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बॉलीवुड में माँ पर बनी फ़िल्मों में काफ़ी बदलाव आया है; पहले माँ को नैतिकता और त्याग की एक सम्मानित मिसाल के तौर पर दिखाया जाता था, लेकिन अब उन्हें एक जटिल और कई पहलुओं वाली इंसान के तौर पर दिखाया जाता है। क्लासिक सिनेमा ने 'मदर इंडिया' (1957) जैसी यादगार फ़िल्मों के ज़रिए माँ के किरदार को अमर बना दिया, वहीं 'नील बट्टे सन्नाटा' (2015), 'मॉम' (2017) और 'मिमी' (2021) जैसी फ़िल्में ऐसी माताओं को दिखाती हैं जो अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए लड़ती हैं, न्याय के लिए आवाज़ उठाती हैं और सरोगेसी व सौतेले माता-पिता बनने जैसे आधुनिक कॉन्सेप्ट्स को अपनी शर्तों पर अपनाती हैं
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