महाराज परीक्षित का महाश्राप स्वीकार करने के बाद, वे गंगा के पवित्र तट पर मृत्यु की प्रतीक्षा में लीन हो जाते हैं। इस गहन क्षण में, अनेक महान ऋषि-मुनि उनकी ओर आकर्षित होते हैं। तभी, परम ज्ञानी शुकदेव गोस्वामी का प्राकट्य होता है, जो राजा परीक्षित के मोक्ष के अंतिम प्रश्न का उत्तर देने वाले हैं। इस एपिसोड में देखें कैसे भागवत पुराण की दिव्य कथा का सूत्रपात होता है, जो कलयुग में ज्ञान और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेगी! #BhagavataPurana #ShukadevaGoswami #ParikshitMoksha #GangaTatt #HinduMythology #SpiritualJourney #KathaAarambh #Devotion #VedicWisdom #Puranas #SpiritualEnlightenment #KingParikshit #SrimadBhagavatam #DivineKnowledge
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00:00महाराज परीच्षित अपने कर्मों और श्रिंगी रिशी के श्राप की अनिवार्यता को स्विकार कर अपने राजसी वैभव से विमुख हो
00:08एक गेहन आंतरिक सत्य की खोज में निकल पड़े, जैसे कोई अकेला मलाह तूफानी समुद्र में अपनी अंतिम यात्रा पर
00:16निकल
00:27हो जाएं. अपने राजसी वस्त्रों और अलंकर्णों को त्याग कर उन्होंने स्वयं को एक साधारन तपस्वी के रूप में प्रस्तुत
00:36किया, जैसे कोई महासागर अपनी असीनता को छोड़ कर एक शांत सरोवर में समा जाएं. हर कदम पर उनके हृदय
00:45में संसार की क्षन
00:47भंगुर्ता का बोध गहरा होता गया, जैसे शरद रितु में पत्तियां अपने व्रिक्षों से विदा लेती हैं. पवित्र गंगा के
00:56तटकी ओर उनका मौन प्रस्थान किसी अंतर्यात्रा का सूत्रपात था, जहां हर पच्चाप से वैराग्य की ध्वनी प्रतिध्वनित
01:04होती थी. जैसे ही उनके नेट्रों ने पतित पावनी गंगा के विशाल स्वरूप को देखा, उनके हृदय में एक अप्रतिम
01:12शान्ती का संचार हुआ, मानो स्वयं परमेश्वर ने उन्हें आलिंगन किया हो. गंगा का प्रत्येक प्रवाह, उनके कानों में मृत्यु
01:22के भ
01:33जहां कोई भी सांसारिक कोलाहल उनकी एकागरता को भंग न कर सके, मानो कोई रिशी अपनी गुफा में प्रवेश कर
01:42रहा हो. उस पवित्र आसन पर बैठ कर, उन्होंने अपने मन और इंद्रियों को पूर्ण रूप से नियंत्रित किया, जैसे
01:50कोई कुशल सार्थी अपने
01:52चंचल घोडों को वश में करता है. उन्होंने अपनी अंतिम साथ रातों और दिनों का प्रतेक्षन परमात्मा की आराधना में
02:01लगाने का द्रिड संकल्प लिया, जैसे कोई योध्धा अपनी अंतिम युध्ध की तयारी करता है. अन्नजल का त्याग कर, उन्होंने
02:11देह क
02:11प्रती आसकती को भी छोड़ दिया, जैसे कोई सर्प अपनी पुरानी केंचुली त्याग देता है. उनका समस्त ध्यान असीम और
02:21अनंत परमात्मा के चर्णों में समर्पित हो गया, जैसे कोई ननहा बालक अपनी मा की गोद में निश्चिंत सो जाता
02:28है.
02:30मृत्यू का भय उनके चित्त से पूर्णत विलीन हो गया था, केवल परमानंद और भगवत प्राप्ती की तीवर लालसा शेश
02:37थी, जैसे अंधकार के बाद सूर्य का उदे होता है.
02:42यह अलोकिक घटना सुनकर, अनेक महान रिशिमुनी और देवगण उस पवित्र गंगा तट पर पधारने लगे, जैसे पुष्प पर भवरे
02:51एकत्रत होते हैं.
02:54अत्री, वसिष्ट, चवन, नारद, व्यास जैसे तेजस्वी महर्शियों का आगमन हुआ, जिनके दिव्य तेज से संपूर्ण वातावर्ण आलो के थोक
03:03उठा.
03:05परीक्षित ने अत्यंत विनमरता पूर्वक उन सभी पूजय रिशियों का सत्कार किया, जैसे एक छोटा बालक अपने गुरुजनों का सम्मान
03:13करता है.
03:15उन महान आत्माओं के समक्ष, परीक्षित ने अपने हृदय की परम जिग्यासा व्यक्त की थे प्रभु मृत्यू के क्षण में
03:23मनुष्य को क्या करना चाहिए?
03:25उनके प्रश्ण ने उस दिव्य सभा में एक गहरा सन्नाटा बिखेर दिया, जैसे कोई गंभी रहस्य अकस्मात प्रकट हो जाएं.
03:34सभी रिशी एक उप्युक्त उत्तरदाता की प्रतीक्षा में थे, जिनकी वाणी में न केवल ज्यान बलकी दिव्य अनुभव का सार
03:42हो, जैसे कोई सूखा खेत वर्षा की प्रतीक्षा करता है.
03:48तभी एक अद्रिश उर्जा और दिव्य सुगंध ने उस पवित्र वातावर्ण को भर दिया, जैसे एक सुगंधित पवन दूरस्थ उपवन
03:56से आती है.
03:58तभी उस दिव्य सुगंध के साथ एक अप्रत्याशित शान्त उर्जा का प्रवाह भी हुआ, जिसने सभा में उपस्थित हर आत्मा
04:07को एक अनोखी पवित्रता से भर दिया.
04:10सभी रिशियों की दृष्टिया एक ही दिशा में मुडगई, जैसे खिले हुए कमल सूर्योदय की ओर स्वतह ही उन्मुख हो
04:18जाते हैं.
04:20और फिर उन सब के समक्ष एक युवा, तेजस्वी स्वरूप प्रकट हुआ, जिसकी आखों में अनंत ज्ञान और वैराग्य का
04:28प्रकाश था, मानो स्वयम ब्रहम लोग से कोई पुनीत आत्मा उतर आई हो.
04:33नारद, व्यास और अन्य सभी महान रिशियों ने आदरपूर्वक शीश नवाया, क्योंकि उन्होंने पहचान लिया कि यह अध्वितिय तेजस्वी ब्रहम
04:43ज्यानी परम पूझे शुकदेव गोस्वामी थे.
04:46उनकी युवा अवस्था के बावजूद, उनकी आखों में एक अकल्पनिय प्राचीनता और गहन वैराग्य का सागर लहरा रहा था, जैसे
04:55कोई अनंत ब्रहमांड एक छोटे से बिंदु में समाहित हो.
05:00महाराज परीक्षित ने उनकी पवित्र उपस्थिती से सांत्वना पाकर अपने हृदय में एक नई आशा और मुक्ती का मार्ग देखा,
05:09जैसे अंधेरे में भटकते यात्री को अचानक ध्रुवतारा दिख जाए.
05:14शुकदेव गोस्वामी ने अपनी सहज गरिमा से उस पवित्र सभा में अपना स्थान ग्रहन किया, जहां सभी रिशिमुनी पहले से
05:22ही परमार्थ की खोज में लीन थे.
05:25उनकी उपस्थिती मात्र से वातावर्ण में एक गहन शान्ती चा गई, जैसे तूफानी समुद्र उनकी एक जलक से शान्त हो
05:34गया हो और सभी आत्माएं एक आगरता की चरम सीमा पर पहुँच गई.
05:39तब महाराज परिशित ने अपने कश्टों का सार और मुक्ती की प्रबल इच्छा को व्यक्त करते हुए अत्यंत विनमर्ता से
05:47अपनी वानी खोली, जैसे एक प्यासा यात्री जीवंदाईनी जल के लिए पुकारता है.
05:54हे भगवन, मुझ जैसे अग्यानी, मृत्यू के भय से व्याकुल प्रानी के लिए मोक्ष का मार्ग क्या है, जिससे मैं
06:01इस भयावः चक्र से मुक्त हो सकूँ, उन्होंने अपनी समस्थ दीन्ता के साथ निवेदन किया.
06:08मेरे पास केवल साथ दिन्शेश हैं, उन्होंने अपनी आवाज में पीड़ा और द्रड संकल्प दोनों को मिला कर कहा, इस
06:16अल्पकाल में मुझे वह परम ज्यान कैसे प्राप्थ हो, जिससे भय का अंत हो सके.
06:22पूरी सभा की आखें, महाराज परीक्षित के प्रशनों का भार लिये हुए, एक बार फिर परम तेजस्वी शुकदेव गोस्वामी की
06:30ओर मुड़ गई, जैसे प्यासे हिरन जल के स्रोत की ओर देखते हैं.
06:36शुकदेव गोस्वामी के मुखमंडल पर एक अगाद शांती और करुणामय मुस्कान थी, जो दर्शाती थी कि वे न केवल परीक्षित
06:45के प्रशन को समझ रहे थे, बलकि उसकी आत्मा की गहराईयों को भी पहचान रहे थे.
06:51उन्होंने धीरे-धीरे अपनी आखें खोली और उनकी वाणी एक शांत जरने की तरहे पवित्र गंगा के तटपर उपस्थित सभी
07:00रिशियों और महाराज परीक्षित के कानों में अमरित घोलने लगी.
07:05हे राजर्शी परीक्षित, आपका प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो न केवल आपके लिए बलकि समस्थ संसारी जीवों के लिए मोक्ष
07:14का द्वार खोलता है, उन्होंने अपनी दिव्यध्वनी में कहा.
07:19उन्होंने आगे कहा, एक व्यक्ति को अपने जीवन के अंतिन ख्षनों में क्या सुनना चाहिए, क्या जब करना चाहिए, क्या
07:26स्मरण करना चाहिए, यह विचार्णिय प्रश्न वास्तव में हर मनुष्य की जिग्यासा है.
07:33जो व्यक्ति मृत्यों को समीप जानकर स्वयं को संसार के मायावी बंधनों से मुक्त करता है, वही वास्तव में जीवन
07:41के परम सत्य को समझने के लिए तैयार होता है.
07:44शुकदेव ने ज्यानवर्धक शब्दों में कहा. उन्होंने स्पष्ट किया कि इस नश्वर देह के त्याग से पहले मन को संसारिक
07:53इच्छाओं से हटा कर भगवान के चर्णों में अर्पित करना ही मोक्ष का प्रारंभिक और अनिवार्य सोपान है.
08:02मनुष्य को चाहिए कि वह अपने चित्त को निरंतर भगवान के दिव्य गुनों, लीलाओं और स्वरूप में लीन करे क्योंकि
08:09यही भवसागर से पार उतरने का एक मात्र सेतु है. उन्होंने उपदेश दिया.
08:15इस प्रकार गंगा के पावन तट पर महाराज परीक्षित की मोक्ष की जिग्यासाने स्वयन शुकदेव गोस्वामी के मुख से श्रीमत
08:23भागवत पुरान के अमर ज्यान की धारा को प्रवाहित कर दिया.
08:28महाराज परीक्षित उस दिव्य ज्यानधारा में स्वयं को निमगन पाकर अपने आसन्न मृत्यू के भय से मुक्थ होते हुए एक
08:36गहन शांती और परम आनंद की अनुभूती करने लगे
08:41उनके हृदय में अब मृत्यू का भय नहीं, अपितु एक तीवर जिग्यासा प्रजवलित थी की इस क्षण भंगुर जीवन का
08:48परम उद्देश क्या है और कैसे इसे भगवान के चर्णों में समर्पित किया जाए
08:54उन्होंने विनमर्ता पूर्वक स्वयंको समस्त रिशियों की सभा के समक्ष प्रस्तुत किया, जिनकी दिव्य उपस्थिती गंगा के पावन तट को
09:02और भी अधिक पवित्र कर रही थी
09:06महाराज ने अपने हाथ जोड कर अपनी द्रिश्टी जुकाए हुए उन तपस्वी महात्माओं को प्रणाम किया जिनकी आभासे संपून वातावर्ण
09:15जगमगा रहा था
09:17उनकी वानी में कृतग्यता का स्वर्था, जैसे वे इस दैविय सभा के समक्ष अपनी नेती को एक महान अफसर के
09:25रूप में स्विकार कर रहे हुँ
09:26हे पूजवर रिशिवर, उनकी आवाज गंदा की शांत लहरों पर गूझ उठी, आपका यह दर्शन मेरे लिए साक्षात इश्वर के
09:36दर्शन के समान है
09:39उन्होंने अपने शाप को एक अद्वितिय वर्दान के रूप में देखा, जिसने उन्हें क्षनभंगुर सांसारिक मोहमाया से विरक्थ होकर भगवान
09:48की शरण में आने का स्वर्णिम अफसर प्रदान किया
09:52यह शाप नहीं, उन्होंने द्रेड़ता से कहा, यह तो प्रभु की ही क्रिपा है, जिसने मुझे भवसागर से पार उतरने
09:59का मार्ग दिखा दिया
10:01उनकी वानी में कोई भय नहीं, कोई पश्चाताप नहीं, अपितु केवल एक गेहन आध्यात्मिक भूख और सत्य की खोज की
10:10उतकट अभिलाशा थी
10:12हे ब्रहम विट्ताओ, उन्होंने पुन संबोधित किया, आप साक्षात त्रिकालदर्शी हैं, क्रिपा कर मुझे इस संकटपूर्ण स्थिती से उबारने का
10:22मार्ग सुझाए
10:24उनकी अलपायों में मृत्यू निकट थी, और वे जानना चाहते थे कि ऐसे समय में मनुष्य का परम कर्तव्य क्या
10:31है, जो उसे संसार के चक्र से मुक्ती दिलाए
10:35मेरा समय अत्यंत अलप है, उन्होंने पीडा और विनमर्ता के साथ कहा, यह जीवन क्षन भंगुर है और मेरी मृत्यू
10:43द्वार पर खड़ी है
10:46उन्होंने अपनी शंका व्यक्त करते हुए रिशियों से पूछा की एक ऐसे व्यक्ती को क्या करना चाहिए जिसकी मृत्यू साथ
10:54दिनों के भीतर निश्चित हो
10:56उस मनुष्य को क्या सुनना चाहिए, क्या जपना चाहिए, क्या स्मरन करना चाहिए और किसका आश्रय लेना चाहिए उन्होंने अपनी
11:04जिग्यासा प्रकट की
11:07समस्त रिशियों की मुख मंडलों पर एक गंभीर चिन्तन की चाया मंडरा गई, क्योंकि यह प्रश्न केवल परीच्षित का नहीं,
11:15अपितु हर नश्वर प्राणी का था
11:18उनकी निगाहे अब गुरुवर शुकदेव गोस्वामी पर टिक गई, मानों वे जानते हों कि इस गूर प्रश्न का उत्तर उन्हीं
11:25के पास है
11:27शुकदेव गोस्वामी ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से समस्त रिशियों की आंतरिक अवस्था को भाप लिया और अपनी मौन स्विकृती से उन्हें
11:36आश्वस्थ किया
11:38उनकी मौन स्विकृती एक सहस्त्र सूर्य के प्रकाश के समान थी, जिसने सभी उपस्थित जनों के हृदय से अज्ञान का
11:46अंधकार मिटा दिया
11:48ठीक उसी क्षन जैसे किसी अद्रिश्य दैविय शक्ती ने उन्हें प्रेरित किया हो, शुपदेव गोस्वामी ने अपनी अलौकिक वानी में
11:56बोलना आरंभ किया
11:59यह वहक्षन था जब श्रीमत भागवत पुराण का अमरग्यान गंगा के पावन तट पर परीक्षित की मोक्ष की पुकार के
12:06उत्तर में ब्रहमांड में गुंजने के लिए तैयार था
12:10गंगा के पावन तट पर एकत्रित समस्त रिशिगन महाराज परीक्षित के मोक्ष की तीवर इच्छा और उनके केवल साथ दिनों
12:18के शेश जीवन को लेकर अत्यंत चिंतित होकर विचार विमर्ष करने लगे
12:24देवर्षी नारद ने अपनी स्वर्णिम वीना को थामे हुए अत्यंत गंभीर मुद्रा में उपस्थित महर्षियों की ओर देखा और इस
12:32विशम परिस्थिती में सर्वोत्तम आध्यात्मिक मार्ग खोजने का संकेत दिया
12:38महर्षी व्यासदेव ने अपनी ध्यानमगन आखों को खोल कर सभा को संबोधित करते हुए कहा कि साधारन तपस्या और यग्यों
12:47का मार्ग इस अल्प समय में परम सिध्धी प्राप्त करने के लिए परियाप्त नहीं है
12:53सभा में बैठे कुछ अन्य ज्यानियों ने अश्टांध योग और कठिन शारिरिक तब की चर्चा की परंतु सभी ने माना
13:00की साथ दिनों के भीतर मन को पूरी तरह वश में करना अत्यंत दुशकर है
13:06तब ज्यान के सागर कहे जाने वाले वशिष्ट कुल के तेजस्वी रिशियों ने कर्मकांड के जटिल नियमों की निरर्थक्ता पर
13:14बल देते हुए केवल भक्ती योग को ही त्वरित मोक्ष का एक मात्र साधन बताया
13:20गंदा की कलकल बहती लहरों के बीच रिशियों का यह शास्त्रार्थ और गंभीर विचारविमर्ष ब्रहमांड के गुप्त रहसियों को उजागर
13:28करने लगा जिससे वहां का वातावर्ण पूर्णत दिव्य हो गया
13:33राजा परीक्षित ने श्रद्धा पूर्वक सिर जुका कर रिशियों की इस चर्चा को सुना जहां उनके चहरे पर मृत्यू का
13:41भय नहीं बलकि सत्य को जानने की परम व्याकुलता स्पष्ट दिखाई दे रही थी
13:47तभी शुकदेव गोस्वामी के शान्त और तेजस्वी मुखमंडल पर एक अलोकिक मुस्कान उभी जिसने समस्थ संशों को शान्त करने वाले
13:56परम सत्य के प्राकट का संकेत दिया
13:59देवर्शी नारद ने अपनी मधुरवानी में कहा कि केवल श्रीमत भागवत का श्रवण ही वह परम नौका है जो इस
14:07कल्यक के भवसागर से साथ दिनों में जीवात्मा का उद्धार कर सकती है
14:13महर्शी भेगु ने अपने विशाल और तेजस्वी मस्तत पर त्रिपुंडर धारण किये हुए सहमती में सिरहिलाया और उद्धोश किया कि
14:21भागवत कथा ही समस्थ वेदों का निचोड और अमरित तत्व है
14:27समस्त मुनी मंडल ने एक स्वर में इस बात पर सहमती जताई की परीक्षित जैसे महान और निश्कलंक राजा के
14:34लिए श्रीमत भागवत का श्रवण ही सर्वोत्तम और एक मात्र मोक्ष मार्ग है
14:40शुकदेव गोस्वामी की ओर देखते हुए समस्त रिशियों ने हाथ जोड कर प्रार्थनाकी की वे इस दिव्यज्यान गंगा को प्रवाहित
14:48कर राजा परीक्षित और संपूर्ण विश्व का कल्यान करें
14:53गंगा के पावन जल में सूर्य की अंतिम किरने स्वर्णिम आभा बिखेर रही थी मानो स्वयन सूर्य देव भी इस
15:00अलोकिक सत्सन के साक्षी बनने के लिए ठहर गए हुँ
15:05राजा परीक्षित ने कुशा के आसन पर बैठ कर अपनी अंजली में गंगाजल लेकर प्रतिग्या की कीवे अगले साथ दिनों
15:13तक बिना अनजल ग्रहन किये केवल इस भागवत अमरित का पान करेंगे
15:18शुकदेव गोस्वामी ने अपने कमल नैनों से राजा परीक्षित की ओर देखा और उनकी अनन्य भक्ती और वैराग्य भाव से
15:26संतुष्ट होकर उन्हें उपदेश देने के लिए आसन ग्रहन किया
15:32रिशियों के इस पावन समुह में एक अलौकिक शान्ती छा गई और प्रकृती भी शान्त होकर उस परम सत्य को
15:39सुनने के लिए लालायत हो उठी जो जन्मुम्रित्यू के चक्र से मुक्ट करने वाला है
15:45आकाश से गंधर्व और देवताओं ने पुष्प वर्षा आरंभ कर दी जिससे गंगा का तट सुगंधित और देवताओं की दिव्य
15:53उर्जा से उतप्रोथ होग उठा
15:56व्यासदेव ने अपने परम तेजस्वी पुत्र शुकदेव को इस महान कार्य के लिए तत्पर देखकर अपने हृदय में असीन गर्व
16:04और संतोष का अनुभव किया
16:07शुकदेव गोस्वामी ने अपने दिव्यकंट से ओम नमो भगवते वासुदेवाय का महामंत्र उच्चारित किया जिससे संपूर्ण ब्रह्मांड में एक पवित्र
16:16और दिव्यकंपन फैल गया
16:19इस प्रकार गंगा के तटपर शुकदेव गोस्वामी के सानिध्य में श्रीमत भागवत पुराण के दिव्यक्यान का वह महायग्य आरंभ हुआ
16:28जो परीक्षित को अमर्ता और मोक्ष की ओर ले जाने वाला था
16:33गंगा तटपर ओम नमो भगवते वासुदेवाय के महामंत्र की पवित्र गूंज के बाद वातावर्ण गेहन शान्ती और आध्यात्मिक उर्जा से
16:42भर गया था जहां समय भी ठहरा सा प्रतीत हो रहा था
16:47सभी रिशी, महर्शी और स्वय महाराज परीक्षित परम पूज शुकदेव गोस्वामी की ओर अपनी उत्सुक और श्रधापूर्ण द्रिष्टिया केंद्रित किये
16:56हुए थे
16:58महाराज परीक्षित मृत्यु के भय से मुक्थ होकर अपनी आत्मा की मुक्ती के लिए एक मात्र आशा के रूप में
17:05उन पर अपनी सारी श्रधा अर्पित कर रहे थे
17:09एक गहन अलौकिक सन्नाटा उस विशाल सभा पर छा गया जो आने वाले दिव्य ज्यान की प्रतीक्षा में स्वयन ब्रह्मांड
17:17की चुप्पी को दर्शा रहा था
17:20परम ज्यानी शुकदेव गोस्वामी जो स्वयन शुद्ध चेतना के प्रतीक थे ने अपनी कमलसी आखों को धीरे-धीरे खोला जिनसे
17:29अनन्त वैराग्य और प्रेम की आभा फूट रही थी
17:33उनके शांत तेजोमय मुखमंडल से एक अध्भुत शांती विकीण हो रही थी जिसने वहां उपस्थित हर हृदय की बेचैनी को
17:42ततकाल शांत कर दिया
17:44एक दिव्य मुस्कान उनके अध्रों पर खिली जो शीध्र ही प्रवाहित होने वाले परमानंदमय ज्यान के आगमन का शुब संकेत
17:52थी
17:54पास ही बैठे महर्शी वेदव्यास ने अपने तेजस्वी पुत्र को इस सर्वोच कार्य के लिए ततपर देखकर अपने हृदय में
18:02असीम गर्व और संतोष का अनुभव किया
18:05तगनंतर शुकदेव गोस्वामी ने अपनी करुणापून द्रिष्टी दोहक से व्याकुल महाराच परीक्षित की ओर घुमाई उनकी आखों में गहरा सांत्वना
18:15का भाव स्पष्ट था
18:17उनकी दिव्यवानी किसी स्वर्गिक वीना के मधुर नाद के समान श्रीमत भागवत पुरान के प्रथम श्लोकों को उच्चारित करने के
18:25लिए तैयार थी
18:28उनके आसपास की वायू भी एक अद्रिश्य उर्जा से स्पंदित हो रही थी, मानो वह भी इस दिव्य ज्ञान को
18:35आत्मसात करने के लिए आतुर हो
18:38उन्होंने सर्वप्रथम उपस्थित समस्त रिशियों और पश्चातापी राजा को संबोधित करते हुए अपने प्रवचन का आरंभ किया, उनके शब्दों में
18:47अनंत ब्रह्मांड का सार नहित था
18:50उनके शब्द गंभीर और गूंचते हुए अज्ञान के परदों को भेद रहे थे, प्रत्येक आत्मा के लिए मोक्ष और अमर्ता
18:58का मार्ग प्रशस्थ कर रहे थे
19:01उन्होंने कहा अहोन रिलोक्य गुरुह सत्वन है मानवलोक के गुरु, तुम ही वह हो जो मोक्ष की सच्ची राह दिखा
19:08सकते हो
19:10प्रत्येक शब्द एक पवित्र आहुती बन रहा था, जो महाराज परीक्षित के लिए आत्मसाक्षातकार और भगवत प्रेम के मार्ग को
19:18आलोकित कर रहा था
19:21समस्त उपस्थित रिशिगन श्रद्धा से सिर जुकाकर मौन स्वीकृती दे रहे थे, उनके हृदय अनुपम आनन से परिपूर्ण थे
19:30महाराज परीक्षित पूर्ण भक्ती और एकागरता के साथ सुन रहे थे, उनके अस्तित्व का हरकन दिव्य प्रवचन में लीन था
19:40गंगा नदी भी अपनी गती धीनी करती प्रतीत हो रही थी, उसके जल में इस ब्रहमांडिय घटना का दिव्य प्रतिबिंब
19:47स्पष्ट दिख रहा था
19:48इस प्रकार शुकदेव गोस्वामी द्वारा वर्नित श्रीमत भागवत का वह ज्यान सागर संसार की आध्यात्मिक प्यास बुझाने के लिए प्रवाहित
19:59होना आरंभ हुआ
20:01यह पवित्र प्रवचन सत्य की एक दिव्य मशाल बनकर समस्ट आत्माओं को परम स्वतंत्रता और भगवत प्रेम की ओर मार्ग
20:09दर्शन करने के लिए अपनी कालातीत यात्रा पर निकल पड़ा
20:14गंगा नदी भी अपनी गती धीनी करती प्रतीत हो रही थी उसके जल में इस ब्रहमांडिय घटना का दिव्य प्रतिबिंब
20:21स्पष्ट दिख रहा था
20:24अचानक उस दिव्य वातावर्ण में एक अवर्णनिय पवित्रता घुल गई जैसे स्वयन ब्रहम लोग से कोई परम प्रकाश उतर आया
20:32हो
20:33इसी क्षण परम हंसों में श्रिष्ट, व्यराग्य और ज्यान के मूर्तिमान स्वरूप श्री शुकदेव गोस्वामी ने अपनी दिव्य आभा के
20:41साथ सभा में प्रवेश किया
20:44उनके आगमन मात्र से सभी उपस्थित रिषिमुनी स्वतह ही अपने अपने आसनों से उठ खड़े हुए मानो प्रकृती भी स्वयन
20:53ही सम्मान में जुप गई हो
20:55उनकी आखों में गहन श्रद्धा और एक अध्भुत विस्मय था क्योंकि उन्होंने इस महान संथ के दर्शन में एक परम
21:03सौभाग्य का अनुभव किया
21:06महाराज परीक्षित भी अपने राजसी आसन से उठकर रिदय में असीन भक्ती लिए आदर पूर्वक दोनों हाथ जोड़कर शुप देव
21:15गोस्वामी को प्रणाम करने लगे
21:18उनके राजसी गर्व की सभी सीमाए तूट गई थी और वे केवल एक प्यासे भक्त के रूप में उस ज्ञान
21:25के सागर के सम्मुख खड़े थे
21:28अत्यंत श्रद्धा और आदर के साथ महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी को अपने दर्बार का सर्वोच्च और सबसे प्रतिष्ठित आसन
21:37प्रदान किया
21:39शुकदेव गोस्वामी ने अपनी सहज वैराग्य और अलौकिक शान्ती के साथ उस शाही सम्मान को बिना किसी अभिमान के स्विकार
21:47किया
21:48जैसे एक कमल जल पर बिना डूबे रहता है
21:52जैसे ही वे आसन पर विराज मान हुए
21:55पूरी सभा में एक गहरी पवित्र चुप पीछा गई
21:59हर हृदय में आगामी ज्यान के लिए एक प्रबल उतकंठा जाग उठी
22:04महाराज परीक्षित का हरिदय शुकदेव गोस्वामी को अपनी सभा में देखकर असीम आनन से भर गया
22:11क्योंकि उन्हें अपनी मुक्ती का मार्ग स्पष्ट दिखाई दे रहा था
22:16उन्होंने शुकदेव को भगवान के परम भक्त के रूप में पहचान लिया था
22:21जिनके हर श्वास में परमात्मा का वास था
22:24वे जानते थे कि शुकदेव गोस्वामी समस्थ ज्ञान के सागर हैं जिनके एक-एक शब्द में ब्रहमांड का सार समाहित
22:32है
22:34महाराज परीक्षित ने अत्यंत विनमरता से अपनी वानी आरंभ की
22:39जिसका उद्देश उस दिव्य उपस्थिती का स्वागत और अपनी दीनता व्यक्त करना था
22:45हे प्रभु आपके आगमन से आज हमारा यह स्थान और मेरा यह जीवन धन्य हो गया है
22:51मानो मृत शरीर में प्राणों का संचार हो गया हो
22:56उन्होंने शुकदेव गोस्वामी से अपनी मुक्ती का मार्ग उस भय से मुक्ती का उपाय पूछा जो उन्हें साथ दिनों के
23:03भीतर घेरने वाला था
23:06शुकदेव गोस्वामी की आखें जो अनंत ज्यान से भरी थी महाराज परिक्षित पर स्थिर हो गई उनमें एक शान्त स्विकृती
23:14और गहन करुणा थी
23:17यहक्षन मात्र दो व्यक्तियों की भेंट नहीं थी बलकी ब्रहमांडिय नेती का एक पवित्र मिलन था जो युगों-युगों तक
23:25गूंजने वाला था
23:27अब मौन की गहनता तूटते ही उस परम संत के श्री मुख से कालजई भागवत पुराण का अमरित प्रवाह आरंभ
23:35होने को था
23:37समस्थ सभा सांसे था में उस दिव्य अमरित वर्षा की प्रतीक्षा कर रही थी जो उन्हें भवसागर से पार उतारने
23:45वाली थी
23:46अपनी मृत्यों को अत्यंत निकट जानते हुए महाराज परीक्षित की आखे शुकदेव गोस्वामी पर टिकी थी जिनमें एक अनकही पुकार
23:55और गेहन जिग्यासा व्याप्त थी
23:59कालचक्र की भयावः गती ने उन्हें एक ऐसे चौराहे पर लाख़डा किया था जहां से भौतिक संसार की सभी आकांक्षाए
24:07अर्थहीन प्रतीत हो रही थी
24:10उनकी आत्मा भय और मुक्ती की तीवर इच्छा से जूचते हुए एक ऐसे मार्गदर्शक की तलाश में थी जो उसे
24:17अज्यान के गेहन अंधकार से निकाल सके
24:21हाथ जोड कर पूरी विनमर्ता और श्रधा के साथ समराट परीक्षित ने उस परम संत के सम्मुक स्वयन को पूर्णता
24:29समर्पित कर दिया
24:30उस पावन गंगा तटपर जहां हजारों रिशिमुनी और देवतागन उपस्थित थे गेहन मौन छा गया
24:38मानो ब्रहमांड स्वयन एक पल के लिए थम गया हो तभी महाराज परीक्षित की वानी ने उस दिव्य शान्ती को
24:46भंग किया
24:47एक प्रश्न के साथ जो मृत्यू के भय से मुक्ती का मार्ग खोजने की कुणजी था
24:53उन्होंने धीमे किंटु द्रेड स्वर में कहा हे महाभाग हे परम ज्यानी मेरी अलपायू को देखते हुए मेरा हृदय एक
25:02गेहन प्रश्न से व्याकुल है
25:05जो मनुष्य मृत्यू के द्वार पर खड़ा हो जिसके पास जीवन के कुछ ही क्षन शेश हो उसके लिए सबसे
25:12महत्वपूर्ण कार्य क्या होना चाहिए
25:15हे करुणा के सागर ऐसे समय में उसे क्या सुनना चाहिए जिससे उसकी आत्मा को शांती और दिशा मिले
25:23उसे कौन सा नाम जपना चाहिए, कौन सी ध्वनी में लीन होना चाहिए, जो उसे संसार के बंधनों से मुक्त
25:30कर सके
25:32उसे किस परम सत्य का स्मरण करना चाहिए, कौन से दिव्यरूप का ध्यान करना चाहिए, जो उसे परमती प्रदान करे
25:41और किस परम सत्ता की उपासना करनी चाहिए जिससे वह इस भवसागर के दुस्तर भय को पार कर सके
25:49उनके प्रत्येक शब्द में एक समराट की नहीं बलकि एक जिग्यासु आत्मा की व्याकुलता और मुक्ती की उतकट अभिलाशा थी
25:58समस्थ सभा उन प्रशनों की गंभीरता को महसूस करते हुए अपनी सासे थामे हुए थी क्योंकि ये प्रशन केवल परीक्षित
26:07के नहीं बलकि हर मरंशी प्राणी के थे
26:11क्रिपा करके मुझे इस दुस्तर भय से मुक्ती का मार्ग बताएं है भगवन
26:17परीक्षित की आखों में आशा और भय का अध्भुत मिश्रण था जैसे एक दूबता हुआ व्यक्ती किनारा तलाश रहा हो
26:26शुकदेव गोस्वामी ने अपनी गहन शांती में महाराज परीक्षित की ओर देखा उनके चहरे पर एक अविचल करुणा की आभा
26:34थी
26:35उनके होठों पर एक अत्यंत सुक्ष्म मधुर मुस्कान खिली जो यह संकेट दे रही थी कि इन प्रशनों का उत्तर
26:43ब्रहमांड के सबसे गुप्ट ज्यान में नहित है
26:47यह क्षन मात्र दो आत्माओं का समवाद नहीं था बलकी काल और नेती का वह मिलन था जो युगो युगो
26:54तक धर्म का मार्ग प्रशस्ट करने वाला था
26:58अब उस परम संट के दिव्य मुखार्विन से समस्त वेदों और पुराणों का सार श्रीमत भागवत पुराण का अमरत्मय उपदेश
27:06आरंभ होने को था
27:09शुकदेव गोस्वामी ने अपनी अमरत्मय द्रिष्टी महाराज परीक्षित पर डाली और अत्यंत गंभीर किन्तु मधुर स्वर में उन्हें आश्वस्त किया
27:18कि मृत्यू केवल शरीर की एक अवस्था है आत्मा की नहीं
27:23उन्होंने राजा से कहा कि साथ दिन का समय अत्यंत संक्षिप्ट प्रतीत हो सकता है परन्तु यदि मन पूर्णत श्रीहरी
27:31के चर्णों में समर्पित हो तो एक शन भी मोक्ष प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है
27:38शुकदेव जी ने पूर्वकाल के राजा खटवां का उदाहरन दिया जिन्होंने अपनी आयू के अंतिम मुहूर्त में केवल दो घड़ी
27:45के भीतर ही परमात्मा का ध्यान धरकर परमपद प्राप्त कर लिया था
27:51उन्होंने परीक्षित की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके हिदय में जागरत हुआ यह वैराग्य कोई श्राप नहीं बलकि साक्षात
27:59भगवान की असीम अनुकम्पा है जो उन्हें इस भवसागर से पार उतारने आई है
28:06फिर उस महान तेजस्वी रिशी ने घोशना की की कलेग के भयंकर दोशों के सागर में केवल एक ही महागुण
28:13है और वह है भगवान कृष्ण के पावन नाम और लीलाओं का कीर्टन
28:19शुकदेव जी ने स्पष्ट किया कि सक्युग में जो फल ध्यान से त्रेता में यग्य से और द्वापर में अर्चना
28:25से प्राप्थ होता था वह कल्युग में केवल हरिकीर्तन से सुलब हो जाता है
28:31उनके इन दिव्य वचनों को सुनकर गंगा तट पर उपस्थित समस्त रिशियों, मुनियों और देवताओं के मन से संशय का
28:39कुहासा छंट गया और संपूर्ण वातावर्ण में एक अपूर्व शान्ती छा गई
28:45शुकदेव गोस्वामी ने परीक्षित को आदेश दिया कि वे अपने मन को राजसी चिंताओं, पुत्रमोह और इस नश्वर शरीर के
28:53अभिमान से पूरी तरह मुक्त कर लें
28:56उन्होंने बताया कि श्रीमत भागवत महापुरान कोई साधारन ग्रंथ नहीं, बलकि साक्षात भगवान कृष्ण का ही वांगमय विग्रह है, जो
29:05उनके इस धराधाम से प्रस्थान करने के बाद भक्तों के कल्यान के लिए प्रकट हुआ है
29:12शुकदेव जी ने कहा कि वे इस परम गोपनिय और दिव्य कथा का गान करेंगे, जिसे उन्होंने स्वय अपने पिता
29:20महर्शी वेदव्यास के मुख से एकांत में श्रवन किया था
29:24उन्होंने समझाया कि इस कथा के केवल श्रवन मात्र से मनुष्य के हृदय में भगवान के प्रती अनन्य प्रेम्मई भक्ती
29:32जागरत हो जाती है, जो जन्मम्रित्यों के चक्र को सदा के लिए समाप्त कर देती है
29:38राजा परीक्षित ने अत्यंत विनीत भाव से अपने दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थनाकी की है गुरुदेव आप अविलंब उस अमरित का
29:47पान कराईए जो तक्षक के विश्को भी निश्प्रभावी कर दे
29:52शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि तक्षक का विश्टो केवल इस भौतिक शरीर को नश्ट कर सकता है परन्तु
29:59भागवत कथा का यह अमरित आत्मा को अमर्ता प्रदान करेगा
30:04उस पावन बेला में जब सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था गंगा की लहरे भी जैसे शान्त होकर इस
30:11महा समवाद को सुनने के लिए स्थिर हो गई
30:15शुकदेव गोस्वामी ने कुछ क्षणों के लिए मौन होकर अपने आराध्य देव भगवान श्री कृष्ण का ध्यान किया और उनके
30:23दिव्यस्वरूप का मानसिक वंदन करते हुए कथा की भूमिका रखी
30:28उन्होंने स्रिश्च्यपत्ती की कथा से प्रारंभ करते हुए बताया कि किस प्रकार परभ्रह्म परमात्मा ने अपनी माया शक्ती से इस
30:37अनंत ब्रहमांड की रचना की है
30:40उन्होंने कहा कि भगवान के प्रतेक अवतार का एक मात्र उद्देश्य साधों की रक्षा दुष्टों का विनाश और धर्म की
30:48पुनहस्थापना करना होता है
30:51महाराज परीक्षित ने अपने संपूर्ण अस्तित्व को केवल सुनने में समाहित कर लिया
30:56मानोवे स्वयन एक मौन श्रोता बनकर परमात्मा की वानी में विलीन हो रहे हूं
31:03गंदा के तटपर मौन की एक ऐसी गहन चादर बिच गई की वायू का धीमा जोंका भी जैसे शुकदेव जी
31:10के दिव्य शब्दों को बाधा न पहुचाने के लिए रुख गया था
31:13इस प्रकार कल्युक के इस महानतम संकट के क्षण में परिक्षित के माध्यम से संपूर्ण मानवता के उद्धार के लिए
31:22श्रीमत भागवत पुराण का महायग्य अत्यंत भव्यता के साथ आरंभ हुआ
31:28गंगा के शांत तटपर शुकदेव गोस्वामी ने अपनी अलौकिक ग्रिष्टी परिक्षित महाराज पर स्थिर की मानो समय स्वय उनके दिव्य
31:37संकल्प के समक्ष ठहर गया हो
31:40समस्थ सभा में एक गेहन मौन छा गया जहां केवल गंगा की पवित्रधारा का कलकल और वायू का मंद जोंका
31:47ही सुनाई देता था जो इस दिव्यक्षन का साक्षी बन रहा था
31:52तब अपने दिव्य ज्यान से परिपून शुकदेव जी ने धीरे से अपना दाया हाथ उठाया मानो वे ब्रहमांड को अपने
32:00शब्दों की शक्ती से जागरित करने वाले हो
32:04उनकी शांत गंभीर वाणी ने गंगा की लहरों को भेदते हुए कहा कि यह श्रीमत भागवतम साक्षात भगवान श्री कृष्ण
32:12का वामय स्वरूप है
32:15जैसे ही उन्होंने कृष्ण के इस साहित्यक अवतार की बात कही वहां उपस्थित प्रत्यक आत्मा ने भगवान की अलौकिक उपस्थिती
32:23को अपने हृदय में अनुभव किया
32:27शुकदेव जी ने आगे कहा कि इस परमग्रंथ के श्रवन मात्र से ही जीव को जन्मुम्रित्यू के चक्र से मुक्ती
32:34और परमगती प्राप्थ होती है
32:37उनकी वानी में ऐसा विश्वास और सत्य था कि वहां बैठे सभी रिशिमुनी जिन में ब्रहमर्शी नारत भी थे विस्मय
32:45और श्रद्धा से नत्मस्तक हो गए
32:49महाराज परीच्षित की आखें अविचल थी उनकी आत्मा का हर कन शुकदेव जी के प्रत्येक शब्द को एक प्यासे की
32:56भाती आत्म साथ कर रहा था
32:59शुकदेव गोस्वामी ने समझाया कि श्रीमत भागवतम केवल कथा नहीं बलकि वह परम ज्ञान है जो सभी भौतिक कामनाओं और
33:08बंधनों से उपर उठाता है
33:11उन्होंने इसे कल्यूप के अंधकार में भटक्ती आत्माओं के लिए परम आश्रे और साक्षात भगवान का प्रकाशस्तम्ध घोशित किया
33:20वेदों और उपनिश्दों के गूढ रहसियों से भी बढ़कर यह सीधे इश्वर तक पहुँचने का सरल और सुगम मार्ग है
33:28शुकदेव जी ने बलपूर्वक कहा
33:31भागवतम ज्ञान का वह अक्षय दीपक है जो अज्ञान के गहन अंधकार को भेद कर आत्मा को शाश्वत सत्य की
33:39ओर ले जाता है
33:41इसी परम महिमा को ध्यान में रखते हुए शुकदेव जी ने शेश साथ दिनों तक लगातार यह कथा सुनाने का
33:48द्रिड संकल्प लिया
33:50उनका यह संकल्प महाराज परीक्षित को उनके अंतिम ख्षणों में आत्मध्यान प्रदान करने के लिए था
33:58और अंतह तक्षक नाग के श्राप से परे उन्हें जन्मम्रत्यू के बंधन से मोक्ष की प्राप्ती हो सके
34:06परीक्षित महाराज ने अपनी आखों से मौन स्वीकृती दी उनका संपूर अस्तित्व गुरु के इस महान संकल्प के प्रती समर्पित
34:15था
34:16यह केवल एक कथावाचन का वादा नहीं था बलकि गुरु और शिश्य के बीच एक अलोकिक आध्यात्मिक समझोता था
34:25साथ दिनों के इस महायग्य में कथा के प्रतेक शब्द को मोक्ष के मार्ग पर एक प्रकाशस्तंभ बनना था
34:33और फिर एक गहरी सांस के साथ शुकदेव गोस्वामी ने अपनी कथा का वास्तविक आरंब किया ब्रहमांड ने अपनी सारी
34:41उचसुकता से सुना
34:43गंगा के तटपर एक नई युग की आध्यात्मिक यात्रा का सूत्रपात हुआ जिसका उद्देश केवल एक समराट का उद्धार नहीं
34:52बलकि सम्पूर्ण मानव जाती का कल्यान था
34:56शुकदेव गोस्वामी ने अपने कमल समान मुख को खोला और उपस्थित रिशियों की ओर देखते हुए भागवत के दिव्यश लोकों
35:05का उच्चारन करने के लिए गहरी सांस ली
35:08महाराज परीक्षित ने अपने दोनों हाथों को जोड कर और अशुरुपूर्ण नेत्रों से शुकदेव जी के चर्णों की ओर देखते
35:16हुए अपने मन को पूरी तरह से भगवान के चर्णों में समर्पित कर दिया
35:21चारों और बैठे महर्शी व्यास, नारद और शौनक जैसे महान रिशी इस दिव्य समवाद को सुनने के लिए परम उच्सुक
35:29होकर शांत भाव से बैठ गए
35:32गंगा के पावन तट पर गूंजता हुआ ओम का पवित्रस्वर पूरे वातावर्ण को एक अलोकिक शांती और आध्यात्मिक उर्जा से
35:41भर देता है
35:43शुकदेव जी ने स्रिष्टी के आधिकारण परम पुरुष भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करते हुए भागवत के प्रथम श्लोक का
35:51गान आरंभ किया
35:53जैसे ही कथा का आरंभ हुआ, गंगा माता की लहरें भी स्थिर हो गई और वे शांत होकर शुकदेव जी
36:00के मुख से निकलने वाली अमरित रूपी कथा को सुनने लगी
36:05शुकदेव जी ने सर्वप्रथम महा विश्णू के उस विराट और कल्यानकारी रूप का वर्नन किया जिससे इस अनन्त ब्रहमांड की
36:12उत्पत्ती, स्थिती और लय होता है
36:16इस दिव्यज्यान को सुनते ही राजा परीक्षित के मन से मृत्यू का भय धीरे-धीरे समाप्थ होने लगा और उनके
36:23भीतर एक परम प्रकाश का उदे हुआ
36:27शुकदेव गोस्वामी ने बताया कि यह श्रीमत भागवत पुरान और कुछ नहीं बलकी वेदो रूपी कल्पवरिक्ष का पका हुआ अत्यंत
36:35मीठा और अमरत मईफल है
36:39बादलों की ओट से सूर्यदेव ने अपनी स्वर्णिम किरने बिखेर कर गंगा के तट पर बैठे सभी महात्माओं और रिशियों
36:46को अपने तेज से आलोकित कर दिया
36:50देवर्शी नारद ने अपने हाथों में थामी हुई महती वीना के तारों को शुकदेव जी की कथा के राग के
36:57साथ धीरे से जंकृत किया
36:59कथा आगे बढ़ी और शुकदेव जी ने कल्यव के अंधकारमई प्रभाव से बचने का एक मात्र उपाय केवल भगवान के
37:07पावन नामों का संकीर्तन बताया
37:11राजा परीक्षित ने अपनी शंकाओं को दूर करने के लिए अत्यंत विनमर्ता पूर्वक पहला प्रशन पूछा की एक मरनासन्न मनुष्य
37:19का परम धर्म क्या होना चाहिए
37:22शुकदेव जी ने राजा के इस सुन्दर और लोग कल्यानकारी प्रशन की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रशन संपूर्ण
37:30मानव जाती के उद्धार का मार्ग प्रशस्त करेगा
37:34स्वर्गलोग से देवराज, इंद्र और अन्य देवतागन अपने अदरिश्य दिव्य विमानों में बैठकर गंगा के तटपर हो रही इस अध्भुत
37:42कथा का साक्षी बनने के लिए उच्सुकता से आप पहुँचे
37:46गंगा तटपर स्थित विशाल और प्राचीन पीपल के व्रिक्ष के पत्ते भी मंध हवा के जोकों के साथ हरिनाम की
37:53गूँच करते हुए प्रतीत हो रहे थे
37:57शुकदेव जी ने भगवान के उस विराट रूप की महिमा का गान किया जिसमें सूर्य और चंद्रमा उनके नेत्र हैं
38:04और संपून ब्रहमांड उनका शरीर है
38:08उपस्थित सभी रिशिमुनी ऐसे मौन और स्थिर होकर सुन रहे थे मानो वे चित्र में अनकित कोई मूर्तियां हो और
38:16कथारस का निरंतर पान कर रहे हो
38:19धीरे धीरे संध्या की चाया गंगा तटपर गहराने लगी परंतु भागवत कथा के दिव्य प्रकाश से पूरा वातावर्ण मध्याहन के
38:28सूर्य की भांती चमक रहा था
38:31महाराज परीक्षित ने अगले साथ दिनों तक बिना अनजल ग्रहेन किये केवल इस भागवत मृत का पान करने का द्रिड
38:38संकल्प ले लिया
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