00:01नमस्कार, मैं श्वेता दिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती हूं।
00:32नमस्कार, मैं श्वेता दिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती हूं।
01:01नमस्कार, मैं श्वेता दिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती हूं।
01:21सृष्टी में दिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती है।
01:51माया जनननी है, पोशन करती है, अपना स्वरूप त्याप कर, संतान का स्वरूप निर्मान करती है।
01:57पुरुष का ऐसा संबंद नहीं है, मूल में तो पुरुष में करता भाव ही नहीं है।
02:02माया ब्रम्ह को आवरित रखकर स्वयम स्रिष्टी का संचालन करती है।
02:07संपून दृष्य स्रिष्टी माया ही है, वले ही ब्रम्ह भीतर बैठा।
02:12ब्रम्ह को धारन करना, पुरुष दें से अंच लेकर आना, शरीर आकरती का निर्मान स्वयम की शरीर से करना, उसके
02:20आत्मा को परिश्रित करके परिवार में जीने के योग्य बनाना, अपने भूत्ते पर स्रिष्टी को सौप देना सब कुछ दिव्यता
02:28है।
02:29आज की शिक्षत व्यवस्था में लिंग भेद ही समाप्त प्राय हो रहा है। इस जी पुरुष की कामना, सपने, जीवन
02:35शैली, सभी कुछ एक ही धरातल पर आ गए। दोनों की शिक्षा का एक ही लक्षे रह गया, करियर यानि
02:42की पेट भरना, शेश जीवन ही सिमट गया।
02:46करियर ने जीवन को पेट तक समेर दिया, शरीर कधान हो गया जीवन कीौ, आत्मा शब्द ही हो गया, शरीर
02:55पशुभाष है, जिव्यता आत्मा की है, हम सब आत्मा अद्रिश्य हैं, शरीर के माधम से जीते हैं।
03:03साधन शरीर अब साध्य हो गया, प्रक्रती ने शरीर को भी सम्मसर और रित्मों में बांट रखा है, शरीर की
03:09भूमिका का आधार वहीं से तै होता है, उत्य शिक्षा की कामना ने इस सम्मसर चक्र को थिन्न भिन्न कर
03:16दिया, जिस प्रकार गैरेज में 20 साल बंद विश्व की �
03:21श्रेष्टगार को बाहा निकालो, तु चलने लायक नहीं रहेगी, सारे सिस्टम को नए सिर्य से खरा करना पड़ेगा, यही हाल
03:28इस्टी शरीर का होने लगा है, देर से शाधी करने पर पहले उसे IVF की शरण में जाना पढ़ रहा
03:34है, शाधी न करना, संतान पैदा न करने क
03:38कामनान लोध कुपचार की शरीर पर आक्रामकता, इस्त्रेण भाव का अभाव सब कुछ जीवन को विकृती की और धकेलता जाता
03:46है, अंगभंग ही इस सिंतन की परनिती दिखाई पढ़ने लगी है, लड़कों जैसे जीने की चाहत, स्वच्छन्द जीवन शैली, को
03:54मलता क
03:55पूरुष भाव में वदल देने का ही प्रयास प्रमानित हुआ, इस्त्रेण विखंडित हो गया, पूरुष पहले ही इस्त्रेण भाव की
04:02अलपता का शिकार हो गया है, अब इस्त्री भी इस्त्रेण भाव को कोशित नहीं करती, शरीर भले भिन हो, इस्त्री
04:22पूरुष भी
04:40पिर्ट प्रतितो पाहर कमजोर होने लगा, सिनेमा, टीवी, फोन ने टाक्रतिक मर्यादाओं کو जटक दिया,
04:53शरीर के प्रतिजिग्यासा समाप्त होने तथा शिक्षा करियर ने स्वतंद्र रहने की स्वेच्छा ने इस्त्री की भूमी का ही बदल
05:01डाली
05:01पुरुष और कमजोर हो गया
05:03शिक्षा ने समाज का रूप भी बदल डाला
05:06हर एक के पास एक ही विकल्प रहे गया जीने का नौकरी
05:09शिक्षा में जीवन निर्मान नहीं है, संसकार नहीं है
05:12इस्त्री पुरुष दोनों को ही नौकरी करनी है, घर चलाना है
05:16कौन सा घर? न शादी, न बच्चे
05:19और कर भी ले तो नौकरी घर बैठे जो कर नहीं सकते, घर से दूर जाना ही पड़ेगा
05:25संयत परिवार में कोई न इस्त्री होती है, न पुरुष होता है
05:30संबंधों के कारण इस्त्री पुरुष के जिस दिव्य स्वरूप को व्यक्ति जीता है, वह एकल परिवार में लुप्त हो जाता
05:37है
05:37चारों और काजे स्थल, पढ़ोस या अन्य अवसर पर इस्त्री पुरुष रह जाते हैं
05:42शरीर मात्र मानकर की वहवार भै जाता है, उसमें भी मन का स्थान गुद्धी ले लेती है
05:48आत्मभाव अनिवाद्य नहीं लगता, न दूसरा आत्मियता से बात करता, दिव्यता चर्चा से बाहर हो गई
05:55अब संतान भी जाविक हो गई, मा अनभिग्य है जीवात्मा के धरापल से, संसकार परंपरा से, जीवात्मा के पजिशकार एवं
06:03पोशन से
06:04जीवात्मा जिस शरीर को छोड़ कर आता है, उसके संसकार नई मानव देह में भी बने रहते हैं
06:11वैसा ही देश बनेगा, उच्चे शिक्षा में संसकार चींगी है, दिव्यता चींगी, मानव शरीर में अमानुष आत्माएं जीने लगी हैं,
06:19समाज विक्रित हो गए, देश में मानवता रसातल की और प्रवाहित होने लगी हैं, नमस्कार