00:01नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का आभिनन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिता के प्रधान संपादर,
00:09वित्या वाचस्पती गुलाव कुठारी जी का परिवार में प्रकाशित आले, जिसका शीर्षक है सम्मेदना हीन पीरी, भा
00:28संस्कार जीवन व्याधार का महत्व बोण पहलु है, व्यवहारी जीवन का आधार है और व्यक्ती की पहचान भी है, यही
00:36व्यक्ती के भावी कर्मों के आधार भी होते हैं, इसलिए हमारे दर्शन ने सुसंस्क्रित बनने पर इतना महत्व दिया है,
00:44Here she has been given a new and new and new and new and new and new and new and
01:03new and new.
01:14In our country, the society has changed the way.
01:17If you don't think about it, you don't have to worry about it.
01:22You don't have to leave your house.
01:23It's a problem here that children will be able to leave their children.
01:31They will leave their children to leave their children to leave their children.
01:38They are
01:38यह विश्वास नहीं होगाता कि यह बुजूर्ग उनके बच्चों को नए परिवेश के अनुरूप डाल सकेंगे।
01:45विडम बना यह है कि इन नए माबाप का सोच भी विदेशी परिवेश का है।
01:50इनके पास न तो बच्चों के लिए समय होता है न यह समझ होती है कि बच्चों को क्या सिखाना
01:56आवश्यक है।
01:57साथ ही उनको यह भी नहीं आता कि सिखाने का सही तरीका क्या है।
02:02बच्चे और माबाप की दूरी लंबी ही नहीं होती, उनमें परसपर चर्चा भी नहीं होती।
02:08दूसरा पक्षबी देख लें, छोटे बच्चे को माबाप सिखा नहीं पा रहे हैं।
02:13यदि मा भी नौक्री करती है, तो विचार आता है, आखिर बच्चा किसके सहारे बड़ा होता है, कितना स्नेह पाता
02:20है, किस वातावरण में उसकी सम्मेदन शीरता और मानविय गुणों का पोशन होता है, मा घर पर रहती है, तो
02:28उसका सारा ज्यान बच्चे के होमवर्ग पर �
02:32रहता है, वह उसको बुद्धी जी भी बनाना चाहती है, सहिश्णुता, समेदना, सेह ममता, आदी भावों को तो लगता है,
02:41साथ रहने से अपने आप आजाते होई, होमवर्ग में मा की ममता का जो नजारा बच्चे को देखने को मिलता
02:49है, वह तो बच्चा शायद ही भूल
02:51पाता है, उसके शारिरिक और बॉतिक विकास का धरातल बढ़ता है, तो दूसरी और वह, वही मानसित्ता विकास में बड़ा
03:01अवरोध भन जाता है, संतुलन बिगड़ जाता है, क्योंकि आगे का जीवन तो मुख्य रूप से मानसिक धरातल पर ही
03:08जीना होता है, पश्चिम
03:20कुछ बड़ा होते ही, बाहर पढ़ाई पर भेजने की योजना बनने लगती है, बच्चा तो प्रसंद होगा ली, माबाब को
03:27स्वतंत्रता का आभास भी कउच्चाहित करता है, तो उच्च शिक्षा अच्छे संस्थान में दिलाने का एहम भी होता है, अधित्तर
03:36नव धना
03:50कुछ लगाना ही छोड़ दिया है, अपनी स्वतंत्रता को बनाय रखने के लिए भी कुछ धिलाई होने लगी है, बच्चों
03:58की परवरिष, नौकर, टीवी, अत्वां बाल घरों के भरोसे होने लगी है, इन सब का बाल मन पर प्रभाव अलग
04:04तरह से बढ़ता है, यूट को
04:19दस बीस सालों में जो नव धनाट्य फिक्सित होए, उनके बालकों की तस्वीरों में बिल्कुल फर्ख है, जिस प्रकार के
04:26साधन सुविधाय, चॉकलेट, खिलोने, आदिवे उपलब्ध कराते हैं, जिस प्रकार के कपड़े उपलब्ध कराते हैं, उससे तो वे अपने ध
04:48उपा जाता, इसकी गिंती गणना संभव नहीं है, इस परिवेश में पलने वाली नई पीधी में संबेदना ही नहीं, क्योंकि
04:57उसके पास वो मन नहीं है, जिसका निर्माण माके अन्न से हो रहा है, नई पीधी की माता आजना तो
05:04बोजन बनाने को तयार है, और ना ही बालक
05:07को संसकार देने को, ऐसे में बालक एक तरस से भावनाहीन अन्न का ग्रहन करना है, जो यातों से बाजार
05:15से मिलता है, या घर में ही रसोईये बनाते हैं, इस अन्न में भावों का अभाव रहता है, या अनेक
05:21बार कलोशित मन से इस गुजन को बनाया जाता है, वही अन्न जब
05:26पालग रहन करता है तो उसके मन में दया, करुणा, स्नेध, माधुर्जे के स्थान पर द्वेश्व कटुता का भाव ही
05:33बनता है वही उसके व्यवाद में परिलक्षित होता है आवश्यक्ता है समय रहते नई पीडिर को बुणा उसी संस्कारों की
05:42और उन्मुक करना जिन्हें
05:44हमारे भारतिय संस्कृती के मूल्य माना चाता है नमस्कार
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