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  • 1 week ago
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Animals
Transcript
00:01बरसात का मौसम था
00:03घने जंगल के बीच बनी कच्ची सडक पर एक पुरानी जीब धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी
00:11जीब से उतर कर निखिल अवस्थी ने अपना बैक संभाला और सामने खड़े जंग लगे बोर्ड को पढ़ा
00:18वन चौकी देवकुंड रिजर्व शेत्र
00:22बोर्ड आधा तूटा हुआ था और उस पर जंग लगी हुई थी
00:26निखिल ने गहरी सांस ली
00:28तो यही है मेरी नई पोस्टिंग
00:30वो वन विभाग में नया रिकॉर्ड अधिकारी था
00:33उसका काम जंगल से जुड़े दस्तावेज, शिकायतें और सरकारी रिकॉर्ड संभालना था
00:39जीप वाला जल्दी से सामान नीचे रखकर बोला
00:43साहब मैं चलता हूँ
00:46अरे इतनी जल्दी क्या है चाय तो पीलो
00:49ड्राइवर ने घबरा कर जंगल की तरफ देखा
00:52सूरज ढलने से पहले यहां से मिकल जाना ही अच्छा होता है
00:56इतना कहकर वो बिना पीछे देखे जीप लेकर चला गया
01:01निखिल कुछ पल उसे जाता देखता रहा
01:04अजीब आदमी है
01:06वो अपना सामान उठा कर वन चौकी के अंदर पहुँचा
01:10अंदर एक पुराना लकडी का उफिस था
01:13दीवारों पर धूल भरे नक्षे टंगे थे
01:16एक कोने में लूहे की अलमारी रखी थी
01:19मेज पर रजिस्टरों का धीर लगा था
01:22और सबसे अजीब बात
01:24मेज पर एक पुरानी पीतल की सीटी रखी थी
01:28उसकी नीचे एक मुरा हुआ कागस दबा था
01:32निखिल ने कागस खोला
01:33उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी
01:36रात में अगर सीटी अपने आप बजे तो जवाब मत देना
01:40निखिल हलका मुस्कुराया
01:42लगता है पुराने करमचारियों का मजाख है
01:45तब ही बाहर से किसी ने आवाज दी
01:47साहब
01:50निखिल बाहर निकला
01:52करीब साट साल का एक दुबला पतला आदमी खड़ा था
01:55मैं हरी राम हूँ
01:57यहाँ चौकी की सफाई और राशन पहुँचाता हूँ
02:01अच्छा हुआ आप मिल गए
02:02आज यहीं रुकिये साथ खाना खाएंगे
02:05हरी राम का चेहरा अचानक उतर गया
02:09नहीं साहब
02:10क्यों
02:11मैं अंधेरा होने के बाद इस चौकी में नहीं रुकता
02:14लेकिन क्यों
02:16हरी राम कुछ पढ़ चुप रहा
02:18फिर बोला
02:20जो लोग वजह जानने की कोशिश करते हैं
02:23वो अगली सुभह पहले जैसे नहीं रहते
02:27इतना कहकर उसने राशन रखा
02:28और तेजी से जंगल की पग्डंडी पढ़कर चला गया
02:33निखिल अब सचमुच असहज हो चुका था
02:36शाम धीरे धीरे रात में बदल गई
02:38जंगल पूरी तरह शान्त था
02:42फिर ठीक ग्यारा बच कर 47 मिनट पर
02:46मेज पर रखी वही पीतल की सीटी
02:50अपने आप बजुठी
02:55आवाज इतनी तेज थी कि निखिल के हाथ से टॉर्च गिर गई
02:59उसने कापते हुए सीटी की तरफ देखा
03:02सीटी अपनी जगा पर रखी थी
03:06लेकिन ओफिस के दर्वाजे के नीचे से
03:08किसी ने एक काला लिफाफा अंदर सरका दिया था
03:11पूरा कमरा अचानक बर्फ जैसा ठंडा हो गया
03:15निखिल धीरे धीरे आगे बढ़ा
03:18उसने लिफाफा उठाया
03:21उस पर लिखा था
03:23शाम होने के बाद
03:24लोग यहां क्यों नहीं रुकते हैं
03:26और क्या है सिटी का रहस्य
03:28अगर सच जानना चाते हो
03:30तो आज आधी रात सूखे कोहे के पास
03:33अकेले आना
03:34और तभी
03:36आफिस के बाहर
03:38सूखे पत्तों पर किसी के भारी कदमों की आवाज आने लगी
03:46लेकिन खिरकी से बाहर देखने पर
03:48वहां कोई भी नहीं था
03:51निखिल के हाथ ठंडे पड़ चुके थे
03:54बाहर कदमों की आवाज अब बंध हो चुकी थी
03:57उसने खिरकी से दोबारा जाका
04:00चारो तरफ घना अंधेरा
04:02हवा तक नहीं चल रही थी
04:05लेकिन उसके दिल की धरकने साफ सुनाई दे रही थी
04:09निखिल ने जाने का फैसला किया
04:11उसने घड़ी देखी
04:13ग्यारा बचकर पचपन मिनट
04:15वो कुछ देर सोचता रहा
04:18अगर ये किसी की शरारत है
04:20तो अब मैं इसका पता लगा कर ही रहूँगा
04:23उसने टौर्च उठाई
04:24और चौकी से बाहर निकल पड़ा
04:28जंगल की पकडंडी रात में
04:30बिलकुल अलग दिखाई दे रही थी
04:32पेडों की टेडी मेडी शाखाए
04:34ऐसे लग रही थी
04:35जैसे किसी के लंबे हाथ हो
04:37दूर कहीं उल्लू की आवाज गोंजी
04:40फिर अचानक
04:43जाडियों में किसी के भागने की आवाज आई
04:46निखिल टौर्च घुमा कर देखने लगा
04:49लेकिन वहाँ कुछ नहीं था
04:51करीब दस मिनट चलने के बाद
04:53उसे सामने एक पुराना कुआ दिखाई दिया
04:57कुएं के पास पहुचते ही
04:59उसकी टौर्च एक बल के लिए जपकी
05:01फिर बुच गई
05:03ये क्या अभी तो बैटरी पूरी थी
05:06उसी समय
05:08पीछे से किसी के बहुत धीमे कदमों की आवाज आई
05:16निखिल ने जटके से पीछे देखा
05:19कोई नहीं
05:21लेकिन जमीन पर किसी के पैरों के निशान बने हुए थे
05:25अजीब बात ये थी
05:26वे निशान कुएं की तरफ आ रहे थे
05:30लेकिन वापस जाने के नहीं थे
05:33निखिल का गला सूख गया
05:35तभी
05:36कुएं के अंदर से बहुत धीमी आवाज आई
05:40रिकार्ड वापस कर दो
05:42निखिल के रॉंग्टे खड़े हो गए
05:45कौन है
05:46कोई जवाब नहीं
05:49फिर वही आवाज
05:50इस बार और साफ
05:54रिकार्ड वापस कर दो
05:57इतने में कुएं के अंदर से एक पुरानी भीगी हुई
06:00फाइल उपर उचल कर बाहर गिरी
06:03निखिल डरते डरते उसे उठाया
06:05फाइल पर धूल और कीचर जमी थी
06:08उस पर लिखा था
06:10वर्ष उननीस सौट ठानवे
06:13उसने जैसे ही फाइल खोली
06:15अंदर के सारे कागस बिल्कुल खाली थे
06:18सिर्फ आकरी पन्ने पर एक वाक्य लिखा था
06:22मुझे इंसाफ चाहिए निखिल
06:24मुझे इंसाफ दिलाओ
06:27अचानक
06:28जंगल में एक साथ
06:30दरजनों कववे जोर जोर से
06:32काउं काउं करने लगे
06:33हवा तेज हो गए
06:35पेड जोर से हिलने लगे
06:38और तब ही
06:39निखिल ने महसूस किया
06:42कोई उसके ठीक पीछे खड़ा है
06:45उसकी गर्दन के पीछे
06:46किसी की ठंडी सास टकराई
06:49लेकिन हिम्मत करके
06:50जब वो पल्टा
06:52वहां कोई इंसान नहीं था
06:54सिर्फ एक पुरानी वन रक्षक की
06:56टोपी जमीन पर पड़ी थी
06:58टोपी पर एक नाम लिखा था
07:01अर्जुन
07:02और उसी क्षण
07:04जंगल के बिलकुल अंदर से
07:06किसी ने बहुत जोर से सीटी बजाई
07:11इतनी तेज की पूरा जंगल गूंज उठा
07:15निखिल ने घबरा कर सिर उठाया
07:17और दूर अंधेरे में
07:20दो चमकती हुई आँखें
07:21उसे लगातार देख रही थी
07:24निखिल ने जैसे ही
07:25उन चमकती आँखों की और तर्श गुमाई
07:28वहाँ कुछ भी नहीं था
07:30सिर्फ हिलती हुई जाडिया
07:32और दूर जाती हुई
07:34किसी के तेज कदमों की आवाज
07:37उसने जमीन पर पड़ी
07:38अर्जुन नाम वाली टोपी उठाई
07:40और बिना देर की ये वन चौकी की ओर लोट पड़ा
07:44सुबह
07:45हलकी हलकी बारिश पड़ रही थी
07:48निखिल सीधे गाउं पहुचा
07:49चाय की दुकान पर बैठे लोग
07:51उसे देखते ही चुप हो गए
07:53उसने दुकानदार से पूचा
07:55भाया अर्जुन नाम कोई आदमी था क्या पहले यहाँ पर
07:59दुकानदार के हाथ से कुल्णर छूड़ते छूड़ते बचा
08:03साहाब ये नाम यहां मतलो
08:06क्यों?
08:08एक बूरह आदमी धीरे धीरे आगे आया
08:11अर्जुन इस जंगल का सबसे इमानदार वनरक्षक था
08:15एक रात वो खायब हो गया
08:18अगले दिन उसकी वर्दी मिली
08:20लेकिन उसका शरीर कभी नहीं मिला
08:24इतना कहकर बूरह आदमी वहां से चला गया
08:27बाकी लोग भी बिना कुछ बोले अपनी अपनी राह निकल गए
08:30उसी समय गाउं के दूसरे छोर पर एक बड़ा पक्का मकान
08:36उसके अंदर सरपंच रगवीर सिंग बेचैनी से टहल रहा था
08:41तभी उसका नौकर दौरता हुआ आया
08:43मालिक नया आफसर अर्जुन के बारे में पूछताच कर रहा है
08:47रगवीर का चहरा सक्त हो गया
08:50उसे जितना चल्दी हो सके इस काउं से जाना होगा
08:56इधर निखिल वन्चौकी पहुचा
08:58उसने अलमारी में रखे पुराने रजिस्टर निकालने शुरू किये
09:02धूल से भरी दरजनों फाइले थी
09:07अचानक एक रजिस्टर के बीच वही निशान बना मिला
09:10जो रात वाले काले लिफाफे पर बना था
09:14उसने रजिस्टर खोला
09:15अंदर कई पन्ने फारे जा चुके थे
09:18सिर्फ एक पन्ने पर लिखा था
09:21सच्चाई पत्थर की खान में छिपी है
09:24उसी समय चौकी के बाहर
09:26मोटर साइकल रुखने की आवाज आई
09:28निखिल बाहर निकला
09:30एक वन कर्मचारी खड़ा था
09:33सहब उपर से आदेश आया है
09:35क्या?
09:37आज से जंगल के उत्तर वाले हिस्से में जाना मना है
09:40लेकिन क्यों?
09:43हमें कारण नहीं बताया गया
09:46वो कागस देकर तुरंच चला गया
09:48निखिल ने आदेश पढ़ा
09:50उसी जगह का नाम लिखा था
09:52पत्थर की पुरानी खान
09:55वही नाम
09:56जो रेजिस्टर में भी लिखा था
10:00शाम धलने लगी
10:02निखिल ने किसी को बिना बताय
10:04अपनी बाइक निकाली
10:06कुछ देर बाद वो जंगल के
10:08उत्तर वाले हिस्से में पहुँच गया
10:10वहां वर्षों से बन पड़ी
10:12पत्थर की खान थी
10:13चारो तरफ टूटी मशीने
10:15जंग लगे लोहे
10:17और गहरा सन नाटा
10:20तभी
10:21खान के अंदर से किसी के बात करने की आवाज आई
10:24निखिल तुरंत एक बड़े पत्थर के पीछे छिप गया
10:27दो आदमी टॉर्च लेकर अंदर खड़े थे
10:30पहला बोला
10:31अगर नए अफसर को सब पता चल गया
10:34तो हम सब फस जाएंगे
10:36दूसरा बोला
10:37चिंता मत करो
10:38आज राद तक उसका भी इंतजाम हो जाएगा
10:42निखिल ने मोबाइल निकाल कर उनकी बाते रिकॉर्ड करनी चाही
10:45लेकिन तभी
10:47उसके पैर के नीचे सूखी टहनी तूट गई
10:51दोनों आदमी एक साथ उसकी तरफ मुड़े
10:54कौन है वहाँ
10:55निखिल भागने लगा
10:57दोनों उसके पीछे दौड पड़े
10:59घने जंगल में जान बचाने की दौड शुरू हो गई
11:03भागते भागते निखिल अचाना के पुराने मंदिर के खंडर तक महुच गया
11:08वो अंदर घुसकर एक तूटी दीवार के पीछे छिप गया
11:12पीछा करने वाले कुछ देर खोचते रहे
11:14फिर वापस लोट गय
11:17निखिल ने राहत की सास ली
11:19निखिल ने सोचा कि अब तो सच का पता लगा नहीं होगा
11:23तभी मंदिर के बाहर से किसी के चलने की आवाज आई
11:26निखिल ने टॉर्च बाहर घुमाई
11:28और इस बार
11:30उसे पहली बार साफ दिखाई दिया
11:32कोई अंधिरे में खड़ा उसे देख रहा था
11:36उसके हाथ में एक पुरानी लाल्टेन थी
11:38लेकिन उसका चहरा
11:41पूरी तरह धुएं जैसी काली परचाई में छिपा हुआ था
11:45मंदिर के बाहर खड़ी वो काली परचाई धीरे धीरे पीछे हटने लगी
11:50निखिल ने हिम्मद जुटाई और उसके पीछे चल पड़ा
11:55वो परचाई जंगल की संक्री पकदंडी से होती हुई
11:58एक पुराने बरगत तक पहुँची
12:00और अचानक गायब हो गई
12:03उसी समय बरगत की जड़ों के पास पड़ी मिट्टी अपने आप धसने लगी
12:09निखिल ने टॉर्च की रोशने डाली
12:12नीचे लकडी का एक पुराना संदूग दबा हुआ था
12:15उसने किसी तरह उसे बाहर निकाला
12:18संदूग के अंदर कई सरकारी फाइलें, नक्षे, एक डायरी और एक छोटा कैमरा था
12:25डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था
12:27मैं अरजुन हूँ
12:28अगर ये डायरी किसी इमानदार इंसान तक पहुचे
12:32तो समझना में अपना वादा निभा सका
12:35निखिल जल्दी से वन्चौकी पहुचा और पूरी डायरी पढ़ने लगा
12:40डायरी में लिखा था कि कई साल पहले जंगल में दुरलब चंदन के पेड़
12:44और कीमती जड़ी बूटियों की चोरी होती थी
12:47इस पूरे गिरोहों का सरगना सरपंच रगुवीर सिंग था
12:52कुछ ब्रष्ट कर्मचारी भी उसके साथ मिले हुए थे
12:55अरजुन ने सबूत इकठा कर लिये थे
12:58लेकिन सच सामने आने से पहले ही उसे पकड़ लिया गया
13:02उसकी हत्या कर दी गई
13:04और सारे रिकॉर्ड जंगल में अलग-अलग जगा छिपा दिये गए
13:08ताकि कोई भी पूरा सच कभी न जान सके
13:12डाइरी की आखरी लाइन थी
13:13जो भी ये पढ़ रहा है सबूत पुलिस तर पहुँचा देना
13:18बस यही मेरी आखरी इच्छा है
13:22उधर रगुवीर को खबर मिल चुकी थी
13:25वो अपने तीन आदमियों के साथ
13:27वन चौकी की तरफ निकल पड़ा
13:29आज रात सब खत्म कर दो
13:32उसी समय निखिल ने पुलिक को फोन किया
13:36और सब कुछ बताया
13:37पुलिस टीम तुरंट चल पड़ी
13:40रात के लगभग बारा बजे
13:42रगुवीर और उसके आदमी
13:43वन चौकी पहुँच कै
13:45उन्होंने चारो तरफ से चौकी को घेर लिया
13:48रगुवीर चिल लाया
13:50निखिल फाइले हमें दे दो
13:52वरना जिन्दा नहीं बचोगी
13:55निखिल बाहर आया
13:56उसके हाथ में वही डायरी थी
14:00आज सच छिपेगा नहीं
14:01रगुवीर ने अपने आदमी को इशारा किया
14:04वे निखिल की ओर बढ़ने लगे
14:07तब ही
14:07एक सीटी की आवाज गूँचने लगी
14:13ऐसा लग रहा था
14:14जैसे जंगल के हर कोने से सीटी बज रही हो
14:18अचानक तेज हवा चली
14:20वन चौकी के सामने रखी
14:21पुरानी लाल्टेन अपने आप जल उठी
14:24रगुवीर के आदमी घबरा गय
14:26तब ही अंधेरे से
14:27वही लाल्टेन लिये काली पर छाई बाहर आई
14:30लेकिन उसने किसी पर हमला नहीं किया
14:34बस धीरे धीरे
14:35अपना हाथ जंगल की तरफ उठा दिया
14:37उसी क्षण
14:39चारो और छिपे पुलिस कर्मियों ने टॉर्चें जला दी
14:42कोई भागेगा नहीं
14:45रगुवीर और उसके साथ ही
14:46चारो तरफ से गिर चुके थे
14:48घबराहट में वे भागने लगे
14:51लेकिन जल्दबाजी में
14:52रगुवीर एक पुराने
14:53ढके हुए गड़े में गिर पड़ा
14:56उसे गंभीर चोट लगी
14:58बाकी तीनों को पुलिस ने पकड़ लिया
15:02सुबह
15:02पूरा गाउं वन चौकी के सामने एक अठा था
15:06बरामत फाइले
15:07कैमरे की रिकॉर्डिंग
15:09और डाइरी के आधार पर वर्षों पुराना
15:11अपराध जागर हो गया
15:13जंगल में होने वाली अवैध तसकरी
15:15का पूरा नेटवर्क सामने आ गया
15:18अरजुन का नाम सम्मान
15:19के साथ फिर से दर्च किया गया
15:21वन विभाग ने उसी चौकी के बाहर
15:23उसकी मूर्ती बनवा दी
15:25कुछ दिनों बाद
15:26निखिल अपनी मेज पर बैठा
15:28नए रिकॉर्ड लिख रहा था
15:30अब जंगल पहले जैसा डरावना नहीं लगता था
15:34लेकिन एक बात
15:35आज भी नहीं बदली थी
15:36हर पूर्णिमा की रात
15:38दूर जंगल से एक हलकी सीटी सुनाई देती थी
15:42निखिल मुस्कुरा देता
15:44उसे अब डर नहीं लगता था
15:46उसे लगता था
15:48जंगल का वो अंदेखा रखवाला
15:50अब भी अपनी ड्यूटी निभा रहा है
15:53ताकि इस जंगल में फिर कभी
15:55किसी निर्दोश के साथ अन्याई न हो
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