00:001933 में Lundon की एक सड़क पार करते समय हंगरी के वेग्यानिक लियो जिलाड के मन में एक ऐसा विचार
00:05आया जिसने आने वाले समय में पूरी दुनिया की ऊर्जा बदल दी
00:09उन्होंने सोचा अगर परमानू के अंदर छिपी ऊर्जा को एक नियंतरित चेन रियक्शन में बदला जा सके तो उससे लगातार
00:15गर्मी पैदा होगी और उस गर्मी से बिजली भी बनाई जा सकती है
00:18उस समय ये सिर्फ एक कलपना थी क्योंकि किसी ने आज तक ऐसा कोई रियक्टर नहीं बनाया था जो इस
00:24रियक्शन को सुरक्षित तरीके से नियंतरित कर सके
00:26अगले ही साल 1934 में जिलाड ने अपने रियक्टर के विचार का पेटेंट दर्ज कराया लेकिन समस्या अभी भी वही
00:32थी
00:33वैग्यानिकों को ये भी नहीं पता था कि ऐसी चेन रियक्शन वास्ता में संभव है या नहीं
00:37फिर 1934 के आखिर में जर्मनी में आटो हान और फ्रिट्स स्ट्रास्मैन ने नियूक्लियर फिशन की खोज की
00:44जबकि लीज माइटनर और आटो फिशन ने समझाया कि परमानू तूटने पर इतनी जादा उर्जा क्यों निकलती है
00:50अब जिलाड का पुराना विचार पहली बार वग्यानिक रूप से संभव दिखाई देने लगा
00:54करीब 3 साल बाद 2 दिसंबर 1942 को अमेरिका के युनिवर्सिटी अफ शिकागो के स्टैग फिल्ड स्टेडियम के नीचे बने
01:01एक साधारन स्कॉश कोट में एंरिको फर्मी और उनकी टीम ने दुनिया का पहला न्यूकलियर रियक्टर शिकागो पाइल एक तयार
01:08किया
01:08दोपहर लगबग 3 बचकर 25 मिनट पर कंट्रोल रॉड्स धीरे धीरे बाहर निकाली गई
01:13कुछी पलों में रियक्टर पहली बार सेल्फ सस्टेनिंग न्यूकलियर चेन रियक्शन की अवस्था में पहुँच गया
01:19शुरुवाती परीक्षन में इसका पावर लेवल लगभग आधा वाट रखा गया
01:22और जब ये साबित हो गया कि रियक्शन पूरी तरह नियंतरन में है तो रियक्टर को सुरक्षित रूप से बंद
01:27कर दिया गया
01:28अब वैग्यानिकों के सामने नया सवाल था
01:30अगर इतनी उर्जा निकल सकती है तो क्या इस से किसी शहर को बिजली दी जा सकती है
01:34इस सवाल का पहला जवाब 20 दिसंबर 1951 को अमेरिका के आइडाहों में मिला
01:39एक्सपरिमेंटल ब्रीडर रियक्टर वन यानी EBR-1 ने पहली बार न्यूकलियर एनर्जी से लगभग 800 वाट बिजली पैदा करके
01:474200 वाट के बल्ब जला दिये
01:49ये इतिहास का पहला मौका था जब किसी न्यूकलियर रियक्टर से बिजली निकली
01:53लेकिन ये अभी भी सिर्फ एक प्रयोग था
01:55अब दुनिया को ऐसी मशीन चाहिए थी जो दिन रात लगातार बिजली बना सके
01:59जुतिय विश्व युद्द के बाद सोवियत संग ने इसी लक्ष पर काम शुरू किया
02:03इस परियोजना की कमान इगोर कुर्चातोव को दी गई
02:06जबकि रियक्टर का डिजाइन इंजीनियर निकुलाई डोलेजाल और उनकी टीम ने तयार किया
02:11उन्होंने युरेनियम फ्यूल से निकलने वाली हीट को पानी तक पहुचाने का सिस्टम बनाया
02:15पानी भाप में बदलता, भाप टर्बाइन घुमाती, टर्बाइन जनरेटर चलाता और जनरेटर बिजली पैदा करता
02:21वही कंट्रोल रोड्स हर पल न्यूकलियर रियक्शन को सुरक्षित सीमा में रखती थी
02:25कई साल की इंजिनिरिंग, टेस्टिंग और सुधार के बाद, आखिरकार 26 जून 1954 को
02:30सोवियत संके ओबनिंसक शहर से पहली बार ऐसी भीजली, पबलिक ग्रिड में भीजी गई, जो कोईले, तेल या पानी से
02:37नहीं, बलकि परमानू की उर्जा से बनी थी
02:39इसकी क्षमता पांच मेगावाट थी, और जिस मशीन की कहानी आपने अभी सुनी, वही इतिहास का दुनिया का पहला ग्रिड
02:46कनेक्टेड न्यूकलियर पावर प्लांट था
02:47इसी ने साबित कर दिया कि परमानू की उर्जा सिर्फ विनाश का हत्यार नहीं, बलकि पूरी दुनिया को रोशन करने
02:53का भी जरिया बन सकती है
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