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  • 1 week ago
42 साल के लीलाराम साहू की कहानी उन शिक्षकों के लिए प्रेरणा है, जो टीचिंग को सिर्फ एक पेशा मानते हैं. अभिषेक मिश्रा की रिपोर्ट.

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00:00तारों की छाओं में, चंदा की गाओं में, हम सेर कमे जाएंगे, राकेट से उढ़ जाएंगे।
00:23ये लीला राम साहु हैं, सास्किये प्राथ्मिक साला धौरा माठा के प्रधान पाठक हैं, उत्कृष सिक्षनकार के लिए अब इन्हें
00:33राजिपाल पुरसकार दिया जा रहा है।
00:35स्टूडेंट्स स्कूल की पढ़ाई से खुस हैं, तो अभी भावक भी मानते हैं कि रिजल्ट बहतर हुआ है, और गाओं
00:41का नाम भी रौसन हुआ है।
01:06लेकिन जब रिजल्ट बहतर सामने आते हैं, तो हमला गवरों महसुच होते हैं, और कोई एक साधारन नहीं बात नहीं
01:15है, कि एक इसकूल से साल में दो लईका, तीन लईका के नवदा एक लब्य में चायन होते हैं, वो
01:23हम सब के लिए खुसी के बात है।
01:31लिला राम साहु खेल-खेल में बच्चों को सिख्चा देते हैं, टीलम के जरिये पढ़ाते हैं।
01:44खास बात ये भी है कि लिला राम साहु बच्चों को विहवारिक सिख्चा भी दे रहे हैं।
01:59लिला राम साहु को सम्मान मिलने पर स्टाफ ने भी खुसी जताई है।
02:17लिला राम साहु की कहानी इस बात की मिसाल है कि सरकारी स्कूल की तस्वीर बदलने के लिए केवल बड़े
02:23संसादनों की नहीं,
02:25बलकि एक समर्पित सिख्चक की सोच, मेहनत, नवचार और समाज को साथ लेकर चलने की इच्छा सक्ती की जरूरत होती
02:32है।
02:32सिख्च के छेत्र में बेहतर कारे करने के लिए राज्येपाल के हाथों पुरुषकार दिया जाएगा,
02:38जिसके लिए धमतरी के लेला राम साहु का चैन हुआ है,
02:41जो धौरा भाटा के प्रात्मिक साला में पदस्त हैं।
02:45They have better work for the children and the children who have better work for them.
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