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  • 5 weeks ago
पिछले एपिसोड में गृहस्थ धर्म और श्राद्ध कर्म की महिमा जानने के बाद, महर्षि पराशर अब मैत्रेय को कर्मों के अटल विधान और पापों के भयंकर परिणामों से अवगत कराते हैं। इस विशेष एपिसोड में हम यमलोक की यात्रा, चित्रगुप्त के न्याय और विभिन्न नरकों (नरक लोकों) का विस्तृत वर्णन करेंगे, जहां पापी अपनी दुष्कर्मों का फल भोगते हैं। जानिए कैसे बुरे कर्म हमें दुर्गति की ओर धकेलते हैं और कैसे धर्मपरायण जीवन तथा भगवान विष्णु की भक्ति हमें इन यातनाओं से मुक्ति दिलाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। क्या आप नरक के रहस्यों को जानने और उनसे बचने के मार्ग को समझने के लिए तैयार हैं? #विष्णुपुराण #कर्मोंकाफल #नरकलोक #यमलोक #मोक्ष #पापपुण्य #हिंदूधर्म #पौराणिककथा #विष्णुभक्ति
Transcript
00:00ग्रिहस्थ धर्म के गेहन उपदेश और श्राध कर्म की महिमा को आत्मसाथ करने के पश्चात मैत्रे के मन में एक
00:07नया प्रश्न उमड पड़ा, जो उन्हें महर्शी पराशर की ओर खीच लाया।
00:13उन्होंने पिछली शिक्षाओं पर मनन करते हुए जीवन के जटिल तानेबाने और कर्मों के अद्रिश्य धागों को समझने का प्रयास
00:21किया, जहां धर्म और अधर्म की सीमाए निरंतर परिवर्तित होती रहती हैं।
00:27धर्म के मार्ग पर चलने के असंख्य लाभों को जानने के बाद, उनके मन में उन आत्माओं के भविश्य को
00:34लेकर एक गेहन चिन्ता उत्पन हुई, जो अधर्म की राह पर भटक जाती हैं।
00:41अधर्मी कर्मों का फल क्या होता है? यह प्रश्न उनके हृदय में शूल की तरह चुब रहा था, जिससे वे
00:47गुरुवर पराशर के समक्ष प्रस्तुत होने को विवश हो गए।
00:52विन्मर्ता और आदर से भरे शब्दों में, मैत्रे ने महर्शी के चर्णों में जुपकर अपनी जिग्यासा व्यक्त की, जैसे एक
01:00प्यासा यात्री जलसरोत की ओर बढ़ता है।
01:04हे गुरुदेव, मैत्रे ने अत्यंत नमर्ता से पूछा, जो जीव धर्म के मार्ग से विमुख होकर पाप कर्मों में लिप्ठ
01:11हो जाते हैं, उनका अंतह क्या परिणाम होता है।
01:16उन्हों ने उन गंभीर उलंगनों और कर्तवियों की उपेक्षा पर जोर दिया, जिनके कारण आत्माय न्याय और सदाचार के पत
01:24से भटक जाती हैं।
01:27मैत्रे ने कर्मफल के संपूर्ण चक्र को समझने की तीवर इच्छा व्यक्त की, पाप के गहरे अंधकार से लेकर उसके
01:34अंतिन परिणामों तक।
01:37महर्शी पराशर ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से मैत्रे की अंतरात्मा को देखा, उनकी सच्ची जिग्यासा और सत्य की खोच को भामपते
01:46हुए एक गहरी शांती से भर गए।
01:49एक शन के लिए उस पवित्र कुटिया में पूर्ण शांती छा गई, जैसे प्रकृती भी उन गंभीर प्रशनों के उत्तर
01:56की प्रतीक्षा कर रही हो।
01:59फिर महर्शी ने एक गहरी सांस ली, उस गहन सत्य की ओर इशारा करते हुए, जिसे वे अब उजागर करने
02:07वाले थे, जिसकी गंभीरता ने उनके चित्त को भी आंदोलित कर दिया था।
02:12उनकी शांत गंभीर वानी ने उस मौन को भंग किया, जैसे आकाश में गड़गडाहट से पहले हलकी हवा चलती है,
02:20मैतरे धर्म का मार्गी जीवन का सार है, मोक्ष का आधार है।
02:26परंतु फिर उनकी आवाज में एक गंभीर परिवर्तन आया, जैसे शांत नदी में अचानक भंवर उठ जाए, किन्तु जो इससे
02:34भटकते हैं, उनके लिए गेहन अंधकार प्रतीक्षारत है।
02:40महर्शी ने समझाया कि ब्रह्मांड का प्रतेक कन कर्म के अविनाशी नियम से बंधा है, जहां प्रतेक क्रिया, चाहे शुब
02:47हो या अशुब अपना फल अवश्य देती है।
03:10और जितनी गहरी डुब की पाप में लगाई जाती है, उतनी ही उल्जन बढ़ती जाती है।
03:16महर्शी ने संकेत दिया कि इन आत्माओं के लिए सामान्य मानविय लोकों से परे, अज्यात और भयानक आयामों में कठोर
03:25यातनाय प्रतीक्षा करती हैं।
03:28अधर्म का पत अत्यंत परिलास है। मैत्रे महर्शी ने चेतावनी दी, हर कदम पर आत्मा का पतन सुनिश्चित है, जब
03:37तक वह अपने पापों का फल भोग न ले।
03:40मैत्रे गुरु के हर शब्द को अपने हृदय में उतारते हुए गहरी एकागरता से सुन रहे थे, मानो वे ब्रहमांड
03:48के सबसे बड़े रहस्य को उजागर होते देख रहे हुँ।
03:52और इस प्रकार महर्शी पराशर ने उन भयानक लोकों की भूमी का बांधी, जहां पापियों को उनके कर्मों का उचित
04:00फल भुगतना पड़ता है, नरक के द्वार खोलने के लिए।
04:05महर्शी पराशर ने अपनी गंभीर द्रिष्टी मैत्रे पर स्थिर करते हुए कर्म के अटल विधान को ब्रहमांड का सर्वोच नियम
04:13घोशित किया, जिसे कोई भी प्राणी, चाहे देव हो या दानव, ताल नहीं सकता।
04:19मैत्रे ने अपने गुरु के शब्दों को गहरी श्रद्धा से आत्म साथ किया, यह समझते हुए कि यह केवल एक
04:26सिध्धान्त नहीं, बल्कि प्रत्येक आत्मा के अस्तित्व की आधारशिला है।
04:32उन्होंने समझाया कि प्रत्येक विचार, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कर्म, चाहे वह कितना भी सुक्ष्म क्यों नहों, ब्रहमांडिय उर्जा में
04:41अपनी छाप छोड़ता है, और एक अद्रिश्य धागे से भविश्य से जूर जाता है।
04:47पुन्य कर्मों का फल अनंद सुख और आनंद के रूप में प्रकट होता है, जो आत्मा को दिव्य लोकों की
04:54ओर उठाता है, और उसे शांती व समरिधी प्रदान करता है।
05:00इसके विपरीत, पाप कर्मों का परिणाम गेहन दुख, पीडा और भय के रूप में मिलता है, जो आत्मा को निंतर
05:07लोकों की ओर खीचता है, जहां उसे अपने दुशकर्मों का प्रायश्चित करना पड़ता है।
05:14उन्होंने बल दिया की केवल बाहरी क्रियाय ही नहीं, अपितु मन के भीतर पन पे सुक्ष्म विचार और भावनाय भी
05:21कर्म के विधान के अधीन आती हैं, जिनका फल अवश्यम भावी है।
05:27यह कर्म का चक्र कई जन्मों तक चलता रहता है, जहां एक जीवन के कर्म अगले जीवन की परिस्थितियों और
05:34अनुभवों का निर्धारन करते हैं।
05:38आत्मा की नियती उसके जन्म, उसके अनुभव और यहां तक की उसकी मृत्यु भी उसके संचित कर्मों के योग से
05:45तय होती है।
05:47कोई भी कर्म अद्रिश्य नहीं रहता, ब्रह्मांड का प्रत्येक कन साक्षी है और उसका लेखा जोखा दिव्यता द्वारा सावधानी पूर्वक
05:56रखा जाता है।
05:59महर्शी ने एक प्राचीन पैमाने तराजू की कलपना की, जहां एक और पुन्य के हलके पंक और दूसरी और पाप
06:06के भारी पत्थर रखे होते हैं, जो आत्मा के भाग्य का निर्णय करते हैं।
06:12यह दिव्य संतुलन सुनिश्चित करता है कि कोई भी कर्म न तो अनसुना रह जाएं और नहीं अनुत्तरित प्रत्येक आत्मा
06:21को उसकी करनी का फल मिलता है।
06:24पुन्यवान आत्माएं उच्चतर लोकों में जन्म लेती हैं, जहां वे दिव्य सुख और ज्यान का अनुभव करती हैं, देवताओं और
06:32रिशियों के साननिध्य में।
06:34पापी आत्माय भयानक निन्न लोकों में धकेल दी जाती हैं, जहां वे अपने कर्मों के अनुरूप कष्टों और यात्नाओं का
06:42सामना करती हैं.
06:45इस प्रकार कर्म का विधान आत्मा को अन्वरत रूप से जन्ममृत्यू के चक्र में फंसाय रखता है, जब तक वह
06:53अपने सभी संचित कर्मों का पूर्ण भोग न कर ले.
06:57कर्म के इस जाल से कोई बच नहीं सकता, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे अपने कर्मों
07:04का फल अवश्य भोगना पड़ता है.
07:07महर्शी पराशर ने बलपूरवक कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों के प्रती अत्यधिक जागरूक और सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि
07:16भविश्य उनके वर्तमान निर्नेयों से ही बुना जाता है.
07:21मैत्रे ने अपने गुरू के शब्दों की गहनता को महसूस किया, उनके हृदय में कर्म के विधान की अविनाशी शक्ती
07:28का बोध गहराई से अनकित हो गया.
07:32उन्होंने समझा की कर्म का यह अटल विधान मोक्ष के मार्ग पर पहला कदम है, क्योंकि केवल कर्मों की प्रकृती
07:39को समझकर ही कोई इस चक्र से उपर उठ सकता है.
07:44महर्शी पराशर ने एक गहरी सांस ली, नरक के भयावह विवर्णों को प्रस्तुत करने के लिए तयार, जहां आत्माओं को
07:51उनके पापों के लिए कठोर गंड भोगना पड़ता है.
07:56और फिर एक गंभीर स्वर में उन्होंने उन लोकों का वर्णन करना शुरू किया जो पापी आत्माओं के लिए निर्धारित
08:03हैं, जहां न्याय की अगनी उन्हें शुद्ध करने के लिए जलती है.
08:09महर्शी पराशर ने अपनी गंभीर वानी में समझाना प्रारंभ किया कि मानविय कर्मों की सुक्षमता और उनकी तीवरता के आधार
08:17पर पापों को विभिन शेनियों में विभाजत किया गया है.
08:22पराशर जी ने सबसे पहले परग्रव्य हरन अर्थात चोरी के पाप का उलेख किया, जहां दूसरों की मेहंत और समपत्ती
08:30को छल से छीनना आत्मा पर एक गहरा अंधकार में भार डालता है.
08:36उन्होंने सपश्ट किया कि केवल भौतिक वस्तूओं की ही नहीं, बलकि गुरु के ज्यान को चुराना या उसका दुरुप्योग करना
08:44उससे भी बड़ा पाप माना गया है, जो बुद्धी को नश्ट कर देता है.
08:50असत्य भाशन और समाज में जूठी गवाही देना एक ऐसा घोर पाप है, जो सत्य के स्तंभ को हिला कर
08:57पूरे समाज में अराजकता का बीज बोता है.
09:01जीव हिंसा को महापाप की श्रेणी में रखते हुए पराशर मुनी ने बताया कि मुख पशुओं पर निर्दैता पूर्वक अत्याचार
09:09करना और उनके प्राण हरण करना साक्षात काल को आमंत्रन देना है.
09:15किसी अन्य मनुष्य को शारेरिक पीडा पहुचाना या मानसिक रूप से प्रताडित कर उसे रोने पर विवश करना मनुष्य के
09:23संचित पुन्यों को तत्क्षन भस्म कर देता है.
09:27माता-पिता का अनादर करना और उनकी वृध्धावस्था में उन्हें असहाय छोड़ देना एक ऐसा अक्षमय अपराध है जो संतानों
09:36को अत्यंत क्रूर नरक का भागी बनाता है.
09:40जिस गुरु ने अज्ञानता के अंधकार से निकाल कर ज्ञान का प्रकाश दिया, उनका अपमान करना या उनके प्रती कृतगन
09:48होना सीधे तौर पर आत्मा के पतन का कारण बनता है.
09:53दामपत्य जीवन के पवित्र विश्वास को तोड़ना और परपुरुष या परस्त्री गमन करना एक ऐसा महापाप है जो परिवार की
10:01मानमर्यादा और कुल की आत्मा को कलंकित कर देता है.
10:06अपने वर्ण और आश्रम के अनुकूल निर्धारित धर्म का त्याग करना और केवल वासना तथा स्वार्थ के वशीभूत होकर जीना
10:14मनुष्य को उसके मूल आध्यात्मिक लक्ष से भटका देता है.
10:19अपनी संपत्ती का एक भी अन्श भूखों और बेसहारों को न देकर केवल तिजोरियों में संचित रखना, धन के देवता
10:27कुबेर के कोप और दरिद्रता के नरक का कारण बनता है.
10:33जलाश्यों को प्रदूशित करना, छायादार और फलदार व्रिक्षों को अनावशक काटना तथा प्रकृती के संतुलन को बिगाड़ना भी घोर पापों
10:42के अंतर्गत जिना जाता है.
10:45पराशर जी ने समझाया कि इन सभी पापों की गुरुता अर्थात उनका भारीपन इस बात से तय होता है कि
10:52वे किस भावना और किस सीमा तक किये गए हैं.
10:57धर्मराज यमदेव के दर्बार में चित्रगुप्त प्रत्येक जीवात्मा के इन पापों और पुनियों का सुक्षमता से लेखा जोखा रखते हैं,
11:05जहां न्याय में रक्ती भर भी भूल नहीं होती.
11:09प्रत्येक बुरे कर्म के साथ आत्मा के सुक्षम शरीर पर एक गहरा काला दाग अंकित हो जाता है, जो उसकी
11:16चेतना को भारी और अंधकार में बना देता है.
11:21जो मनुष्य जीवन भर अपने पापों का प्रायश्चित नहीं करते, मृत्यू के पश्चात यमदूत उनके सुक्षम शरीर को बलपूर्वक खीचते
11:30हुए यमलोग के दुरगम मार्ग पर ले जाते हैं.
11:34पापी जीवात्माओं को उस भयानक वैतर्णी नदी को पार करना पड़ता है, जो रक्त, पीप और दहक्ती हुई अगनी से
11:42भरी हुई है, और जहां क्रूर जीव उन्हें नोचते हैं.
11:47मनुष्य भले ही संसार की आखों से अपने कुकर्मों को छिपा ले, परंतु कालचक्र और आत्मा की साक्षी से कुछ
11:55भी छिपा नहीं रह सकता, जिसका न्याय अंत्ह अवश्य होता है.
12:00जमराज के समक्ष पहुँचकर जीव आत्मा को अपने किये हुए हर एक पाप का बोध होता है, और वह पश्चाताप
12:08की अगनी में जलते हुए एक शमा की याचना करती है, परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.
12:15पराशर जी ने अंत्मे मैत्रे को आश्वासन दिया कि यद्यपी पापों का फल भयानक है, परंतु समय रहते सच्चा पश्चाताप,
12:24सतकर्म और नारायन का स्मरण ही आत्मा को इस भाय से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करता है.
12:31जीवात्मा शरीर त्याग कर एक अद्रिश्य उर्जा के रूप में ब्रहमांड के अनंत विस्तार में भटकने लगती है, जहां उसे
12:39अपने किये कर्मों का बोज पश्ट अनुभव होता है.
12:44यह सुक्ष्म शरीर काल के अप्रत्यक्ष मार्ग दर्शन में भयभीत करने वाले वीरान रास्तों और घने अंधकार से होते हुए
12:52यमलोक की ओर बढ़ता है, जहां हर जीव को एक बार पहुँचना ही होता है.
12:59मार्ग में उसे अपने ही पापों की छायाए डराती हैं, जो भूतकाल के कड़वे स्मर्णों की भांती उसके मन को
13:06विचलित करती हैं, पर वापसी का कोई मार्ग नहीं होता.
13:11अंतर दूर से ही यमलोक के विशाल और भयावध द्वार द्रिष्टि गोचर होते हैं, जो न्याय के अटल सिध्धान्त की
13:18घोशना करते हुए हर आत्मा का इंतजार कर रहे होते हैं.
13:24द्वार पर खड़े भयंकर यम्दूत, जिनके नेत्रों में अगनी प्रजवलित होती है, उस आत्मा को बिना किसी दया के न्याय
13:32के उस दर्बार की ओर खीच कर ले जाते हैं.
13:36भीतर प्रवेश करते ही, आत्मा एक ऐसे विशाल और गंभीर न्यायाले में स्वयन को पाती है, जहां काल का नियम
13:44और कर्मों का हिसाब किताब ही सर्वोच होता है.
13:49सिनहासन पर विराजमान, मृत्यू के देवतायमराज अपनी गरिमा और भयावहता से उस सभा को भर देते हैं, जिनकी उपस्थिती मात्र
13:58से ही समस्त ब्रहमांड भैभीत होता है.
14:02तभी अपने सुनहरे लेखनी और कर्मों की विशाल पोथी के साथ, धर्मराज के मुख्य सचिव चित्रगुप्त अपनी शांत और गंभीर
14:10मुद्रा में सभा में प्रवेश करते हैं.
14:15चित्रगुप्त अपनी अलौकिक पोथी को खोलते हैं, जिसमें सृष्टी के आरंब से लेकर अब तक के हर जीव के कर्मों
14:22का लेखा जोखा अक्षरशा अंकित होता है.
14:26एक एक करके उस आत्मा के जीवन के सारे कर्म, उन्य और पाप, एक चल्चित्र की भाती, चित्रगुप्त के समक्ष
14:34और आत्मा की द्रिष्टी में प्रकट होने लगते हैं.
14:38आत्मा अपने ही किये हुए पापों को देखकर भय और लज्जा से भर जाती है. हर अपराध, हर छल, हर
14:46अधर्म उसकी आखों के सामने स्पष्ठ हो उठता है.
14:50वहीं उसके द्वारा किये गए परोपकार, दान और सेवा के क्षण भी प्रकाशित होते हैं, जो उसके कर्मफल के तराजू
14:58पर कुछ आशा की किरन जगाते हैं.
15:02चित्रगुप्ट बिना किसी राग या द्वेश के प्रत्यक कर्म का सूक्ष्म विशलेशन करते हैं, जहां किसी भी बहाने या छल
15:10को कोई स्थान नहीं मिलता.
15:12उसक्षण आत्मा को अपने जीवन का वास्तविक अर्थ और अपने कर्मों का अटल परिणाम पूर्ण रूप से समझाता है, जिसे
15:21वह जीते जी अंदेखा करती रही थी.
15:24अंत्र यम्राज अपनी गंभीर और अटल वानी में न्याय का निर्णय सुनाते हैं, जो किसी भी तर्क या अपील से
15:32परे होता है.
15:34कर्मों का तराजू, जिसके एक पल्डे पर पुन्य और दूसरे पर पाप होते हैं, धीरे धीरे संतुलन खोकर आत्मा के
15:42भविश्य की दिशा तै करता है.
15:45यदि पापों का पल्डा भारी हो, तो आत्मा को ततकाल नरक के भयानक लोकों की ओर धकेल दिया जाता है,
15:53जहां उसे अपने कुकर्मों का कठोर प्रायश्चित करना होता है.
15:58पर यदी सतकर्मों का पलडा भारी हो, तो उसे स्वर्ध की उचाईयों या मोक्ष के परम सुख की ओर अग्रसर
16:05किया जाता है, जहां उसे शान्ती और मुक्ती मिलती है
16:10यह चक्र अनन्त है, जहां हर आत्मा अपने कर्मों के अनुसार ही फलपाती है, जब तक कि वह अज्यान के
16:17बंधन से मुक्थ होकर परम तत्व में विलीन न हो जाएं
16:22पराशर जी के वचन प्रतिध्वनित होते हैं कि इस जटिल चक्र से मुक्ती का एक मात्र मार्क सतकर्म, सच्चा पश्चाताप
16:30और नारायन का अटूट स्मरण ही है, जो आत्मा को परम शान्ती प्रदान करता है
16:36मैत्रे ने अत्यंत विनीत होकर महर्शी पराशर से उन भयावा नरक लोकों के विशय में पूछा, जहां पापी आत्माओं को
16:44अपने कुकर्मों का दंड भुगतना पड़ता है
16:49पराशर जी ने समझाते हुए कहा कि ब्रहमांड के सबसे निचले भाग में अंधकार और पीडा से भरेवे नरक लोक
16:56स्थित हैं जो यमराज के नियंत्रण में आते हैं
17:00इन लोकों के अधिपती न्यायप्रिय धर्मराज यम हैं, जो हर जीव के कर्मों का निश्पक्ष लेखा जोखा रखकर उन्हें न्यायसंगत
17:09फल प्रदान करते हैं
17:12उन्होंने स्पष्ट किया कि ये नरक अनंत काल के दंड के स्थान नहीं, बलकि आत्मा की अशुद्धियों को तपाकर नश्ट
17:19करने वाले अस्थाई शोधन ग्रेह हैं
17:23जब पापी मनुष्य अपने भौतिक शरीर को त्यागता है, तब यमदूत उसे अत्यंत क्रूर्ता पूर्वक घसीटते हुए यमलोग के द्वारों
17:32तक ले जाते हैं
17:35पराशर जी ने सबसे पहले रौरव नरक का वर्नन किया, जहां वे दुष्ट आत्माई भीजी जाती हैं, जिन्होंने जीवन भर
17:43केवल जूट और कपट का सहारा लिया
17:45इस रौरव नरक में रुरू नामक भयंकर और विशैले जीव उन कपटी आत्माओं को घेर कर उन्हें असहनिय पीडा देते
17:54हैं
17:55इसके पश्चात महारौरव का स्थान आता है, जहां दूसरों के परिवारों और संपत्ती का विनाश करने वाले स्वार्थी लोगों को
18:04भीशन यातनाय दी जाती हैं
18:07फिर उन्होंने तामिस्र नरक के विशै में बताया, जो पूर्ण रूप से घने अंधकार में डूबा हुआ है, और जहां
18:15दूसरों का धन हड़पने वाले तडपते हैं
18:19अंधतामिस्र वह अंधकूप है, जहां अपनों को धोखा देने वाले और विश्वास घाती जीव अपनी दृष्टी खोकर अनंतभय में चीखते
18:27रहते हैं
18:30कालसूत्र नामक नरक तामबे की धधक्ती हुई विशाल भूमी के समान है, जहां मातापिता और गुरुजनों का अपमान करने वालों
18:38को तपाया जाता है
18:41असिपत्रवन एक ऐसा भयानक वन है जिसके व्रिक्षों के पत्ते तलवार की धार जैसे तीखे हैं और वहां अपने धर्म
18:49से भटकने वाले लहुलुहान होते हैं
18:53असिपत्रवन की वे तीच्षन पत्तिया हवा के हर जोके के साथ गिरती हैं और अधर्मी आत्माओं के अंगों को छिन्नभिन
19:01कर देती हैं
19:03सुकर्मुख नरक में उन लोभी और अत्याचारी मनुश्यों को डाला जाता है जिन्होंने निर्बल जीवों पर अत्याचार किया और उन्हें
19:12कोलहु की भांती पीसा जाता है
19:16पराशर जी ने समझाया कि प्रत्येक पाप की एक निश्चित सीमा और अवधी होती है और उसी के अनुसार न्याय
19:23की देवी प्रकृती दंड निर्धारित करती है
19:27मैत्रे गुरुदेव की ये बाते सुनकर अत्यंत गंभीर हो गए और उनके मन में इश्वर के अटूट विधान के प्रती
19:35श्रद्धा और भय दोनों जागरत हो गए
19:38तब महर्शी ने सांत्वना देते हुए कहा कि दंड की यह प्रक्रिया केवल प्रतिशोध नहीं बलकि आत्मा को पुन्ह पवित्र
19:46कर उसे नवीन जन्म के योग्य बनाने का साधन है
19:51जैसे ही आत्मा के पापों का क्षय होता है वह पुन्ह उच्च लोकों की ओर अग्रसर होती है जहां उसे
19:59अपने नए कर्मों को सुधारने का अफसर प्राप्थ होता है
20:03उन्होंने बल दे कर कहा कि इस नरक के भय से बचने का सबसे सरल और अचुक उपाय केवल भगवान
20:10नारायन के पवित्र नाम का अन्वरत स्मरण और कीर्तन है
20:16पराशर जी के इस ज्यानों क देश से अभिभूत होकर मैत्रे ने उनके चर्णों में मस्तक जुकाया यह समझकर की
20:23प्रभू की न्याय व्यवस्था में भी परम करुना ही नहित है
20:28महर्शी पराशर ने संसार को धर्म के मार्ग पर स्थिर रखने के उद्देश से घोर पापी चेतनाओं को मिलने वाले
20:36भयानक रौरव नरक का विशद वर्णन आरंब किया
20:40रौरव नरक एक अत्यंत अंधकार्मय और खौफनाक लोग के रूप में द्रिश्यमान होता है जहां चारों और केवल पापी आत्माओं
20:48की भयंकर चीतकारें गूंजती हैं
20:52इस नरक में रौरू नामक अत्यंत भयानक और हिंसक जीव प्रकट होते हैं जो काले और लाल वर्ण के फन
20:59वाले विक्राल सर्पों के समान दिखाई देते हैं
21:03जो मनुष्य अपने भौतिक स्वार्थ के लिए निर्दोष जीवों को कष्ट पहुचाते हैं उन्हें ये रुरू जीव अपने विशाल और
21:11विशैले शरीरों में जकड लेते हैं
21:15रुरू जीवों के तीखे दंत और विशैला दंश आत्मा को वह तीवर यातना देते हैं जो उसने प्रिथवी पर अन्य
21:23प्राणियों को पहुचाई थी
21:25पराशर जी ने समझाया कि रौरव नरक का यह विधान स्रिष्टी का वह अचूक नियम है जहां हर अन्याय का
21:32फल उसी तीवरता के साथ लोटाया जाता है
21:36इसके पश्चात महर्शी ने कुम्भी पाक नामक उस भयावा नरक का वर्नन किया जहां तामबे और लोहे के विशालकाय कड़ा
21:45उबलते रहते हैं
21:47भयानक आकरिती वाले यम्दूत जिनकी आखे धधकते अंगारों जैसी और शरीर वजर के समान कठोर है उन कड़ाहों के चारों
21:56और पहरा देते हैं
21:59जो दुराचारी केवल अपनी जिहवा या क्षणिक सुख के लिए निरीः प्राणियों का वध करते हैं उन्हें यम्दूत उबलते हुए
22:07तेल के कड़ाहों में डाल देते हैं
22:10उबलते तेल की भयंकर गर्मी में आत्माए निरंतर तड़पती हैं किन्तु पाप का फल पूरा भुगते बिना उनका अंतभी संभव
22:19नहीं होता
22:21यम्दूत विशाल लोहे के भालों और त्रिशूलों से उन आत्माओं को उबलते तेल में नीचे धकेलते हैं जिससे उनकी यातना
22:29द्विगुनित हो जाती है
22:32महर्शी पराशर ने सपश्ट किया कि बिना किसी कारण के जीवों को कश्ट देना कुम्भी पाक का भीशन दंड आमंत्रित
22:39करता है
22:41पराशर जी के मुख से इन हरिदय विदारक नरकों का विवन सुनकर मैत्रे जी का हरिदय काम्प उठा और उन्होंने
22:49कातर भाव से मुक्ती का मार्ग पूछा
22:52पराशर जी ने आश्वस्ट किया कि ये दंड केवल प्रतिशोध नहीं बलकि जीव की चेतना को उसके पापों से मुक्त
23:00करने की शुद्धी प्रक्रिया है
23:03तभी एक भव्यद्रिश में धर्मराज यमराज अपने कृष्ण महिश पर आरूड होकर न्याय के दंड का संचालन करते हुए प्रकट
23:11होते हैं
23:14यमराज बिना किसी पक्षपात के चित्रगुप्त की बही में दर्ज मनुष्य के प्रतेक कर्म के अनुसार न्याय का निश्पादन करते
23:21हैं
23:23पराशर जी ने बल दिया कि यदि मनुष्य समय रहते अपने दुश कर्मों का पश्चाताप कर ले तो वह इन
23:30भीशन नरकों से बच सकता है
23:34अंधकार से भरे नरक के मारगों पर केवल भगवान श्री हरी विश्णु के नाम का संकीरतन ही मोक्ष का एक
23:40मात्र प्रकाश पुंज बनता है
23:44नारायन नाम के स्मरण मात्र से पापी आत्माओं के भारी से भारी कर्म बंधन क्षन भर में छिन्नभिन हो जाते
23:51हैं
23:53पराशर जी ने उपदेश समाप्त करते हुए कहा कि सर्वप्राणी के प्रती करुणा और नारायन की भक्ती ही रौरव और
24:00कुम्भी पाक के भैसे स्थाई मुक्ती दिलाती है
24:05महर्शी पराशर अपनी गंभीर वानी में मैत्रे को आगे समझाते हैं कि रौरव के भीशन कष्टों के पार तामिस्र और
24:13अंधतामिस्र नामक दो और भयानक नरक स्थित हैं जो पापियों की प्रतीक्षा कर रही हैं
24:20पराशर जी तामिस्र नरक का वर्णन करते हैं, जहां केवल वही पापी आत्माय गिराई जाती हैं, जिन्होंने अपने जीवनकाल में
24:29दूसरों के धन को छला और अपने ही परिवार को धोखा दिया
24:34तामिस्र के उस गहन, दमघोंटू अंधकार में भयानक यमदूत इन चोरों और विश्वास घातियों को दहकती हुई लोहे की जंजीरों
24:42से कसकर बांध देते हैं
24:45यम के ये निर्दई दूत उन आत्माओ पर अंधाधुंध कोड़े बरसाते हैं, जिनकी चीखें उस अनंत अंधकार में गुफा में
24:53गूज कर दम तोर देती हैं, पर कोई बचाने नहीं आता
24:57वहाँ भूख और प्यास से तड़पते हुए इन अपराधियों को पीने के लिए केवल उबलता हुआ गर्म जल और भोजन
25:05के स्थान पर जलते हुए कोईले दिये जाते हैं
25:09इसके पश्चात महर्शी पराशर अंधतामिस्र नरक की ओर ध्यान आकर्शित करते हैं, जहां अपनों को धोखा देने वाले और विश्वास
25:18घाती मित्र भेजे जाते हैं
25:21अंधतामिस्र में इतना सघन और अभेद्य अंधकार चाया रहता है कि पापी जीव को अपनी उंगलिया तक दिखाई नहीं देती
25:29और वह गहरे भ्रम में डूब जाता है
25:33वहां अपराधियों को सूखे काश्ट की भांती भूमी पर बांथ दिया जाता है और यमदूत उन्हें तब तक बेर्हमी से
25:40पीटते हैं जब तक वे अचेत नहीं हो जाते
25:45पराशर जी समझाते हैं कि यह असहनिय मानसिक और शारिरिक पीडा उनके द्वारा प्रिथवी पर अपनों को दिये गए विश्वास
25:53घात के आघात का ही सीधा फल है
25:56इसके उपरांथ पराशर जी कालसूतर नामक भयानक नरक की व्याख्या करते हैं जो मातापिता और गुरुजनों का अनादर करने वालों
26:05के लिए निश्चित है
26:08कालसूतर नरक की भूमे धधक्ती हुई तामबे की विशाल चादरों से बनी है जिसके नीचे प्रल्यंकारी अगनी 2400 घंटे जलती
26:17रहती है
26:18इन धधक्ते तामबे के फर्ष पर पापियों को यमदूतों के विशाल और हिंसक शिकारी कुट्टों द्वारा खदेडा जाता है जिससे
26:27उनके पैर पूरी तरहे जलकर छिन्नभिन हो जाते हैं
26:31इसके बाद वे अप्रतिष्ट नरक का उल्लेख करते हैं जहां धार्मिक कारियों और यग्यों में विधन डालने वाले पापियों को
26:39बिना किसी सहारे के एक अनंत शूने में घुमाया जाता है
26:44पराशर जी धर्मभरष्ट लोगों के लिए असिपत्रवन नामक वन का वर्णन करते हैं जिसके व्रिक्षों के पत्ते अत्यंत तीखी और
26:53धारदार तलवारों के समान है
26:56जब पापी धूप से बचने के लिए उन व्रिक्षों की छाया में भागते हैं तो हवा चलने पर तलवार जैसे
27:03पत्ते गिरकर उनके शरीरों को लहूलुहान कर देते हैं
27:08धर्मराज यमदेव के कठोर आदेश पर यमदूत इन सभी नर्कों में न्याय सुनिश्चित करते हैं ताकि ब्रहमांड का नैतिक संतुलन
27:17बना रहे
27:18यमराज अपने विशाल दर्बार में बैठकर प्रत्येक जीव के कर्मों के बही खाते की सुक्षम जाच करते हैं जहां रत्ती
27:26भर भी पक्षपात नहीं होता
27:29महर्शी पराशर अपने शिश्य मैत्रे से कहते हैं कि ये दंड कोई करूरता नहीं बलकी कर्म और उसके फल का
27:37अकाट्य प्राकृतिक नियम है
27:40मृत्यू से पूर्व इन घोर पापों से बचने का एक मात्र उपाय सच्चे हृदय से किया गया पश्चाताप और भगवान
27:47श्री हरी विश्नु के चर्णों में पूर्ण समर्पण ही है
27:52अंत्र भगवान विश्णू की दिव्य और स्वर्ण में आभाका एक ही क्षण का स्मरण सभी नर्कों के अंधकार को मिटा
28:00कर मोक्ष का परम्मार प्रशस्त कर देता है
28:04महर्शी पराशर से शिष्य मैत्रे अत्यंत उच्सुकता से प्रश्न करते हैं कि जब पापी जीव नर्क की भीशन यातनाए भोग
28:12लेता है तब उसके पश्चात उस जीवात्मा की क्या गती होती है
28:17महर्शी पराशर समझाते हैं कि नर्क का दंड शाश्वत नहीं है बलकि यह केवल पाप कर्मों का रिंच चुकाने की
28:25एक निश्चित और सीमित सम्यावधी मात्र है
28:29जैसे ही तीवर यातनाओं के अगनिकुंदों में जीवात्मा के दुशकर्म जलकर भस्म हो जाते हैं वैसे ही उसके नर्क भोग
28:37का चक्र भी समाप्थ हो जाता है
28:41धर्मराज यमदेव अपने विधान के अनुसार उस निश्पाप हुई जीवात्मा के नरक्वास की समाप्ती की घोशना करते हुए उसे पुनह
28:49स्रिष्टी के चक्र में भेजते हैं
28:53चित्रगुक जी अपने विशाल दिव्यग्रंथ में उस जीव के दंड का हिसाब पूर्ण अनकित कर उसके नए जीवन की यात्रा
29:00का मार्ग खोलते हैं
29:03नरक्की यात्नाओं से मुक्ठ होकर वह सुक्ष्म आत्मा एक धुंधले आध्यात्मिक लोग से गुजरती हुई पुनह पृत्वी की ओर आकर्शित
29:12होने लगती है
29:14पूर्व जन्मों के अवशिष्ट संस्कारों और सुक्ष्म वासनाओं की पोटली बांधे हुए वह जीवात्मा भौतिक संसार में प्रवेश की तयारी
29:23करती है
29:25वायूक जल्वरिष्टी और वनस्पती के माध्यम से वह जीव पुनह इस नश्वर धरातल पर अंकुरित होने के लिए वर्शा की
29:32बूंदों के साथ धर्ती पर गिरता है
29:36अपने कर्मों के अनुसार वह जीवात्मा सर्वप्रथम व्रिक्ष, पौधे या अचल जीवों की योनी में प्रवेश कर मंध चेतना के
29:44साथ जीवन आरंभ करती है
29:48ततपश्चात विकासक्रम में आगे बढ़ते हुए वह आत्मा पशु, पक्षी और जल्चरों के विभिन शरीरों में जन्म लेकर अपने पशुभाव
29:56को पूर्ण करती है
29:59लाखो निम्न योनियों में कश्ट सहते हुए जब उस जीव के स्थूल पाप क्षीन हो जाते हैं, तब उसकी चेतना
30:06उत्तरोत्तर अधिक प्रबुद्ध होने लगती है
30:10अंगिनत वर्षों के उपरांथ, अत्यंत दुरलब और पवित्र अवसर के रूप में वह आत्मा पुना मनुष्य के रूप में जन्म
30:18धारन करने का सौभाग्य प्राप्त करती है
30:22यदि कुछ छोटे पाप शेश रह जाते हैं, तो वह जीवदरिद्रता या शारिरिक व्याधियों वाले जीवन में जन्म लेकर उन
30:30अंतिन कर्मरिनों को भी चुकता करता है
30:34पराशर मुनिस पश्ट करते हैं कि इश्वर का यह संपूर्ण गंड विधान प्रतिशोध नहीं, बलकि आत्मा की परम शुद्धी और
30:42उसके उठ्थान की दिव्य व्यवस्था है
30:46मनुष्य शरीर प्राप्त करते ही जीवात्मा को पुनह विवेक और कर्म करने की स्वतंत्रता मिलती है, जहां से वह अपने
30:53मोक्ष का मार्ग चुन सकती है
30:57यदि मनुष्य पुनह अज्ञानवश पाप करता है, तो संसार चक्र भूमता रहता है, किन्तु ज्यानी पुरुष धर्म का मार्ग चुनकर
31:05इस चक्र को तोर देते हैं
31:08केवल मानव जन्म ही वह एक मात्रद्वार है, जहां से जीव अपने सतकर्मों और भक्ती के बलपर इस अनन्त पुनरजन्म
31:16के चक्र से सदा के लिए मुक्थ हो सकता है
31:20जब साधक सच्चे हरिदै से भगवान श्री हरी विष्णू के चर्णों में कमल का पुष्प अर्पित कर उनकी भक्ती में
31:27लीन हो जाता है, तब उसके ज्यान का दीप प्रजवलित होता है
31:32भगवान विष्णों की करुणामई द्रिष्टी पढ़ते ही जीवात्मा के जन्ममन के सभी सुक्ष्म बंधन और कर्मों के पाशपल भर में
31:40भस्म हो जाते हैं
31:43पराशर जी निशकर्ष निकालते हैं कि श्रीहरी के अनन्य प्रेम और शरंगती से ही जीवात्मा संसार के समस्त दुहकों और
31:51नर्कों से पार होकर परम-पद्मोक्ष को प्राप्त करती है
31:56किन्तु हे मैत्रे इस परम्मोक्ष तक पहुँचने के लिए प्रत्येक जीवात्मा को इस नश्वर संसार में अपने कर्मों के पत्थ
32:04पर अत्यंत सावधानी से चलना होगा
32:08धर्म ही वह ढाल है जो जीवात्मा को नरक की अगनी से बचा कर पुन्य लोकों की स्वर्णिम सीधियों तक
32:14ले जाती है
32:17सत्य करुना, शमा, दान और तप जैसे सद्गुनों का पोशण ही मानव को देवत्व के मार्ग पर अग्रसर करता है
32:26निश्काम भाव से किये गए पुन्य कर्म, आत्मा के लिए पुने के बीज बोते हैं जो मृत्यू के उपरांत अमृत्फल
32:33बन जाते हैं
32:36यह सुनिश्चित करता है कि मृत्यू के पश्चात आत्मा का मार्ग प्रकाशित हो और वह उच्च आनंदमय लोकों की ओर
32:43अग्रसर हो सके
32:46सच्चे हृदय से किया गयादान चाहे वह अन्न का हो, विद्या का हो या अभय का आत्मा को लोग के
32:53बंधनों से मुक्त करता है
32:56सत्य का पालन ही परमधर्म है जो वानी को पवित्र कर, विचारों को शुद्ध कर, जीवात्मा को असत्य के अंधकार
33:04से बचाता है
33:06प्रत्येक जीव के प्रती करुणा का भाव रखना, समस्थ संसार को प्रेम से जोडता है और आत्मा को अहमकार के
33:14बोच से हलका करता है
33:17अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार कर्तवियों का निश्ठा पूर्वक पालन करना ही संसार चक्र में स्थिर्ता और संतुलन लाता
33:25है
33:26ये सभी पुन्य कर्म मिलकर जीवात्मा के लिए सकारात्मक उर्जा का संचय करते हैं जो उसे पारलौकिक यात्रा में शक्ती
33:35प्रदान करती है
33:37इसके विपरीट, अधर्म और अस्दाचार में लिप्ट आत्माए कर्मों के ऐसे बंधन बनाती हैं जो उन्हें अंधकार में नरक्की और
33:46खीचते हैं
33:48अज्यानता के अंधकार में भटक कर मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है और क्षणिक सुखों के पीछे भागता
33:56है
33:58परंतु वेदों और शास्त्रों का ज्यान ही वह प्रकाश पुझ है जो आत्मा को अज्यान के गहन अंधकार से बाहर
34:05निकालता है
34:08निहस्वार्थ सेवा भाव से किया गया कार्य न केवल समाज को उन्नत करता है बलकि स्वयंकी आत्मा को भी पवित्र
34:16और निर्मल बनाता है
34:19धर्म का मार्ग भक्ती से ही पूर्ण होता है क्योंकि सच्चा प्रेन ही हमें परम सत्य की ओर ले जाता
34:25है
34:27देवतागन आकाश गंगा के कंकन में व्याप्थ होकर प्रत्येक प्राणी के कर्मों के साक्षी बनते हैं और न्याय का विधान
34:35रचते हैं
34:37जिन आत्मावने धर्म का मार्ग अपनाया, वे मृत्यू के बाद एक शांत और दिव्य मार्ग से होते हुए परम शांती
34:45को प्राप्थ करती हैं।
34:48ये पुन्य आत्मावे स्वर्गादी उच्छ लोकों में निवास करती हैं, जहां अनंत सुख, ज्ञान और शांती उन्हें प्राप्थ होती हैं।
34:58धार्मिक जीवन का लक्षे केवल नरक से बचना नहीं, बलकि जन्ममृत्यू के चक्र से मुक्थ होकर शाश्वत आनंद को प्राप्थ
35:06करना है।
35:07इसलिए है मैत्रे, अपनी प्रत्येक सास में धर्म का स्मरण करो, क्योंकि यही जीवन का सार और मोक्ष का द्वार
35:15है।
35:17महर्शी पराशर आगे कहते हैं कि स्वर्ग का सुख भी सीमित है, परंतु भगवान विश्णू की परम भक्ती ही जीव
35:24को संसार के जन्ममर्ण के बंधन से सदा के लिए मुक्थ करती है।
35:30मैत्रे ने अत्यंत श्रद्धा भाव से अपने गुरुदेव के समक्ष मस्तक जुका कर प्रश्न किया कि माया रूपी इस विशाल
35:38भवसागर को पार करने का सबसे सरल और श्रिष्ठ मार्ग कौन सा है।
35:43पराशर जी ने मुस्कुराते हुए बताया कि सर्वव्यापी प्रभू श्री हरी विश्नु ही समस्त ब्रह्मांड के आधार, संरक्षक और अंतिन
35:52परमधाम है।
35:54सच्ची विश्नु भक्ती वह पवन नौका है, जो जीव को कर्मों के प्रचंड वेग और नरक के भयावः गर्च से
36:01बचाकर निर्भैता प्रदान करती है।
36:05जब भक्त अपने मन, कर्म और वानी से केवल श्री हरी के चर्णों में समर्पन कर देता है, तब उसके
36:12जन्म जन्मांतर के पाप शन भर में भस्म हो जाते हैं।
36:17भगवान नारायन का केवल नाम समरण ही वह महामंतर है, जो यमराज के दंड और यातनाओं को निश्वल कर देता
36:24है।
36:26सुदर्शन चकर की भानती हरी भक्ति भक्त के अग्ञान और भाए को काट कर उसके हिदय में ज्ञान का अविनाशी
36:33प्रकाष प्रजवलित करती है।
36:36केवल यज्य और कर्मकान से प्राप्त फल्क शैकारी होते हैं, किन्तु विश्णु भक्ती से प्राप्त मुक्ष सदास्दा के लिए अजर
36:44और अमर है
36:47भक्ती मार्ग पर चलने वाले साधक को न तो नरक का भय व्याकुल करता है और नहीं स्वर्ग का लोग
36:53विचलित कर पाता है
36:56जैसे नदिया अपनी संपूर्ण यात्रा पूरी करके अनन्त समुद्र में लीन हो जाती हैं, वैसे ही भक्त की आत्मा परमात्मा
37:04विश्णु में एकाकार हो जाती है
37:08पराशर मुनी ने बताया कि नारायन ही समस्थ जीवों के परम हितैशी हैं, जो शर्णागत पापी का भी सहर्ष उद्धार
37:15कर देते हैं
37:18देवर्शी नारत की भांती निरंतर हरिकीर्टन करने वाले ज्यानी सदैफ प्रभु के परम सनरक्षन में निश्चिंत निवास करते हैं
37:27जीवन मुक्तात्मा संसार के सभी कर्मों को करते हुए भी उनके फलों से लिपायमान नहीं होती, जैसे कमल का पत्ता
37:35जल में रहकर भी अचुता रहता है
37:39भगवान विश्चु का चरण कमल ही तीनों लोकों में प्राणियों के लिए एक मात्र अभय और शांती का शाश्वत धाम
37:46है
37:48मैत्रे का हृदय गुरुदेव के इस ज्यानोप देश को सुनकर अगाध आनंद और अनन्य भक्ती भाव से सराबोर हो गया
37:57महर्शी पराशर ने स्पष्ट किया कि धर्म, अर्थ और काम की सिध्धी का अंतिम धेभी परमेश्वर विश्णू की प्राप्ती ही
38:05होना चाहिए
38:06जो मनुष्य प्रति दिन इस पावन उपाख्यान का श्रवन करता है, वह नरक की भयभीत कर देने वाली यातनाओं से
38:14सदा के लिए मुक्त हो जाता है
38:17अतेवे मैत्रे, अपनी बुद्धी और आत्मा को सदैव श्री हरी के निरंतर ध्यान में लीन रखो, यही सनातन सत्यकासार है
38:27यह वैकुंठ धाम ही वह अविनाशी परमपद है, जहां पहुचने के बाद जीव कभी पुनह दुखों के इस नश्वर संसार
38:35में नहीं लोटता
38:38आएए सर्वपाफारी परम कृपालू भगवान श्रीमन नारायन के श्री चर्णों में प्रणाम कर मोक्ष के इस परममार्ग को अपनाएं

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