेकिन अपनी जगह से उठे नहीं
05:32उनके चहरे का रंग उड़ चुका था
05:35तभी
05:36धक
05:38दुकान के दर्वाजे पर पहली दस्तक हुई
05:40और तीनों की सांसें जैसे एक पल के लिए थम गई
05:44दुकान के दर्वाजे पर पहली दस्तक हुई
05:48तीनों की सांसें जैसे एक पल के लिए थम गई
05:52बारिश अब भी लगातार हो रही थी
05:55हवा के साथ पीन की छट चर्मराने लगी
05:59कुछ सेकेंड तक कोई दूसरी आवाज नहीं आई
06:02मोहन ने धीरे से रामु काका की तरफ देखा
06:07काका, शायद कोई राहगीर होगा, इतनी बारिश में फस गया होगा
06:12रामु काका ने बिना कुछ कहे सिर जुका लिया
06:15उनकी आखें दर्वाजे पर हिटी की थी
06:18अचानक, दूसरी बार दस्तक हुई
06:22टक, टक
06:26इस बार पहले से ज्यादा साफ
06:30मैं दर्वाजा खोल देता हूँ
06:34जैसे ही सुरेश आगे बढ़ा
06:36रामु काका ने उसका हाथ कस कर पकड़ लिया
06:40रुको, पहले सुनो
06:43क्या बाहर कोई अपना नाम बता रहा है
06:47तीनों बिलकुल चुप हो गए
06:49बाहर सिर्फ बारिश की आवास थी
06:52ना किसी के चलने की
06:54ना किसी के खासने की
06:55ना किसी के बोलने की
06:57सिर्फ सन्नाटा
07:00मोहन के माथे पर पसीना आ गया
07:03जबकि मौसम ठंडा था
07:05अगर बाहर कोई नहीं है
07:07तो दस्तक कौन दे रहा है
07:09रामू काका ने गहरी सांस ली
07:12जैसे वो यही सवाल सुनने से डर रहे हूं
07:16बीस साल पहले
07:18हरी नाराइन के गायब होने से एक रात पहले
07:23उसके घर के दर्वाजे पर भी
07:26ऐसी ही दस्तक हुई थी
07:29फिर उसने दर्वाजा खोल दिया था
07:34इतना कहते ही
07:35तीसरी बार दस्तक हुई
07:37ठक ठक ठक
07:42इस बार
07:43दस्तक के साथ एक धीमी आवाज भी सुनाई दी
07:50रामू दर्वाजा खोल
07:55रामू काका का चहरा एक दम सफेद पड़ गया
07:59उनके हाथ कापने लगे
08:01मोहन और सुरेश ने पहली बार उन्हें इतना डरा हुआ देखा था
08:08काका
08:09ये आवाज किसकी है
08:11जिसकी आवाज मैंने बीस साल पहले आखरी बार सुनी थी
08:17दुकान के अंदर रखी लाल्टेन
08:20अचानक टिम्टिमाने लगी
08:22उसकी रोशनी कभी तेज होती
08:25तो कभी बिल्कुल धीमी
08:27उसी समय दर्वाजे के नीची से गीली मिट्टी का पानी अंदर आने लगा
08:33लेकिन पानी के साथ गीले पैरों के निशान भी बन रहे थे
08:39अजीब बात ये थी
08:41दर्वाजा अभी बंद था
08:43फिर भी वो निशान धीरे धीरे दुकान के बीच तक आ गए
08:48और वहीं आकर रुख गए
08:51ऐसा लग रहा था
08:52जैसे कोई उन तीनों की ठीक सामने खड़ा हो
08:57कोई भी
08:58पीछे मुड़कर मत देखना
09:01और चो भी हो
09:03किसी भी आवाज का चवाब मत देना
09:07रामू काका की बात सुनते ही
09:09मोहन और सुरेश बिलकुल स्थिर खड़े रह गए
09:13दुकान के अंदर ऐसा सन्नाटा था
09:16कि चूलहे में जलती लकडियों की आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी
09:21कुछ पल बाद दर्वाजे के नीचे बने गीले पैरों के निशान
09:26धीरे धीरे मिटने लगे
09:28लेकिन दर्वाजे के बाहर खड़ा कोई अब भी वहाँ मोजूद था
09:36रामू मैं अभी भी यहीं हूँ
09:40आवाज सुनते ही रामू काका ने अपनी आखें बंद कर ली
09:44उन्होंने जैसे उस आवाज को पहचान लिया था
09:47काका ये कौन है?
09:51हरी नारायन
09:52या फिर जो उसके साथ उस जंगल से लोटा था
09:57मोहन और सुरेश कुछ समझ नहीं बाए
10:00रामू काका ने कापती आवाज में आगे कहना शुरू किया
10:04तीन दिन बाद जब हरी नारायन वापस आया
10:08तो उसने किसी से एक शब्द भी नहीं बोला
10:12दिन भर अपने घर में बैठा रहता
10:14और रात होती ही
10:16चुक चाप बास के चंगल की तरफ निकल जाता
10:20एक रात उसका छोटा भाई
10:24चुके से उसकी पीछे चला गया
10:27फिर क्या हुआ
10:30सुभा उसका भाई तो मिल गया
10:33लेकिन हरी नारायन फिर कभी नहीं मिला
10:37रामु काका की आवाज भारी हो गई
10:40उन्होंने पहली बार मोहन की आँखों में देखा
10:43उस दिन से हर बारिश की रात
10:47कोई न कोई आवाज सुनता है
10:49पहले वो नाम लेकर बुलाता है
10:52फिर दर्वाजा खट-खटाता है
10:54और अगर कोई उसके पीछे चला जाए
10:56तो कभी पहले जैसा वापस नहीं लोटता
10:59मोहन के हाथ से कुलहड छूट कर जमीन पर गिर गया
11:04उसी समय
11:05बाहर अचानक सब कुछ शान्त हो गया
11:08बारिश, हवा, यहां तक की बास के पेड़ों की आवाज भी बंद हो गई
11:14ऐसा लग रहा था जैसे पूरा गाउं एक पल के लिए थम गया हो
11:19तब ही दूर बास के जंगल की पीच एक पीली सी लालटीन जलुठी
11:26उसकी रौशनी बारिश के अंधेरे में साफ दिखाई दे रही थी
11:30काका, वो देखिए, जंगल में कोई लालटीन लेकर खड़ा है
11:35रामू काका ने बाहर देखा और उनका चहरा एकदम उतर गया
11:40वो लालटेन किसी इंसान के हाथ में नहीं है
11:45तीनों उसी रौशनी को देखते रहे
11:46कुछ सेकेंड बाद वो लालटेन धीरे-धीरे जंगल के और अंदर जाने लगी
11:53और उसके पीछे ऐसा लगा जैसे कोई आदमी बिना आवाज किये चल रहा हो
12:00रामो काका ने जल्दी से लालटेन उठाई और दोनों लड़कों की तरफ देखा
12:03अर आज राज सच नहीं जाना तो ये आवाज कभी हमारा पीछा नहीं छोड़ेगी
12:08चलो अब हमें उस जंगल में जाना होगा
12:11रामो काका की बात सुनकर मोहन और सुरेश कुछ पल तक चुप खड़े रहे
12:18बाहर बारे शब भी हो रही थी लेकिन पहले जैसी तेज नहीं
12:23दूर बास की जंगल की बीच चल रही लालटेन अब भी वहीं दिखाई दे रही थी
12:29ऐसा लग रहा था जैसे कोई जान बूच कर उनका इंतजार कर रहा हो
12:35रामो काका ने दुकान का चूला बुझाया लालटेन उठाई और दर्वाजा खोल दिया
12:41मेरे पीछे पीछे चलना जो भी हो मेरी इजाज़त के बिना किसी तरफ मत जाना
12:49तीनों दुकान से बाहर निकले
12:52बारिश की ठंडी बूंदें उनके चेहरों पर गिर रही थी
12:56कीचड से भरी पक डंडी पार करते हुए
12:58वे धीरे धीरे बास के जंगल की तरफ बढ़ने लगे
13:03गाउं की आखरी चौपाल पीछे चूट चूट चुकी थी
13:06अब चारों तरफ सिर्फ बास के लंबे पेड थे
13:11हवा चलती तो उनके टकराने की आवाज पूरे जंगल में गूंच जाती
13:15काका, क्या लोग सच में यहां रात में आते थे?
13:19पहले आते थे, लेकिन हरी नरायन के बाद
13:23सूरज ठलते ही, इस रास्ते पर कोई नहीं चलता
13:26कुछ दूर चलने के बाद, रामु काका अचानक रुक गए
13:31उन्होंने लाल्टे मीचे की, गीली मिट्टी पर, ताजा पैरों के निशान बने हुए थे
13:38लगता है कोई अभी अभी यहां से गुजरा है
13:41रामु काका जुक कर निशानों को देखने लगे
13:46कुछ पल बाद, उन्होंने धीरे से सिरहलाया
13:51नहीं, ये हमारे आने से पहले के नहीं है
13:55फिर, ये निशान हमारे साथ साथ चल रहे है
14:00मोहन और सुरेश के चेहरे का रंग उड़ गया
14:04उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा
14:07बारिश गीली मिट्टी पर लगातार गिर रही थी
14:10लेकिन उनके पीछे कोई नहीं था
14:14उसी समय, जंगल के अंदर से
14:18एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी
14:21मा, कोई है?
14:24आवाज इतनी साफ थी
14:26कि मोहन एक कदम आगे बढ़ गया
14:30काका, लगता है कोई बच्चा फस्या है
14:32रुको, ये जंगल
14:34कभी किसी बच्चे की आवाज नहीं निकालता
14:38ये तुम्हें बुला रहा है
14:40मोहन तुरंत रुक गया
14:43उसी पल
14:45रोने की आवाज अचानक बंध हो गई
14:47और उसकी जगा
14:49धीमी हसी सुनाई देने लगी
14:52ही, ही
14:55तीनों के रॉंग्टे खड़े हो गए
14:57तभी
14:58दूर दिखाई दे रही लाल्टेन
15:01अचानक अपने हाप बुच गई
15:04पूरा चंगल
15:05कहरे अंधेरे में डूप गया
15:07रामु काका ने कापती आवाज में का
15:10लाल्टेन बुच गई
15:11इसका मतलब
15:13वो हमारे बहुत करीब आ चुका है
15:15उसी समय
15:17मोहन ने अपने बिलकुल पीछे
15:19किसी की धीमी सांसों की आवाज सुनी
15:22लेकिन
15:23रामु काका की बात याद करके
15:25उसने पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं की
15:29बारिश फिर तेज होने लगी
15:31और बांस के पेड जोर-जोर से हिलने लगे
15:34ऐसा लग रहा था
15:35जैसे पूरा जंगल अब जाक चुका हो
15:38जंगल में एक बार फिर गहरा सननाटा चा गया
15:42बारिश की बूंदे अब भी बांस के पत्तों पर गिर रही थी
15:46मोहन ने पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं की
15:50उसे साफ महसूस हो रहा था
15:52कि कोई उसके बिलकुल पीछे खड़ा है
15:55रामु काका ने धीरे से लाल्टेन उपर उठाई
15:58उसकी हलकी सी रोश्नी में
16:01सामने एक पुराना तूटा हुआ चबूतरा दिखाई दिया
16:05उसके बीचों बीच एक जंग लगी कुलहड़ी पड़ थी
16:10काका? क्या ये?
16:15हाँ, यही हरी नारायन की कुलहड़ी है
16:18बीस साल से यही पड़ी है
16:22इतने में बांस के पेड़ों के पीछे से
16:26एक परचाई धीरे धीरे बाहर आई
16:28वो इनसान जैसी दिख रही थी
16:31लेकिन उसका चहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था
16:34बारिश उसके आर पार गिर रही थी
16:37जैसे उसका कुई शरीर ही न हो
16:39काका वो कौन है
16:43आखे नीचे रखो
16:45उसके चहरे की तरफ मत देखना
16:48वो परचाई बिना कुछ बोले
16:50धीरे धीरे उनकी तरफ पढ़ने लगी
16:53जैसे जैसे वो पास आ रही थी
16:56हवा और ठंडी होती जा रही थी
16:58अचानक वो वही रुगे
17:01फिर बहुत धीमी आवाज में बोली
17:04रामो तू बच गया था
17:08लेकिन आज नहीं
17:12रामो काका ने कापते हुए
17:15जमीन पर पड़ी कुलहाडी उठा ली
17:17तू हरी नारायन नहीं है
17:20हरी नारायन तो उसी रात मर गया था
17:23तू सिर्फ उसकी आवाज लेकर लोगों को बुलाता है
17:27इतना सुनते ही
17:30पूरे जंगल में तेज हवा चलने लगी
17:33बांस के पेड जोर जोर से टकराने लगे
17:36वो पर चानक चीख उठी
17:39उसकी आवाज पूरे जंगल में गूंच गई
17:42रामु काका ने पूरी ताकत से कुलहाडी
17:45उस पुराने चबूत्रे पर दे मारी
17:47धडाम
17:48उसी पल धर्ती जैसे हलकी सी काप गई
17:52पर चाई धूए की तरह बिखरने लगी
17:55उसकी चीख धीरे धीरे दूर होती चली गई
17:58फिर सब कुछ शान्त हो गया
18:02क्या सब खत्म हो गया
18:05खत्म या कुछ समय के लिए शान्त
18:09ये कोई नहीं जानता
18:12तीनों बिना एक शब्द बोले
18:14गाउं वापस लोटाए
18:16अगली सुभा गाउं के कुछ लोग हिम्मत करके
18:20जंगल तक गए
18:21जहां पुराना चबूत्रा था
18:23वहाँ अब सिर्फ टूटी हुई कुलहाडी पड़ी थी
18:27लेकिन गीली में टी पर
18:28तीन नहीं
18:30चार लोगों के पैरों के निशान बने हुए थे
18:33गाउं वाले आज तक नहीं समझ भाए
18:35कि चौथा आदमी कौन था

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