00:00मैं खुद मंदिर का पुजारी हूँ और मैंने मूर्ति स्थापना की है
00:03अचार जी क्या प्रतिकों की ऐसी सेवा करना सायक हो सकती है
00:08तुम्हारी नियत क्या है? सब तुम्हारे उपर है
00:13अब अलग बात यह है कि जादातर हम लोग क्या होते हैं? बदनियत
00:16तो इसलिए मूर्ति का भी हम दुरुपयोग ही करते हैं जादातर लोग
00:21लेकिन इसमें दोश मूर्ति का नहीं है
00:23अगर मूर्ति का दोश है तो फिर तो गुरु का भी दोश है फिर ग्रंत का भी दोश है फिर
00:27दुनिया के हर विशय का और हर विधी का दोश है
00:30मूर्ति इसलिए है कि तुम जिनके सामने गए हो उनको देख करके तुम्हें अपना छुटपन याद आ जाए
00:37मूर्ति इसलिए है कि उनके माध्यम से तुम स्वयम को देख पाओ और कहो कि कहां वो और कहां मैं
00:42और क्यों नहीं वैसा मैं भी हूँ
00:45खड़ा हूँ मैं कृष्ण की मूर्ती के आगे खड़ा हूँ मैं बुद्ध की मूर्ती के आगे
00:49और मैं पूछ रहा हूँ स्वयम से
00:51मैं ऐसा हूँ जो किसी और के सिखाने पर भी सीख नहीं पा रहा हूँ
00:55हम दोनों में इतना अंतर क्यों है
00:57हम दोनों में इतना अंतर क्यों है यह है मूर्ति का सदुपयोग और यह सदुपयोग क्रिष्ण नहीं कर रहा है
01:03यह सदुपयोग आपको करना है इस मामले में मूर्ति बिल्कुल बेवस है मूर्ति क्या करेगी बेचारी मूर्ति क्या कर सकती
01:11है मूर्ति वहां खड़ी हुई है
01:15झाल झाल
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