कर्म और नरक के गहन रहस्यों को समझने के बाद, महर्षि पराशर अब मैत्रेय को आत्मा की अमरता और माया के बंधन से मुक्ति के मार्ग से अवगत कराते हैं। इस एपिसोड में भगवान विष्णु की परम सत्ता, आत्मा के स्वरूप और ब्रह्मांड में उनके स्थान पर प्रकाश डाला गया है। पराशर ज्ञान (ज्ञान योग) और भक्ति (भक्ति योग) के सिद्धांतों की गहन व्याख्या करते हैं, जो मनुष्य को जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाते हैं। यह खंड विष्णु पुराण के दार्शनिक हृदय को उजागर करता है, जहाँ भगवान विष्णु ही परम सत्य, चेतना और आनंद के साकार रूप हैं। देखें कैसे करें इस भवसागर से पार और पाएं परमधाम! #VishnuPurana #Moksha #Atman #Maya #BhaktiYoga #JnanaYoga #SpiritualJourney #HinduMythology
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00:00यमलोग की भयानक यातनाओं के सत्य को जानने के बाद, अब महर्शी पराशर मैत्रे को उस मार्ग की ओर ले
00:07चलते हैं, जो इन सभी सांसारिक बंधनों से परेपरम शांती देता है
00:13शांत और पवित्र तपोवन में, जहां सुभा की पहली सुनहरी किरने व्रिक्षों की शाखाओं से छनकरा रही हैं, वहां ज्यान
00:21का एक अलौकिक प्रवाह शुरू होने जा रहा है
00:25महान रिशी पराशर अपनी दिव्य और शांत मुद्रा में बैठे हैं, जिनका तेज संपूर्ण वातावर्ण को एक अनोखी आध्यात्मिक उर्जा
00:34से भर रहा है
00:36उनके प्रिय शिश्य मैत्रे अत्यंत विनीत भाव से अपने गुरू के सम्मुख बैठे हैं, और उनके नेत्रों में ज्यान को
00:44प्राप्त करने की एक गहरी पिपासा दिखाई दे रही है
00:49महर्शी पराशर अपने कोमल और गंभीर स्वर में कहते हैं कि हैं मैत्रे, कर्मों का फल और नरक की यातनाए
00:56तो केवल मन को सचेत करने के लिए हैं, असली सत्य तो मोक्ष है
01:02वे समझाते हैं कि जिस प्रकार हवा में उर्ता हुआ पत्ता हवा के रुख से नियंत्रित होता है, उसी प्रकार
01:09अज्यानी मनुष्य अपने अच्छे और बुरे कर्मों के जाल में फंसा रहता है
01:15अच्छे कर्मों से मिलने वाला स्वर्ग और बुरे कर्मों से मिलने वाला नरक दोनों ही आत्मा के लिए सोने और
01:22लोहे की बेडियों के समान है जो उसे बांध कर रखती है
01:27इस संसार चक्र में जन्म, मृत्यू, सुख और दुख का यह अनंत खेल केवल माया का एक भ्रम है जो
01:35आत्मा के वास्तविक स्वरूप को ढख देता है
01:39महर्शी पराशर ने अपनी उंगली से आकाश की ओर संकेत करते हुए मैत्रे को ब्रहमांड के उस असीम शून्य और
01:47दिव्य प्रकाश की ओर ध्यान केंद्रित करने को कहा
01:51गुरू के ववनों को सुनते हुए मैत्रे के मन में एक गहरा प्रश्न उठता है कि इस अज्यानता और सुख्दुख
01:58के मायाजाल से मुक्थ होने का वास्तविक मार्ग क्या है
02:03पराशर जी मुस्कुराते हैं और समझाते हैं कि आत्मा न तो कभी जन्म लेती है और नहीं कभी मरती है
02:10वह तो सदैव, शुद्ध, बुद्ध और शाश्वत चैतन्य है
02:15जैसे पानी में उगने वाला कमल का फूल की चड़ और पानी से बिलकुल अचूता रहता है, वैसे ही मानव
02:22आत्मा को भी इस संसार के विकारों से निरलिप्त रहना चाहिए
02:27इस परम ज्यान को समझाने के लिए महर्शी पराशर अपने हाथों में एक जलता हुआ मिट्टी का दीपक उठाते हैं,
02:35जिसकी लौ बिना हिले स्थिर होकर जल रही है
02:39वे कहते हैं कि जब मन की वृत्तिया इस दीपक की स्थेर लौकी तरहे परमात्मा में लीन हो जाती हैं,
02:46तब मनुष्य को मोक्ष के मार्ग का दर्शन होता है
02:50उसी समय आश्रम के उपर का आकाश एक अलौकिक नीले और सुनहरे प्रकाश से भर जाता है, मानो स्वयन ब्रहमांड
02:59इस ज्ञान का स्वागत कर रहा हो
03:02मैत्रे अपने आखे बंद करके अपने हृदय के भीतर उस परम जोती का अनुभव करने का प्रयास करते हैं, जिससे
03:09उनका मुखमंडल शांत और तेजस्वी हो जाता है
03:14पराशर जी बताते हैं कि भगवान विश्णू की भक्ती ही वह सुगम नौका है जो जीव को इस संसार रूपी
03:21भवसागर से पार उतार कर मोक्ष के द्वार तक ले जाती है
03:26धीरे-धीरे मैत्रे को यह बोध होने लगता है कि सुख और दुख केवल शरीर के धर्म है और उनकी
03:34अपनी आत्मा तो वास्तव में परमात्मा का ही एक अंश है
03:39तपोवन के पशुपक्षी और सम्पूर्ण प्रकृती भी इस दिव्य उपदेश को सुनकर पूरी तरहे शांत और मंत्रमुग्ध होकर वही ठहर
03:47गए हैं
03:49अंत में महर्शी पराशर अपने शिश्य के सिर पर आशिरवाद का हाथ रखते हैं जिससे मैत्रे को परम शांती और
03:57मोक्ष की ओर बढ़ने का पहला दिव्य अनुभव प्राप्थ होता है
04:02अपने गुरु के आशिरवाद से भाव विभोर होकर मैत्रे अपनी आखें खोलते हैं और उनके चहरे पर परम संतोष और
04:11कृतग्यता के आशु छलक उठते हैं
04:14महर्शी पराशर अत्यन्त सौमय और गंभीर स्वर में मैत्रे की ओर देखते हुए पूछते हैं कि क्या वह स्वयन को
04:22केवल यह हाडमास का शरीर मानते हैं
04:26मैत्रे आश्चर्यचित होकर अपने हाथों और शरीर को देखते हैं मानो वह पहली बार इस भौतिक पिंजरे की सीमाओं को
04:35समझने का प्रयास कर रहे हुँ
04:38पराशर समझाते हैं कि यह शरीर मिट्टी, जल, अगनी, वायू और आकाश जैसे पंच तत्वों का एक शनभंगुर जोड मात्र
04:46है जो अंतह इसी प्रकृती में विलीन हो जाएगा
04:50वे ज्ञान की इंद्रियों को बेकाबू घोरों के रूप में दर्शाते हैं जो रत को खीच रहे हैं जबकि आत्मा
04:58पीछे बैठी एक शांत और तटस्थ दर्शक है
05:02गुरुदेव बताते हैं कि आखें देखती हैं और कान सुनते हैं लेकिन उनके पीछे छिपी जो चेतन सत्ता इन सब
05:10का अनुभव करती है वही वास्तविक तुम हो
05:14फिर वे मन का वर्णन विचारों के एक चंचल और अशांत सागर के रूप में करते हैं जिसे केवल आत्मा
05:22की साक्षी द्रिष्टी ही शांत कर सकती है
05:26पराशर कहते हैं कि बुद्धी भी स्वयन प्रकाशित नहीं है बलकि वह आत्मा के दिव्य प्रकाश से उर्जा पाकर ही
05:33सही और गलत का निर्णय करने में सक्षम होती है
05:38मैत्रे अपनी आखे बंद करके अपने हृदय के भीतर एक अत्यंत तेजोमे और शांत स्वर्णिम लौका ध्यान करते हैं जो
05:46उनके अस्तित्व का केंद्र है
05:49महर्शी पराशर गर्जना करते हुए कहते हैं कि आत्मा न तो कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है
05:57यह अजन्मा शाश्वत और अविनाशी है
06:01वे समझाते हैं कि शस्त्र इस चेतन आत्मा को काट नहीं सकते, अगनी इसे जला नहीं सकती, जल इसे गीला
06:09नहीं कर सकता और वायू इसे सुखा नहीं सकती
06:13एक सुन्दर उपमा देते हुए वे कहते हैं कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्रधारन करता है,
06:21वैसे ही आत्मा भी जीन शरीरों को बदलती है
06:25परम पूज पराशर मैत्रे को संसार रूपी व्रिक्ष पर बैठे दो दिव्य और अत्यन्त सुन्दर पक्षियों का रहस्य में रूपक
06:33समझाते हैं
06:35वे बताते हैं कि पहला पक्षी संसार के कर्म फलों का स्वाद चकता है, जबकि दूसरा साक्षी पक्षी केवल शांत
06:43रहकर उसे बिना किसी रागदवेश के देखता है
06:48इस दिव्य ज्यान को सुनते ही मैत्रे को अनुभव होता है कि वे स्वय वह शांत और साक्षी पक्षी हैं,
06:55जो सुख़दुख से पूरी तरह परे हैं
06:59वे समझाते हैं कि आत्मा न तो पुरुष है, न स्त्री, न बालक और न व्रिद्ध, यह सभी भौतिक उपाधियों
07:06और सांसारिक बंधनों से सर्वता मुक्त है
07:11अचानक मैत्रे की आखों के सामने से माया का एक जिल मिलाता हुआ स्वर्णिम पर्दा हटने लगता है, जिससे उन्हें
07:18परम सत्य की जलक मिलती है
07:21उन्हें साक्षात भगवान विश्नु का अत्यंत विराट स्वरूप दिखाई देता है, जिनसे अनंट आत्माएं अगनी के स्फुलिंगों की भानती निकल
07:30कर पुना उन्ही में विलीन हो रही है
07:34संपूर्ण तपोवन और प्रकृती इस समय एक अलौकिक स्वर्णिन प्रकाश से सराबोर हो उठती है, मानो पूरी स्रिष्टी ही मोक्ष
07:43के इस पावन उत्सव को मना रही हो
07:46अंत में पूर्ण आत्मबोध से त्रिप्थ होकर मैत्रे अपने गुरु पराशर के चर्णों में साश्टान प्रणाम करते हैं और उनका
07:54हृदय परम शांती से भर जाता है
07:58परम सत्ता के दर्शन उपरांथ मैत्रे ने अपने गुरु पराशर के समक्ष उठकर उनकी आखों में गहन कृतग्यता और अनकही
08:07जिग्यासा लिए देखा, मानो और भी गूढ रहसियों के लिए उनका हृदय लालायत हो रहा हो
08:14पराशर ने मैत्रे के भावों को समझते हुए मंदमंद मुस्कुराया, उनकी आखों में वह ज्यान और अनुभव जलक रहा था
08:21जो स्रिष्टी के समस्त मायाजाल से परे हैं, एक मौन स्वीकृती जो आगामी गहन शिक्षा की ओर संकेत कर रही
08:29थी
08:30गुरुदेव ने तब एक गहरी सांसली और शांत स्वर में कहा कि जिस परम सत्य का मैत्रे ने अभी अनुभव
08:37किया है, वह संसार के उस आवर्ण से ढखा है, जिसे माया कहते हैं, एक ऐसा भ्रम जो सत्य को
08:44ढखत लेता है
08:47पराशर ने समझाया कि यह संसार, जिसके सुख दुख को हम सत्य मान कर जीते हैं, वास्तव में एक गहन
08:54स्वपन की भांती है, जिससे जागने पर ही वास्तविक यथार्थ का बोध होता है
09:00यह माया कोई बाहरी शक्ती नहीं, अपितु स्वय भगवान विश्नु की ही योग माया शक्ती है, जो अपनी इच्छा से
09:08इस ब्रहमांड को एक विराट रंदमंच के रूप में प्रस्तुत करती है
09:13इस योग माया शक्ती द्वारा ही भगवान विश्नु सम्पूर्ण स्रिष्टी की रचना, पालन और सहार करते हैं, यह उनका ही
09:21लिलाविनोध है, जिससे वे विभिन्न रूपों में प्रकट होकर संसार को मोहित करते हैं
09:28माया के आवर्ण से ढखा यह संसार अपनी चकाचौंद से जीवों को भ्रमित करता है, जहां प्रत्येक वस्तुक्षन भंगुर और
09:37परिवर्तन शील होते हुए भी शाश्वत प्रतीत होती है
09:42अज्ञानवश जीव स्वयन को इस शरीर, मन और इंद्रियों तक सीमित मान लेता है, भूल जाता है कि वह स्वयन
09:49उस परम ब्रह्मा का ही अंश है जो माया के परे हैं
09:54माया के मुहपाश में बंध कर जीव धन, संपत्ती, संबंध और कामनाओं के पीछे भागता रहता है, शनिक सुख को
10:02ही वास्तविक आनंद मान कर अनंत दुख के चक्र में फंसा रहता है
10:08यह माया ही जीव को बार-बार जन्ममृत्यु के इस अंथीन चक्र में धकेलती रहती है, जब तक वह अपने
10:15वास्तविक स्वरूप को पहचान कर इस बंधन से मुक्त नहीं होता
10:20पराशर ने बताया कि माया की यह शक्ती त्रिगुनों, सत्व, रजस और तमस से युक्त है, जो हर जीव के
10:27स्वभाव और कर्मों को प्रभावित कर उसे संसार से बांधते हैं
10:33इस माया के आवर्ण को भेदना अत्यंत कठिन है, यह एक अद्रिश्य परदा है, जो सबसे बुद्धिमान व्यक्तियों को भी
10:41अपने भ्रमजाल में फंसा लेता है
10:45जैसे मरुस्थल में म्रिगत्रिश्ना सत्य प्रतीत होती है, वैसे ही यह संसार भी अज्यानी जीव को सुख का आभास देता
10:53है, पर अंत्य केवल निराशा ही हाथ लगती है
10:58पराशर ने स्पष्ट किया कि अज्यानता ही इस माया का मूल आधार है, ज्यान के अभाव में जीव इसे ही
11:05सत्यमान कर इसमें लिप्त रहता है
11:08गुरु ने समझाया कि यह संपूर्ण ब्रहमांड अपनी समस्त विविधताव और घटनाव सहित भगवान विश्णू की दिव्य लीला मात्र है,
11:17एक अनंत नाटक जिसे वे स्वया रचते और देखते हैं
11:22इस माया के बंधन से मुक्ति पाना ही मोक्ष है, वह अवस्था जहां जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान कर
11:30परमशान्ती और आनंद को प्राप्त करता है
11:34पराशर ने बताया कि भगवान विश्णू के प्रती अटूट भक्ती और प्रेम ही वह मार्ग है, जो माया के गहन
11:41अंधकार को भेद कर जीव को परम सत्य की ओर ले जाता है
11:47गुरू की कृपा ही वह मार्ग गर्शक प्रकाश है, जो अज्ञान के अंधेरे में भटकते हुए जीव को माया के
11:54भ्रमजाल से निकाल कर आत्म ज्ञान की ओर ले जाता है
11:59यह गहन ज्ञान प्राप्त कर मैत्रे का हृदैश रधा और द्रिड संकल्प से भर उठा, उन्होंने प्रतिग्या की कि वे
12:07इस माया के आवर्ण को भेट कर आत्म साक्षातकार के मार्ग पर अग्रसर होंगे
12:13पराशर ने मैत्रे को आशिर्वाद देते हुए कहा कि जो साधक निष्ठा पूर्वक इस पत्थ पर चलता है, उसे अंत्या
12:21भगवान विश्नु की क्रिपा से माया के पार्मोक्ष अवश्य प्राप्त होता है
12:26महर्शी पराशर ने दिव्यवाणी में मैत्रे को बताया कि भगवान विश्नु ही परम ब्रह्मा हैं, जो अनादी, अनन्त और समस्त
12:35ब्रहमांडों के एक मात्र मूल आधार है
12:39स्रिष्टी की उत्पत्ती से पूर्व केवल भगवान विश्नु ही विद्यमान थे और प्रलै काल में सब कुछ उनही के योग
12:46निद्रा में विलीन हो जाता है
12:49ब्रहमा जी की स्रिजनात्मक शक्ती और भगवान शिव का प्रल्यंकारी स्वरूप भी वस्तुता विश्णू की ही भिन्नभिन शक्तियों की अभिव्यक्ती
12:58हैं
13:00प्रित्वी, जल, अगनी, वायू और आकाश ये सभी पंच महाभूत भी नारायन की ही इच्छा से उत्पन्ध होकर ब्रहमांड का
13:08निर्मान करते हैं
13:10काल का चक्र भी विश्णू के ही अधीन कार्य करता है, जो निरंतर स्रिष्टी की गती और जीवों की आयू
13:18का निर्धारन करता है
13:20पराशर ने समझाया कि प्रत्येक जीव के हृदय में अंतर्यामी रूप से वास करने वाले परमात्मा भी स्वयन श्री हरी
13:28ही हैं
13:30यह परम ज्यान सुनकर मैत्रे का मन अगाध भक्ती और विस्मय से भर गया, और उन्होंने श्री हरी के विराठ
13:37स्वरूप को जानने की इच्छा प्रकट की
13:41महर्शी पराशर ने ध्यान लगा कर मैत्रे की द्रिष्टी को दिव्य बनाया, जिससे उन्हें नारायन के अलोकिक विराठ स्वरूप के
13:49दर्शन होने लगे
13:51मैत्रे ने देखा कि अनन्त आकाश में फैले भगवान विश्नु के विराठ स्वरूप में अंगिनत सूर्य, नक्षत्र और लोक समाय
13:59हुए थे
14:00उस विशाल रूप के विभिन अंगों में समस्त देवगन, सब्तरिशी और चौधा भुवन स्पष्ट रूप से द्रिशमान हो रहे थे
14:09वेदों की समस्त रिचाएं और यग्य की पावन आहुतियां भी अंत्त उन्ही परम पुरुष विश्नु को ही प्राप्थ होती है
14:19भगवान विश्नों की त्रिगुनात्म का माया ही संसार के जीवों को मोह में बांधती है
14:24परंतु उनकी शरण में जाने वाला साधक माया से मुक्त हो जाता है
14:30बैकुंठ लोख ही वह परमधाम है जहां न कोई दुख है न जन्म और नम्रित्यू केवल शाश्वत आनंद और शांती
14:38का वास है
14:40अनंत नाग शेशनाग अपनी सहस्र फणों पर संपून ब्रहमांड का भार धारन करके निरंतर नारायन की सेवा में ततपर रहते
14:48हैं
14:50माता लक्ष्मी श्री हरी की अहरनिश सेवा में लीन रहकर समस्त लोकों में समरिध्धी, कृपा और एश्वर्य का संचार करती
14:59है
15:01पराशर ने द्रिड़ता से कहा कि जो मनुष्य भक्तिभाव से विश्नु का निरंतर स्मरण करता है वह संसार चक्र से
15:08मुक्थ होकर मोक्ष को प्राप्थ होता है
15:12श्री हरी ही इस जगत के आदी मध्य और अंत हैं उनके अतिरिक्ट अन्य कुछ भी सत्य नहीं है
15:20विराट स्वरूप के इस पावन दर्शन और पराशर के उपदेश से मैत्रे का हृदय परमशान्ती और आत्म ज्यान से आपलावित
15:28हो गया
15:30पराशर ने मैत्रे को आशिरवाद देते हुए इस सनातन सत्य की सदारक्षा और प्रचार करने की प्रेणा दी
15:38इस प्रकार विष्णु पुरान का यह पावन प्रसंद यह संदेश देता है कि श्री हरी के चरण कमलों में आत्म
15:45स्मर्पन ही जीवन का अंतिम लक्ष है
15:49महरशी पराशर आगे समझाते हैं कि जिस प्रकार सूर्य से अंगिनत किरने निकल कर भी सूर्य का ही भाग रहती
15:57है
15:57उसी प्रकार यह संपूर्ण जीवात्मा वर्ग परमेश्वर श्री विष्णु का ही एक चेतन अंश है
16:05जब तक अज्यान की माया आत्मा को घेरे रहती है तब तक यह जीव स्वयं को परमात्मा से अलग मानकर
16:12संसार के सुख दुख के चक्र में भटकता रहता है
16:17जैसे एक विषाल प्रजवलित अगनी कुंड से लाखों छोटी-छोटी चिनगारिया उत्पन्न होकर पुन्ह उसी अगनी में समा जाती हैं
16:25वैसे ही समस्ट आत्माएं विष्णु से उत्पन्न होकर अंत्त उन्ही में विलीन होती हैं
16:31जल से भरे अंगिनत पात्रों में एक ही चंद्रमा के अलग-अलग प्रतिविंद दिखाई देते हैं
16:38खीक वैसे ही एक ही परमात्मा अनेक शरीरों में भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है
16:44अज्यान्ता के विनाश के लिए पराशर मुनी मैत्रे को बताते हैं कि शरीर नश्वर है परंतु उसके भीतर का द्रश्टा
16:52आत्मा, अमर, निर्गुन और अविनाशी है
16:56वह परमेश्वर प्रत्येक प्राणी के हरिदय रूपी कमल में अंतर्यामी रूप से सदा विराजमान रहता है, भले ही जीव अपनी
17:04इंद्रियों की वासनाओं के कारण उसे न देख सके
17:09उपनिश्दों का प्रसिध द्रिष्टांत देते हुए पराशर कहते हैं कि एक ही व्रिक्ष पर दो दिव्य पक्षी बैठे हैं, जिन
17:16में से एक कर्मों के फल भोगता है और दूसरा केवल शान्त भाव से देखता रहता है
17:23जब कर्मफल भोगता हुआ यह जीव पक्षी उपर देखकर उस शान्त साक्षी पक्षी की महिमा को पहचान लेता है, तब
17:31उसके सारे शोक और दुख तुरंथ समाप्थ हो जाते हैं
17:36ज्यान की अगनी जब अग्यान के पर्दों को जला देती है, तब साधक को समझ आता है कि मैं यह
17:43हार्मांस का शरीर नहीं, बलकि परम ब्रहमा का ही अंश हूँ
17:48पराशर जी कहते हैं कि नदिया जिस प्रकार अपने नाम और रूप को छोड़कर समुद्र में मिलकर समुद्र ही बन
17:55जाती हैं, उसी प्रकार ज्यानी पुरुष परमात्मा में लीन हो जाता है
18:01इस आत्मज्यान को प्राप्त कर मैत्रे का मन परम शान्ती में स्थिर हो गया और उनके सभी संशे एक क्षण
18:08में नश्ट हो गए
18:10मोक्ष केवल मृत्यू के बाद की स्थिती नहीं है, बलकि जीतेजी अग्यान और अहंकार से मुक्ती पाकर श्री हरी के
18:18स्वरूप में स्थित हो जाना ही सच्चा मोक्ष है
18:22पराशर समझाते हैं कि भक्ती ही वह सबसे सरल और सुगम नौका है जो जीव को माया के इस दुर्जर
18:29भवसागर से पार उतार कर मोक्ष के तट पर पहुँचाती है
18:34जो व्यक्ती निरंतर ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का स्मरण करता है उसके हृदय का अध्यान अंधकार सुर्योदय की भांती
18:43लुप्थ हो जाता है
18:46परमात्मा से जुरने पर जीव में अनंत प्रेम, शांती और करुणा का संचार होता है और वह समस्थ प्राणियों को
18:53अपने ही समान देखने लगता है
18:57बैकुंठ लोग का आनंद किसी भौतिक वस्तु में नहीं, बलकि श्री हरी के नित्य सानिध्य और उनके प्रेम्मय भक्ती रस
19:05में ही अंतरनिहित है
19:07महर्शी पराशर अपना उपदेश पूर्ण करते हुए मैत्रे से कहते हैं कि इस विश्णु पुरान का श्रवन और मनन करने
19:15वाला प्राणी भवबंधन से सदा के लिए मुक्थ हो जाता है
19:20मैत्रे ने हाथ जोड़कर अपने गुरु के प्रती असीन कृतग्यता व्यक्त की और इस परम ज्ञान को लोक कल्यान के
19:27लिए फैलाने का संकल्प लिया
19:30समस्त लोकों का आधार, सर्वव्यापी और परम मंगलकारी भगवान श्री विश्णु ही इस जगत के करता, धरता और संहरता है
19:40इस प्रकार विश्णु पुरान का यह महान प्रसंग हमें याद दिलाता है कि हमारा वास्तविक अस्तित्व श्री हरी के चर्णों
19:48में ही सिध्ध और साकार होता है
19:52महर्शी पराशर अब ज्ञान योग के अतिसूक्ष्म सिध्धानतों का उद्धाटन करते हुए मैत्रे को विवेक और वैराग्य के परम्मार्ग पर
20:00अग्रसर करते हैं
20:03विवेक का अर्थ है उस नित्य अविनाशी परम सत्य और क्षनभंगुर अनित्य संसार के अंतर को अपनी प्रखर चेतना से
20:11भली भानती पहचानना
20:14जैसे मरुस्थल में चमक्ती बालू जल का भ्रम पैदा करती है वैसे ही यह नश्वर जगत अग्यानी मनुश्यों को स्थाई
20:21प्रतीत होता है
20:24वैराग्य वह पावन भावना है जो मन को संसार के क्षनिक आकर्शनों से मुक्त करके केवल परमिश्वर के चर्णों में
20:31स्थिर कर देती है
20:34यह स्थूल शरीर तो पंच्टत्वों की नश्वर पुतली है जबकि इसके भीतर विद्यमान आत्मा श्री हरी की असीम जोत का
20:42ही अंश है
20:44जब साधत ध्यान की पराकाश्था में पहुँचता है तो पृत्वी, जल, अगनी, वायू और आकाश का भेज समाप्थ होकर केवल
20:53एक परम सत्ता शेश रह जाती है
20:57आत्मनुसंधान का यह कठिन मार्ग में कौन होग के निरंतर मंथन से प्रारंभ होकर अहंकार के समूल विनाश पर समाप्थ
21:04होता है
21:06अविद्या के अंधकार में फंसा मन ही इस भवसागर के भयानक बंधनों और कष्टों का मुख्यकारण बनता है
21:15किन्तु ज्यान की तीच्षन तलवार से इस मायावी जाल को काट कर आत्मा अपनी वास्तविक स्वतंतरता को प्राप्थ करती है
21:24सच्चा ज्यानी वही है जो शत्रू और मित्र, स्वर्ण और पत्थर तथा सभी जीवित प्राणियों में केवल एक भगवान विश्णु
21:32को ही देखता है
21:35महर्शी पराशर की अमरित्मई वानी सुनकर मैत्रे का हृदय अनन्त ज्यान और अनिर्वचनिय आनन्द के सागर में निमगन हो गया
21:44द्वैत का जूठा प्रपंच समाप्थ होते ही साधक को यह बोध होता है कि वह परंब्रम से अलग नहीं बलकि
21:51उसी का अभिन्न रूप है
21:54ज्यान योग की अगनी में तपकर साधक का चित पूरी तरह निश्कलंक और अत्यंत निर्मल हो जाता है
22:03संसार के सभी विश्यभोग मन को घ्रमित करते हैं परंतु हरिचिंतन ही एक मात्र ऐसा मार्ग है जो अचल शान्ती
22:11प्रदान करता है
22:13जिस प्रकार नदिया विभिन्न मार्गों से बहती हुई अन्तह महासागर में विलीन हो जाती हैं
22:20उसी प्रकार सभी ज्यानमार्ग श्री विश्नु में ही विश्राम पाते हैं
22:25जीवन मुक्तात्मा संसार में रहते हुए भी कमल के पत्ते पर जल की बूंड की भाती पूरी तरह अनासक्त और
22:33अस्परशित रहती है
22:36अज्यानांध कार को मिटाने वाली यह ब्रहम विद्याही जीव को जन्ममर्ण के अनंत चक्र से सरवदा के लिए मुक्त करती
22:43है
22:45मैत्रे ने हाथ जोड कर अपने गुरुदेव के चर्णों में शीश नवाया और इस परम पवित्र ज्यान योग के उपदेश
22:52को शिरोधार्य किया
22:54पराशर मुनी ने आशिर्वाद देते हुए कहा कि जो भी मनुष्य विवेक और वैराग्य को अपनाएगा वह सहेज ही मोक्ष
23:02का अधिकारी बनेगा
23:04इस प्रकार ज्यान योग के इस परम पावन प्रसंका श्रवन करके मनुष्य संसार के मायाजाल से छूटकर सीधे वैकुंठ धाम
23:13की ओर प्रस्थान करता है
23:16मैत्रे ने परम शांत भाव से अपने गुरुदेव के चर्णों का स्पर्श किया और पूछा कि हे महामुनी इस संसार
23:23सागर के अगाध अंधकार में फंसा मनुष्य बिना मार्ग दर्शक के मोक्ष को कैसे प्राप्थ कर सकता है
23:31महर्शी पराशर ने अत्यंत स्नेह पूर्वक मुस्कुराते हुए कहा कि हे वत्स यह संसार माया का एक अत्यंत दुर्गम वन
23:39है जहां पकपक पर अज्ञान का सघन अंधकार मनुष्य की चेतना को भ्रमित करता रहता है
23:46इस सघन अंधकार मै संसारवन में गुरु ही वह दिव्य प्रकाशस्तम्भ है जो अपने ज्ञान की मशाल से भटकती हुई
23:54आत्मा को सत्य और मुक्ती का मार्ग दिखाता है
23:59पराशर जी समझाते हैं कि गुरु का अर्थ केवल एक देह नहीं अपितु वह चैतन ये सत्ता है जो जीव
24:06के भीतर सुशुप्त पड़ी चेतना को जगा कर उसे परमात्मा से जोर देती है
24:12गुरु शब्द में गुका अर्थ अंधकार है और रुका अर्थ प्रकाश अर्थात जो साधक को अज्ञान के तमस्से खीच कर
24:20ज्ञान के परम प्रकाश में स्थापित करे वही सच्चा गुरु है
24:25शास्त्रों का ज्यान एक ऐसा अमूल्य दर्पण है, जिसमें मनुश्य अपने वास्तविक आत्मस्वरूप का दर्शन करता है और मायाजन्य भ्रमों
24:35से सदा के लिए मुक्त हो जाता है
24:38चारों वेद, रिगवेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद परब्रहम विश्नु की वाणी हैं, जो ब्रहमांड की विवस्था और धर्म के शाश्वत
24:47नियमों को नियंत्रित करते हैं
24:50ये पवित्र शास्त्र केवल अक्षरों के संग्रह नहीं हैं, बलकि इन में छिपी प्रत्यक्रिचा और मंत्र मनुष्य के मन और
24:58आत्मा को पवित्र करने वाली परम औश्धी हैं
25:03वेदों के गूड ज्यान को साधारन मनुष्यों तक पहुचाने के लिए ही इतिहास और पुराणों की रचना की गई, जो
25:10मनोरम कथाओं के माध्यम से धर्म की स्थापना करते हैं
25:15बिना शास्त्र के ज्यान के गुरु की शिक्षा पूर्ण नहीं होती, और बिना गुरु की कृपा के शास्त्रों का मर्म
25:22कभी समझ में नहीं आ सकता
25:25जैसे अगनी में तपा कर सोने को अशुद्धियों से मुक्त किया जाता है, वैसे ही गुरु अपने वचनों और अनुशासन
25:33की भट्टी में शिश्य के अंकार को भस्म कर देते हैं
25:37गुरु की सच्ची सेवा और उनकी आग्या का पालन करने से मनुश्य के जन्मों जन्मों के संचित पाप वैसे ही
25:45नश्ट हो जाते हैं, जैसे सूखे पत्तों का धेर तेज हवा में उर जाता है
25:51सच्चा साधक वही है, जो शास्त्रों के वचनों को केवल कंठस्थ नहीं करता, बलकि उन्हें अपने आचर्ण और दैनिक व्यवहार
25:59में उतारता है
26:02पराशर जी चेतावनी देते हैं, कि संसार में अनेक ऐसे पाखंडी भी हैं, जो केवल धन और यश के लिए
26:09गुरु का धों करते हैं, ऐसे लोगों से सदादूर रहना चाहिए
26:14एक सच्चा सद्गुरु वही है, जो निशकाम भाव से, बिना किसी लोग के, केवल अपने शिश के परम कल्यान और
26:22मुक्ती की कामना करता है
26:25शास्त्रों में कहा गया है कि जब गुरु प्रसन होते हैं, तो साक्षात भगवान हरी प्रसन होते हैं, क्योंकि गुरु
26:33और गोविंद में कोई भेद नहीं है
26:36ज्यान की प्राप्ती के पश्चात जब साधक का मन एकाग्र होता है, तब वह संसार की सभी सीमाउं से परे
26:44जाकर अखंड ब्रहमांड का अनुभव करता है
26:48के मैत्रे, गुरु की कृपा और शास्त्रों के इस ज्यान योग के आश्रे से ही जीवात्मा अंत्ह वैकुंट के परमपद
26:56को प्राप्त करने के योग्य बनती है
26:59इस प्रकार गुरु और शास्त्रों की महिमा का यह परम पावन प्रसंग जो भी श्रद्धा पूर्वक सुनता है, उसके जीवन
27:07के सभी कष्ट सदा के लिए मिट जाते हैं
27:11विश्नु पुरान के इस पावन ज्यान को आत्म साथ कर, मनुष्य अपने अंतहकरण को शुद्ध करता है और परम मोक्ष
27:19की प्राप्ती के पथ पर अग्रसर होता है
27:22महर्शी पराशर आगे कहते हैं कि हे मैत्रे आने वाले कठिन कलियुग में कठिन जब तब और यग्यकरना साधारण मनुष्यों
27:31के लिए अत्यंत कठिन हो जाएगा
27:33इस पर जिग्यासु मैत्रे अत्यंत विनमर्ता से हाथ जोड़ कर गुरुदेव से कलियुप के जीवों के कल्यान का सर्वसुलब उपाए
27:42पूछते हैं
27:44तब पराशर मुनी मुस्कुराते हुए भक्ति योग के उस पावन मार्ग को प्रकट करते हैं जो समस्त वेदों और शास्त्रों
27:52का परम निचोड है
27:55भग्वान श्री हरी विश्नुदया के ऐसे अनंत सागर हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए कठोर साधना की नहीं बलकी निश्कपट
28:03प्रेम की आवश्चक्ता होती है
28:06यह भग्ती मार्ग उस सुद्रिढ नौका के समान है जिस पर सवार होकर जीव इस संसार रूपी भयंकर भवसागर को
28:14बिना किसी कष्ट के सहज ही पार कर लेता है
28:18पूर्व के युगों में जो मोक्ष सहसरों वर्षों के कठोर तपोबल से मिलता था वह कलियुग में केवल भगवान विश्णु
28:26के नाम संकीर्तन मात्र से प्राप्त हो जाता है
28:30जब कोई भग्त सच्चे हरिदय से ओम नमो भगवते वासुदेवाय का जाब करता है तो उसके समस्थ पाक शन भर
28:38में भस्म हो जाते हैं
28:41श्री हरी अपने भग्तों से केवल निश्चल प्रेम मांगते हैं चाहे कोई उन्हें श्रद्धा से केवल एक पत्ता, फूल, फल
28:49या जल ही क्यों न अर्पित करे
28:51विशाल धन संपदा और अहंकार युक्त बड़ेग्डे यग्यों की तुलना में प्रभु भक्त के अश्रुजल और विशुद्ध भाव को सहर्ष
28:59स्विकार करते हैं
29:02अनन्य भक्ती के प्रभाव से मनुष्य का अंतहकरन निर्मल हो जाता है और उसके हृदय कमल में स्वय भगवान नारायन
29:10का वास होने लगता है
29:12जो प्राणी सर्वस्व त्याग कर केवल विश्णू के चर्णों में शरण लेता है उसके जन्मांतरों के संचित कर्मबंधन स्वतह ही
29:21कट जाते हैं
29:23देवर्शी नारत की भांती जो भी जीव निरंतर वीना की तान पर प्रभू की महिमागाता है वह संसार के मायाजाल
29:31से सदा के लिए मुक्थ हो जाता है
29:34पराशर समझाते हैं कि जिस प्रकार भक्त प्रहलाद की अटूट भक्ती ने दैतियों के समस्त अत्याचारों को निश्वल कर दिया
29:42वैसे ही भक्ती हर भय को हर लेती है
29:46भगवान श्री विश्णु अपने अनन्य भक्तों की रक्षा उसी प्रकार करते हैं, जैसे एक पक्षी अपने कोमल पंखों के नीचे
29:54अपने शावकों को सुरक्षित रखता है
29:58जब भक्ती परिपक्व हो जाती है, तो जीव को मोक्ष मांगने की भी आवश्शक्ता नहीं पड़ती, वह स्वतह ही वैकुंट
30:06के परम आनन्द में लीन हो जाता है
30:10महर्शी पराशर के इन अमरित तुल्य वचनों को सुनकर मैत्रे का हृदय अगात परमशान्ती और भक्ती रस्से भर उठता है
30:19अंत्य भक्ती मार्ग पर चलने वाला साधक नित्य, शाश्वत और प्रकाश्मान वैकुंट लोक में पहुँचकर श्री हरी के चर्णों में
30:27स्थान पाता है
30:30इस प्रकार भक्ती योग ही समस्त योगों का मुकुट मनी है, जो आत्मा को परमात्मा से सीधे जोड़कर परम्मोक्ष प्रदान
30:38करता है
30:40नील्मनी के समान कांती वाले चतुर्भुज भगवान विश्नु अपने अभय हस्त से सम्पून स्रिष्टी को आशिरवात देते हुए सर्वत्र प्रकाशित
30:49हो रहे हैं
30:52इसलिए है मानव, सब चिन्ताओं को त्याग कर भगवान श्री हरी विश्नु के चर्णों में आत्मस्मर्पन करो और परमपद को
30:59प्राप्त करो
31:01हे मैत्रे, अब मैं तुम्हें उस परम कल्यानकारी नवधा भगती के विशय में बताता हूँ, जो जीव को संसार से
31:08मुक्त कर सीधे भगवान श्री हरी के चर्णों तक पहुँचाती है
31:13इस भगती का प्रथम सोपान श्रवनम है, जिसमें भगत अत्यंत श्रद्धा पूर्वक भगवान विश्नु की दिव्य लीलाओं, कथाओं और उनके
31:22अनंत नामों का रस्पान करता है
31:26जब पवित्र कथाए कानों के माध्यम से हिदय में प्रवेश करती हैं, तब आत्मा के सारे संशय और सांसारिक पाप
31:33स्वतह ही नश्ट हो जाते हैं
31:37द्वितिय सोपान कीर्टनम है, जहां भक्त भगवान के पावन नामों और लिलाओं का उच्चस्वर में आनंद पूर्वक गान करके समस्त
31:45ब्रहमांड को पवित्र करता है
31:48प्रेम में मगन होकर, जब भक्त जाज और मंजीरे लेकर हरी नाम का संकीर्टन करते हैं, तो स्वयन देवता भी
31:56उस अलोकिक आनंद का साक्षी बनने धर्ती पर आते हैं
32:01त्रीतिय सोपान स्मर्णम है, जिसमें भक्त उठते बैठते, सोते जागते हर क्षन केवल अपने आराध्य भगवान श्री हरी का ही
32:10निरंतर ध्यान करता है
32:13इस निरंतर स्मर्ण से भक्त का मन संसार के सभी बंधनों से मुक्ठ होकर सीधे परमात्मा के दिव्य चैतन्य में
32:20विलीन होने लगता है
32:23चतुर्थ सोपान पाद सेवन है, जिसके अंतरगत भक्त भगवान के श्री चर्णों की सेवा को ही अपने जीवन का एक
32:31मात्र परम लक्ष मान लेता है
32:34प्रभु के इन परम पावन चर्णों का आश्रय लेने से संसार रूपी भयानत भवसागर अत्यंत छोटा और पार करने योग्य
32:42बन जाता है
32:45पंचम सोपान अर्चनम है, जिसमें भक्त सुन्दर पुष्पों, चंदन, धूप और दीपों के द्वारा पूर्ण विधिविधान से भगवान की शोडशोपचार
32:54पूजा करता है
32:56इस निश्चल प्रेम्मई पूजा से अर्पित किया गया, एक छोटा सा पुष्प भी भगवान को अत्यंत त्रिप्ती और प्रसन्निता प्रदान
33:04करता है
33:06शष्ट सोपान वंदनम है, जिसमें भक्त अपने समस्थ अहंकार को त्याग कर भगवान के चर्णों में पूर्ण आदर से साश्टांग
33:15दंडवत प्रणाम करता है
33:17जब साधक का मस्तक प्रभु के चर्णों में जुपता है, तब उसका संपूर्ण अहंकार मिट जाता है और उसे परमशान्ती
33:25प्राप्थ होती है
33:28सप्तम सोपान दास्यम है, जहां भक्त स्वयं को भगवान का सेवक मान कर उनकी इच्छा को ही अपने जीवन का
33:35सर्वोच्च आदेश स्विकार करता है
33:39इस दास्य भाव में भक्त के भीतर का करत्रित्व भाव समाप्थ हो जाता है और वह केवल प्रभु के हाथों
33:46का एक पवित्र यंत्र बन जाता है
33:50अश्टम सोपान सक्यम है जहां भक्त भगवान को अपना सबसे प्रिय मित्र और सक्खा मान कर अपने हृदय की हर
33:57बात उनसे साजा करता है
34:00इस मधुर सक्खा भाव में कोई भाय या संकोच नहीं होता बलकि केवल निश्चल, गहरा और अटूट प्रेम प्रवाहित होता
34:09है
34:10नवम और अंतिन सोपान आत्मनिवेदन्म है जहां भक्त अपनातन, मन, प्रान और सर्वस्व भगवान के चर्णों में पूर्ण रूप से
34:19अर्पित कर देता है
34:22जब भक्त का अपना प्रिथक अस्तित्व पूरी तरह मिख जाता है, तब वह साक्षात भगवान के दिव्य स्वरूप में लीन
34:29होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है
34:32है मैत्रे जो भी मनुष्य इन नौ प्रकार की भक्ती में से किसी एक को भी सच्चे मन से अपना
34:39लेता है, उसे संसार चक्र से सदा के लिए मुक्ती मिल जाती है
34:45महर्शी पराशर आगे बताते हैं कि जब जीवात्मा सासारिक बंधनों से मुक्त होती है, तो वह माया के अंधकार को
34:53चीरते हुए परम प्रकाश की ओर अग्रसर होने लगती है
34:57यह शुद्ध चेतना सूर्य मंडल को भेदती हुई काल और कर्म के चक्र से परे दिव्य लोकों की ओर यात्रा
35:04करती है
35:07भौतिक संसार की सीमाओं को पार कर वह आत्मा माया के अंतिम आवन से बाहर निकल कर विशुद्ध ब्रहम प्रकाश
35:14में प्रवेश करती है
35:17ततपश्चात उस मुक्त आत्मा के समक्ष भगवान विश्नु का परमधाम श्री वैकुंठ लोक प्रकट होता है जो शाश्वत आनंद और
35:26शान्ती का सागर है
35:29वैकुंठ लोक में चारों और मनियों से निर्मित दिव्य प्रासाद और प्रस्फुटित कमल पुष्पों से सुसज्जित अलोकिक सरोवर्शो भायमान है
35:39वहां कल्पव रिक्षों से निरंतर सुगंधित पुष्पों की वर्शा होती है और संपूर्ण वातावर्ण वेदों की मधुर ध्वनी से गुंजायमान
35:47रहता है
35:50वैकुंठ में प्रवेश करते ही आत्मा को समस्थ दुखों से रहित एक दिव्य और शाश्वत स्वरूप प्राप्थ हो जाता है
35:58परमर्शी नारद वीना की तान पर भगवान हरी की महिमा का गान करते हुए वहां उपस्थित भक्तों को आननदित करते
36:06हैं
36:08वैकुंठ के विशाल स्वर्ण द्वारों पर द्वारपाल जय और विजय अत्यंत भव्य रूप में प्रभू की सेवा में तत्पर खड़े
36:15दिखाई देते हैं
36:17उस परमधान के मध्य में दुग्ध सागर लहराता है जिसकी क्षीर तरंगों पर अलौकिक कांती बिखरी हुई है
36:26क्षीर सागर के बीच सहस्त्र फणों वाले शेशनाग की शया पर जगतपती भगवान श्री विश्नु विराजमान है
36:35प्रभु के चार हाथों में शंक, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हैं तथा उनके वक्षस्थल पर कौस्तुभ मनी सूर्य के
36:43समान देदी प्यमान है
36:46जगजन्नी माता लक्ष्मी भगवान के चर्णों के निकट विराजमान होकर संपूर्ण ब्रहमान पर अपनी कृपा और करुणा की वर्शा करती
36:55हैं
36:56मुक्ट आत्मा भगवान विश्नु के इस परम मनमोहक स्वरूप का दर्शन कर अनन्य प्रेम और भक्ती के अश्रूओं से सराबोर
37:04हो जाती है
37:07अंता वह आत्मा भगवान विश्नु के दिव्य परम जोती में लीन होकर सदैव के लिए उनके साथ एकाकार हो जाती
37:14है
37:16पराशर मुनी कहते हैं कि वैकुंठ लोक में न समय का प्रभाव है न वृद्धावस्था न मृत्यू और नहीं किसी
37:24प्रकार का पुनरजन्म
37:26ज्यान और भक्ती का यह पावन संगम ही मनुष्य को इस नश्वर संसार के चक्रव्यों से निकाल कर परम गती
37:33प्रदान करता है
37:36महर्शी पराशर के इन परम गूड वचनों को सुनकर शिश्य मैत्रे का हरिदय असीन कृतग्यता और ब्रह्मानंद से भर जाता
37:44है
37:45पराशर जी आशिर्वाद देते हैं कि जो भी मनुष्य इस परम ग्यान का श्रवन और ध्यान करेगा वह निश्चित ही
37:53विश्नुलोग का अधिकारी बनेगा
37:56इस प्रकार श्री विश्नु की परम सत्ता आत्मा का सत्य और मोक्ष का यह महान रहस्य संपून स्रिष्टी को प्रकाशमान
38:04करता है