विष्णु पुराण अध्याय 5 में जानिए ध्रुव के वंश में जन्मे अधर्मी राजा वेन की विनाशकारी कहानी और भगवान विष्णु के अंशावतार राजा पृथु के प्राकट्य का रहस्य! जब अधर्म के कारण धरती माँ ने समस्त अन्न और औषधियों को निगल लिया, तब राजा पृथु ने धनुष उठाकर पृथ्वी का पीछा किया। जानिए कैसे पृथु ने पृथ्वी को गौरूप में दुहकर समस्त जीवों के जीवन का उद्धार किया और विश्व के पहले सार्वभौम सम्राट बने।
#VishnuPurana #KingPrithu #PrithuAvatar #HinduMythology #SanatanDharma #IndianHistory #Puranas
#VishnuPurana #KingPrithu #PrithuAvatar #HinduMythology #SanatanDharma #IndianHistory #Puranas
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00महर्शी पराशर अपने परम ज्यानी शिश्य मैत्रे को ध्रूव जी के अती पवित्र और तेजस्वी वंश की अमर कथा सुनाना
00:07प्रारंब करते हैं।
00:09परम भक्त ध्रूव के पश्चात उनके धर्मनिष्ट वंश जोने प्रित्वी पर सत्यक्त न्याय और भगवान विश्नु की निश्चल भक्ती का
00:18ध्वज लहराया।
00:19ध्रूव के वंश में शलिष्ट और रिपू जैसे महान राजाओं ने जन्म लेकर वेदों के ग्यान और यग्यों की पवित्र
00:27परमपरा को जीवित रखा।
00:28वंश की इस पवित्र परमपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रजापती उल्मुख के प्रतापी पुत्रों ने ब्रहमांडिय धर्म की रक्षा का
00:37संकल्प लिया।
00:39इसी महान सूर्यसमान उज्वल वंश में राजा अंका जन्म हुआ जो बालेकाल से ही अत्यंत धर्मनिष्ट और करुणामई हृदयवाले थे।
00:49वयस्क होने पर राजा अंका राज्याभिशेक संपूर्ण नगर में वेदमंत्रों की गूंज और पुषपवर्शा के बीच अत्यंत धूमधाम से किया
00:58गया।
00:59राजा अंग ने अपनी प्रजा को अपने संतानों की भांती माना और उनके राज्य में हर नागरिक सुख और शांती
01:07से जीवन बिताता था।
01:09महाराज अंग निरंतर विशाल यग्यों का आयोजन करते थे, जिससे समस्त देवगन और स्वय भगवान विश्नु सदैफ प्रसन्न रहते थे।
01:19अपार वैभव और सर्वप्रिय शासन होने के बाद भी राजा अंका हृदय पुत्रहीन होने के गहन दुख से निरंतर व्यथित
01:27रहता था।
01:29उनकी पत्नी महारानी सुनी था, जो मृत्यु देव की पुत्री थी, राजा के इस भारी दुख को देखकर स्वय अत्यंत
01:36दुखी रहती थी।
01:39महर्शी पराशर ने मैत्रे को बताया कि महारानी सुनिथा के पिता मृत्यु का प्रभाव आने वाले वंश के भागय पर
01:46छाया हुआ था
01:48संतान प्राप्ती की तीवर लालसा में राजा अंगने रिशियों के परामर्ष पर महान पुत्र कामिष्टी यग्य का संकल्त लिया
02:08में अश्रु भरकर अगनिदेव को आहुतिया दी और एक योग्य वधर्मनिष्ट पुत्र के लिए प्रार्थना की
02:15राजा की निश्चल भक्ती देख कर पवित्र यग्य कुंड से अलोकिक किरने फूट पड़ी और संपूर्ण वातावर्ण प्रकाशमान हो उठा
02:25अगनी के बीच से दिव्याकृती वाले यग्यपुरुष प्रकट हुए जिनके हाथों में खीर से भरा स्वर्णिन पात्र जग्मगा रहा था
02:34यग्यपुरुष ने राजा अंको वह दिव्यप्रसाद सौंपते हुए आशिरवाद दिया कि उनकी मनोकामना शीघ्र ही पूर्ण होगी
02:43महारानी सुनीथा ने अत्यंत श्रद्धा पूर्वक उस दिव्यप्रसाद का ग्रहन किया जिससे नए जीवन की नीम रखी गई
03:03पूर्णे चेतावनी दी की नेती का एक अग्यात और भयानक काला साया उस होने वाले बालत पर मंडरा रहा था
03:11प्राचीन काल में अंग देश के धर्मात्मा राजा अंग अपनी प्रजा को पुत्रवत पालते थे
03:17किन्तु अपनी संतानहींता से एक गहरा शून्य अनुभव करते थे जिससे उनका विशाल सामराज भी सूना लगता था
03:26पुत्र प्राप्ती की कामना में उन्होंने मृत्यू की पुत्री अपसरा सुनित्रा से विवाह किया
03:31यह नहीं जानते थे कि इस संबंध से एक ऐसे बीज का रोपन हो रहा है जो उनके वंश और
03:38धर्ती के लिए काल बनेगा
03:41गर्भावस्था के दोरान ही समूचे अंग देश पर एक भयावः शान्ती चा गई आकाश में घने काले बादल मंदराने लगे
03:50और धर्ती भी आने वाले प्रलै का आभास कराती हुई काप उठी
03:55और फिर उस अशुब घडी में जब तारे भी छिप गए थे राजकुमार वेन का जन्म हुआ जिसकी पहली चीक
04:02से ही बातावर्ण में एक अजीव सी भयाभता घुल गई मानो धर्ती ने अपना पहला अभिशाप सुना हो
04:10बचपन से ही वेन की आखों में एक क्रूर चमक थी वह निरीः पशुओं और यहां तक की अपने खेलने
04:17वाले साथियों को भी अकारण ही पीडा पहुचाने में आनंद लेता था
04:23रानी सुनित्रा अपनी पुत्री के इस अंधेरे स्वभाव को देखती रही कभी एक अनकही पीडा के साथ तो कभी अपने
04:31पिता मृत्यू के वंश की नेती को स्वीकार करते हुए एक विचित्र तटस्थता से
04:37जैसे जैसे वेन बड़ा होता गया उसकी क्रूरता भी बढ़ती गई वह निर्दोश दर्बारी सेवकों और यहां तक की रिशियों
04:45का अपमान करने और उन्हें प्रताडित करने में कोई संकोच नहीं करता था
04:51राज्य के विद्वान ब्राहमन और अनुभवी मंत्री राजकुमार के बढ़ते हुए दुशकर्मों को देख चिन्तित हो उठे और उन्होंने राजा
04:59अंग को बार-बार चेतावनी दी की यह भावी अंधकार की निशानी है
05:05राजा अंग ने कई बार अपने पुत्र वेन को समझाने का प्रयास किया, उसे धर्म और न्याय का पाथ पढ़ाया,
05:13किन्तु राजकुमार के हृदय पर उनके शब्दों का कोई प्रभाव नहीं पढ़ा
05:18अपनी शक्ती के मद में चूर वेन ने जल्द ही अपने जैसे ही क्रूर और अधर्मी युवाओं का एक दल
05:25बना लिया, जिनके साथ मिलकर वह राज्ज में आतंक फैलाने लगा
05:30वेन के बढ़ते अत्याचारों से पूरा अंग देश भयभीत था, प्रजा की आखों में निराशा और विद्रोह की एक धूमिल
05:38चिंदारी सुलगने लगी थी
05:41राजा अंका हरिदय पुत्र के ऐसे कुकर्मों को देख निरंतर विदीर्ण होता रहा, वह अपने ही वंश के विनाश को
05:48अपनी आखों से देख रहे थे
05:51उन्होंने वेन को धर्म, नैतिक्ता और राजा के कर्तवियों के बारे में बार-बार सिखाया, उसे एक आदर्श शासक बनने
05:59के लिए प्रेरित करने का हर संभव प्रयास किया
06:03किन्तु वेन अपने पिता की किसी बात को नहीं मानता था, वह धर्म को एक मूर्ख तापून बंधन और राजा
06:10के नियमों को अपनी व्यक्तिगत शक्ती के आड़े आने वाली बाधा मानता था
06:16अपने पुत्र के अप्रिवर्तनिय स्वभाव से निराश होकर, राजा अंग ने अपना राजपाट त्याग दिया और वन में जाकर तपस्या
06:24करने का निर्ने लिया, ताकि वे अपने पापों का प्रायश्चित कर सकें
06:29राजा के चले जाने के बाद वेन ने बिना किसी विरोध के सिनहासन संभाला और उसका राज्याभिशेक एक भव्य उत्सव
06:38के बजाए एक गंभीर भयावः चेतावनी जैसा प्रतीत हुआ
06:43सिनहासन पर बैठते ही वेन ने तुरंत ऐसे फर्मान जारी किये जिनसे सभी धार्मिक यग्य, दान और देवताओं की पूजा
06:51पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया
06:54उसने घोषणा की की केवल उसी की पूजा की जाए, क्योंकि वह ही परमेश्वर है और उसके अलावा किसी और
07:02शक्ती को स्विकार करना दंडनिय अपराध होगा
07:06परिणाम स्वरूप पूरा अंग देश घोर अंधकार में डूब गया, यग्यों की पवित्र अगनी बुझ गई और मंदिरों में सन्नाटा
07:14चा गया, मानो धर्म स्वय धर्ती से विदा हो गया हो
07:18इस प्रकार वेन के अत्याचारों ने धर्ती को एक ऐसे रसातल में धकेल दिया, जहां धर्म का नामो निशान मिट
07:26चुका था और केवल निरंकुष सत्ता का अंधेरा ही राज करता था
07:31नव्युवक राजा वेन ने राज्या भिशेक के भव्य अनुष्ठानों के तुरंत बाद अपने नवर्जित सिन्हासन पर बैठते ही अपनी शक्ती
07:40का प्रदर्शन करना प्रारंभ कर दिया, जिसके मुखमंडल पर दंभ की छाया स्पष्ट जलक रही थी
07:47राज सभा में एकत्रित अपने मंत्रियों और प्रजाजनों के सामने राजा वेन ने एक ऐसी घोशना की जिसने सभी को
07:55स्तंभित कर दिया, मानो आकाश से वजर्पात हुआ हो
08:00उसने गरस्ते हुए कहा कि अब कोई यज्य नहीं होगा, कोई पवित्र अनुष्ठान नहीं किया जाएगा और नहीं किसी देव
08:08की पूजा होगी
08:10उसकी अहंकारी वानी ने घोशना की की अब से केवल वही राजा वेन एक मात्र पूजनिय देवता है और सभी
08:18को केवल उसी की आराधना करनी होगी
08:21इस भयानक घोशना से प्रजा में हाहाकार मच गया, भय और अविश्वास की लहर पूरे राज्ज में फैल गई
08:30राजा के क्रूर सैनिक ततकाल आदेश का पालन करते हुए, मंदिरों और यग्यशालाओं में घुस गए और पवित्र वेदियों को
08:38ध्वस्त करना शुरू कर दिया
08:41धर्मनिष्ट पुरोहितों और रिशियों ने वेन को समझाने का विफल प्रयास किया, उनके मुख पर वेदना और चिन्ता के भाव
08:48स्पष्ट थे
08:50परंतु वेन ने उनकी एक न सुनी, अपितु उसने स्वयं को देवताओं से भी बढ़कर घोशित करते हुए, उनकी भक्ती
08:58का उपहास किया
09:00धार्मिक कर्मकांडों के रुकने से पूरी प्रित्वी पर एक अजीब सा सुनापन छा गया, मानो प्रकृती ने स्वयं अपनी जीवंतता
09:08खोदी हो
09:10ब्रहमांड के रक्षक, भगवान विश्णू ने अपने क्शीर सागर में विराज मान होकर प्रित्वी पर फैले इस घोर अधर्म को
09:18महसूस किया
09:20प्रित्वी पर संतों और रिशियों के मन में आशंका घर कर गई कि इस अधर्म से कहीं कोई बड़ा दैविय
09:26प्रकोप ना आ जाए
09:29एक दिन जब कुछ भक्त चुपके से भगवान विश्णू की पूजा करने का प्रयास कर रहे थे, वेन के क्रूर
09:35सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया और उनके अनुष्ठान को भंग कर दिया
09:41वेन का अत्याचार बढ़ता ही गया, और जो भी उसके नियमों का उलंगन करता, उसे कठोर दंड दिया जाता
09:49बच्चे जो कभी मंदिरों में मंत्रोचार सुनते थे, अब सूनी वेदियों को देखकर भंध और उदास खड़े रहते थे
09:58समस्त राज्य में एक भारी दमनकारी मौन छा गया, मानों हवा में भी अध्यात्मिक सूखा पड़ गया हो
10:06जब यह अत्याचार अपनी सीमाय लांध गया, तो प्रबुध रिशियों ने वेन को समझाने का अंतिम प्रयास करने का निर्णै
10:14लिया
10:15उन्होंने राजा के दर्बार की ओर प्रस्थान किया, उनके चहरों पर द्रिढ संकल्प और अंतिम आशा की जलक थी
10:24राज़ दर्बार में पहुँचकर उन रिशियों ने वेन से नमरता पूर्वक परंतु द्रिढता से अपने कुकर्मों को त्यागने और धर्म
10:32का पालन करने का आगरह किया
10:35लेकिन वेन ने उन्हें अपमानित करते हुए अपने अहंकार में चूर होकर उनके पवित्र उपदेशों को ठुकरा दिया और स्वयं
10:43को ही सर्वोच शक्ती घोशित कर दिया
10:46निराश और क्रोधित होकर रिशियों ने समझ लिया कि वेन का अहंकार अब किसी भी तर्क से परे हैं और
10:54वे अब एक गंभीर निर्नय लेने के लिए विवश्ट थे
10:58दुष्ट राजा वेन के राज्ज में धर्म और नैतिक्ता का हरास हो रहा था, जहां प्रजा का हर दिन अत्याचारों
11:05और अज्यानता के बोज तले दब रहा था, जिससे धर्ती भी विलाप कर रही थी
11:11दूर एक पवित्रवन में तेजस्वी रिशिमुनी अपनी कुटिया में बैठे गहन चिन्तन में लीन थे, जहां उन्होंने वेन के अधर्म
11:19से उत्पन होते भीशन अनिष्ट को अपनी दिव्यद्रिष्टी से अनुभव किया
11:25परम पूज महर्शी भेगु ने अपनी दिव्य अंतरग्रिष्टी से भावी विनाश को भामपकर अपने योगियों को एकत्रित किया और वेन
11:33के अत्याचारों को समाप्त करने का द्रिड संकल्प लिया
11:38संकल्पित रिशियों का दल महर्शी भेगु के नेत्रित्व में वेन के राजमहल की ओर बढ़ा उनके मुखमंडल पर गंभीरता और
11:46करुणा का मिश्रण जलक रहा था
11:49राजा वेन अपने स्वर्ण सिनहासन पर अहंकारी मुद्रा में विराजमान था जब रिशियों ने राजदर्बार में प्रवेश किया तो उसने
11:58उन्हें अंदेखा करने का दुस्सा हस किया
12:01महर्शी भ्रेगु ने शांत किन्तु द्रेड स्वर में वेन को उसके राजधर्म और प्रजा के प्रती कर्तवियों का स्मरण कराया
12:09जैसे कोई मार्ग दर्शक भूले हुए यात्री को सही राह दिखाता है
12:14वेन ने उफास पूर्ण मुसकान के साथ रिशी भ्रेगु की बातों को बीच में ही काट दिया
12:20मानो एक तुछ कीट पवित्र उपदेशों को चुनौती दे रहा हो
12:26राजा वेन ने उन्माद पूर्ण स्वर में घोशना की की वही एक मात्र देवता है
12:31सभी यग्य और पूजा केवल उसी के लिए है
12:34मानो वह स्वयन ब्रहमांड का स्वामी हो
12:38राजा के इस निरंकुष उद्गोश से रिशियों के मुख पर गहरा विस्मय और क्रोध उभराया
12:44जैसे कोई शांत सरोवर में अचानक तूफान आ गया हो
12:49महर्शि भेगु ने अंतिम चेतावनी दी
12:51उनकी वानी में वजर के समान शक्ती थी
12:54जैसे प्रलै से पहले की अंतिम गड़गडा हट
12:58किन्तु राजा वेन ने रिशियों के दिव्य काउंसल को घोर अहंकार के साथ ठुकरा दिया
13:03मानो वह मृत्यू के आहवान को ही स्विकार कर रहा हो
13:08रिशियों ने एक दूसरे की ओर देखा
13:11उनकी आखों में एक शांत भयानक द्रिड़ता थी
13:14जैसे युद्ध के लिए तैयार योध्धाओं की अंतिम मौन सहमती
13:19फिर उन्होंने अपने आखे बंद कर ली
13:22अपने हाथों को ध्यान मुद्रा में जोडा
13:25और अपनी आंतरिक योगिक शक्तियों को जागरित करना आरंभ किया
13:30उनकी एक आगरता से एक तीवर उर्जा का प्रवाह उत्पन हुआ
13:34जो वायु मंदल में कमपन पैदा कर रहा था
13:37मानो अद्रिश्य शक्तिया जागरित हो रही हो
13:41महर्शी भेगु का मुख क्रोध से लाल हो गया
13:44उनकी आखें अगनी के समान धधक उठीन
13:47मानो युगों का तपस्या जनित क्रोध अब प्रजवलित हो रहा हो
13:52और फिर एक गहरा गर्जना पूर्ण हुंकार गर्बार में गूज उठा
13:57जो स्वयम प्रकृती की आत्मा से निकला एक आदिम आहवान था
14:02वेन ने भैभीत होकर अपनी गर्दन भुमाई
14:05जब उस हुंकार की शक्ती ने उसे अपनी पकड में लेना शुरू किया
14:10जैसे कोई अद्रिश शक्ती उसे जकड रही हो
14:14वह हुंकार एक गर्जना में बदल गया
14:17जिसने राजा के शरीर को अंदर तक जख जोर दिया
14:20मानो अनिष्ट का अंत करने के लिए ब्रहमांड स्वयं गरज रहा हो
14:25अंतिम और तीवर हुंकार के साथ दुष्ट वेन धर्ती पर गिर पड़ा
14:30उसका जीवन उसके शरीर से ऐसे निकल गया जैसे शुष्पत्ते से प्रान
14:35वेन के वध के साथ एक भयानक सन्नाटा चा गया
14:39मानो प्रकृती ने एक क्षन के लिए अपनी सांस रोक ली हो
14:43और फिर एक नई आशा की किरन धर्ती पर उत्री
14:48राजसिनहासन के रिक्थ होते ही धर्म का स्तंभ डग्मगा उठा
14:52और प्रजा अराजकता के गहन अंधकार में डूगने लगी
14:57रात्री के सन्नाटे में चोरी और लूट पाठ की काली चाया तेजी से बढ़ने लगी
15:13विलीन होती गई गाव-गाव में लोग त्राहित्राही कर रहे थे
15:18उनके खेतों से अन्न छीन लिया गया और उनकी जोप्रिया राख में बदल गई
15:25व्यापार के मार्ग असुरक्षित हो गए और धन्धाने से भरे कारवा मार्ग में ही लुटेरों का शिकार बनने लगे
15:33महानगरों की भव्य दीवारे भी अब सुरक्षा प्रदान नहीं कर पा रही थी क्योंकि भय का सायाहर और गहराता जा
15:41रहा था
15:42धर्ती माता ने भी मानवजाती के पापों से पीडित होकर अपनी धन संपदा को अपने गर्भ में छिपाना आरंभ कर
15:50दिया
15:52हरेभरे खेत देखते ही देखते सूखने लगे अनाज की बालिया सूख कर मुर्जा गई और अन्न के भंडार खाली हो
15:59गए
16:01जीवंदाईनी नदिया सूख कर पतली धाराओं में बदल गई उनके तल में केवल रेट और सूखे पत्थर ही शेश रह
16:08गए
16:10धर्ती के भीतर छिपे खनेज और रत्न भी अग्रिश होने लगे मानो पृत्वी ने अपनी सारी समरिधी समेट ली हो
16:18वन के प्राणी भी भूखप्यास से व्याकुल होकर भटकने लगे उनके कंकाल सूखे वनों में बिखरे पड़े थे
16:27भुखमरी ने विक्राल रूप ले लिया और बच्चे, बूढे, स्त्रीपुरुष सभी भोजन के एक दाने के लिए तरस रहे थे
16:35लोग अपने घरबार छोड़कर भोजन की तलाश में अंजान रास्तों पर निकल पड़े, किन्तु उन्हें कहीं भी आश्रय न मिला
16:45रिश्मुनियों ने अपनी कुटियों से इस भयावध रिश्य को देखा और संसार के इस अधोपतन पर गहरी चिंता व्यक्त की
16:53माताओं की गोद में दुध्मुहे बच्चे भूख से बिलख रहे थे और उनके अश्रु सूखे धर्ती को और भी नम
17:00कर रहे थे
17:02कभी अन्न से भरे रहने वाले विशाल अन्नभंडार अब धूल और जालों से भरे पड़े थे जिनकी दीवारे गहरी उदासी
17:10बया कर रही थी
17:13आकाश की ओर हाथ उठाए हुए लोगों ने इश्वर से करुन पुकार लगाई उनकी आवाजे निराशा के सागर में खो
17:20रही थी
17:22तब ज्यानी जनों ने यह समझा कि इस धर्ती को बचाने और धर्म को पुनह स्थापित करने के लिए एक
17:29शक्तिशाली समराट की आवश्शक्ता है
17:33चारो और मृत्यु का तांडव था और जीवन की हर किरन धूमिल हो चुकी थी यही वह अंधकार मैं क्षण
17:40था जहां से आशा का उदे होना था
17:42इस गेहन अंधकार के बीच एक नई सुभह की प्रतीक्षा थी जब एक महान समराट का आगमन इस धरा को
17:51पुनह जीवनदान देगा
17:54अराजक्ता के अंधकार में डूबी प्रिथवी को बचाने के लिए महर्शी भ्रेगु और समस्त रिशियों ने राजा वेन के निश्प्रान
18:01शरीर के समीप अत्यंत गंभीर विचार विमर्ष प्रारंब किया
18:06अधर्म के विनाश और राजवन्ष को समाप्थ होने से रोकने हेतू रिशियों ने प्राचीन गुप्त योग पद्धती द्वारा वेन के
18:14देह का मन्थन करने का संकल्प लिया
18:17महर्शी अत्री और अंगिरा ने पावन कुष घास और पवित्र अर्णिकाष्ठ लाकर वेन के मृत शरीर के चारों और एक
18:25सुरक्षात्मक वैदिक तंत्र निर्मित किया
18:28संपूर्ण यग्यशाला में गूंजते हुए शक्तिशाली वेदमंत्रों की ध्वनी ने वातावर्ण को प्रचंड आध्यात्मिक उर्जा और अलौकिक स्पंदन से भर
18:37दिया
18:39रिशियों ने राजा वेन के बाएं उरु अर्थात बाई जांग को मन्थन के विशेश स्थान के रूप में चेहनित करते
18:46हुए मन्थन काश्ट स्थापित किया
18:49पवित्र कुंड में प्रजवलित होती भयंकर अगनी ने विशियों के संकल्प को साक्षी मान कर अपनी लप्टों को और अधिक
18:56तीवर कर दिया
18:58महर्शी भेगु ने अपने तपोबल का आहवान करते हुए मन्थन डंड को वेन की बाई जांग पर रखकर मन्थन की
19:05क्रिया का आरंभ किया
19:08मंत्रो चार की गती बढ़ने के साथ ही राजा वेन के मृत शरीर के बाई भाग में एक तीवर और
19:14रहस्य में कमपन उत्पन होने लगा
19:18रिशियों के सामुहिक मन्थन बल से वेन के शरीर के भीतर समाया हुआ संपून अधर्म और पाप एक स्थान पर
19:25एकत्रित होने लगा
19:27अचानक राजा वेन की बाई जांग से एक धना काला धुआ और प्रचंड नकारात्मक उर्जा का बवंडर प्रकट होकर हवा
19:35में तैरने लगा
19:37उस उग्र मन्थन के परिणाम स्वरूप धुए के उस विक्राल बवंडर से एक अत्यंत विचित्र और क्रिश्नवर्ण प्राणी का जन्म
19:45हुआ
19:46वह उत्पन हुआ पुरुष छोटे कद का अत्यंत काले वर्ण वाला लाल आखों और चप्ती नासिका वाला एक उग्रस्वरूप था
19:56उसके संपूर्ण शरीर से राजा वेन के युगो युगो के पाप, क्रूर्ता और अधर्म की तीवर गंध और दुरगंध फूट
20:03रही थी
20:05भैभीत होकर उस नए प्रकट हुए प्राणी ने हाथ जोड़कर रिशियों से पूछा की है महाराज
20:11मेरे लिए क्या आग्या है?
20:15महर्शी भेगु ने उसे निर्देश देते हुए कहा निशीद अर्थात बैठ जाओ और इस प्रकार उसका नाम निशाद पड़ा
20:24रिशियों के आदेश से राजा वेन के भीतर की समस्त दुष्टता, पाप और अधर्म हमेशा के लिए निशाद के भीतर
20:31समाहित हो गए
20:33पाप से मुक्थ होते ही राजा वेन का निश्प्रान शरीर अब पूरी तरह से निश्पाप, पवित्र और अलौकिक कांती से
20:40चमकने लगा
20:42निशाद ने रिशियों को प्रणाम किया और प्रिथवी के पापों का बोज उठा कर घने वनों और परवतों की ओर
20:49प्रस्थान किया
20:51उस निशाद से ही आगे चल कर वनों में निवास करने वाली निशाद जाती और वन्य जनसमुदायों की उत्पत्ती हुई
21:00वेन के देह को पाप मुक्त करने के पश्चात अब रिशियों ने धर्म पालक और महान चक्रवर्ती राजा प्रिथु के
21:07प्राकट्य हेतु दाहिनी भुजा का मन्थन करने की तयारी की
21:12वेन की मृत्यू से व्याकुल प्रिथ्वी माता अपने दुख से और भी जरजर हो चुकी थी जहां कोई राजा न
21:19होने से अराजकता का अंधकार गहराता जा रहा था
21:22तब उन तपस्वी रिशियों ने प्रिथ्वी पर व्याप्थ हाहाकार को समाप्थ करने के लिए गहन मन्थन और दिव्य चिंतन से
21:31एक विचित्र उपाय निकालने का निश्चय किया
21:35सभी रिशियों की सहमती से यह तय हुआ कि वेन के अधम शरीर का मन्थन कर उसमें से एक ऐसे
21:42दिव्य पुरुष को प्रकट किया जाएगा जो प्रिथ्वी का उद्धार करेगा
21:47इस असाधारन अनुष्ठान के लिए वेन के मृत शरीर को एक विशेश आसन पर स्थापित किया गया और उसके चारों
21:55और पवित्र आउश्धियों व मन्त्रों का घेरा बनाया गया
21:59मन्त्रों से पूर्व रिशियों ने वेन के पापों के फलस्वरूप उत्पन हुए मैल को निकालने का निश्चय किया जो प्रिथ्वी
22:07के कष्टों का मूल कारण था
22:09वेन के वामसकंध का प्रथम मन्थन हुआ और उसके अकर्मने शरीर से निकले विक्रित काले नाटे कद के भयानक निशादगण
22:18जो पापों के प्रतीक थे
22:21उनकी भयावः उपस्थिती से वायुमंडल में एक असहनिय दुरगंध फैल गई जिससे रिशियों के मन में क्षणिक भय उत्पन हुआ
22:30परंतु रिशियों ने अपनी दिव्य शक्तियों और मंत्रों के प्रभाव से उन सभी विक्रित प्राणियों को एक पर्वती गुफा में
22:37निर्वासित कर दिया
22:39इस शुद्धिकरण के बाद वेन का शरीर अब मैल रहित होकर एक नए स्रिजन के लिए तयार था जैसे तूफान
22:47के बाद शान्थ होता महासागर
22:50फिर मुख्य रिशी ने अपने हाथों में वेन की दाहिनी भुजा को लिया जहां से एक दिव्य अवतार का जन्म
22:57होना था
22:59जैसे ही मन्थन आरंभ हुआ वेन की मृत भुजा से एक अध्भुत प्रकाश निकलने लगा जो समस्त वातावर्ण को दिव्य
23:07आभा से भर रहा था
23:09प्रकाश इतना तीव्र होता जा रहा था कि रिशियों को भी अपनी आखें बंद करनी पड़ी मानो कोई सूर्य धर्ती
23:17पर उतर आया है
23:19उस तेजस्वी प्रकाश के मध्य एक दिव्य आकरिती धीरे-धीरे आकार लेने लगी जैसे ब्रहमांड में एक नए तारे का
23:27उदे हो रहा हो
23:29अंतहक वेन के शरीर से एक तेजस्वी बालक का प्राकट्य हुआ जो अगने के समान प्रदीप्त था और जिसने अपने
23:37तेज से समस्थ लोकों को प्रकाशित कर दिया
23:41उनके हाथों में एक दिव्य धनुष और बान थे जो उनके पराक्रमी और रक्षक स्वरूप का प्रतीक थे
23:49वास्तव में वे भगवान विश्नु के अन्शावतार थे प्रित्वी पर धर्म की स्थापना और जीवों के कल्यान हेतु प्रकट हुए
23:58रिशियों ने उन्हें देखते ही पहचान लिया और उनके चर्णों में प्रणाम कर अपनी श्रधा और भक्ती व्यक्त की
24:06समस्थ देवगण आकाश से पुष्प वर्शा कर रहे थे और गंधर्व मधुर गान गाकर उनके प्राकट्य का उत्सव मना रहे
24:14थे
24:16वायुमंदल में दिव्य संगीत और सुगंध का संचार हो गया जिसने प्रिथवी पर फैले सारे शोक को हर लिया
24:24प्रिथवी माता ने भी अपने गर्ब से अनायास रतनों और औश्धियों का उदगम कर नए समराठ का स्वागत किया
24:31इस प्रकार समराठ प्रिथु का दिव्य प्राकट्य हुआ जो प्रिथवी के रक्षक और न्याय के प्रतीक बनकर युगों तक पूजे
24:40गए
24:41सूखी धर्ती पर भुख्मरी और अकाल का तांडव अपने विक्राल रूप में जन जीवन को लील रहा था जहां अन्न
24:49का एक दाना भी दुलब हो चुका था
24:52अपने प्रजाजनों की दैनिय दशादेख महाराजा प्रिथु का हरिदै क्रोध और संकल्प से भर उठा जैसे एक ज्वाला मुखी शांत
25:01होकर भी भीतर ही भीतर सुलगता रहे
25:04उन्होंने समझ लिया कि धर्ती जो कभी जीवन का सुरोत थी अब लोग से जड़ हो गई है और उसे
25:11जगाने के लिए कठोरता ही एक मात्र मार्ध है
25:15फिर अपने दिव्यधनुष अजगव को उठा कर महाराजा प्रिथुने धर्ती माता भूदेवी की ओर निशाना साधा उनकी आखों में एक
25:25अटल प्रतिग्या चमक रही थी
25:28जैसे ही दिव्यबान की प्रत्यंचाखिची भूदेवी थर्थरा उठीन उनके शांत मुख मंडल पर भय की छाया स्पष्ट रूप से दिखने
25:37लगी
25:38ततकाल उन्होंने एक विशाल दिव्यगाय का रूप धारण कर लिया जो अपनी पवित्रता और सौमेता से ब्रहमांड को आलोकित कर
25:46रही थी
25:48प्रिथु चकित रह गए किन्तु उनका संकल्प नहीं डिगा और वे उस गौरूपिनी भूदेवी का पीछा करने लगे जो तीनों
25:56लोकों में भाग रही थी
25:59धर्ती पर दौरते हुए भूदेवी ने अपनी गती और भी तेज कर दी जैसे एक म्रिगी शिकारी से बच निकलने
26:06के लिए दौरती है
26:09महाराजा प्रिथु ने भी अपनी दिव्य शक्ती का प्रयोग करते हुए उस गौ का पीछा जारी रखा उनका रत धर्ती
26:17को चीरता हुआ आगे बढ़ रहा था
26:20जब धर्ती भी सुरक्षित न रही तब भूदेवी पाताल लोक में उतर गई जहां अंधकार और रहस्य का सामराज फैला
26:28था
26:29महाराजा प्रिथु भी बिना विचलित हुए अपने रत को पाताल के गहरे अंधकार में ले गए जहां सर्प और असुरों
26:37का वास था
26:39वहां से भी कोई आश्रय न पाकर भूदेवी ने स्वर्ग लोक की ओर उडान भरी बादलों और देवताओं के बीच
26:46शिपने का प्रयास किया
26:48किन्तु महाराजा प्रिथु की द्रिड़ता आकाश में भी उनका पीछा करती रही उनका रत बादलों को भेदता हुआ स्वर्ग की
26:56उचाईयों पर पहुँच गया
26:59स्वर्ग में भूदेवी ने देवताओं से दया की भीख मांगी अपनी पीड़ा व्यक्त की पर प्रिथु के क्रोध के समक्ष
27:07कोई हस्तक्षेप नहीं कर सका
27:09प्रिथु का संकल परवत से भी अडिक था वे जानते थे कि उनकी प्रजा के जीवन के लिए यह युद्ध
27:17हावश्यक है
27:19तीनों लोकों में भागते भागते भूदेवी ठक कर चूर हो गई उनकी दिव्य आभा कुछ मलान पढ़ने लगी और वे
27:26असहाय महसूस करने लगी
27:29अंतह किसी भी लोक में कोई ठिकाना न पाकर भूदेवी ने स्वयं को महाराजा प्रिथु के समक्ष विवश पाया
27:38उन्होंने अपनी गर्दन मोड कर प्रिथु की ओर देखा उनकी आखों में एक मुख प्रश्न था क्या आप सचमुछ मुझे
27:45दंडित करेंगे
27:47महाराजा प्रिथु ने एक पल के लिए अपनी मुद्रारों की उनके हृदय में कर्तव्य और करुणा के बीच तीवर संधर्श
27:55चड़ रहा था
27:56तब भूदेवी ने मनुष्यों की भाषा में बोलना शुरू किया अपनी रक्षा के लिए तर्क प्रस्तुत करते हुए और प्रिथु
28:04से एक नया मार्ग खोजने का अग्रह किया
28:08भूदेवी ने समझाया कि वह केवल एक गाय नहीं बलकि संपूर्ण ब्रहमांड की पोशक शक्ती है और उसे मारना स्रिष्टी
28:16का विनाश होगा
28:18क्रोधित प्रिथु जिनके हृदय में अपने भूखे प्रजाजनों के लिए गहरा संकल्प था ने प्रिथवी को अन्न देने के लिए
28:26अपने अदमय शौर्य और दिव्य शक्ती का प्रदर्शन करते हुए उसे अपने बानों से बेधने का निश्चय कर लिया था
28:34प्रिथवी जो एक विशालकाय और चमकदार गौ के रूप में स्वयं को छिपाए थी भैभीत होकर एक भयानक गती से
28:42उस उजाड भूमी पर सरपट दौड रही थी जहां जीवन का कोई चिन्ह शेश न था
28:49महाबली प्रिथु एक तेजस्वी श्वेत अश्व पर सवार अपनी दिव्य प्रत्यंचा पर बान साधे अथा सूखी भूमी पर अथक गती
28:57से प्रिथवी का पीछा कर रहे थे मानो भाग्य का चक्र उन्हें स्वयंखी इच रहा हो
29:04भय और विशाद से भरी प्रिथवी ने एक पल के लिए पीछे मुड़ कर प्रिथु को देखा उसकी आखों में
29:10एक मूख याचना थी जो उसके अंदर के गहन दुख को व्यक्त कर रही थी
29:16किन्तु राजा प्रिथु जिनकी आखों में अपनी प्रजा के लिए अन्न का संकल्प जल रहा था
29:22अपनी प्रत्यंचा पर कसे बान की भाती अटल थे और पीछे हटने को तयार न थे
29:29अंतह ठककर प्रिथवी एक गहरे खड के किनारे रुक गई उसकी आखों में भय के स्थान पर अब एक विवश्च
29:36स्विक्रिती और कुछ उचसुक्ता का भाव जलक रहा था
29:41प्रिथु ने अपने अश्व से उतर कर प्रिथवी के समक्ष खड़े होकर अपनी प्रजा के कश्टों का वर्णन करते हुए
29:48उसे अन्नप्रदान करने की अपनी अटूट प्रतिग्या सुनाई
29:53प्रिथु के न्याय संगत आग्रह को समझ कर प्रिथवी ने अपनी गौस्वरूप त्याग कर एक दिव्य शोभायमान देवी का रूप
30:00धारन कर लिया, जो शांती और शक्ती का प्रतीक थी
30:05दिव्य प्रिथवी देवी ने प्रिथु से कहा कि वह स्वार्थी लोगों द्वारा बार-बार दोहन किये जाने के भय से
30:12ही भाग रही थी और उनके इस भय में अतीत की पीडा चिपी थी
30:17प्रिथु ने अत्यंत नमरता और द्रिडता से प्रिथवी देवी को अपनी शुद्धनियत और प्रजा के कल्यान के लिए उनकी संसाधनों
30:26का सदुप्योग करने का वचन दिया, जिससे उनके हृदय में विश्वास जागरित हुआ
30:32देवी प्रिथवी, प्रिथु के निस्वार्थ वचन और अटल संकल्प को पहचान कर अपनी आखों में आशा की एक नई किरण
30:40के साथ धीरे से सिरहिला कर अपनी सहमती व्यक्त की
30:44स्वर्ग सेक्त्रिदेव, ब्रह्मा, विश्नु और महेश इस अलौकिक घटना के साक्षी बन रहे थे, उनके दिव्य मुखों पर आने वाले
30:53समय की प्रतीक्षा और अनुमोदन के भाव थे
30:57राजा प्रिथु, पवित्र भाव से प्रिथवी देवी के समक्ष खड़े होकर, अपने हाथों को एक दिव्य पात्र की भाती फैला
31:05कर प्रिथवी का दोहन करने के लिए तैयार हुए, मानो वह प्रकृती से ही जीवन का अमरित ग्रहन कर रहे
31:11हुँ
31:13प्रिथवी देवी ने एक मधुर मुसकान के साथ स्वयं को दुहने की अनुमती दी, और उनके दिव्य स्वरूप से एक
31:20चमकीली, जीवन दायनी धारा प्रिथु के अंजुली में प्रवाहित होने लगी
31:25वह दिव्य अमरित जैसे ही बंजर भूमी को स्पर्श करता, तुरंत हरे भरे अंकुरों में परिवर्तित हो जाता, जो नए
31:33जीवन और उर्वर्ता के आगमन का प्रतीक थे
31:37शन भर में विस्तरित स्वर्णिन फसले पककर लहलहा उठीन और चमकीली ओशधिय जडी बूटिया उस उजाड भूमी पर खिलने लगी,
31:46जिसने उसे एक हरे भरे स्वर्ग में बदल दिया
31:50विशाल नदिया निर्मल जल से भर कर बहने लगी, सूखी हुई नदी घाटियों में जीवन लोट आया, और हिरन, मोर
31:58तथा अन्य पशु अपनी प्यास बुझाने के लिए उन नए जल स्रोतों की ओर दौड पड़े
32:04मानवता, जो कुछ क्षण पहले दुर्बल और ठकी हुई थी, अब प्रचुर फसल पर आनंद पूर्वक उच्सव मना रही थी,
32:12उनके चहरे राहत और राजा प्रिथु तथा उदार प्रिथवी के प्रती गहरी कृतग्यता से चमक रहे थे
32:20प्रिथु अब एक सच्चे समराठ के रूप में अपने पुनह जीवित हुए राज्य को निहार रहे थे, उनके चारों और
32:27एक अलौकिक तेज था और उनकी प्रजाने उन्हें पहला सच्चा राजा स्विकार किया, जिसने उन्हें जीवन प्रदान किया था
32:36लहलहाती, प्रचुर प्रिथवी, प्रिथवी देवी की दयालू द्रिष्टी और राजा प्रिथु के बुद्धिमान शासन के तहत, उनके पवित्र प्रतिज्या का
32:45शाश्वत प्रमान बन गई, जो भविश्य की पीढियों के लिए निरंतर पोशन सुनिश्चित करती है
32:52धर्ती से अमरित रूपी संपदा प्राप्त करने के पश्चात महाराज प्रिथु ने संपून स्रिष्टी के कल्यान हेतु नवनिर्मान का संकल्प
33:00लिया
33:02विशम तथा पत्रीली भूमी को देख कर समराट प्रिथु ने मानव जाती के निवास और क्रिशी योग्य समतल धरातल बनाने
33:10का निर्णय किया
33:12अपने महान धनुष की टंकार करते हुए राजा प्रिथु ने विशाल परवत शिकरों को विदीन कर भूमी को समतल बनाना
33:19आरंब किया
33:21देखते ही देखते दूर दूर तक फैले दुर्गम परवत मार्ग सुगम हो गए और चारों और विशाल उर्वर मैदानों की
33:29रचना हुई
33:31महाराज प्रिथु ने इतिहास में पहली बार व्यवस्थित नगरों, ग्रामों तथा दुर्गों की नीव रख कर मानव सभ्यता को एक
33:39नया आधार दिया
33:41वनों को काट कर सुरक्षित मार्ग बनाए गए, जिससे विभिन क्षेतरों के बीच व्यापार और आवागम सुचारू रूप से संचालित
33:49होने लगा
33:51समराट ने प्रजा को क्रिशी विद्या का ज्यान प्रदान किया, जिससे धरापर लहलहाती फसलें और भांती-भांती के अन्न उत्पन
33:59होने लगे
34:01नदियों और नहरों की सुव्यवस्थित धाराओं को खेतों तक पहुँचाया गया, जिससे सूखी भूमी भी हराभरा उद्यान बन गई
34:10चारू और समरिध्धी छा गई और आनन्दित प्रजा अपने कृपालू राजा प्रिथु के जयकारों से संपून आकाश को गुंजायमान करने
34:18लगी
34:20महाराज प्रिथु ने धर्म और न्याय पर आधारित राज्य व्यवस्था स्थापित की, जिससे समाज में सुरक्षा और सदाचार का वातावर्ण
34:29बना
34:30साक्षात भूदेवी ने अत्यंत सुन्दर रूप धारन कर राजा प्रिथु के समक्ष प्रकट होकर उनकी असीम कृपा के प्रती आभार
34:38व्यक्त किया
34:40समराट प्रिथु ने धर्ती को अपनी पुत्री के रूप में स्विकार करते हुए उन्हें सदैव के लिए प्रिथवी का अमर
34:47नाम प्रदान किया
34:49आकाश मार्ग से भगवान ब्रह्मा, विश्नु और शिव ने प्रसन्न होकर नवनामित प्रिथवी और राजा प्रिथु पर दिव्य पुष्पों की
34:57वर्षा की
34:59देवर्षी नारद ने अपनी वीना की मधूरतान पर प्रथम चक्रवर्ती समराठ प्रिथु की अक्षय कीर्ती का गाथागान तीनों लोकों में
35:07किया
35:09सामराज्ज में परम शान्ती स्थापित होने पर समराट प्रिथु ने भगवान श्री हरी विश्नु के निमित भव्य वैदिक यग्यों का
35:17आयोजन किया
35:19यग्य की पावन अगनी से चतुर्भुज रूप में भगवान विश्नु प्रकट हुए और उन्होंने राजा प्रिथु को अमर धर्मधुरंधर होने
35:27का वर्दान दिया
35:29प्रिथु के शासनकाल में भए, दरिद्रता और रोगों का पूर्ण अंत हो गया तथा सभी प्राणी परसपर प्रेम और सौहार्थ
35:37से रहने लगे
35:39रत्नों की खानों, निर्मल सरिताओं और फलों से लदे व्रिक्षों से आच्छादित होकर प्रिथवी देवी अत्यंत मनमोहक प्रतीत होने लगी
35:48महर्शियों और देवगणों की उपस्थिती में राजा प्रिथु का ब्रहमांड के प्रथम सर्वभाउम समराट के रूप में भव्य राज्याभिशेक संपन्न
35:57हुआ
35:57इस प्रकार प्रथम समराट प्रिथु के धर्मनिष्ट शासन में प्रिथवी पर एक नए स्वर्णिंग युग का आरंभ हुआ जो अनंत
36:06काल तक स्मर्नी रहेगा
Comments