00:00Satsang with Moojima
00:30At night it was 12 hours, two friends were standing at the bus stand on the bus stand.
00:37The bus stand on the light was one mouthful,
00:40which was once again fought in the dark.
00:45It was four more people.
00:47There was no sound of the bus stand on the bus,
00:49nor the people of the bus stand on the bus.
00:54The bus stand on the bus stand on the bus,
00:57like one took on the bus,
01:01two friends were left on the bus,
01:05but the bus was different.
01:08One was running by the bus,
01:11and the other was running by the bus,
01:14and the bus was running all the space.
01:17But the bus stood on the bus even.
01:21But no one walked in the bus,
01:23the bus was not going on the bus.
01:25His voice was much higher than he was.
01:29His voice was more than he was.
01:32His headlights were on the floor.
01:38He was on the floor, but the door opened up some more than he was.
01:42Conductor's face was not visible.
01:47His body was on the floor, but his eyes were on the floor, which was like a place where he
01:52was.
01:55Just like they were in this place.
01:58Two friends were in the bus.
02:05Bus was very empty.
02:07There were some old seats in the back.
02:10The cover was still in the back.
02:12The bus was in the back of the bus.
02:14It was just like the bus was running some days.
02:17But the bus was still in the back of the bus.
02:21Conductor got a ticket.
02:23Two tickets.
02:26but the ticket was removed from the time
02:27but the passenger's hands got one step
02:31the ticket was made on the machine
02:34one taken the ticket
02:35So when the bus was just two people
02:38the conductor left the ticket
02:42with the eyes thieres thieres bus
02:49khali seat, khali galyaara, pichay ka undheera
02:53फिर उसने तीसरा टिकट अपनी जेब में राख लिया
03:03बस चल पड़ी
03:05पहाडों के सडकें रात में और भी संकरी हो जाती है
03:10मोड इतने तेज कि खिडकी से बाहर देखने पर लगता जैसे बस सीधे खाई में गिर जाएगी
03:19धुन्द अब और घनी हो चुकी थी, बाहर कुछ नहीं दिख रहा था, सिवाए कभी-कभी उभरते किसी पेड़ के
03:29बस के भीतर अजीब सी ठंड थी, हीटर चालू था, फिर भी ठंड थी, ऐसी ठंड जैसे बस किसी गहरे
03:37तालाब में चल रही हो
03:41कुछ दूर जाने के बाद, कंड़क्टर फिर गिंती करने लगा, एक, दो, तीन
03:51उसकी गिंती में कोई जिचक नहीं थी, जैसे वो साफ-साफ तीन लोगों को देख रहा हो
04:01बस की सीटे चर्मराई, पीछे की सीटों से हलकी सी आवाज आई, कपड़े के रगड़ने जैसी
04:12दुंदले शीशे में परचाई उपरी, ना पूरी तरह इंसानी, ना पूरी तरह जानवा
04:19बस में बैठे दोनों दोस्तों को ऐसा रहा है, जैसे कोई और भी उनके साथ सांस ले रहा हो
04:29समय का अंताजा होने लगा, घड़ी की सुईयां जैसे थम दे
04:35मुबाइल फोन में नेटवर्क नहीं था, और बैटरी आसामाने रूप से तेजी से गिर रही थी
04:42बस एक ऐसे मोड पर पहुँची, जहां सडक बहुत पुरानी लगने लगी
04:48डामर पर दरारें थी, पेडों की शाखाएं सडक के उपर जुकी हुई थी, मानु रास्ता रोकने की कोशिश कर रही
04:56हूँ
04:58कंड़क्टर ने तीसरी सीट की और देखा, वो सीट खाली थी, लेकिन थोड़ी धसी हुई थी, जैसे कोई अद्रिश वजन
05:06उस पर बैठा हो
05:07हवा में गंध फैलने लगी, गीली मिट्टी और पुराने कपड़ों की
05:15बस की नाइट एक पल के लिए बुझी, जब दोबारा जली, तो खिड़की पर उम्मियों के निशान थी, अंदर की
05:23उसे
05:26रास्ते में एक पुराना बोर्ट दिखाई दिया, बोर्ट पर जगे का नाम मिट चुका था, सिर्फ नीचे लिखा था, यहां
05:33बस नहीं रुकती, लेकिन बस रुकी
05:37दर्वाजा अपने आप खुल गया, बाहर कुछ नहीं था, सिर्फ धुंद और पीडों की काली दिवार
05:45कंड़क्टर ने तीसरे टिकेट की ओड़ देखा, वो टिकेट पर स्याही भैलने लगी, जैसे नाम घुल रहा हो
05:52बस फिर चली, जैसे जैसे बस आगी बढ़ी, हवा भारी होती गई, हर सांस के साथ सीने का बोज बढ़ता
06:01गया
06:03पीछे की सीट से किसी के उठने का एहसास हुआ, कदमों की आवाज नहीं थी, लेकिन गल्यारे में ठंड की
06:10लहर चल रही थी
06:12कंड़क्टर ने फिर गिंती की, एक, दो, तीन, बस के शीशे पर बाहर से किसी ने हथेली रख दी
06:22लेकिन बाहर कोई नहीं था, शीशे पर शब्द भरने लगे, नाम, रोहित, वही नाम जो तीसरे टिकेट पर था, बस
06:36अचानक रुकी
06:39चारों और जंगल था, कोई सड़क नहीं, कोई कस्पा नहीं
06:45कंड़क्टर ने तीसरे टिकेट हवा में छोड़ दिया, वो टिकेट भर्ष पर नहीं गिरा, धीरे धीरे गल्यारे में तैरता रहा
06:52और फिर पीछे की अंधेरी सीट में समा गया
06:56बस के भीतर ठंड खत्म हो गई, हवा हलकी हो गई, अब बस में सिर्फ दो ही सासे थी
07:04कंड़क्टर ने आखरी बार पीछे देखा, अब उसकी आखों में खालीपन नहीं था, सुकून था, बस आके बढ़ी
07:14सुभा जब बस अगले शहर पहुँची, सब कुछ सामान ने था
07:20लोग चड़े, किसी ने कुछ अजीब नहीं देखा
07:25लेकिन टिकट मशीन में उस रात की एंट्री थी, तीन टिकट
07:31जबकि बस में आये थे सिर्फ दो लोग
07:35पीछे की आखरी सीट आज भी थोड़ी धसी हुई रहती है
07:39और हर रात दुन्द में चलने वाली उस बस में
07:44एक टिकट हमेशा कम बढ़ जाता है
08:04इंट्रेस्टिंग और खौफना कहानियों के साथ