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राजसूय यज्ञ के समापन के बाद, दुर्योधन की ईर्ष्या प्रज्वलित होती है। उधर, शिशुपाल के मित्र साल्व ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रतिशोध लेने की शपथ ली है। वह अपने मायावी विमान 'सौभ' से द्वारका पर भीषण आक्रमण करता है, जिससे पूरी नगरी त्रस्त हो उठती है। श्रीकृष्ण, अपनी अनुपस्थिति में द्वारका पर हुए इस हमले को देख, साल्व से निर्णायक युद्ध के लिए निकलते हैं। क्या भगवान साल्व के मायाजाल को भेदकर उसके अजेय विमान को नष्ट कर पाएंगे? देखें इस महाकाव्य में द्वारका की रक्षा की दिव्य गाथा! #DwarkaAttack #SalvaVadh #SaubhaVimana #LordKrishna #BhagavataPurana
Transcript
00:00इंद्रप्रस्थ में आयोजित धर्मराज युधिष्थिर के राजसू यग्य के अंतिम अनुष्ठान भगवान श्री कृष्ण और अन्य पांडवों की उपस्थिती में
00:08अत्यंत भव्यता और वैदिक मंत्रों चार के साथ संपन हुए, जिससे पूरा वातावर्ण दैवी �
00:15उर्जा से स्पन्दित हो उठा. यग्य की पूर्णाहूती के साथ ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के दिव्य आशिरवाद की वर्शा
00:24हुई, जिसे देखकर सभी उपस्थित राजाओं और रिशियों के हृदै श्रधा और भक्ती से भर गए.
00:31उपस्थित सभी दिगजों ने एक स्वर में धर्मराज युधिश्थिर को चक्रवर्ती समराट घोशित किया, जिसकी गूंज इंद्रप्रस्थ के प्रत्येक कोने
00:40में फैल गई और विजय के नगाडों के साथ संपूल्ण नगर आनन्दित हो उठा.
00:46युधिश्थिर के राज्याभिशेक के पश्चात इंद्रप्रस्थ में उत्सव का माहौल छा गया, जहां समस्थ प्रजा और अतिथी राजाओं ने पांडवों
00:55के अद्भुत आतिथ्य का आनन्द लिया.
00:58इस अद्वितिय वैभव और पांडवों के एश्वर्य को देख कर दुर्योधन का हृदय ईश्या की अगनी में धधक उठा, उसकी
01:06आखें क्रोध से लाल हो गई और मुठिया कस गई.
01:10यग्य के समापन के बाद धर्मराज युधिष्थिर ने सभी अतिथी राजाओं को इंद्रप्रस्ट की मायावी सभा का भ्रमन करने के
01:18लिए आमंत्रित किया, जिसकी प्रसिधी दूर-दूर तक फैली हुई थी.
01:24माया सभा के भीतर कदम रखते ही, दुर्योधन और उसके साथ ही उसकी अग्वितिय कारीग्री और भ्रम पैदा करने वाली
01:32सनरचनाओं को देखकर अवाक रह गए, जिसकी कलपना उन्होंने कभी नहीं की थी.
01:38विचित्र भ्रमों से भरी सभा में आगे बढ़ते हुए, दुर्योधन ने कई बार अपनी आखों पर विश्वास नहीं किया, जहां
01:46पानी जमीन और जमीन पानी प्रतीत होती थी.
01:50मायावी सभा के हर कोने में फैली यह अद्भुत कारीग्री वास्तव में दानव मै दानव की अतुलनिय शिल्प कौशल का
01:58प्रमाण थी, जिसने इंद्रप्रस्थ को एक जादुई नगरी में बदल दिया था.
02:03दुर्योधन जिसने पान्डवों के वैभव को कभी स्विकार नहीं किया था, अब इस मायावी वास्तुकला की भव्यता से अभिभूत होकर
02:12अपने क्रोध और इर्ष्या से जूज रहा था.
02:15आगे बढ़ते हुए, दुर्योधन एक ऐसे स्थान पर आया जहां उसे लगा कि यह ठोस भूमी है, परन्तु वास्तव में
02:23वह एक निर्मल जलकुंड था और वह सीधे उसमें गिर पड़ा.
02:28दुर्योधन को इस प्रकार अनायास जल में गिरते देख, पास खड़े भीम सहित सभी पांडव और अन्य उपस्थित लोग अपनी
02:36हसी रोक न सके और पूरी सभा ठहाकों से गूँज उठी.
02:41अपनी इस अपमान जनक स्थिती से शर्मिंदा होकर, दुर्योधन ने क्रोधित दृष्टी से चारों ओर देखा, अपनी गरिमा को बनाय
02:50रखने का व्यर्थ प्रयास करते हुए.
02:52कुछ देर बाद जब वह जलकुंड से बाहर निकला, तो उसने भ्रमवश एक ऐसे ठोस फर्ष को पानी समझ कर
03:00अपनी धोती उपर उठा ली, जहां वास्तव में कोई जल नहीं था, जिससे उसकी मूर्खता पर और अधिक हसी गूज
03:08उठी.
03:09यह देख भीनसेन और अर्जुन जैसे योध्धाओं ने भी अपनी हसी पर नियंत्रन खो दिया, उनकी गर्जनाकरती हसी माया सभा
03:18की दीवारों से टकरा कर वापस लोट रही थी.
03:22इन घटनाओं से तिल मिलाकर दुर्योधन ने अपनी आखें बंद कर ली, मानो वह इस अपमानजनक वास्तविक्ता से बच सके,
03:30परंतु हसी के स्वर उसके कानों में गूँचते रहे.
03:34अंतह एक ऐसे मार्ग पर चलते हुए जहां उसे लगा कि वह एक खुला द्वार है, दुर्योधन एक पारदर्शी स्वटिक
03:42की दीवार से टकरा गया, जिससे उसके सिर पर हलकी चोट आई और उसकी हसी का पात्र बनने का सिलसिला
03:49जारी रहा.
03:51द्रॉपदी जो अब तक अपनी हसी पर सन्यम रखे हुए थी, दुर्योधन की इस अंतिम मूर्खता को देखकर स्वयं को
03:59रोक न सकी और उसके मुख से मधुर परंतु स्पष्ट हसी फूट पड़ी.
04:05द्रॉपदी की हसी दुर्योधन के हृदय में तलवार के समान चुब गई, उसकी इश्या और अपमान अब प्रतिशोध की दहकती
04:12ज्वाला में परिवर्तित हो गए, जिसने उसके पूरे अस्तित्व को घेर लिया.
04:18गहरे अपमान और प्रतिशोध की तीवर इच्छा से जलता हुआ दुर्योधन, बिना किसी को कुछ कहे, तेजी से माया सभा
04:26से बाहर निकल गया, अपने हृदय में भविश्य के विनाश का बीज बोता हुआ.
04:32इंद्रप्रस्थ के राजसू यग्य में हुई इन घटनाओं से अन्भिग्य, चेदी राज्य के राजा साल्व को अपने परम मित्र शिशुपाल
04:40के वद्ध का भीशन समाचार मिला, जिसने उसके हृदय को चीर डाला.
04:45इस अकल्पनिय सत्यको स्वीकारने में असमर्थ साल्व का मुख क्रोध, शोक और प्रतिशोध के गहन भावों से विरूपित हो गया,
04:54मानो उसके भीतर कोई ज्वाला मुखी फूट पड़ा हो.
04:58अपने परम्मित्र के अकस्मात और अपमान जनक अंत की स्मृती से जलता हुआ साल्व, सिनहासन से उठ खड़ा हुआ और
05:06उसकी मुठिया इस सीमा तक भिंच गई की नसे उभराई, उसकी आखों में श्रीकृष्न के प्रतिगहन भेना और प्रतिशोध की
05:14ज्वाला प्रज
05:27मूले चुकाने पर विवश करेगा, चाहे उसे अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े।
05:57संसार की सभी सुक्सुविधाओं का परित्याग करते हुए। सैक्रों वर्षों तक साल्वने अन्नजल का त्याग कर, कभी अगनी के समक्ष
06:07तो कभी जल के भीतर खड़े होकर, अपने शरीर और मन को परम पीड़ा दी, उसकी तपस्या की उर्जा से
06:13वातावर्ण में एक अ
06:27पहले से भी अधिक तीवर हो उठी थी, जो उसे तपस्या जारी रखने की प्रेणा दे रही थी।
06:57अपनी आखें खोली, उनके त्रीतिय नेत्र से दिव्य प्रकाश का एक शनिक पुझ उभरा।
07:03साल्व के अटूट संकल्प और निष्ठा से प्रसन्न होकर त्रिकाल दर्शी भगवान शिव ने उसे दर्शन देने और उसकी मनोकामना
07:12पूर्ण करने का निर्णै लिया, ब्रहमांड में उनकी शक्ती का एक और विस्मयकारी प्रदर्शन होने वाला था।
07:19एक प्रचंड गर्जना और दिव्य प्रकाश के साथ भगवान शिव स्वयन साल्व के समक्ष प्रकट हुए, उनके आगमन से पूरा
07:28परवकमंदल थर्रा उठा और आकाश में देवताओं के जैगोश गूंज उठे।
07:34अपनी तपस्या के फल को साकार होते देख, साल्व की आखों से आनंद के अश्रुबह निकले, उसने तुरंत भगवान शिव
07:42के चर्णों में अपना मस्तक जुकाया, उसकी सारी शारिरिक पीडाक्षन भर में विलुप्थ हो गई।
07:49साल्व ने नमरता पूर्वक अपने हाथ जोडे और भगवान शिव की स्तुती करते हुए, उनकी असीम कृपा और ब्रहमांडिय शक्ती
07:57का बखान किया, उसके शब्द भक्ती और कृतग्यता से भरे हुए थे।
08:03भगवान शिव ने अपने गंभीर ब्रहमांडिय स्वर में साल्व से कहा कि उसकी तपस्या सफल हुई है और वह जो
08:10चाहे वर्दान मांग सकता है, जिससे साल्व का हृदय आशा से भर गया।
08:16अपनी मनो कामना व्यक्त करते हुए, साल्व ने एक ऐसा मायावी विमान मांगा जो इच्छा शक्ती से चलता हो, देवताओं
08:24के लिए भी अजय हो और किसी भी प्रकार के शस्त्र से नश्ट न किया जा सके।
08:30साल्व ने आगे कहा कि वह ऐसा विमान चाहता है, जिससे वह द्वार का नगरी को पूरी तरह से जला
08:37कर भस्म कर सके और श्री कृष्ण के सामराज्य को तहसन हस कर दे।
08:42भगवान शिव ने साल्व की बात धैर्य पूर्वक सुनी और गंभीर स्वर में उसकी मनोकामना पूर्ण करने का वर्दान दिया।
08:51यद्यपी उनके मुख पर एक सुक्ष्म उदासी की छाया थी, क्योंकि वे भविश्य के विनाश को जानते थे।
08:59भगवान शिव के वर्दान के फल्स्वरूप, एक विशाल, रहस्यमय और मायावी विमान, सौब विमान, आकाश से नीचे उत्रा, जो काले
09:08लोहे से निर्मित था और उसमें सोने चांदी के जटिल नकाशीदार विवर्ण थे, जिसकी भव्यता और भयानक शक्ती देखते
09:16ही बनती थी, उस अजे विमान को प्राप्त कर साल्व का हृदय प्रतिशोध की ज्वाला से धधक उठा और उसने
09:24तुरंत द्वारका पर आक्रमन करने की तैयारी आरंभ कर दी, जिसका लक्ष अब स्पष्ट था, श्री कृष्न का विनाश, सौब
09:33विमान के अंदर साल्व �
09:35अपने मायावी सैनिकों को द्वारका पर भीशन आक्रमन करने का आदेश दिया, उसकी आखें प्रतिशोध की अगनी से दहक रही
09:43थी, विशाल सौब विमान एक विक्राल गर्जना के साथ आकाश में उठा, अपनी काली छाया से धर्ती को ढखता हुआ,
09:52द्वारका की ओर त
10:04कतिविधियों में लीन थी, जब तक की आकाश में एक सुक्षम परिवर्तन नहीं दिखा। अचानक आकाश में एक विशाल का
10:13एकाली आकरिती प्रकट हुई, जिसने सूर्य के प्रकाश को अवरुध कर दिया और द्वारका के नागरिकों की शान्ती भंग करते
10:21हुए भय का
10:21माहौल पैदा कर दिया। नगर के उच्च सुरक्षा बुर्जों पर तैनात सतर्क रक्षकों ने तुरंत खत्रे को भामपा और युद्ध
10:30भेरी बजाकर समस्त नगर को आसन्न आक्रमन की चेताबनी दी। युद्ध भेरी की करकश ध्वनी सुनकर द्वारका की सड़कों �
10:39पर हाहाकार मच गया। लोग भैभीत होकर अपने घरों की ओर भागने लगे सुरक्षा की तलाश में। सौब विमान ने
10:49अपनी भयानक शक्ती का प्रदर्शन करते हुए द्वारका पर अगनी और पत्थरों की वर्षा करना शुरू कर दिया, जिससे स्वर्णमंदित
10:57भव
10:57ध्वस्त होने लगे। श्री कृष्ण की अनुपस्थिती में पराक्रमी अनिरुद्ध और प्रद्युम्न ने तुरंट अपनी सेनाओं को संगठित किया और
11:07अदमे साहस के साथ द्वारका की रक्षा के लिए युद्ध भूमी में उतरने की तयारी की। द्वारका के वीर
11:15युद्धा अदमे साहस से भरे, सौब विमान से उतर रहे राक्षसी सेनाओं के विरुद्ध डटकर खड़े हो गए भीशन युद्ध
11:23का आरंभ हो चुका था। युद्ध के दौरान सौब विमान अचानक अद्रिश्य हो गया, जिससे द्वारका के युद्धा असमंजस
11:32में पढ़ गए, उनके अस्त्रशस्त्र अब लक्षहीन थे। अद्रिश्य रहते हुए भी, सौब विमान ने द्वारका पर प्रहार जारी रखा,
11:41जिससे अप्रत्याशित हमलों से और भी अधिक विनाश हुआ और शहर में दहशत फैल गई। अनिरुद्ध और प्रद्य�
12:02में युधिष्ठिर के राजसु यग्य में एक शीघरगामी दूत ने द्वारका पर हुए भीशन आक्रमन का दुखद समाचार श्री कृष्ण
12:10तक पहुचाया। द्वारका के विनाश का समाचार सुनकर भगवान श्री कृष्ण का शांत मुखमंडल गंभीर हो गया और �
12:19उन्होंने तुरंत इंद्रप्रस्थ छोड़कर अपनी प्रियनगरी की रक्षा के लिए प्रस्थान करने का निर्णय लिया। बिना एक शन गवाए भगवान
12:28श्री कृष्ण ने यज्य मंडब से तीवर गती से प्रस्थान किया। उनके दिव्यतेज से पूरा वातावर्
12:36अपने गरूर पर आरूढ होकर भगवान श्री कृष्ण आकाश मार्ग से अत्यंत वेग से द्वारका की ओर बढ़े उनका दिव्यसार्थी
12:45दारुक उनके साथ था। अंतह भगवान श्री कृष्ण द्वारका के उपर पहुँचे और अपनी प्रियनगरी को सौब विमान
12:54द्वारा तबाह होते देख उनके हृदय में क्रोध की अगनी प्रजवलित हो उठी। आकाश में स्थिर रहकर भगवान श्री कृष्ण
13:03ने द्वारका की भयावह स्थिती का अवलोकन किया अद्रिश्य सौब विमान के कारण हुई क्षती और अपने प्रियजनों की पीड
13:25पांच जन्य की प्रचंड ध्वनी ने आकाश को चीर दिया, जो साल्व की राक्षसी सेनाओं के लिए मृत्युदंड का संदेश
13:32और द्वारका के रक्षकों के लिए आशा की किरण लेकर आया।
13:53जावी सेना के राक्षसों के हृदय में भय और अशान्ती फैल गई क्योंकि यह दिव्य गर्जना उनके विनाश की पूर्व
14:00घोशना थी।
14:02भगवान श्रीकृष्न जिनकी दिव्य आभा से आकाश जगमगा रहा था, अब युद्ध के मैदान में अवतरित हुए, उनका लक्षे दुष्टों
14:11का सहार कर धर्म की स्थापना करना था।
14:15जैसे ही वह अपने दिव्य रत पर सवार होकर युद्ध भूमी में आये, उनके सार्थी दारुक ने कौशल से रत
14:21को साल्व की सेना की ओर मोड़ा, जो उनके आगमन से भयभीत होकर छित्राने लगी थी।
14:28सौब विमान अपनी मायावी शक्तियों के साथ आकाश में अद्रिश्य होकर तेजी से घूम रहा था, कभी एक दिशा में
14:36प्रकट होता तो कभी दूसरी जिससे उसे निशाना बनाना असंभव प्रतीत हो रहा था।
14:42भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शार्गधनुष को उठाया और उस पर एक दिव्यबान चड़ाया, जिसका लक्ष उस अद्रिश्य विमान की रहस्य
14:52में उर्जा को भेदना था।
14:54उनके छोड़े गए बान ने आकाश को चीरते हुए सौब विमान के मायावी आवर्ण को क्षण भर के लिए भंग
15:02कर दिया, जिससे उसकी काली धातुई संरचना कुछ पल के लिए द्रिश्टि गोचर हुई।
15:07विमान से ततकाल ही विनाशकारी अस्त्रशस्त्रों की बोचार हुई जो द्वारका के शेश भवनों और भगवान श्रीकृष्ण के रत की
15:16ओर बढ़ी, जिससे तीवर विस्पोट हुए।
15:20दारुक ने अभूत पूर्व कौशल का प्रदर्शन करते हुए, भगवान श्रीकृष्ण के रत को मायावी अस्त्रों से बचाते हुए, उसे
15:28युद्ध भूमी में बिजली की गती से संचालित किया।
15:32सौध विमान के भीतर से साल्व ने एक मायावी स्वर में भगवान श्रीकृष्ण का उपहास किया, के कृष्ण तुम अपनी
15:40शक्ती पर कितना भी गर्व करो, मेरा विमान तुम्हारे लिए एक अद्रिश्य चुनौती रहेगा।
15:46भगवान श्रीकृष्ण का चहरा क्रोज से तम्तमा उठा, उनकी आखें आग की तरहें चमकने लगी, क्योंकि साल्व के ये शब्द
15:55उनके हृदय में प्रतिशोध की ज्वाला को प्रजवलित कर गए।
15:59उन्होंने ततकाल अपने चक्र सुदर्शन को आहवान किया, जो ब्रहमांडिय उर्जा से उतप्रोथ होकर उनके दाहिने हाथ में प्रकट हुआ,
16:08एक चमकते हुए सूर्य के समान।
16:12सुदर्शन चक्र अपनी तीवर गती और विनाशकारी शक्ती के साथ सौब विमान की ओर बढ़ा, जिससे आकाश में एक चमकीली
16:21लकीर बन गई और विमान की सुरक्षा परतें थर्थरा गई।
16:25चक्र के प्रहार से सौब विमान का एक हिस्साक्षतिग्रस्थ हो गया, जिससे उसकी मायावी अद्रिशता भंग हुई और उसका विशाल
16:34भयानक आकार पूर्णत प्रकट हो गया, जो आकाश में एक काली चाया की तरह मंदरा रहा था।
16:41साल्व ने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग करते हुए द्वारका में भीशन भ्रम पैदा किया, जिससे नागरिकों को अपने प्रीजनों
16:50के कष्टों और मृत्यों के भयावध द्रिश दिखाई देने लगे।
16:54द्वारका के नागरिक इन भयानक और हृदय विदारक मायावी द्रिश्यों को देख कर चीखने लगे, उन्हें लगा कि उनके अपने
17:02परीजन मारे जा रही हैं, जिससे उनकी आशा पुन्ह निराशा में बदलने लगी।
17:09भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य अंतरद्रिश्टी से तुरंत समझ गए कि यह साल्व का नया मायावी खेल है, जो उनके भक्तों
17:17के मन को विचलित करने के लिए रची गई है।
17:21उन्होंने अपनी दिव्य शक्ती को केंद्रित किया, अपने मन में एक द्रिड संकल्प धारन करते हुए कि वे इस मायावी
17:28छल को ध्वस्ट कर अपने भक्तों को मुक्ती दिलाएंगे।
17:33भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योग माया शक्ती का प्रयोग किया, जिससे साल्व की मायावी स्रिष्टी की नीम भिल गई और
17:41भ्रम के द्रिश धीरे-धीरे बिखरने लगे, जैसे सुभा की उस धूप में गायब होती है।
17:47जैसे ही भ्रम तूटने लगा, भगवान श्रीकृष्ण ने पुनह अपने शारंगधनुष को उठाया और एक और दिव्यबान छोड़ा, जिसका सीधा
17:57लक्ष्य अब स्वयन साल्व था, जो अपने विमान के अंदर से प्रकट हुआ।
18:02भगवान श्रीकृष्ण का वह दिव्यबान, सूर्य के समान प्रजवलित, सौब विमान के अभेद्य कवच को भेदता हुआ साल्व के मायावी
18:11शरीर से जाटकराया, जिससे एक तीवर चीक के साथ उर्जा का काला विस्फोट हुआ।
18:17साल्व अपने मायावी शरीर में तीवर पीडा का अनुभव करते हुए, अपने यंत्रों से लबालब विमान के भीतर छट पटाया,
18:26जिससे पूरा सौब विमान डगमगा उठा और उसकी मायावी शक्ती कुछ क्षण के लिए शिथिल पड़ गई।
18:33अपनी हार को भापकर, साल्व ने क्रोधित स्वर में अपने शेश राक्षसी सेनाप्तियों को आदेश दिया कि वे द्वारका के
18:41कमजोर पड़ते सुरक्षा घेरे पर अंतिम और सबसे भीशन हमला करें, जबकि वह स्वयंक्षनिक पलायन कर अपनी शक्ती पुन्ह एकत्र
19:02जब साल्व की राक्षसी सेना ने एक और प्रचंड आक्रमन शुरू किया, ठीक उसीक्षन, युवा और पराक्रमी प्रद्युम्न जो अपने
19:13पिता के समान तेजस्वी थे, यादव सेना के अग्रिम पंक्ती में प्रकट हुए, उनके मुख पर अटूट संकल्प और आख
19:21की अग्नी प्रज्वलित थी, अपनी अध्भुत धनुर्विद्या का प्रदर्शन करते हुए, प्रद्युम्न ने एक साथ अंगिनत बानों की वर्षा की,
19:31जिन्होंने शत्रु सेना की अग्रिम पंक्तियों को चीरते हुए, उनके होसलों को पस्त कर दिया, उसने अपने �
19:38पिता के समान ही तीवरगती और सटीक्ता से बान चलाए, जिससे साल्व के सेनाप्ती भी अचम्भित रह गए और उनके
19:46आक्रमन की धार कुंद पड़ गई, प्रद्युम्न ने अपनी दिव्यद हनुर्विद्या से शत्रु के सभी मायावी जाल और भ्रम को
19:54भी काट डाला
19:55जिससे उनके सैनिक वास्तविक युद्ध भूमी को देख पाए और उनका मनोबल पुनह जागरित हुआ। उन्होंने अपनी सेना को संबोधित
20:05करते हुए एक बुलंद आवाज में कहा वीरों। भयत्यात दो हम द्वारका के रक्षक हैं और जब तक मुझ में
20:14प्राण हैं
20:15यह पवित्र नगरी सुरक्षित रहेगी। प्रद्युम्न के इन प्रेनादायक शब्दों से यादव सेना में नया जोश भर गया और वे
20:24दुगुने उचसाह के साथ साल्व की राक्षसी सेना पर तूट पड़े हर सैनिक अपने कर्तव्य के प्रती समर्पित था। युद
20:45लेकिन तभी सौब विमान से एक नई और अधिक भयावा राक्षसी पल्टन निकली जिन में मायावी शक्तिया थी और वे
20:53द्वारका के कमजोर पड़ते पश्चिमी द्वार की ओर बढ़े। प्रद्युम्न ने तुरंक अपनी रणनीती बदली और यादव सेना के एक
21:02हिस
21:03से को पश्चिमी द्वार की ओर भेजा, जबकि वे स्वयन केंग्रिय मोर्चे पर डटे रहे, ताकि कहीं भी रक्षा में
21:10कमी ना आए।
21:33जो द्वार का के सबसे उचे शिखर को निशाना बनाते हुए आकाश में तेजी से बढ़ा। प्रद्युम्न ने उस नवप्रकट
21:41दानव के भयानक रूप को देखा और तुरंत समझ गए कि यह एक भयंकर चुनोती है, जिसके लिए उन्हें अपनी
21:49समस्थ शक्ती और कौ�
22:19का उप्योग करना होगा।
22:20इस नवप्रकट दानव के साथ प्रद्युम्न का महा संग्राम शुरू हुआ, जहां दोनों और से प्रचन प्रहार हो रहे थे,
22:27जिससे द्वारका की नीम भी हिल उठी।
22:30अंतह प्रद्युम्न ने अपनी सारी शक्ती एकत्र की और अपने पिता के लोटने तक द्वारका की रक्षा के लिए अविचल
22:38खडा रहा, चाहे परिस्थितिया कितनी भी विकट क्यों न हो।
22:42ठका हुआ, रक्तरंजित प्रद्युम्न अपने शरीर की अंतिम शक्ती को बटोर कर अपने शत्रु साल्व के मायावी सैनिकों के विरुध
22:52द्वारका की रक्षा में अडिक खडा था, उसकी आखें द्रिड संकल्प से चमक रही थी।
22:58द्वारका नगरी जो कभी सुनहरी चमक से युक्त थी, अब एक जलते हुए खंडहर में बदल चुकी थी, उसके उचे
23:06महल धै रहे थे और नागरिक भय तथा निराशा में अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे।
23:13तभी सुदूर क्षितिच पर घने काले धुए और गर्दिश के बीच एक अलौकिक तेजस्वी प्रकाश पुंच प्रकट हुआ, जो धीरे
23:22धीरे आकार लेता हुआ द्वारका की ओर तेजी से बढ़ता चला आया।
23:28भगवान श्री कृष्ण का दिव्यरत, जिस पर चार तेजश्वी अश्व जुते थे, वायु मंदल को चीरते हुए तीवर गती से
23:35द्वारका की ओर अग्रसर हुआ, उसके पहियों की गडगडाहट दूर से ही सुनाई दे रही थी।
23:42दूर से ही अपनी प्रिय नगरी को जलता और तबाह होता देख, भगवान श्री कृष्ण का शांत मुखमंडल पहले चिन्ता
23:50से घिरा, फिर गहरा दुहक और अंत्र प्रचंड क्रोध से भर उठा।
23:55देवताओं के स्तुती गान के साथ, भगवान श्री कृष्ण का रत सीधे द्वारका के रणभूमी में उत्रा, जहां उनकी दिव्य
24:03उपस्थिती ने तुरंथ ही युद्ध के भयंकर शोर को दबा दिया।
24:07श्री कृष्ण के अचानक आगमन से शेश बचे हुए यादव सैनिक और भयभीत नागरिक जो मृत्यू के करीब थे, उनके
24:16प्राणों में एक नई आशा और अदमय साहस का संचार हुआ।
24:21अपने पिता को देखकर प्रद्युम्न ने अंतह अपनी सारी शक्ती खोदी और युद्ध भूमी में मूर्चित होकर गिर पड़ा। उसके
24:29चहरे पर अब शान्ती का भाव था कि द्वार का सुरक्षित है।
24:34भगवान श्री कृष्ण ने अपने रत से उतर कर चारों और फैली भीशन तबाही और अपने नागरिकों के कष्ट को
24:42अपनी दिव्य आखों से देखा, जिससे उनका हृदय पीडा से भर गया।
24:48अपने प्रियजनों और नगरी की दुर्दशा को देख कर, श्री कृष्ण की आखों में देवत्व का अगनिप्रचंड क्रोध उमड पड़ा,
24:55उन्होंने अपने मन में साल्व का सहार करने का अटल निश्चय किया।
25:01द्रिड संकल्प के साथ, श्री कृष्ण ने अपने विश्वसनिय सार्थी दारुक की ओर मुर कर देखा, उनके स्वर में युध
25:08का आहवान और न्याय की अटल पुकार थी।
25:11श्री कृष्ण ने दारुक को अपने दिव्यरत को तुरंत युध के लिए तयार करने का आदेश दिया, जिससे साल्व के
25:19विरुध महायुध का बिगुल बजाने का संकेट मिल गया।
25:24दारुक ने बिना कोई क्षण गवाय, अत्यंत भक्ती और फुर्ती से दिव्यरत को युध के लिए तयार करना शुरू किया,
25:31उसके हाथों में असाधारन गती आ गई थी।
25:35युध के लिए ततपर भगवान श्री कृष्ण अपने पूर्ण दिव्य स्वरूप में खड़े थे, उनका एक-एक अंपरम शक्ती और
25:43अजे संकल्प की घोशना कर रहा था।
25:47भगवान श्री कृष्ण को युध के लिए तयार देख कर, यादव सेना में निराशा का एक भी कन नहीं बचा,
25:54बलकि उनकी रगों में नया रक्ट संचारित होने लगा और उनमें अपार उत्साह भर गया।
26:00शत्रों पर प्रहार करने के लिए आतुर, यादवों ने एक स्वर में युध गर्जना की, जिससे द्वारका की भूमी कांप
26:08उठी और आकाश में गुंज उठी।
26:11अपने मायावी विमान सौभ में बैठा साल, नीचे द्वारका में श्री कृष्ण के आगमन और यादव सेना में हुए अप्रत्याशित
26:20उत्साह को अपनी तीवर द्रिष्टी से देख रहा था।
26:24श्री कृष्ण को युद्ध के लिए तयार देख कर भी साल्व का अहंकार कम नहीं हुआ, बल्कि वह अपनी मायावी
26:31शक्तियों और विमान की अजेता पर और भी अधिक दंभ करने लगा।
26:36एक बिजली की गती से भगवान श्री कृष्ण अपने भव्यरत पर आरूड हुए, उनके हाथों में उनका दिव्य शंक पांच
26:44जन्य शोभा पा रहा था, जो युद्ध की उद्धोशना के लिए तयार था।
26:50भगवान श्री कृष्ण ने अपने पांच जन्य शंक का नाद किया, जिसकी प्रचंड ध्वनी ने आकाश, पाताल और प्रित्वी तीनों
26:58लोकों को थर्रा दिया, साल्व के हृदय में भय और द्वारका में आशा भर दी।
27:04पांच जन्य के उस गर्जना भरे नाद से साल्व का हृदय भले ही क्षण भर के लिए भय भीत हुआ,
27:10परंतु उसके अहंकार ने तुरंत ही उसे और भी उग्र बना दिया, मानो उसने भगवान श्री कृष्ण की चुनोती को
27:17स्वीकार कर लिया हो।
27:19साल्व ने अपनी मायावी शक्तियों को एकत्र करते हुए, अपने राक्षसी सेनाप्तियों को द्वारका पर भीशन आक्रमन करने का आदेश
27:29दिया, जिसके बाद एक भयंकर गर्जना से आकाश गूझ उठा।
27:34शन भर में बादलों को चीरता हुआ, साल्व का मायावी सौब विमान एक विशाल उर्ते हुए किले के समान आकाश
27:42में प्रकट हुआ, जिसकी भयानक उपस्थिती ने द्वारका के रक्षकों में देशत भर दी।
27:48उस सौब विमान से भीशन अस्त्रों की वर्षा होने लगी, जिन में अगनिबान, विशैले साम्प और बड़े बड़े शिलाखन शामिल
27:57थे, जो द्वारका की भव्य प्राचीरों पर विध्वन्स मचा रहे थे।
28:02भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य रत पर आरूड, शांत और स्थिर चित्त से अपनी दिव्य शक्तियों को जागरित करते हुए, द्वारका
28:10की रक्षा के लिए तत पर हुए।
28:13उन्होंने तुरंट अपने सार्थी दारुख को रत को आगे बढ़ाने का आदेश दिया और अपने धनुष शारंग को खीच कर
28:21साल्व के विमान की ओर अगनिबानों की एक तीवर वर्षा कर दी।
28:26श्रीकृष्ण के बानों से बचने के लिए साल्व ने तुरंट अपनी मायावी शक्ती का प्रयोग किया और सौब विमान को
28:34आकाश में अद्रिश कर दिया, जिससे वहक्षन भर में ही द्रिश्टी से उजल हो गया।
28:40अद्रिश विमान को खोजने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योग माया शक्ती का प्रयोग किया, जिससे उन्हें साल्व के
28:48मायावी चालों को भेदने की दिव्यद्रिश्टी प्राप्थ हुई।
28:52अचानक अद्रिश सौब विमान द्वारका के एक भिन छोर पर जमीन से निकलता हुआ प्रकट हुआ और एक भयंकर भुकंप
29:00के साथ शहर पर फिर से हमला कर दिया।
29:04भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सार्थी दारुक को तुरंत उस दिशा में रथ मोरने का आदेश दिया, जहां से विमान प्रकट
29:12हुआ था, अपनी दिव्यद्रिश्टी से उसके हर चाल को भाम्पते हुए।
29:16साल्व ने अपनी मायावी शक्तियों से एक विशाल काले बादल का निर्मान किया, जिसने पूरे युद्धक्षेत्र को ढख लिया, और
29:25उस घने अंधकार से मायावी राक्षसों की सेना को उत्पन्न किया।
29:31भगवान श्रीकृष्ण ने तुरंत अपने सुदर्शन चक्र का आहवान किया, जिसकी चमक ने उस मायावी अंधकार को चीर दिया, और
29:39मायावी राक्षसों को क्षण भर में भस्म कर दिया।
29:43युद्ध का घमासान और तीवर हो गया, जब साल्व ने अपने विमान को कभी आकाश में तो कभी पृत्वी के
29:50नीचे ले जाकर श्रीकृष्ण पर निरंतर हमले जारी रखे।
29:55साल्व ने एक और माया का प्रयोग किया, जिसमें श्रीकृष्ण के मित्र और परिवार के लोग घायल और मृत अवस्था
30:03में विमान के भीतर दिखाई दिये, जिससे उन्हें विचलित किया जा सके।
30:08भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया शक्ती से तुरंत इस भ्रम को पहचाना और अपने मन को स्थिर करते हुए साल्व
30:16की इस कुटिल चाल को भंग कर दिया।
30:20कृध्ध होकर भगवान श्रीकृष्ण ने सौब विमान पर सीधे प्रहार करने का निश्चय किया और अपने शक्तिशाली बानों से उसके
30:28कवच को भेढने लगे।
30:30साल्व ने प्रत्युप्तर में अपने विमान से एक भीशन वजर्पात किया जिससे आकाश में एक गर्जना हुई और बिजली की
30:39चमक से धर्ती काप उठी।
30:41श्री कृष्ण ने अपने कौमोद की गदा का प्रयोग किया जिससे उस वजर्पात को रास्ते में ही रोक दिया गया
30:49और उसकी उर्जा को विलीन कर दिया गया।
30:52फिर भगवान श्री कृष्ण ने अपने लक्षे को केंडरित करते हुए साल्व के मायावी विमान के मूल उर्जा स्रोत पर
31:00प्रहार करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र को तयार किया।
31:04एक प्रचंड वेग से भगवान श्री कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र को साल्व के मायावी सौध विमान की ओर प्रक्षेपित
31:12किया, जो आकाश को चीरता हुआ अपनी अंतिम नेती की ओर बढ़ा
31:18सुदर्शन चक्र ने आकाश को चीरते हुए, तीवर गती से मायावी सौध विमान की ओर अपनी यात्रा जारी रखी, जिससे
31:26उसके मार्ग में आने वाली हर मायावी बाधा जल कर राख हो गई
31:31साल्व ने अपने सिनहासन से विक्राल गर्जना की, जब उसने देखा कि उसकी माया की परते भगवान के दिव्य अस्त्र
31:39के सामने एक एक करके बिखर रही थी
31:43सौब विमान ने अचानक अपनी स्थिती बदली, एक तीवर जिगजैग पैंतरे बाजी करते हुए, मानो किसी अद्रिश्य हाथ ने उसे
31:52दूर खींच लिया हो
31:54परंतु सुदर्शन चक्र, अपनी दिव्य चेतना से युक्त, सौब विमान की हर चाल को भाम्त लेता था और एक शिकारी
32:02की तरह उसका पीछा करता रहा
32:05द्वारका के तट पर खड़े होकर, भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य द्रिश्टी से युद्ध के हर क्षण को देख रहे थे,
32:12उनकी आखें सौब विमान पर अविचलित केंद्रित थी
32:17चक्र ने अंतह सौब विमान की बाहरी मायावी परत को भेदा, जिससे एक तीवर उर्जा का विस्फोट हुआ और विमान
32:24का एक हिस्सा क्षण भर के लिए ठोस रूप में प्रकट हुआ
32:29अपनी माया के भंग होने से क्रोधित साल्व ने विमान के भीतर से सैक्डो घातक मायावी बानो और उर्जा के
32:37गोले का वर्षा करना शुरू कर दिया
32:40श्री कृष्ण ने अपनी योग माया का प्रयोग किया, जिससे साल्व के सभी घातक प्रक्षेप्य हवा में ही अद्रिश्य होकर
32:47नश्ठ हो गए, मानों वे कभी अस्तित्व में थे ही नहीं
32:52सुदर्शन चक्र ने अब सौब विमान के धातुई कवच पर प्रहार करना शुरू कर दिया, जिससे विमान की सतह पर
32:59तीवर चिंगारिया और गहरे घाव बनते जा रहे थे
33:04विमान के अंदर साल्व अपनी आँखों में भय और हताशा के साथ अपने नियंतरन कक्ष को लड़कडाते हुए महसूस कर
33:12रहा था, जो धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा था
33:16भगवान श्री कृष्ण के होठों पर एक सुक्षम मुस्कान थी, जैसे वे जानते थे कि अंत निश्चित्था और साल्व की
33:24हार अब बस समय की बात थी
33:27चक्र अब सौब विमान के मूल उर्जा स्रोत की ओर गहराई से प्रवेश कर गया, जिससे विमान के आंतरिक तंत्र
33:34में भयंकर विस्पोटों की श्रिंखला शुरू हो गई
33:38धुए और तूटते हुए धातु के बीच साल्व अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था, उसकी आखें जंगली दहशत
33:46से भरी थी और वह किसी भी तरह भागने की असफल कोशिश कर रहा था
33:52द्वारका के नागरिकों और सैनिकों ने समुद्र तट से भय और विस्मय के मिश्रण के साथ आस्मान में हो रहे
33:59इस विनाशकारी युद्ध को देखा
34:02श्री कृष्ण ने अपनी एक आगरता को और गहरा किया, अपनी दिव्य शक्ती से सुदर्शन चक्र को साल्व की ओर
34:09निर्देशित करते हुए अंतिम प्रहार के लिए
34:13अंतिम और निर्नायक क्षण में सुदर्शन चक्र ने एक तीवर स्वर्णिन प्रकाश के साथ साल्व को सीधा लक्ष बनाया जो
34:21उसकी छाती से टकराया
34:24एक गगनभेदी धमाके के साथ सुदर्शन चक्र ने साल्व के शरीर को पूरी तरह से भस्म कर दिया जिससे एक
34:32विशाल उर्जा का गोला पूरे आकाश में फैल गया
34:36सौब विमान अपनी सारी मायावी शक्तिक होकर एक बड़े धमाके के साथ टुक्रे टुक्रे होकर आस्मान से द्वारका के समुदर
34:44में गिरने लगा
34:46साल्व का शरीर दिव्य अगनी में जल कर राख हो गया उसकी दुष्ट आत्मा भी ब्रहमान से विलीन हो गई
34:53जिससे उसकी सभी बुराईया समाप्थ हो गई
34:57आकाश जो कुछ क्षण पहले युद्ध के धुए और माया से घिरा था अब धीरे धीरे साफ होने लगा सूर्य
35:05की किरने पुन्ह द्वारका पर चमकने लगी
35:08सुदर्शन चक्र अपनी महिमा और उर्जा को पुन्ह प्राप्थ करते हुए भगवान श्री कृष्ण के पास वापस लोट आया, मानो
35:17एक आज्याकारी सेवक अपने स्वामी के पास लोटा हो
35:21श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र को अपने दाहिने हाथ की तरजनी पर सहजता से ग्रहन किया, उनकी उपस्थिती एक बार
35:29फिर ब्रहमान्डिय शान्ती और शक्ती का प्रतीक बन गई
35:34द्वारका के लोगों ने जैजैकार की ध्वनी से आकाश को भर दिया, उनके हृदय भगवान श्री कृष्ण के प्रतीकृतग्यता और
35:42प्रेम से उमड़ पड़े
35:44भगवान श्री कृष्ण की आखें गेहन संकल्प से चमक उठीन, मानों उन्होंने आकाश में मंदराते अग्रिश्य सौब विमान के विनाश
35:52का अंतिम निर्नय कर लिया हूँ
35:54उनकी दिव्यवानी एक ब्रह्मांडिय गर्जना के समान सुदर्शन चक्र को आदेश देती है कि वह अपने मायावी शत्रु साल्व का
36:04अंत कर दे और इस विनाशकारी विमान को राख में मिला दे
36:09आदेश को सुनकर सुदर्शन चक्र की चमक कई गुना बढ़ गई उसकी अलोकिक उर्जा ने आसपास की वायू को कमपायमान
36:17कर दिया मानो वह अपने महासनहार के लिए अधीर हो
36:22एक चण के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी तरजनी उंगली से सुदर्शन चक्र को आकाश की ओर मुक्त किया जैसे
36:30कोई ब्रहमान्डिय धनुर्धर अपना बान छोड़ रहा हो
36:34वह चक्र एक जलते हुए स्वर्गिय डिस्क की भानती अविश्वसनिय वेग से आकाश में जूम करता हुआ उपर की ओर
36:42बढ़ा अपने पीछे एक सुनहरी नीली उर्जा की लकीर छोड़ता हुआ
36:47इस बीच सौब विमान के भीतर दुष्ट साल्व अभी भी अपनी मायावी शक्तियों पर घमंड कर रहा था अपने अद्रिश्य
36:56विमान से द्वारका पर हमले जारी रखते हुए
36:59अचानक सुदर्शन चक्र ने साल्व की मायावी ढालों को भेद दिया
37:04सौब विमान की अद्रिश्यता का आवर्ण तूट गया और उसका वास्तविक भयानक रूप आकाश में प्रकट हो गया
37:12सौब विमान के भीतर साल्व और उसकी दानवी सेना यह देखकर भयभीत हो गई कि उनका अभेद्यगड अब देवताओं के
37:20द्रिश्टि गोचर हो चुका था
37:22उनका घमंड पल भर में धूल में मिल गया
37:26सुदर्शन चक्र अपनी अविश्वसनिय शक्ती के साथ विमान के बाहरी कवच को चीरता हुआ उसके अंदरूनी हिस्सों में घुस गया
37:34एक एक करके उसके मुख्य इंजनों को नश्ट करता हुआ
37:39भीशन विस्पोटों की एक श्रिंखला ने सौब विमान को हिला दिया
37:43उसकी समरचना में गहरी दरारें पड़ गई और आग की लप्तें उसके हर कोने से बाहर निकलने लगी
37:51ध्वस्थ होता सौब विमान आकाश से नीचे गिरने लगा
37:55एक जलते हुए उलकापिंड के समान अपने साथ साल्व के अहंकार और शक्ती को भी ढोता हुआ
38:02विमान के विनाशकारी पतन के बीच साल्व स्वया को बचाने के लिए छटपटाया
38:08अपनी तलवार निकालकर श्री कृष्ण पर अंतिम व्यर्थ प्रहार करने की कोशिश करता हुआ
38:14लेकिन सुदर्शन चक्र ने उसे कोई अवसर नहीं दिया
38:18एक पल में साल्व की गरदन पर प्रहार किया
38:21उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया
38:23जिससे उसका अभिमानी जीवन समाप्त हो गया
38:27साल्व का धड़ और कटा हुआ सिर विमान के साथ ही आकाश से नीचे गिरा
38:32उसके अंतिम अवशेश भी अगनी और धुए में विलीन हो गए
38:37और फिर एक अंतिम और प्रचंड विस्पोट के साथ
38:41सौब विमान पूरी तरह से अंगिनत जलते हुए टुक्रों में बिखर गया
38:46जो आकाश में बिखर गये और फिर अद्रिश हो गए
38:50विमान के अवशेश जलते हुए मलबे की तरह गहरे नीले सागर में जागिरे
38:56जहां वे पूरी तरह से बुझ गये और अनंत गहराईयों में समा गये
39:01द्वारका के लोगों ने भय और आतंक से मुक्त होकर इस अविश्वसनी द्रिश को विस्मय और राहत की गहरी सांस
39:09के साथ देखा
39:10उनके हृद्यों में शांती लौट आई थी
39:13अपना कार्य पूर्ण कर सुदर्शन चक्र अपने मिशन की सफलता से संतुष्ट, शांत और स्थिर होकर भगवान श्री कृष्ण की
39:22उंगली पर लौट आया
39:24श्री कृष्ण ने अपने आसपास के अब शांत आकाश का सर्वेक्षण किया
39:29एक दिव्य और शांती पून उपस्थिती के साथ मानो ब्रहमांड में संतुलन पुनह स्थापित हो गया हो
39:37द्वार का शहर मुक्ती और विजय के उल्लास में डूब गया
39:40हर तरफ भगवान श्री कृष्ण के नाम के जैकारे और स्थुतिगान गूंजने लगे
39:47सौब विमान के विनाशकारी अंत को देख कर राक्षसराज साल्व का हरिदय तीवर आक्रोश और गहरी हताशा से भर गया
39:55उसकी आखों में बदला लेने की भयानक ज्वाला धधक रही थी
40:00उसके चारों और सौब विमान के जलते हुए अवशेश बिखरे पड़े थे
40:15साल्व ने अपनी समस्त राक्षसी शक्ती और क्रोध को एकत्रित करते हुए एक विशालकाय लोहजडित गदा अपने हाथों में ली
40:24जो उसकी अंतिम आशा और प्रतिशोध का प्रतीक थी
40:28अंतिम प्रहार करने के द्रिढ निश्चय के साथ साल्व एक कृध आंधी की भांती सीधे भगवान श्री कृष्ण की ओर
40:36जप्ता उसकी गती से वायुमंडल में एक चीकसी सुनाई दी
40:41उसकी आखों में श्री कृष्ण को ध्वस्ट करने का जुनून स्पष्ट था जैसे एक भूखा भेडिया अपने शिकार पर अंतिम
40:49जपट्टा मारता है
40:52साल्व के चहरे पर प्रतिशोध की ज्वाला भयानक रूप से जल रही थी
40:56हर माल स्पेशी में उसकी पराजय का कड़वा स्वाद और बदला लेने की उतकट इच्छा साफ जलक रही थी
41:04शांत स्वभाव के भगवान श्री कृष्ण ने साल्व के इस हताश प्रहार को पहले ही भांप लिया था और अपनी
41:12दिव्य कौमोद की गदा को द्रिड़ता से उठाया
41:15जैसे ही साल्व की लोहे की गदा श्री कृष्ण की स्वर्णिन कौमोद की से टकराई एक भीशन गर्जना के साथ
41:22आकाश में चिंगारिया बिखर गई
41:24मानो दो ब्रहमांडिय शक्तियां आपस में टकराई हो
41:29टकराई से उत्पन भयावह कमपन ने हवा को चीर दिया और चारों और एक शक्तिशाली उर्जा लहर फैल गई
41:37जिससे दूर के बादल भी कामपने लगे
41:40दोनों प्रतिदवंदवी एक दूसरे के समक्ष अडिक खड़े थे
41:44उनकी आखें एक दूसरे की शक्ति और संकल्प को तोल रही थी
41:49एक दूसरे पर हावी होने का तीवर प्रयास कर रहे थे
41:54श्रीकृष्ण की दिव्यशक्ति और साल्व की राक्षसी क्रूरता का यह द्वंदव
41:59हर पल तीवर होता जा रहा था
42:01जो धर्म और अधर्म के बीच अंतिम युद्ध को दर्शा रहा था
42:06अचानक भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी गदा को एक प्रचंड गती से घुमाते हुए
42:11साल्व को पीछे धकेल दिया
42:13उसके शरीर पर लगे आधात से वह कुछ पल के लिए लड़कडा गया
42:17यह जानते हुए कि अब समया गया है
42:21भगवान श्रीकृष्ण ने अपने तीक्षन सुदर्शन चक्र का आहवान किया
42:26जो उनकी उंगली पर एक चमकदार सोने की आभा के साथ प्रकट हुआ
42:32सुदर्शन चक्र एक चमकती हुई स्वर्णिम डिस्क की भानती तीवर गती से आकाश में उचला
42:38उसकी धारदार परिधी से दिव्य उर्जा की लहरें निकल रही थी
42:43साल्व ने अपनी मृत्यू को निकट आते देखा
42:47उसकी आखों में भाय और निराशा का अंतिन भाव स्पष्ट जलक रहा था
42:51क्योंकि चक्र तेजी से उसकी ओर बढ़ रहा था
42:55एक चण में सुदर्शन चक्र ने साल्व के धड़ से उसके सिर को अलग कर दिया
43:01जिससे वह धडाम से नीचे गिर पड़ा और उसका राक्षसी जीवन समाप्थ हो गया
43:07साल्व का विच्छिन शरीर आकाश से नीचे गिरा जैसे एक तूटा हुआ परवत खंड जिससे प्रित्वी पर एक भयानक गूँच
43:15पैदा हुई
43:16जो उसके अंत का संकेत थी
43:20साल्व के वध के साथ ही द्वारका के उपर छाया गहरा अंधकार छंट गया और एक दिव्य सुनहरी शांती धीरे
43:27-धीरे पूरे शहर को घेरने लगी
43:31समुद्र की लहरें भी शांत हो गई
43:33हवा में एक सुखद सुगंध घुल गई और प्रकृती ने भी इस विजय का जश्न मनाया मानो एक लंबी रात
43:40के बाद नई सुभा आई हो
43:43द्वारका के नागरिक जो अब तक भय और अनिश्चित्ता में जी रहे थे विजय के उल्लास में डूब गए उनके
43:50चेहरों पर राहत और आनंद की चमक थी
43:54हर तरफ भगवान श्रीकृष्ण के नाम के जैकारे और स्तुतिगान गूंजने लगे जैसे हजारों कंठों से निकला एक शक्तिशाली भजन
44:03पूरे ब्रहमांड में फैल गया हो
44:06भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्याभा के साथ विजय मुद्रा में खड़े थे उनकी आखों में ब्रहमांडिय शांती और एक सुक्ष्म मुस्कान
44:15थी जिसने द्वारका पर आय संकट का समाधान कर दिया था
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