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द्वारका पर साल्व के भीषण हमले के बाद, श्रीकृष्ण शांति बहाल करते हैं। राजसूय यज्ञ के बाद दुर्योधन की ईर्ष्या चरम पर पहुँच जाती है, और शकुनि के छल से पांडवों को एक घातक द्युत क्रीड़ा के लिए आमंत्रित किया जाता है। युधिष्ठिर धर्मसंकट में फँसकर अपनी पत्नि द्रौपदी को भी दाँव पर लगा देते हैं, जिसके बाद भरी सभा में चीरहरण का वो भयावह दृश्य घटित होता है। कैसे श्रीकृष्ण बचाते हैं अपनी भक्त की लाज? क्या होगा पांडवों का भविष्य? जानें महाभारत के इस सबसे दर्दनाक अध्याय की पूरी कहानी, जो बदल देगा युगों का इतिहास! #महाभारत #द्रौपदी #चीरहरण #द्युतक्रीड़ा #श्रीमद्भागवतपुराण #श्रीकृष्णलीला #युधिष्ठिर #पांडव #कौरव #धर्मयुद्ध #YouTubeMythology #HindiStories
Transcript
00:00साल्व को परास्त कर ब्रहमांडिय विजय के आभा मंडल से दीप्तिमान भगवान श्री कृष्ण अपने परम दिव्य स्वरूप में इंद्रप्रस्थ
00:08की स्वर्ण नगरी में लोटते हैं, जहां उनकी दिव्य आभा से संपूर्ण वातावर्ण जग्मगा उठता है.
00:16उनकी वापसी पर पांडवों और द्रौपदी सहित राजसी परिवार अपने परम मित्र और मार्ग दर्शक का गर्मजोशी से स्वागत करते
00:24हैं, उनके चहरों पर राजसुय यग्य की सफलता का उल्लास और उनकी उपस्थिती का गहरा संतोश जहलकता है.
00:33धर्मराज युधिष्ठिर अपने हाथों को श्रद्धा पूर्वक जोड़कर भगवान श्री कृष्ण के प्रती अपनी असीम कृतग्यता व्यक्त करते हैं, जिनके
00:42बिना राजसुय यग्य की सफलता असंभव थी.
00:47इंद्रप्रस्थ के चकाचौंध भरे हॉल अब भी राजसुय यग्य की भव्यता और विजय के गीत गा रहे थे, जहां हर
00:54कोनी से खुशी और सम्रिध्धी की लहरेन फूट रही थी.
00:58इन उत्सवों के बीच भी एक काला साया मंडरा रहा था, क्योंकि दुर्योधन पांडवों के वैभव और सम्मान को सहन
01:06न कर पाने के कारण, मन में कटुता लिए हस्तिनापूर लोटने की तयारी कर रहा था.
01:13ठीक उसीक्षन धूर्ट शकुनी, जिसकी आखें कुटिलता से चमक रही थी, दुर्योधन को हस्तिनापूर जाने से रोक लेता है, और
01:22उसके मन में इर्शया के विश बीज और गहरे बोदेता है.
01:27दुर्योधन का हृदय इर्शया की अगनी में बुरी तरहे जल रहा था, राजसूर यग्य की प्रत्येक सफल रस्म उसे अपमानित
01:35और अक्षम महसूस करा रही थी, जिससे उसका मन प्रतिशोध की ज्वाला में धधक रहा था.
01:41उसके मस्तिश्क में बार-बार मायावी सभा के वेदरिश कौन्ध रहे थे, जहां उसने स्वयंको भ्रमित और उफास का पात्र
01:50पाया था, प्रत्येक दीवार और खंभा उसे अपमानित करता प्रतीत हो रहा था.
01:56उसे याद आया की कैसे उसने गलती से पानी को फर्ष समझकर कदम रखा और धडाम से गिर पड़ा, और
02:03तभी द्रौपदी का उफास्पून अट्थास उसके कानों में गूंज उठा था, जिसने उसके क्रोध को और भड़का दिया.
02:11उस अपमान की कसक उसके हरिदय में गहरे तक बैठ गई थी, और उसने उसी क्षन पांडवों को उनके वैभव
02:19और सम्मान से वंचित करने का भयानक संकल्प ले लिया था.
02:23इरश्या की भयंकर ज्वाला से प्रेरित होकर, दुर्योधन का संकल्प अब एक हिंसक प्रतिशोध में बदल चुका था, जो पांडवों
02:32के विनाश का मार्ग प्रशस्त करने को आतुर था.
02:35इस विक्राल क्रोध को भामपते हुए, कप्टी शकुनी ने पांसे के खेल का प्रस्ताव रखा, जिससे पांडवों की सारी संपत्ती
02:44और राज्य धोखे से हडपा जा सके.
02:47सुर्य पुत्र कर्ण ने भी इस भयावह योजना का समर्थन किया, अपने अटल विश्वास और दुर्योधन के प्रती अपनी अदमे
02:56निश्ठा के साथ, जिससे दुर्योधन का अहमकार और भी अधिक बढ़ गया.
03:01शड्यंत्र को क्रियानवित करने के लिए दुर्योधन अपने व्रिद्ध और नेत्रहीन पिता, महाराज धृत्राष्ट्र के सम्मुख प्रस्तुत होता है, अपने
03:10मन में छिपी कुटिल योजना के साथ.
03:14धृत्राष्ट्र यद्यपी अपने पुत्र के प्रती अत्यधिक्स नेह रखते थे, फिर भी उनकी आत्मा में पांडवों के साथ होने वाले
03:22संभावित अन्याय की आशंका से थोड़ी हिचकी चाहट उत्पन हुई.
03:27लेकिन दुर्योधन अपने पिता की आखों के अंधेपन का लाब उठाते हुए, भावुक ब्लैक्मेल और राज्यके भविष्य के बारे में
03:35भ्रामक धमकियों के साथ उन्हें अपनी बात मनवाने में सफल रहता है.
03:41पुत्र प्रेम में अंधे धृत्राष्ट्र अपने भीतर की नैतिक दुविधा को दरकिनार करते हुए, अंत्ता दुर्योधन की विनाशकारी योजना के
03:50आगे जुक जाते हैं, एक भयानक नेती की नीम रखते हुए.
03:55धर्मग्य विदुर महल के अंधेरे कोनों में मंदराते विनाश को भापते हुए, महाराज धृत्राष्ट्र को रोकने का प्रयास करते हैं,
04:04इस भयानक पासे के खेल के भयावह परिनामों की चेतावनी देते हुए.
04:09विदुर ने क्रोध और ग्रिड़ता के साथ समझाया कि यह जुआ न केवल पांडवों, बलकि पूरे कुरुवंश के लिए विनाश
04:17और अंगिनत दुरक लाएगा, एक ऐसी आग जो सब कुछ भस्न कर देगी.
04:23परंतु धितराष्ट्र अपने पुत्र के मोह में पूरी तरह जक्रे हुए विदुर की सारी चेतावनियों को अंसुना कर देते हैं,
04:31और पांडवों को जुए के लिए आमंतरित करने का संदेश भेजने का आदेश देते हैं, जिससे भाग्य का पहिया घूमना
04:38शुरू हो �
04:41महाराज धितराष्ट्र का आदेश सिर आखों पर रखकर महाज्यानी विदुर भारी मन से हस्तिनापूर से इंदरप्रस्थ की ओर प्रस्थान करते
04:49हैं,
04:51सुन्दर उपवनों और भव्य प्राचीरों से सुसजित इंदरप्रस्थ की पावन नगरी में प्रवेश करते हुए विदुर का हृदय होने वाले
04:59अनर्थ की कलपना से काम उठता है,
05:03माया सभा के दिव्य प्रांगण में पहुँचकर विदुर पांडवों की उपस्थिती में धर्मराज युधिष्थिर को ध्रितराष्ट्र का द्युत क्रीडा का
05:11निमंतरन पत्र सौंपते हैं,
05:15जेश्ट पांडव युधिष्थिर जुए के इस निमंतरन को सुनकर क्षण भर के लिए स्तब्ध रह जाते हैं, क्योंकि वे इसके
05:22संभावित विनाशकारी परिणामों से भली भांती परिचित थे,
05:27महाबली भीन कुरुराज ध्रितराष्ट्र के इस कपटपूर्ण निमंतरन पर तीवर क्रोध व्यक्त करते हैं, और युधिष्थिर से इस खेल को
05:35स्पष्ट रूप से ठुकराने का आगरह करते हैं,
05:39महारानी द्रौपदी के मन में भी इस अचानक आय निमंतरन से अनिष्ट की आशंका घर कर लेती हैं, और वे
05:46भैभीत होकर विदुर का चेहरा ताकने लगती हैं,
05:51युधिष्थिर अपने क्षत्रिय धर्म और जेश्ट पिताध्रित्राष्ट की आग्या का पालन करना अपना कर्तव्य मानते हुए भारी मन से हस्तिनापूर
06:00जाने का निर्णय लेते हैं,
06:03अपनी समरिद्ध नगरी इंद्रप्रस्थ को पीछे छोड़ते हुए पांडव और द्रौपदी काल चक्र के लिखे को शिरोधार्य कर हस्तिनापूर की
06:11ओर प्रस्थान करते हैं,
06:14स्वर्नज्रित रथों का भव्य काफिला घने जंगलों और नदियों को पार करता हुआ हस्तिनापूर की सीमा में प्रवेश करता है,
06:24हस्तिनापूर के मुख्य द्वार पर प्रजा पांडवों का स्वागत तो करती है, किन्तु वायुमंडल में छाय अनिष्ट के काले बादल
06:31हर किसी को चिन्तित कर देते हैं,
06:34राज सभा में पहुँचकर, युधिष्ठेर और उनके भाईयों ने पितामह भीश्म, गुरु द्रोन और महाराज धृत्राष्ट के चर्नों में प्रणाम
06:43कर उनका आशिर्वाद प्राप्त किया,
06:47दुर्योधन अपने भाईयों के साथ कप्टी मुस्कान लिये पांडवों का स्वागत करता है, जिसके मन में इर्श्या की आग प्रचंड
06:54रूप से जल रही थी,
06:57दुर्योधन पांडवों को नवनिर्मित भव्यद्यूत सभा में ले जाता है, जहां जुए का चौपड पहले से ही बिच्छा हुआ था,
07:05सभा भवन में भीश्म, द्रोन, विदोर और क्रिपाचार्य जैसी महान विभूतिया, विवशता और भारी मन से अपने अपने आसनों पर
07:14विराज मान हो जाती है,
07:17शकुनी अपने वश में रहने वाले मायावी पासों को हाथों में नचाते हुए धूर्टता भरी मुस्कान के साथ चौपड के
07:24सम्मुखा कर बैठ जाता है,
07:28जब युधिष्ठिर दुर्योधन के स्थान पर शकुनी से खेलने पर आपत्ती जताते हैं, तब शकुनी अपनी कुटिल वागपटुता से उनके
07:36स्वाभिमान को चुनौती देता है,
07:40खेल का आरंभ होते ही शकुनी अपने अभिमंत्रित हाथीदात के पासों को बड़े ही कौशल और कपट से चौपड के
07:47वस्तर पर फेंकता है,
07:50पासे ठीक वही अंक दर्शाते हैं, जो शकुनी चाहता था, और इस प्रकार पांडवों की पराजय का पहला विशैला चक्र
07:58शुरू हो जाता है,
08:01पहले ही दाव में अपने बहुमूल्य मनियों और आभूशनों को हार जाने पर युधिष्ठिर व्यत्थित हो जाते हैं, जबकी दुर्योधन
08:09अटहास कर उठता है,
08:12कप्टी शकुनी युधिष्ठिर को और अधिक दाव लगाने के लिए उकसाता है, जिससे द्युत क्रीडा का वह विनाशकारी महाजाल बुन्ना
08:20शुरू हो जाता है,
08:23युधिष्ठिर पासे के मोहपाश में जक्डे, पहले अपने बेशकींती हाथी, फिर रथों के जथे, और अंत में राज्य के स्वर्न
08:31भंडार को दाव पर लगा देते हैं, जिसकी चमक अब उनकी आखों में निराशा का प्रतीक बन चुकी थी,
08:38प्रत्येक बार कप्टी शकुनी की चलभरी मुस्कान के साथ पासे युधिष्ठिर के भाग्य को और गहरा गर्त में धकेलते रहे,
08:47जिससे उनके चहरे पर गहरी निराशा की रेखाये उभर आती थी,
08:52भरी सभा में विदुर की आखें हर क्षण आने वाली अनिष्ट की आशंका से डबडबा रही थी, मानोवे भविष्य के
08:59अंधकार को सपष्ट देख पा रहे हों।
09:03युधिष्ठिर ने तब हस्तिनापूर के अपने समस्त राजकोश और बहुमूल्य रतनों को दाफ पर लगाया, एक ऐसा निर्णय जिसने पूरे
09:11राज्य के भाग्य को एक ही पासे के खेल पर टिका दिया।
09:16और फिर वही हुआ जिसका भय था। पासे ने फिर से शकुनी के पक्ष में अपना फैसला सुनाया, जिससे युधिष्ठिर
09:24ने अपनी प्रजा और राज्य का सारा कोश गवा दिया।
09:28शकुनी ने अपने शड्यंत्र का अगला विशैला दाव खेला और युधिष्ठिर को उनके प्रिय सामराज्य इंदरप्रस्थ को ही दाव पर
09:36लगाने के लिए उकसाया।
09:38मोह में फंसे युधिष्ठिर ने अनिच्छा से पर अपने जुआरी के धर्म से बंधे होकर उस भव्य और समरिद इंदरप्रस्थ
09:47को ही पासे के खेल में दाव पर लगा दिया।
09:50नेती की कुरूर हसी के साथ पासे ने फिर से शकुने के पक्ष में आकर अपना फैसला सुनाया और इस
09:57प्रकार इंदरप्रस्थ भी कौर्वों के हाथों में चला गया।
10:02दुर्योधन का अटहास पूरी सभा में गूंज उठा जैसे वह पांडवों के पतन और अपनी सर्वविजी महत्वाकांख्षा का जश्न मना
10:10रहा हो।
10:12चली शकुने ने एक बार फिर अपनी विशैली जीब चलाई और युधिश्थिर को अपने चार भाईयों को दाव पर लगाने
10:20के लिए उकसाया एक ऐसा दाव जिसने मानवता की सभी सीमाओं को तोर दिया।
10:26गहरे दुख में डूबे युधिश्थिर ने अपने चोटे भाई नकुल को दाव पर लगाया, एक ऐसा कृत्य जिसने सभा में
10:33उपस्थित सभी लोगों को स्तब्ध कर दिया।
10:37पासे ने फिर वही करूरता दोहराई और नकुल को भी दाव में हार दिया, जिससे पांडवों के सम्मान पर एक
10:44और गहरा घाव लगा।
10:47अंधे जुए के खेल में फंसे, युधिश्थिर ने फिर अपने शेश भाईयों, सहदेव, अर्जुन और अंत में पराक्रमी भीम को
10:55भी दाव पर लगा दिया, और एक एक करके उन्हें भी हारते गए।
11:00पांडवों के पराक्रम और मर्यादा के प्रतीक अब ध्यूत क्रीडा के उस कपट भरे चक्रवियों में फंसकर अपने ही भाई
11:07के दाव पर दास बन चुके थे।
11:10शकुनी ने अपने पाश को और कस्ते हुए युधिष्ठिर को स्वयं को ही दाव पर लगाने के लिए फुसलाया, जिससे
11:18उनकी आत्मसम्मान की अंतिम लौभी बुझने की कगार पर थी।
11:22जोए के पाश में फंसे युधिष्ठिर ने एक लंबी और दर्द भरी आभरी और अंतिम पासे के फैंकने पर युधिष्ठिर
11:38भी अपनी स्वतंत्र ताहार गए और पांडवों का गौरव धूल में मिल गया, जिससे कौरवों के खेमे में विज्जोल लास
11:45की लहर दौड
11:47अंधे धृत्राष्ट्र ने जो अब तक अपने पुत्रों के विज्जोल लास में खोए थे, अपनी ही अज्यानता के जाल में
11:54फसकर अपने पुत्रों को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया
11:59अपनी विजय से उनमादित शकुनी ने अपनी विशैली चाल की अंतिन कडी चलते हुए युधिश्थिर से उनकी पत्नी महारानी द्रौपदी
12:08को दाफ पर लगाने का क्रूर प्रस्ताव रखा
12:12यह क्रूर प्रस्ताव सुनकर पूरी सभा में एक सन्नाटा चा गया, मानो समय थम गया हो और सभी की आखें
12:19युधिश्थिर पर टिक गई जो इस अन्होनी चुनोती से जूज रहे थे
12:25युधिश्थिर का हृदय भीशन गलानी और कर्तव्य के द्वंद्व से देहल उठा, जहां एक और क्षत्रिय कुल की मर्यादा थी
12:32और दूसरी और अपनी अरधांगिनी को दाफ पर लगाने का महापा
12:38भीश्म पितामह ने अपनी आखें बंद कर ली, क्योंकि वे हस्तिनापूर के सिहासन के प्रती अपनी अटूट प्रतिज्या के कारण
12:46इस अन्याय को रोकने में पूरी तरह असमर्थ थे
12:50शकुनी ने अपने हाथों में चौपड के उन पांसों को घुमाया, जो अधर्म और कपट की जीती जागती विशैली चिंगारिया
12:58बनकर युधिष्थिर को चुनौती दे रहे थे
13:02दुर्योधन के चहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई और उसकी आखों में युधिष्थिर के पूर्ण विनाश को देखने की
13:09तीवर लालसा चमक उठी
13:12महान कर्ण भी दुर्योधन के समीप मौन खड़े थे, उनका सूर्य के समान तेजस्वी कवट चमक रहा था, लेकिन उनका
13:20मन इस अनुचित खेल के कारण अशांत था
13:23विदुर ने अपने स्थान से उठकर धृत्राष्ट्र से इस भयानक अधर्म को तुरंत रोकने की गुहार लगाई, जिससे कुरुवंश समूल
13:32नश्ठ होने से बच सके
13:35अंधे महाराज धृत्राष्ट्र अपने पुत्र के प्रती मोह में डूबे हुए पूरी तरह मौन रहे, और उनका यह मौन कुरु
13:42सभा की सबसे बड़ी तरास्दी बन गया
13:46महाबली अरजुन ने अपनी मुठी को क्रोध से भीच लिया, उनके नेत्र धधकते कोईले की भाती लाल हो गए, किन्तु
13:53धर्मराज के आदेश के अधीन वे चुप रहे
13:57क्रोध से उबलते हुए भीमसेन की सासे किसी जंजावात की तरह चलने लगी, और उनके हाथ अपनी गदा को थामने
14:05के लिए तडप उठे
14:07नकुल और सहदेव अत्यंत व्याकुल होकर सिर जुकाए खड़े थे, उनका निशकलंक तेज इस भयानक अपमान की आशंका से मध्धम
14:16पड़ चुका था
14:18शकुनी ने कुटिलता पूर्वक हंस्ते हुए कहा कि यदि पांडव पराजय स्विकार कर लें, तो उन्हें इस संकट से मुक्ती
14:26मिल सकती है, जिससे युधिष्ठिर का स्वाभिमान जाग उठा
14:31युधिष्ठिर ने अपने पूर्वजों की कीर्ती और क्षत्रिय धर्म के उस कठोर नियम को याद किया, जो किसी भी निमंतरण
14:39को अस्विकार करने की अनुमती नहीं देता
14:55दुर्योधन ने पुनह ताना मारते हुए कहा कि क्या धर्मराज अपनी प्रियरानी द्रौपदी को दाफ पर लगाने का साहस्क हो
15:02चुके हैं, जिससे सभा में सन्नाटा चा गया
15:06दुहशासन ने अपने भाई की हामेहा मिलाते हुए कुछसित हसी हसी और उसकी आखों में द्रौपदी के प्रती शत्रुता और
15:14वासना का गंदा खेल दिखाई देने लगा
15:18युधिष्ठिर ने कापते हाथों और भारी मन से भाग्य के इस क्रूर चक्र को स्विकार करते हुए अपनी पत्नी द्रौपदी
15:26को दाफ पर लगाने की घोशना कर दी
15:29इस महापाप पूर्ण घोशना को सुनकर पूरी सभा में एक हाहाकार मच गया और सभी धर्म प्रायन राजाओं के मुख
15:37से भय और आश्चर्य की चीख निकल पड़ी
15:41शकुनी ने विजी उनमाद में अट्थास करते हुए उन पांसों को हवा में फैंका मानों वे पांसे नहीं बलकि कुरूवंश
15:49की बरबादी के वजर थे
15:51पांसे घूमते हुए खेल के पटल पर गिरे और शकुनी के जादूई पांसों ने वही अंक दिखाए जो पांडवों के
15:58सर्वनाश के लिए आवश्चक थे
16:02दुर्योधन ने गरस्ते हुए अपनी जीत का जश्ण मनाया और दुहशासन को आदेश दिया कि वह दासी बन चुकी द्रौपदी
16:10को सभा में खीच कर लाए
16:13दुहशासन अत्यंत क्रूरता और अहमकार से भरकर महाराज युधिष्ठिर ग्वारादाव पर हारी गई द्रौपदी को घसीट लाने के लिए राजसभासे
16:22रनिवास की ओर तेजी से बढ़ा
16:25अपने रनिवास में केवल एक ही वस्त्रधारन किये हुए महाराणी द्रौपदी शांत बैठी थी जो इस बात से पूरी तरह
16:33अन्भिज्य थी कि उनके पतियों ने उन्हें जुद क्रीडा में दाफ पर लगा कर खो दिया है
16:40दौहशासन ने मर्यादा की सभी सीमाओं को लांध कर द्रौपदी के निजी कक्ष के द्वार को हिंसक रूप से धक्का
16:47देकर खोला और अपनी कुटिल मुस्कान के साथ उनके सामने खड़ा हो गया
16:53द्रौपदी ने क्रोध और भय से कापते हुए इस दुस्साहस का कारण पूछा जिस पर दौहशासन ने अट्टहास करते हुए
17:01घोशनाकी की धर्मराज युधिष्ठिर उन्हें जुए में हार चुके हैं और अब वे कुरुवंश की डासी है
17:09अत्यंत भयभीत और अपमानित महसूस करते हुए द्रौपदी दुष्ट दौहशासन से बचने के लिए जेश्ट रानियों के कक्ष की ओर
17:17तेजी से भागी लेकिन उनका पीछा कर रहे दौहशासन के चहरे पर केवल कुरूरता थी
17:24सभी मानविय समवेदनाओं को ताक पर रख कर दौहशासन ने द्रौपदी के लंबे, सुन्दर और घने काले केशों को अत्यंत
17:32कुरूरता से अपने हाथों में जकड लिया और उन्हें पीछे की ओर खीचा
17:38हस्तिनापुर के भव्य गलियारों में घसीटे जाते हुए द्रौपदी के अश्रु भूमी को भिगो रहे थे और वे व्याकुल होकर
17:45न्याय तथा अपने शूरवीर पतियों की सहायता के लिए पुकार रही थी
17:51दुएशासन ने द्रौपदी को खीचते हुए हस्तिनापुर की खचाखच भरी कुरु सभा में प्रवेश कराया जहां उनकी बिखरी हुई जुल्फें
18:00और अस्तव्यस्त वस्त्र देखकर सभी उपस्थित लोग स्तब्ध रह गए
18:05सभा के मध्य में अत्यंत क्रोध और पीडा से रोती हुई द्रौपदी ने अपने उन पाचों महाबली पतियों की ओर
18:12देखा जो धर्म के जूठे बंधनों में बंध कर सिर जुकाए मूख दर्शक बने बैठे थे
18:19द्रौपदी ने सभा में उपस्थित भीश्म, द्रोआचार्य और कृपाचार्य जैसे धर्म गुरुओं और गुरुजनों को ललकारते हुए पूछा की क्या
18:28इस पवित्र सभा में धर्म और मर्यादा का पूरी तरह से अंत हो चुका है
18:34पितामा भीश्म जो सिनहासन के प्रती अपनी प्रतिग्या और अपनी अंतरात्मा के बीच पंसे हुए थे, अत्यंत गलानी से अपना
18:43सिर जुका कर मौन रह गए और उनके पास द्रौपदी के इस ज्वलंत प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था
18:50दुर्योधन ने अटहास करते हुए द्रौपदी का अत्यंत अपमान किया और अपनी जांग थप्थ पाते हुए उन्हें अपनी गोद में
18:58आकर बैठने का निरलज्य संकेत किया
19:02दुर्योधन की इस नीचता को देखकर महाबली भीम की आखें क्रोध से लाल हो गई
19:07उनका विशाल शरीर थर्थराने लगा और उन्होंने मौन रूप से युद्ध भूमी में दुर्योधन की उसी जांग को गदा से
19:15तोड़ने की भीशन प्रतिज्या की
19:18महाराज युद्धिष्ठिर गलानी और आक्म घ्रिना की अगनी में जलते हुए पाशान मूर्ती की तरह शांत बैठे रहे मानोवे जुए
19:27की इस भयानत लत के विनाशकारी परिनाम को स्विकार कर रहे हूँ
19:32अपनी विजय के घमंड में चूर दुर्योधन ने दुहशासन को आदेश दिया कि वह पांडवों के राजसी वस्त्र उतार दे
19:40और फिर द्रौपदी की साड़ी को खीच कर उन्हें पूरी तरह निर्वस्त्र कर दे
19:45जब अपमानित पांडवों ने अपने उपरी राजसी वस्त्र उतार कर फेंक दिये तब दुष्ट दुहशासन अत्यंत हिंसक रूप से आगे
19:54बढ़ा और उसने द्रौपदी की साड़ी के पल्लू को पूरी शक्ती से खीचना शुरू कर दिया
20:00जब द्रौपदी ने देखा कि कोई भी उनकी रक्षा के लिए आगे नहीं आ रहा है तो उन्होंने अपने पल्लू
20:07से हाथ हटा लिए और दोनों हाथ हवा में उठा कर परम पुरुष भगवान श्री कृष्ण का अनन्य भाव से
20:13स्मरण किया
20:15सुदूर द्वार का नगरी में विराजमान भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अनन्य सक्खी की इस व्याकुल पुकार को सुना और
20:23उनका दिव्यहृदय करुणा तथा क्रोज से भर उठा जिससे उन्होंने तुरंट अपनी योगमाया शक्ती को वहा भेजा
20:31जैसे ही दुहषासन ने द्रौपदी के वस्त्र को खीचा वैसे ही एक चमतकारिक और अनन्त रूप से बढ़ती हुई दिव्यरेश्मी
20:39वस्त्रों की धारा प्रकट हुई जिसने द्रौपदी को एक अभेद्य सुरक्षा चक्र में लपेट लिया
20:47दुहषासन वस्त्रों के उस विशाल पर्वत को लगातार खीचते खीचते पूरी तरह ठक कर भूमी पर गिर पड़ा जबकी द्रौपदी
20:54भगवान की अनन्त क्रिपा से सुरक्षित और अजय खड़ी रही
20:59समस्थ सभा में एक भयावह सन्नाटा चा गया जहां गुरुजन, श्रिष्ट, योध्धा और धर्मात्मा विदुर भी इस अभूतपूर्व अपमान के
21:08साक्षी होकर जड़वत खड़े थे उनकी आत्माय पश्चाताप की अगनी में जल रही थी
21:15तभी धर्मनिष्ट विदुर का हरिदय करुना और क्रोध से विदियन हो उठा और उन्होंने कुरुवंश के विनाश की आशंका से
21:23कापते हुए इस अधर्म के विरुद्ध अपनी वानी बुलंद की
21:28उनकी चीक उन सभी धर्मात्माव के मौन को चीरती हुई गुमजी जो इस अनर्थ को होते देख रहे थे परन्तु
21:35कोई भी दुर्योधन और उसके सहायकों का सामना करने का साहस नहीं कर पा रहा था
21:42दुर्योधन अपनी जीत पर गर्वित एक क्रूर मुस्कान के साथ सभा में घूमता रहा जबकी करन की आखों में द्रौपदी
21:50के प्रती असीम तिरसकार और धेना जहलक रही थी
21:54तभी अपनी प्रिया के इस भीशन अपमान से विचलित भीमसेन की आखों में रक्त उतर आया और उन्होंने अपनी विशाल
22:02भुजाओं को सिकोर्ते हुए एक गर्जना की जिसने पूरी सभा को कमपकमपा दिया
22:09भीमने अपने कृध में प्रतिग्या की कि वह एक दिन दुहशासन की छाती चीर कर उसके रक्त का पान करेंगे
22:16जिसने इस अधर्म को जन्म दिया
22:19भीन की इस भयंकर प्रतिग्या से पूरी सभा में एक गहरी शान्ती चा गई क्योंकि हर कोई उसके भीशन परिणामों
22:27को जानता था
22:29इसी बीच भयानक अप्शकुन प्रकट होने लगे, प्रित्वी कमपकम पाने लगी, आकाश में गर्जनाय गूंजने लगी और द्वारका में बैठे
22:38श्रीकृष्ण के दिव्यनेत्रों में क्रोध की ज्वाला धधक उठी
22:43अंदरूनी कक्षों से गांधारी की व्याकुल आवाज गूंज उठी, जो इस अनर्थ को सुन रही थी, और अपने पुत्रों के
22:51भविश्य पर मंदराते अंधकार से भैभीत थी
22:55ध्रित्राष्ट्र गांधारी की चेतावनी और इन अप्षकुनों से भैभीत होकर कापते हुए स्वर में दुहशासन को इस नीच कार्य से
23:04रुकने का आदेश देते हैं
23:07राजा ध्रित्राष्ट्र अपने सिनहासन पर हिलते हुए द्रौपदी की ओर मुड़कर इस भैयानक अपराध का प्रायश्चित करने के लिए उसे
23:15वर्दान मांगने को कहते हैं
23:19अपनी गरिमा को बनाए रखते हुए द्रौपदी ने द्रिड़ता से अपनी और अपने पतियों की स्वतंत्रता की मांग की एक
23:27रानी के रूप में अपने अधिकारों का दावा करती हुई
23:31धित्राष्टर ने अपने वन्ष पर आय संकट को टालने के लिए द्रौपदी को उसकी इच्छा के अनुसार वर्दान देने का
23:39प्रस्ताव रखा
23:41अपनी पहली वर्दान में द्रौपदी ने धर्मराज युधिश्थिर को दास्ता से मुक्त करने की मांग की ताकि धर्म की मर्यादा
23:49बनी रहे
23:50और फिर अपने दूसरे वर्दान में उसने शेश सभी पांडवों भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव को उनकी स्वतंत्रता और उनके
23:59दिवे शस्त्रों के साथ मुक्त करने की मांग की
24:04धृत्राष्ट्र ने भय और गलानी से द्रौपदी की सभी मांगे स्विकार कर ली, जिससे पांडव दास्ता के बंधनों से मुक्त
24:11होकर अपने शस्त्रों के साथ पुनह खड़े हो गए
24:15अपने सम्मान और स्वतंत्रता को पुनह प्राप्त कर पांडवों ने मौन रहकर सभा से बाहर निकलने की तैयारी की उनकी
24:23आखों में प्रतिशोध की एक दबी हुई ज्वाला धधक रही थी
24:28परंतु दुर्योधन और कर्ण अपनी हार से कुपित होकर धृत्राष्ट को फिर से एक और द्युत क्रीडा के लिए पांडवों
24:36को वापस बुलाने के लिए उकसाने लगे
24:40धृत्राष्ट्रक पुत्रमोह और अपने पुत्रों के भविश्य के भई से वशीभूत होकर पांडवों को पुनह सभा में वापस बुलाने का
24:48आदेश देते हैं
24:50पांडव अपने भाग्य से विवश होकर एक बार फिर उस कपटपूर्ण सभा में लोट आते हैं जहां एक और घातक
24:58जुद क्रीडा उनकी प्रतीक्षा कर रही थी
25:01जीत के अहंकार में अंधा दुर्योधन पांडवों की दुर्धशा पर अट्थास करते हुए धर्मराज युधिश्थिर के सम्मुख एक और कुटिल
25:10प्रस्ताव रखता है
25:12कप्ती शकुनी अपने पासों को उंदलियों में घुमाते हुए युधिश्थिर को याद दिलाता है कि उनके पास अभी भी उनकी
25:20परम्प्रिय पत्नी द्रौपदी के रूप में एक अनमोल रत्न शेश है
25:26दुर्योधन युधिश्थिर के स्वाभिमान को ललकारते हुए कहता है कि यदि वे द्रौपदी को दाफ पर लगा कर जीत जाएं
25:33तो उनका खोया हुआ सम्पूर्ण राज्य और भ्राता वापस मिल सकते हैं
25:39इस अधर्मपूर्ण प्रस्ताव को सुनते ही महात्मा विदुर क्रोध से काम्प उठते हैं और वे राजा धृत्राष्ट्र को इस कुरुवंश
25:47धाती पाप को तुरंत रोकने की कठोर चेतावनी देते हैं
25:52विदुर उच्चस्वर में सभा को सचेत करते हैं कि एक पतिवर्ता और पूजनिय कुलवधु को दाफ पर लगाना समस्तकुरु सामराज्य
26:01के सर्वनाश का कारण बनेगा
26:04पितामः भीश्म अतिशय पीडा से अपना मस्तक जुका लेते हैं और अपनी प्रतिग्याओं एवन राजधर्म के धर्म संकट में बंधे
26:12होने के कारण विवश होकर मौन रहते हैं
26:16गुरु द्रोनाचार्य और क्रिपाचार्य लज्जा और गलानी से अपनी आखे मूद लेते हैं क्योंकि वे अधर्म के इस भयानक तांडव
26:25को रोकने में असमर्थ सिद्ध हो रहे थे
26:28अपने जेश्ट घ्राता और भाभी के इस घोर अपमान से वीर भीम सेन का हृदय क्रोध की ज्वाला से जलने
26:35लगता है और उनकी आखें अंगारे की भाती लाल हो जाती हैं
26:41महाबली अर्जुन अपनी उग्र क्रोधागनी को दबाते हुए धर्मराज के प्रती अपनी अपार श्रद्धा के कारण अपने बानों को प्रत्यंचा
26:50पर चड़ाने से स्वयन को रोकते हैं
26:54ध्राता नकुल और सहदेव अत्यंत दुख और गलानी से भर जाते हैं तथा इस विनाशकारी घड़ी में अपने भाईयों के
27:01विवश चेहरों को चुपचाप देखते रह जाते हैं
27:06दुर्भाग्य और ग्युत क्रीडा के सम्मोहन से घिरे धर्मराज युधिष्थिर का विवेक पूरी तरह नश्ट हो जाता है और वे
27:13एक अतिविनाशकारी निर्नैले बैठते हैं
27:17अत्यंत भारी और कापते स्वर में युधिष्थिर यग्यसेनी द्रौपदी को अंतिन दाव के रूप में स्विकार करते हैं और कुरु
27:26सभा को स्तब्ध कर देते हैं
27:29युदिश्थिर के मुख से द्रौपदी का दाव सुनते ही सम्पून कौरव सभा में एक हाहाकार मच जाता है और सभी
27:36सभासद स्तब्ध रह जाते हैं
27:39कप्ती शकुनी चहरे पर कुटिल मुस्कान लिये अपने छद्म पासों को हवा में उच्छालता है और उन्हें मखमली विसात पर
27:48फेंक देता है
27:50पासे घूमते हुए वही मायावी अंक दर्शाते हैं जिनकी शकुनी को प्रतीक्षा थी और इस प्रकार छलका वह अंतिम दाव
27:58भी युधिश्ठिर हार जाते हैं
28:02शकुनी प्रचेंड गर्जना करते हुए बड़े ही कुटिलता पूर्वक घोशना करता है कि उसने द्रौपदी को भी जीत लिया है
28:11दुर्योधन विजय के मद में अंधा होकर ठहा के मारता है और उसकी कुरूरता कुरु सभा के प्रांगण में काल
28:18बनकर मंदराने लगती है
28:21दुर्योधन के समीप खड़ा दानवीर कर्ण भी परिस्थितियों के प्रवाह में बहकर इस अधर्म पूर्ण विजय पर अपनी मौन और
28:29कूटु सहमती जताता है
28:31इस घोर अधर्म के घटित होते ही राज महल के बाहर भयंकर अमंगलकारी सियार रोने लगते हैं और आकाश में
28:39बिन बादलों के बिजलिया कड़कने लगती हैं
28:43अपनी जीत से उनमत्थ होकर दुर्योधन अपने सेवक प्रतिकामी को आदेश देता है कि वह अंतहपूर जाकर द्रौपदी को बलपूर्वक
28:52इस अधर्मी सभा में खीच लाएं
28:56दुर्योधन की आध्या पाकर सेवक प्रतिकामी द्रौपदी के कक्ष में पहुँचा और उसने अत्यंत जिजगते हुए द्यूद सभा में चलने
29:04का दुष्ट आदेश सुनाया
29:07अपमान से प्रजवलित द्रौपदी ने तीखे स्वर में प्रतिकामी से प्रश्न किया कि धर्मराज युधिष्ठिर ने स्वयं को पहले हारा
29:15था या मुझे दाफ पर लगाया था
29:18प्रतिकामी ने द्यूद सभा में लोटकर द्रॉपदी का यह धर्म सम्मत प्रशन दुर्योधन और सभाप्ती भीश्म के सामने रखा, जिससे
29:26पूरी सभा स्थब्ध रह गई
29:29द्रॉपदी के प्रशन से बॉख लाए दुर्योधन ने अपने क्रूर भाई दुहशासन को आदेश दिया कि वह स्वया अंतहपूर जाकर
29:37द्रॉपदी को घसीटते हुए सभा में लाए
29:41मदांध दुहशासन ने अंतहपूर में प्रवेश कर रजस्वला अवस्था में एक वस्त्र पहने द्रॉपदी के सुन्दर लंबे केशों को बलपूर्वक
29:49अपने हाथों में जकड लिया
29:52अत्यन्त निर्दैता से केश पकड़ कर घसीटते हुए दुहशासन रोती और गिड़गिडाती हुई द्रॉपदी को हस्तिनापूर की भव्य राजसभा के
30:01मध्य ले आया
30:03राजसभा में खड़ी होकर द्रॉपदी ने भीश्म, द्रोन और कुरुवंश के जेश्ठों की ओर कातर द्रिष्टी से देखते हुए धर्म
30:11और न्याय की पुकार लगाई
30:14द्रॉपदी के धर्म संकट से भरे प्रशनों का उत्तर देने में असमर्थ होकर पितामह भीश्म और गुरु द्रोनाचार्य लज्जा से
30:22अपने सिर जुका कर मौन बैठ गए
30:25दुर्योधन के छोटे भाई विकर्ण ने उठकर इस अन्याय का विरोध किया परंतु कुटिल कर्ण ने उसे बीच में ही
30:32डाटकर चुप रहने पर विवश कर दिया
30:36अधर्म के आवेग में आकर कर्ण ने दुहशासन को उकसाया कि वह पांडवों और द्रौपदी के वस्त्र छीन कर उनका
30:43पूर्ण अपमान करे
30:45दास्य भाव स्वीकार करते हुए पाचों पांडवों ने अपने दिव्य उपरी वस्त्र उतार कर सभा के बीच फेंक दिये और
30:53मौन क्रोध में तिलमिला उठे
30:56आंकार में अंधे दुर्योधन ने द्रौपदी को नीचा दिखाने के लिए अपनी नगनबाई जांग पर हाथ थप्थपा कर उसे अपनी
31:04जांग पर बैठने का अशलील संकेत किया
31:08दुर्योधन की इस घेनित चेश्टा को देख कर महाबली भीमसेन प्रचंड गर्जना करते हुए रणभूमी में दुर्योधन की जांग तोड़ने
31:16की भीशन प्रतिग्याली
31:19दुहशासन ने पूर्ण सभा के सामने द्रौपदी के वस्त्र के छोर को पकड़ कर उसे निर्वस्त्र करने के लिए बलपूर्वक
31:26खींचना प्रारंभ कर दिया
31:29जब मानव शक्ती निश्फल हो गई तब द्रौपदी ने अपने वस्त्र का मोह त्याग कर दोनों हाथ हवा में उठा
31:36कर परमिश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए आर्थ पुकार की
31:41सुदूर द्वारका में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अनन्य भक्त द्रौपदी की करुण पुकार सुनी और ततकाल अपनी योगमाया शक्ती
31:50को उसकी रक्षा हेतु घेज दिया
31:53सभा में एक अध्भुत चमतकार हुआ जहां द्रौपदी के शरीर से अनन्त, दिव्य और रंगबिरंगी साडियों की धारा स्वतह उत्पन
32:01होकर बहने लगी
32:04दुएशासन वस्त्र खीचते खीचते पूरी तरह ठककर पसीने से लथपत होकर गिर पड़ा, परंतु वस्त्रों का वह विशाल परवत कभी
32:12समाप्थ ही नहीं हुआ
32:15इश्वरिय चमतकार देखकर पूरी सभा द्रौपदी के पतितरात्य और श्रीकृष्ण की महिमा के जैकारों से गूझ उठी, जबकी कौर्वों के
32:24चहरे पसीने से फक पड़ गए
32:26भयंकर अप्शकुनों और विनाश की आशंका से भयभीत होकर राजा धृतराष्ट्र ने मध्यस्थता की तथा द्रौपदी को सम्मान पूर्वक वर्दान
32:35देकर पांडवों को दास्ता से मुक्ट कर दिया
32:39राजा धृत्राष्ट्र ने कमपकमपाते स्वर में द्रॉपदी को अपने सिनहासन के समीप बुलाकर उसके साथ हुए अन्याय पर गहरा दुख
32:47प्रकट किया
32:48अपने दुष्ट पुत्रों की धृष्टता के लिए क्षमा मांगते हुए धृत्राष्ट्र ने द्रॉपदी से अपनी इच्छा अनुसार प्रथम वर्दान मांगने
32:57का आग्रह किया
33:00द्रॉपदी ने बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के प्रथम वर्दान के रूप में धर्मराज युधिष्थिर की दास्ता से ततकाल मुक्ती मांगी
33:09ध्रित्राष्ट्र ने सहर्ष प्रथम वर्दान प्रदान करते हुए युधिश्थिर को स्वतंत्र कर उनके समस्त दास्य बंधनों को छिन्न भिन्न कर
33:17दिया
33:17इसके पश्चात राजा ध्रित्राष्ट्र ने द्रौपदी की धर्मनिष्था से प्रभावित होकर उससे दूसरा वर्दान मांगने की अनुमती दी
33:28ध्रौपदी ने द्वितियवर्दान के रूप मेभीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की उनके अस्त्रशस्त्रों सहित पूर्ण स्वतन्तरता मांगी
33:38ध्रित्राश्ट्र ने द्वितिय वर्दान स्विकार करते हुए चारों पांडवों को दास्ता से मुक्त कर उनके अस्त्रशस्त्र पुनह लोटाने की घोशना
33:46की
33:47अंधे राजा ने द्रौपदी के त्याग से अभिभूत होकर उसे तीसरा वर्दान मांगने तथा पांडवों के लिए अपार धनसंपत्ती लेने
33:56को कहा
33:58द्रॉपदी ने स्वाभिमान पूर्वक तीसरा वर्दान लेने से यह कहकर इनकार कर दिया कि क्षत्रिय नारिया दो से अधिक वर्दानों
34:06की पात्र नहीं होती
34:09द्रौपदी के इस उत्तर से लजजित होकर धृत्राष्ट्र ने स्वय ही पांडवों का छीना गया संपूर्ण राज्य, धन और सम्मान
34:17सहर्ष लोटा दिया
34:19धर्मराज युधिष्ठिर ने अक्तियंत नमर्ता के साथ अपने खोए हुए राज्य और अधिकारों को पुनह स्विकार करते हुए धृत्राष्ट्र को
34:28प्रणाम किया
34:30सभा में बैठे कर्ण ने व्यंग्य करते हुए कहा कि पांडव विपत्ती के महास्मुद्र में डूब रहे थे और द्रौपदी
34:37नौका बनकर उन्हें उबार लाई
34:40कर्ण के तंज को सुनकर भीम का क्रोध भड़क उठा परन्तु युधिष्थिर ने शांत भाव से उनका हाथ पकड़ कर
34:47उन्हें रोक लिया
34:49ग्रौपदी ने अपने बिखरे केशों को संभाला और अपमान की अगनी को हृदय में दबाकर पांडवों के साथ प्रस्थान की
34:57तयारी की
34:59प्रस्थान से पूर्व युधिष्थिर ने कुरुवंश के पितामह भीश्म और गुरु द्रोनाचार्य के समीप जाकर उनके चरण स्पर्ष किये
35:08पितामह भीश्म ने पांडवों को विजय का आशिरवाद दिया किन्तु उनके नेत्रों में कुरुवंश के भावी विनाश की चिन्ता के
35:16आसू तैर रहे थे
35:18महात्मा विदुर ने पांडवों और द्रौपदी को धर्म के मार्ग पर स्थिर रहने की प्रेणा देते हुए आदर पूर्वक विदाई
35:25दी
35:27दुर्योधन और शकुनी अपने जीते हुए खेल को यू निश्फल होते देखकर इर्षया और क्रोध से तिल मिला रहे थे
35:35पांडव अपनी पत्नी दुरौपदी के साथ हस्तिनापूर के राजप्रासाद से निकल कर इंदरप्रस्त की ओर जाने वाले रथों पर सवार
35:43हुए
35:45जैसे ही पांडवों के रत हस्तिनापुर की सीमाओं से बाहर निकले, आकाश में काली घटाए घिर आई जो भावी महायुध
35:53का संकेट दे रही थी
35:56हस्तिनापुर के प्रासाद के गुप्त कक्ष में दुर्योधन इर्शया की कुरूर अगनी में जल रहा था और उसने शकुनी तथाकर्ण
36:04के साथ मिलकर पांडवों के सर्वनाश की नई साजश रची
36:08कुटिल शकुनी ने दुर्योधन को पासा फैंकने के एक अंतिम खेल की सलाह दी जिसमें हारने वाले पक्ष के लिए
36:16तेरह वर्षों का कठिन वनवास भुगतने की भयावः शर्थ तै की गई
36:21दुर्योधन ने अपने अंधी ममता से ग्रस्थ पिता धृत्राष्ट्र के पास पहुँचकर पांडवों से मिलने वाली संभावित भावी प्रतिशोध का
36:30भय दिखाया और उन्हें एक और खेल आयोजित करने के लिए विवश कर दिया
36:35पितामा भीश्म और विदुर के कड़े विरोध को दरकिनार करते हुए मोहांध धृत्राष्ट्र ने युधिष्थिर को पुना हस्तिनापुर बुलाने के
36:44लिए ततकाल एक शाही राजदूत रवाना कर दिया
36:48इंद्रप्रस्थ की ओर लोटते पांडवों के मार्ग को रोपकर राजदूत ने धृत्राष्ट्र का अंतिम पत्रसौपा जिसे सुनकर संपून पांडव दल
36:57स्तब्ध रह गया
36:59द्रौपदी और भीम के भारी विरोध के बावजूद धर्मराज युधिश्थिरने क्षत्रिय मर्यादा और पिता समान धृत्राष्ट्र की आग्या का पालन
37:08करते हुए वापस हस्तिनापुर लोटने का निर्णय लिया
37:13हस्तिनापुर की विशाल राजसभा में पांडवों के पुना प्रवेश करते ही संपूर्ण वातावर्ण में एक भयावह और तनाफपूर्ण निरवता छा
37:21गई
37:23शकुनी ने पासे फैंकने से पूर्व क्रीडा की कठोर शर्थ घोशित्की की पराजित होने वाले दल को बारह वर्ष वन
37:30में और एक वर्ष गुप्त वेश में अग्यात्वास में बिताना होगा
37:35यह जानते हुए भी कि शकुनी का खेल छल से भरा है धर्मनिष्ट युधिष्ठिर ने अपने सत्यवरत का पालन करते
37:43हुए पासे के खेल की चुनौती स्विकार कर ली
37:46कुटल शकुनी ने अपनी मायावी और कपटपूर्ण कला से नियंतरित हाथी दाब के पासे फैंके और पांडवों को अंतिम बाजी
37:55में पराजत कर दिया
37:57पासे रुकते ही शकुनी ने अट्टाहास करते हुए अपनी विजय का उद्गोश किया और पांडवों का भविश्य तेरह वर्षों के
38:05अंधकार में वनवास में धकेल दिया
38:08दुर्योधन और दुहशासन भरी सभा में पांडवों की पराजय पर कुरूर्ता से हंसने लगे जिससे समस्त सभाभवन में अपमान और
38:17वेदना की तरंगे दोड़ गई
38:20अपनी हार को स्वीकार करते हुए धर्मराज युधिश्थिर ने शांत भाव से अपना राजसी मुकुट और बहुमुल्य आभूशन उतार कर
38:28सभा के पटल पर रख दिये
38:31भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने भी अपने राजसी वस्त्र और कवच त्याग कर कठोर सन्यासियों के समान वलकल वस्त्र
38:39और मृक्छाला धारन कर ली
38:42साधवी द्रौपदी ने भी अपने सुन्दर राजसी परिधानों का त्याग कर साधारन तापसी का रूप धारन कर लिया और अपने
38:50खुले केशों के साथ स्वाभिमान से खड़ी रही
38:54क्रोध से उफंते महाबली भीम ने गरश्ते हुए भरी सभा में दुर्योधन की जंधा तोरने और दुहशासन की छाती का
39:02रक्त पीने की भीशन प्रतिग्याली
39:05धनुर्धर अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष की प्रत्यन चाखीची और वनवास की अवधी पूर्ण होने पर समस्ट अधर्मी कौर्वों के
39:14अंत की प्रतिग्या की
39:16ज्यानी विदुर्णे धृत्राष्ट्र को कड़े शब्दों में सचेत किया कि पांडवों के साथ हुआ यह जगन्य अन्याय हस्तिनापूर और कुरुवंश
39:25का नामों निशान मिटा देगा
39:28सब कुछ गमवाकर भी धर्म पर अडिग पांडव द्रौपदी के साथ नंगे पैर हस्तिनापूर के विशाल सिनहदवार से निकल कर
39:36घने और बीहड वनों की ओर बढ़ चले
39:40हस्तिनापूर के नागरिक अश्रुपूरित नेतरों से अपने प्रिय पांडवों को वन की ओर जाते देख रहे थे जो अनिवार्य महायुध
39:47कुरुक्षेत्र की नीम रख रहा था
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