द्वारका में खुशियाँ लौट ही रही थीं कि एक ब्राह्मण के पुत्रों के बार-बार मृत्युलोक चले जाने से फिर मातम छा जाता है। अर्जुन, अपने पराक्रम पर अभिमान कर, ब्राह्मण के नवजात पुत्र को बचाने का संकल्प लेते हैं, पर असफल रहते हैं। इस असफलता से निराश अर्जुन जब आत्मदाह के लिए तैयार होते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें रोकते हैं। श्रीकृष्ण, अर्जुन के साथ एक अविश्वसनीय यात्रा पर निकल पड़ते हैं, जहाँ वे मृत्युलोक से भी परे जाकर ब्राह्मण के पुत्रों को वापस लाते हैं। यह एपिसोड श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप, उनकी परम शक्ति और अर्जुन के अहंकार के भंग होने की अद्भुत कहानी है। जीवन, मृत्यु और ईश्वरीय लीला के गहन रहस्यों को जानने के लिए देखें! #BhagavataPurana #KrishnaLeela #Arjuna #Dwaraka #HinduMythology #SpiritualJourney
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00:00देवकी के पुत्रों की वापसी के बाद द्वार का नगरी में एक अभूत पूर्व शांती और उच्सव का माहौल था,
00:07जहां हर घर में आनंद और संतुष्टी की मंदमन सुगंध फैल रही थी.
00:12किन्तु इस शांत वातावर्ण से दूर नगर के एक कोने में एक व्रिध ब्राहमन का छोटा सा मिट्टी का घर
00:20था, जहां खुशियों की कोई किरण कभी टिकती ही नहीं थी.
00:24एक आशा भरी सुभा, उस ब्राहमन के घर में एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसकी किलकारियों ने पहली बार उस
00:32घर में क्षनिक सुख की एक लेहर दोडाई.
00:35किन्तु नवजात शिशु के जन्म के कुछ ही पलों में, एक अज्यात शक्ती ने उस ननही जान को छीन लिया,
00:42और घर में खुशी की जगह गेहन मातम पसर गया.
00:47ब्राहमन और उसकी पत्नी इस असहनिय पीडा से तूट गए, उनके हृदय में अपने पहले पुत्र को खोने का गहरा
00:54आघात एक अनन्त दुख बन गया.
00:57समय बीटता गया और एक बार फिर आशा की किरण जगी जब दूसरे पुत्र का जन्म हुआ, पर नेती ने
01:04कुरूरता से उसे भी तुरंट छीन लिया.
01:08हर गर्भावस्था के साथ उनके मन में एक अजीब साडर और आशंका घर कर जाती थी, हर नया जीवन एक
01:16अनिश्चित भविश्य की तलवार पर जूलता प्रतीत होता था.
01:20एक के बाद एक साथ पुत्रों को जन्म के तुरंट बाद खो देने का सिलसिला जारी रहा, जिससे उनका जीवन
01:28दुखों की एक अन्थीम श्रिंखला बन गया.
01:31फिर आया आठवें पुत्र का जन्म एक अन्तिम उम्मीद जो पल भर के लिए चमकी और फिर निर्ममता से बुझ
01:38गई, जैसे किसी सूखे दिये कीलौ.
01:42आठ पुत्रों के बार-बार खोने से ब्राहमन का धैरिय और आस्था पूरी तरह से बिखर गई, और उसके हृदय
01:49में एक तूफानी क्रोध उमड पड़ा.
01:52उसने निश्चे किया कि अब वह अपनी पीडा को राजद्वार पर लेकर जाएगा और द्वारका के शास्कों से अपने बच्चों
02:00की असमय मृत्यू का हिसाब मांगेगा.
02:03उसके कदम द्वारका के भव्य राजद्वार की ओर बढ़ चले, हर कदम उसके हृदय की अनन्त वेधना और बढ़ते क्रोध
02:11की कहानी कह रहा था.
02:13अन्त वह द्वारका के विशाल और भव्य राजद्वार पर पहुँचा, जहां सैनिक अपनी मुस्तैदी से खड़े थे और जनजीवन की
02:22चहल पहल जारी थी.
02:24अपनी व्यथा से तूटकर उसने राजद्वार पर खड़े होकर एक हृदय विदारक विलाप करना शुरू कर दिया, जिसकी गूंच पूरे
02:32वातावर्ण में ठैल गई.
02:35उसने उची आवाज में द्वारका के शास्कों पर धर्म की रक्षा न कर पाने और अपनी प्रजा को इस प्रकार
02:42के राक्षसी संकट से बचाने में विफर रहने का आरोप लगाया.
02:47ब्राहमन के इन तीखे आरोपों और उसकी दर्धनाक कहानी को सुनकर वहाँ उपस्थित सभी नागरिक स्तब्ध रह गए, उनके चहरों
02:56पर भय और चिंता के भाव उभराए.
02:59राजद्वार के प्रहरी भी इस ब्राहमन की वेदना से विचलित हो उठे और उसे रोकने के बजाए वे असमंजस में
03:07एक दूसरे को देखने लगे.
03:09शीध्र ही एक फूर्तीला संदेशवाहक दौरते हुए, ब्राहमन के आरोपों की खबर राजमहल तक पहुचाने के लिए अंदर चला गया.
03:19इस घटना ने पूरी द्वार का नगरी में एक चिंता की लहर फैला दी, हर तरफ ब्राहमन के दूहक और
03:26शासकों पर लगे आरोपों की फुसफुसाहटें गूंजने लगी.
03:30राजमहल के एक शांत कक्ष में, भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप में अपनी आखों में गहरी एकागरता लिये हुए, इस
03:39अनहोनी घटना से अनभिज्य नहीं थे.
03:42राजमहल के एकांट कक्ष में भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य चेतना से उस दुहखद ब्राहमन की पुकार और द्वारका
03:51के वातावर्ण में घुल रही चिन्ता को सपष्ट रूप से अनुभव किया
03:55उसी क्षण द्वारका के मुख्य चौक पर ब्राहमन ने अपने आठ मृत पुत्रों के लिए हृदय विदारक विलाप जारी रखा
04:03जिससे भीड में सहानुभूती और दहशत की लहर दौड गई
04:08पास ही अपने दैनिक अनुष्ठानों के बाद तहलते हुए महान धनुर्धर अर्जुन के कानों में उस ब्राहमन के करुण क्रंदन
04:16की गूंश पड़ी जिसने उनके हृदय को विचलित कर दिया
04:21अर्जुन ने अपने कदम भीड की ओर बढ़ाए उनके मन में उस असहनिय पीडा को जानने की तीवर इच्छा थी
04:28जिसने पूरे नगर को स्तब्ध कर दिया था
04:32वहाँ पहुँचकर उन्होंने एक वृद्ध ब्राहमन को देखा जिसका चहरा पीडा से विक्रित था और वह चिल्ला चिल्ला कर देवताओं
04:40और राजाओं को अपने आठ मृत पुत्रों की मृत्यू के लिए दोशी ठहरा रहा था
04:46ब्राहमन की आवाज में इतनी पीडा थी कि उसने अर्जुन के हरिदय को विचलित कर दिया और उसे अपने गांडीव
04:54के बल पर पूरा विश्वास था जिससे उसके अंदर न्याय करने की प्रबल इच्छा जागरित हुई
05:01अर्जुन ने एक गहरी सास ली और भीड के बीच से आगे बढ़े उनकी भव्य उपस्थिती ने ततकाल सभी की
05:08फुस्फुसाटों को शांत कर दिया और सबकी नजरे उन पर टिक गई
05:13उन्होंने ब्राह्मन से शांत और ग्रिड स्वर में पूछा कि उसके बच्चों के साथ यह भयानक त्रास्दी किस प्रकार घटित
05:21हुई और क्या कोई रहस्यमई शक्ती इसके पीछे थी
05:26कमपकमपाती आवाज में ब्राह्मन ने बताया कि कैसे उसके आठोन पुत्र जन्म लेते ही रहस्यमई ढंग से अद्रिश्य हो गए
05:34थे जैसे कि उन्हें कोई अंदेखी शक्ती छीन लेती हो
05:39अर्जुन की आखों में क्रोध और द्रिढ संकल्प की ज्वाला भड़क उठी उन्होंने इस अलौकिक चुनोती और अन्याई शक्ती को
05:47परास्त करने का द्रिढ निश्चय कर लिया
05:50सार्वजनिक रूप से गांडीव धारी अर्जुन ने एक भीशन प्रतिग्याली की वह ब्राहमन के नौवे पुत्र की हर हाल में
05:58रक्षा करेंगे और यदि वे अस्फर रहे तो स्वयंको अगनी को समर्पित कर देंगे
06:04अर्जुन की इस साहसिक और द्रिढ प्रतिग्या से पूरी द्वार का नगरी में सन्नाट आचा गया हर व्यक्ति उनके अदमे
06:12साहस और द्रिढ संकल्प से अचम्भित था
06:15अर्जुन ने अपने गांडीव और दिव्य अस्त्रों की शक्ती पर अपने अटूट विश्वास को दोहराया यह दर्शाते हुए कि कोई
06:23भी बाधा उनके संकल्प को तोड़ नहीं सकती
06:27ब्राह्मन जो पहले निराशा के सागर में डूबा था अब अर्जुन के अटूट साहस और संकल्प को देख कर अपने
06:35हृदय में आशा की एक शीन किरन महसूस करने लगा
06:39अर्जुन ने ब्राह्मन को निर्देश दिया कि वह उन्हें तुरंट सूचित करे जब उसकी पत्नी नवे पुत्र को जन्म देने
06:47वाली हो ताकि वे अपनी प्रतिज्या पूरी कर सके
06:51इसके बाद अर्जुन ने अपने कक्ष में लोटकर अपनी दिव्य अस्त्रशस्त्रों का निरीक्षन किया और मानसिक रूप से आने वाली
06:59चुनोती के लिए स्वयन को तैयार करने में जुट गए
07:04द्वार का नगरी में अर्जुन की इस अविश्वस्निय प्रतिज्या की खबर एक जंगल की आग की तरह फैल गई जिससे
07:11हर ओर भय और उच्सुकता का मिश्रण छा गया
07:15राजमहल में बैठे भगवान श्रीकृषन अपने दिव्य स्वरूप में इस नाटक के अगले चरण को अपनी अलौकिक ग्रिष्टी से देखते
07:23हुए मंदमंद मुस्कुराएं क्योंकि वे जानते थे कि यह सब एक व्रिहत दिव्य योजना का ही हिस्सा था
07:31अर्जुन द्वारका के एक उचे बुश पर खड़े होकर शितिच की ओर देख रहे थे उनकी आकरती डूपते सूरज के
07:39सुनहरे आलोक में एक शक्तिशाली चाया के रूप में उभी जो अपने महान परीक्षन के लिए तयार थे
07:47सूर्य अस्थ हुआ और रात की चादर ने द्वारका को ढख लिया लेकिन अर्जुन के हृदय में न्याय की ज्वाला
07:54और अपनी प्रतिग्या को पूरा करने का संकल्प निरंतर प्रजवलित रहा
07:59द्वारका के राजमहल में गेहन रात्री का सन्नाटा चाया था जब ब्राहमन की पत्नी के प्रसव की पीडा भरी चीखें
08:07गूंज उठीन जो एक नई चुनोती का संकेत थी
08:11अर्जुन अपनी प्रतिग्या के वजरसंकल्प से उतप्रोत ब्राहमन के शयनकक्ष के बाहर अचल खड़े थे उनका ध्यान आने वाले शिशु
08:20और उसकी सुरक्षा पर पूरी तरह केंद्रित था
08:24कुछ ही क्षणों में एक ननहें शिशु का रुदन कक्ष में गूंज उठा जो एक नए जीवन के आगमन और
08:31अर्जुन के लिए एक और महान परीच्षा का संकेत था
08:35शन भर भी गवाएं बिना अर्जुन ने अपनी दिव्यास्त्र शक्ती से हजारों बानों का एक अभेद्य सुरक्षा कवच नवजात शिशु
08:44के चारों और निर्मित कर दिया जो चमक्ती हुई उर्जा से उतप्रोथ था
08:49उन्होंने अपनी सभी सिध्धियों और गुरुओं द्वारा दिये गए सभी अमोग दिव्यास्त्रों का आवाहन किया ताकि इस नाजुक जीवन को
08:58किसी भी अद्रिश्य खत्रे से बचाया जा सके
09:02कवच के भीतर शिशु के आसपास एक स्वर्गिये चमक फैल गई जो अर्जुन के संकल्प और दिव्यास्त्रों की शक्ती का
09:09प्रतीक थी जिससे कक्ष में डिव्य उर्जा भर गई
09:13किन्तु जैसे ही समय बीटता गया एक सुक्षम अद्रिश्य कमपन वातावर्ण में फैलने लगा जो किसी अज्यात और रहस्यमय शक्ती
09:22की उपस्थिती का संकेट दे रहा था
09:26अर्जुन के बानों का अभेद्य घेरा जो अभी तक अचल था उस अद्रिश्य बल के कारण हलकासा कापने लगा जिससे
09:34उनके माथे पर चिन्ता की लकीरें उभराई
09:38वह अद्रिश्य शक्ती एक तीवर भवर की तरह घूंती हुई अर्जुन के दिव्य सुरक्षा कवच को भेदने का प्रयास करने
09:45लगी जिससे पूरा कक्ष पूर्जा के टकराव से काप उठा
09:50अर्जुन ने अपनी पूरी एक आगरता और अपनी सभी सिद्ध शक्तियों को एकत्र कर अद्रिश्य शक्ती के विरुद्ध संधर्श किया
09:58उनकी आखें जोतिर्मय होकर चमक रही थी
10:03अचानक शिशु की स्वर्गिय आभामन्द पढ़ने लगी और वह धीरे धीरे अर्जुन की आखों के सामने ही अद्रिश्य होने लगा
10:11जैसे कोई स्वपन धुंधला होकर ओजल हो रहा हो
10:15और फिर एक पल में शिशु पूरी तरह से लुप्थ हो गया केवल अर्जुन द्वारा निर्मित बानों का सुरक्षा कवच
10:22खाली रह गया जिसने अद्रिश्य को रोक नहीं पाया
10:27अर्जुन की आखें विस्मय से चौड़ी हो गई उनकी द्रिड़ता क्षन भर के लिए बिखर गई क्योंकि उनके महान पराक्रम
10:35का प्रत्यक्ष परिनाम शुनि था
10:38अद्रिश्य शक्ती द्वारा शिशु के अफरण के बाद अर्जुन का बानों का सुरक्षा कवच धीरे धीरे विलीन हो गया जिससे
10:45उस स्थान पर केवल खालीपन रह गया
10:49ब्राहमन ने अपने नौवे पुत्र को भी खो देने के दुख में एक मरमसपर्शी चीख मारी उसका हृदय वेदना और
10:56निराशा से फट गया
10:59ब्राहमन की पतनी अपने पती के बगल में बैठ कर अपने सभी नौव बच्चों के खोने के दर्द में फूट
11:05-फूट कर रोने लगी उसका दोहक शब्दों से परे था
11:09अर्जुन अपनी असाधारन शक्तियों के बावजूद पराजित स्तब्ध खड़े थे उनकी महान प्रतिष्ठा धूल में मिलती प्रतीत हो रही थी
11:20दूर राजमहल के जरोखे से भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्यस्वरूप में इस दुखद घटना को शांत और गंभीर मुख मुद्रा से
11:28देख रहे थे
11:29उनकी आखों में एक गहरा रहस्य छिपा था
11:33अपने वचन को पूरा करने में असफर रहने पर अरजुन का गर्व तूट गया और वे ब्राहमन के सामने घुटनों
11:40के बल बैठ गए शर्म और आत्मगलानी से भरे हुए
11:45उन्होंने अपने आखें उपर आकाश की ओर उठाई जहां तारे टिम्टिमा रहे थे और मौन रहते हुए अपने पराकरम की
11:53व्यर्थता तथा इस अद्रिश शक्ती के रहस्य पर विचार करने लगे
11:59अर्जुन ने अपने पराक्रम की व्यर्थता को स्विकार करते हुए आत्मदाह के कठोर निश्चय पर मुहर लगा दी ताकि वे
12:07अपनी विफल प्रतिग्या का प्रायश्चित कर सकें
12:10उन्होंने अपने आवाज में द्रिड़ता भरते हुए द्वारका के नागरिकों के समक्ष अपनी आत्मदाह की प्रतिग्या की घोशना की जिससे
12:19वहाँ एक गहन सन्नाटा चा गया
12:22अर्जुन के इस चौकाने वाले निर्णै से द्वारका के निवासी भाय और चिंता से भर गये उनके चेहरों पर दुहक
12:30और निराशा की गहरी लकीरें उभराएं
12:33अपने संकल्प को पूरा करने के लिए अर्जुन ने स्वय ही एक विशाल चिता का निर्मान करना आरंभ कर दिया
12:41हर एक लकडी के टुकडे को पूरी गंभीरता से स्थापित करते हुए
12:46उन्होंने अपने हाथों से पवित्र चंदन की लकडी और सुगंधित घी को एकत्र किया
12:52जो आत्मदाह के अनुष्ठान के लिए आवश्चक सामगरी थी
12:55हर वस्तु को श्रधा पूर्वक रखते हुए
12:59अपने शरीर और मन को शुद्ध करते हुए
13:02उन्होंने पवित्र मंत्रों का जाप किया
13:05और आत्मदाह से पूर्व के प्रारंभिक अनुष्ठानों को एकागरता से संपन किया
13:11जैसे जैसे अर्जुन अपने अंतिन क्षणों के निकट आते गए
13:15आकाश में काले बादल चाने लगे और द्वारका पर एक दुखद और ओमिनस ग्लूम चा गया
13:22द्वारका के नागरिक जिन में बालक और व्रिध भी शामिल थे
13:26अपने प्रिय अर्जुन को रोकने के लिए उनके चर्णों में गिर पड़े
13:30और उनसे अपना निश्चय त्यागने की फरवेंट प्रार्थना करने लगे
13:35इतनी करुन प्रार्थनाओं के बावजूद अर्जुन अपनी प्रतिग्या पर अडिग रहे
13:40उनकी आखों में एक अटल संकल्प और गहन पीडा का मिश्रन स्पष्ट दिखाई दे रहा था
13:47दूर से ब्राहमन पिता जिनकी आखों में असहायता और गहरा दुहक था
13:53अर्जुन के इस आत्महाती अनुष्ठान को विवश्टा से देख रहे थे
13:57मानो भाग्य का खेल देख रहे हूँ
14:01अपने दिव्य महल में स्थित भगवान श्री कृष्ण अपनी योगमाया से
14:05अर्जुन के हृदय की गहन पीडा और उनके अटल निश्चय को सपष्ट रूप से अनुभव कर रहे थे
14:12अपने प्रिय सखा और भक्त अर्जुन को बचाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने ततकाल उस स्थान पर जाने का
14:20द्रिढ निश्चय किया
14:21जहां यह त्रास्दी घटित होने वाली थी
14:25जैसे ही अर्जुन ने अगनी प्रजवलित की भगवान श्री कृष्ण अपने दिव्यरत पर सवार होकर चमकते हुए द्वारका की सड़कों
14:33से तेजी से उस दिशा में बढ़े जहां चिता जल रही थी
14:38अपने अंतिम क्षणों में अर्जुन ने गहरे दुहक और द्रिड संकल्प के साथ प्रजवलित चिता की ओर अपना पहला कदम
14:46बढ़ाया जिससे उपस्थित जनसमुदाय की चीखें वातावर्ण में गूंच उठी
14:52तभी एक दिव्यत गंभीर और प्रेमपून आवाज ने अर्जुन को पुकारा जिसने समय को क्षण भर के लिए रोक दिया
14:59और उनकी आत्मदाह की तैयारी को बाधित कर दिया
15:04उस परिचित किन्तु अप्रत्याशित दिव्य पुकार को सुनकर अर्जुन का पैर चिता में जाने से क्षण भर पहले ही रुप
15:11गया और उन्होंने चकित होकर उस दिशा में देखा जहां से वह आवाज आई थी
15:18भगवान श्री कृष्ण के आगमन से उस थल पर एक अलौकिक शांती और दिव्य उर्जा का संचार हुआ जिससे दुहक
15:26और डिस्पेयर का वातावर्ण भी मोमेंटरिली शांत हो गया
15:30शांत और गंभीर मुख मुद्रा से भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को संबोधित किया उनके शब्दों में अटूट कमपैशन और
15:38गहन ज्यान भरा हुआ था जो अर्जुन के व्यथित हृदय को छू गया
15:44भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को उनके वास्तविक स्वरूप, उनके धर्मा और इस ब्रहमांड में उनके डिवाइन उद्देश की याद
15:52दिलाई, जो उन्हें इस क्षणिक निराशा से उपर उठने के लिए प्रेरित कर रहा था
15:58अंत में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को इस ब्रहमन पुत्रों के रहस्य और उनकी वापसी का एक रहस्य में
16:05समाधान प्रस्तुत किया, जिससे अर्जुन की आखों में आशा की एक नई किरण जगमगा उठी
16:13भगवान श्री कृष्ण ने अपनी मधुर मुस्कान के साथ अर्जुन की ओर देखा और उन्हें इस अद्भुत ब्रहमांडिय रहस्य को
16:21सुलजाने के लिए अपने साथ आने का निमंतरन दिया
16:25अर्जुन ने बिना किसी हिचकी चाहट के अपने हिदय में उमर्ती श्रद्धा और रोमाच के साथ भगवान श्री कृष्ण के
16:33निमंतरन को सहर्ष स्विकार कर लिया, उनकी हर आज्या का पालन करने को तैयार
16:39उसी क्षण्क भगवान श्री कृष्ण ने अपनी इश्वरिय शक्ती से एक भव्य स्वन जडित रथ का आहवान किया, जो आकाश
16:47से उतर कर उनके सामने चमचमाती आभा के साथ प्रकट हुआ
16:52दोनों दिव्य पुरुष उस अलौकिक रथ पर आरूड हुए और पलक जपकते ही वह रथ धर्ती को छोड़कर तेजी से
17:00उपर की ओर बादलों को चीरता हुआ, ब्रहमांड के अज्यात क्षेत्रों की ओर अग्रसर हुआ
17:05वे सौर मंडलों, नक्षत्रों और अज्यात आकाश गंगाओं के बीच से गुजरे जहां ब्रहमांड की असीमित सुन्दर्ता और रहस्य उनकी
17:15आखों के सामने अनावरित हो रहे थे
17:19अंतहक वे एक ऐसे रहस्य मेई सीमा तक पहुँचे, जहां भौतिक ब्रहमांड की सभी शक्तिया समाप्थ होती प्रतीत हो रही
17:27थी और एक अज्यात दिव्य उर्जा का सामराज्य प्रारंभ हो रहा था
17:33भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि यह वह स्थान है जहां माया का परदा समाप्थ हो जाता है और
17:40शुद्ध चेतना का अनादी स्वरूप प्रकट होता है जो सभी ब्रहमांडों का मूल स्रोत है
17:48श्रीकृष्ण के एक इशारे पर रत उस चम्चमाती सीमा को भेद कर एक ऐसे आयाम में प्रवेश कर गया जहां
17:55न सूर्य था न चंद्रमा बस एक शाश्वत आत्मप्रकाशित जोती जग्मगा रही थी
18:02यह एक अकलपनिय गहन और रहस्य में शूनि था जहां हर कण में अनंत ब्रहमांडों की शक्ती समाहित थी और
18:10अर्जुन ने अपनी चेतना को विस्तृत होते हुए महसूस किया
18:15श्री कृष्ण ने अर्जुन की ओर संकेत करते हुए बताया कि यही वह परग्रम का शाश्वत धाम है जहां सभी
18:22स्रिष्टी का उद्गम और विलय होता है और जहां सभी जीवात्माय अन्तह लोटती है
18:29इस असीन प्रकाश के भीतर अर्जुन ने एक विराट अनन्त रूप देखा भगवान महा विश्णु जो शेशनाग पर अनन्तकाल से
18:38शयन कर रहे थे अपनी योग निद्रा में ली
18:42भगवान श्रीक्रिष्ण स्वय महा विश्णु के ही एक अन्श होते हुए भी परम आदर के साथ उस विराट स्वरूप के
18:49समीत पहुँचे मानो अपने मूल स्रोत का अभिवादन कर रहे हूँ
18:55अनन्तशाई महा विश्णु ने अपनी योग निद्रा से जागरत होकर एक गहरी ब्रहमांडिय ध्वनी में अर्जुन को आश्वस्त किया कि
19:03ब्राहमन के पुत्र उनके ही पास सुरक्षित हैं
19:07महा विश्णु ने समझाया कि उन्होंने ब्राह्मन के पुत्रों को अपनी लीला के एक भाग के रूप में यहां रखा
19:14था ताकि श्री कृष्ण और अर्जुन दोनों इस परमधाम के दर्शन कर सकें
19:20इस विराट ब्रहमांडिय रहस्योधाटन से अर्जुन की आखें चौनधिया गई उनका हृदय श्रद्धा से भर उठा और उन्हें अपने अस्तित्व
19:29की लगुता वर इस दिव्य लीला की महत्ता का बोध हुआ
19:33महा विष्णु ने अपने दिव्य स्पर्ष से एक चमतकारी प्रकाश पुंज उत्पन किया जिसके भीतर से ब्राहमन के सभी छै
19:41पुत्र अचूते और शांत अवस्था में प्रकट हुए
19:45वे बालक अपनी दिव्य यात्रा से अचूते नींद से जागरित हुए जैसे प्रतीत हो रहे थे उनके मुख पर एक
19:53अलौकिक शांती और ज्ञान की जहलक थी
19:57भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने श्रधापूर्वक उन बालकों को ग्रहेन किया उनके मुख पर विजी मुस्कान और हृदय में संतोश
20:05का भाव था कि उनका कर्तव्य पूर्ण हुआ
20:09बालकों को साथ लेकर श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने भव्यरत पर पुन्ह आरूड हुए और उसी दिव्यपत पर चलते हुए वापस
20:18मर्त्य लोग की ओर लोटने लगे
20:21अंतहक दिव्यरत धीमे से द्वार का नगरी के ब्राहमन के आश्रम के समक्ष उत्रा जहां सभी की आखें आशा और
20:29अविश्वास से खुली रह गई जब उन्होंने बालकों को सकुषल देखा
20:34ब्राहमन अपने सभी पुत्रों को जीवित और नीरोग देखकर हर शाश्रु बहाते हुए भगवान श्री कृष्ण के चर्णों में गिर
20:42पड़ा
20:43अर्जुन ने भी अत्यन्त संकोच और अपार भक्ती से भरे मन से श्री कृष्ण की ओर देखा क्योंकि उनका सारा
20:51अहंकार समाप्थ हो चुका था
20:54द्वारकावासी इस अलौकिक चमतकार को देखकर जैजैकार करने लगे और संपूर्ण वातावर्ण हरिनाम के संकीरतन से गूझ उठा
21:04अपनी प्रतिग्या पूर्ण होने और भगवान की असीम कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव कर अर्जुन का हृदय पूर्णत द्रवित हो गया
21:13भगवान श्रीकृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ अर्जुन को अपने निकट बुलाया और उन्हें सांत्वना देते हुए दिव्यवचन कहे
21:22अर्जुन ने हाथ जोड़कर कापते स्वर में कहा कि हे गोविंद आपके बिना इस स्रिष्टी में किसी भी जीव का
21:29कोई सामर्थ्य नहीं है
21:33तदोपरांथ श्री कृष्ण ने अर्जुन के अज्ञान को दूर करने के लिए क्षण भर के लिए अपने अलौकिक प्रकाशमान रूप
21:40की जहलत दिखाई
21:42अर्जुन के सामने अनंत सूर्य मंदलो का तेज उमड पड़ा जिसमें संपून ब्रहमान ग्रह और समस्थ देवगन समाय हुए दिखाई
21:50दिए
21:51उस परम अलौकिक विराट स्वरूप को देख कर अर्जुन अतिविस्मित होकर भूमी पर गंडवत प्रनाम करने लगे
21:58उस दिव्य स्वरूप से फूट्ती स्वर्नेम और नीली किर्णों ने संपून द्वारकापुरी को एक असीम ब्रहमांडिय प्रकाश से नहला दिया
22:09आकाश में उपस्थित ब्रहमाजी और समस्थ देवताओं ने इस अध्भुत लीला को देख कर श्री कृष्ण पर दिव्य पुष्पों की
22:17वर्षा की
22:18अर्जुन को विहवल देख कर लीलाधर श्री कृष्ण ने पुनह अपनी मनमोहक और शांत द्विभुज रूप धारण कर लिया
22:27अर्जुन ने नत्मस्तक होकर कहा कि है वासुदेव आपकी माया अपार है और केवल आपकी शरण में ही शांती नहित
22:35है
22:36द्वारका के उस पावन आश्रम में ब्राह्मन परिवार अपने बालकों को पुनह पाकर आनंद उत्सव मनाने लगा
22:45ततपश्चात श्री कृष्ण और अर्जुन अपने चम्चमाते हुए स्वर्णिन रत पर सवार होकर राजप्रासाद की ओर लोटने लगे
22:53मार्ग में द्वारका की प्रजाने अपने स्वामी श्री कृष्ण और वीर अर्जुन पर सुगंधित पुष्पों की व्रिष्टी की
23:02राजप्रासाद के मुख्य द्वार पर महारानी रुक्मिनी और महाराज उग्रसेन ने उनका भव्य स्वागत किया
23:10महाराज उग्रसेन ने प्रभू की इस अध्भुत लीला का श्रवण कर गदगद कंट से जगन्नात श्री कृष्ण की स्थुती की
23:18अर्जुन ने राजसभा में स्वीकार किया कि श्री कृष्ण ही समस्त लोकों के एक मात्र स्वामी रक्षक और परमिश्वर है
23:27इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण की यह दिव्य लीला सिद्ध करती है कि जो अनन्य भाव से प्रभू की शरण
23:34में आता है उसकी रक्षा स्वय भगवान करते हैं
23:40तत्पष्चात श्री कृष्ण और अर्जुन एक दिव्य रत पर आरूढ होकर समस्त ब्रह्मांड को पार करते हुए उस अज्यात लोक
23:47की ओर अग्रसर हुए जहां से कोई आज तक वापस नहीं आया था
23:53अचानक रत एक अथा भयावः अंधकार में समा गया जहां न कोई प्रकाश था न कोई दिशा केवल गेहन निस्तब्धता
24:01का सामराज्य था जो स्वयंकाल से भी परे था
24:06यह अंधकार इतना घना था कि अर्जुन को लगा जैसे उनका अपना अस्तित्व ही इस शूनी में विलीन हो रहा
24:13हो पर श्री कृष्ण के तेजस्वी आभामंडल ने उन्हें संभाले रखा
24:18सहसा उस अनन्थ शूने के गर्भ से एक अध्भुत प्रकाश पुंच फूट पड़ा जिसने क्षन भर में उस भयावह अंधकार
24:26को चीर कर एक सुनहरे मार्ग का अनावरण किया
24:30जैसे ही रत उस प्रकाश मार्ग पर आगे बढ़ा अर्जुन ने अपने नेत्रों के सामने एक अलौकिक धाम देखा जहां
24:38रंग और ध्वनी के अनन्थ प्रवाह एक साथ विलीन हो रहे थे
24:43वहां उन्होंने परम पुरुष भगवान विश्नु के विराट स्वरूप का प्रथम दर्शन किया जो ब्रहमाण की समस्त स्रिष्टी को अपने
24:51भीतर समाय हुए एक अनन्त नीलाव प्रकाश पुन्ज के रूप में प्रकट हुए
24:57यह विराट स्वरूप इतना विशाल और तेजस्वी था कि अर्जुन की आखें चौन्धिया गई और उन्हें लगा जैसे उनके भीतर
25:05का सारा अहंकार एक पल में चूर-चूर हो गया हो
25:09विराट स्वरूप के भीतर अर्जुन ने समस्थ लोकों को घूमते हुए देखा ग्रह, तारे, आकाश गंगाये और अंगिनत जीव सब
25:18उसी असीम उर्जा के एक अंश के रूप में प्रकट हो रहे थे
25:23उन्होंने स्रिजन और सहार के चक्र को एक साथ देखा, जहां एक पल में जीवन उभरता और दूसरे पल में
25:30अनंत्शूने में विलीन हो जाता था, सब कुछ उस परम सत्ता के खेल का हिस्सा था
25:37अर्जुन ने अपने आपको इतना तुछ महसूस किया, जितना कभी नहीं किया था, और उन्होंने परम श्रद्धा से अपने दोनों
25:45हाथ जोड़कर उस विराठ स्वरूप को प्रणाम किया
25:49तभी विराठ स्वरूप से एक गंभीर ब्रहमांडिय ध्वनी गूंज उठी, जिसने कहा, हे अर्जुन, तुम धन्य हो जिसने इस परम
25:58सक्य का दर्शन किया
26:00दिव्यवाणी ने आगे कहा, तुम्हारे और कृष्ण के आगमन का उद्देश्य उन ब्रहमन पुत्रों को पुनह प्राप्त करना है, जिन्हें
26:09मैंने अपनी महामाया से यहां सुरक्षित रखा है
26:13यह सुनकर अर्जुन के हृदय में आशा की एक नई किरण जगी, यह जानकर कि उनके मित्र श्रीकृष्ण की लीला
26:21कितनी गहरी और सर्वव्यापी है
26:24और फिर विराट स्वरूग के भीतर से छै तेजस्वी बालक प्रकट हुए, जो दिव्य प्रकाश से दीप्तिमान थे और शांत
26:32भाव से खड़े थे
26:35श्रीकृष्ण ने उन पुत्रों को अत्यंत स्नेह से अपने पास बुलाया और उनकी ओर वातसल्य पूर्ण द्रिश्टी से देखा, जैसे
26:43एक पिता अपने बिछडे हुए बच्चों को पाता है
26:47पुत्रों ने श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों को प्रणाम किया, उनके चेहरों पर मुक्ती और शांती का भाव स्पष्ट था, मानों
26:55वे एक लंबी निग्रा से जागरित हुए हुँ
26:59दिव्यवानी ने पुनह गुम जाते हुए अर्जुन को संबोधित किया, हे पार्थ, अब तुम्हें ग्यात हुआ कि मैं ही काल
27:06हुँ, मैं ही करता हुँ और मैं ही वह सकता हुँ जो सब कुछ नियंत्रित करती है
27:12इस अध्भुत दर्शन के उपरांत, विराट स्वरूप धीरे धीरे अपने असीन विस्तार को समेटने लगा, और उसकी भव्यता एक शांत
27:21नीलाप प्रकाश पुंज में परिवर्तित हो गई
27:25श्री कृष्ण ने अर्जुन और ब्राह्मन पुत्रों को अपने साथ लिया और पुनह अपने दिव्य रत पर आरूढ हुए, अब
27:32उनकी वापसी की यात्रा आरंभ हो चुकी थी
27:36जैसे ही वे मृत्य लोग की ओर लोटे, उनके पत में पुनह वही अनंत्शुने आया, परंतु अब वह भयावह नहीं,
27:44बलकी दिव्य लीला का एक शांत साक्षी प्रतीत हो रहा था
27:49परंतु अब वह अनंत्शुने उन्हें भयभीत नहीं करता था, अपितु यह विराट चेतना के शांत सागर जैसा प्रतीत होता था,
27:57जहां समय और स्थान के बंधन विलीन हो चुके थे
28:02अर्जुन जो अब भी विराट स्वरूब के असीम दर्शन से अभिभूत थे, अपने हृदय में उस परंशक्ती और उसकी लीला
28:10की गूर्ता को आत्म साथ कर रहे थे
28:13ब्राहमन पुत्र, जिनकी आत्माए अभी अभी परमेश्वर के साननिध्य में आनन्दित होकर लोटी थी, एक अगाध शांती और अप्रतिन प्रसन्निता
28:23से भरे हुए थे
28:25श्री कृष्ण ने सभी पर एक करुणामय और निश्चिन्त मुस्कान बिखेरी जो उन्हें पुना मृत्य लोग की यात्रा के लिए
28:32आश्वस्ट कर रही थी
28:35दिव्य रत जिसे कोई अद्रिश्य शक्ती चला रही थी, ब्रह्मांड के इस अनन्द विस्तार में बिना किसी बाधा के सहचता
28:43से आगे बढ़ रहा था
28:46धीरे धीरे शूने का वह निर्मल विस्तार, सुदूर तारों और आकाश गंगाओं के सुक्षम प्रकाश से जग्मगाने लगा, जैसे कोई
28:54अद्रिश्य परदा उठ रहा हो
28:57रत अब उन लोकों से होकर गुजर रहा था जहां अनन्त नक्षत्र और ग्रह अपनी दिव्य प्रभा बिखेर रहे थे,
29:04मृत्यू लोग की ओर बढ़ते हुए
29:08अर्जुन के मन में विराट स्वरूप के दर्शन से जन्मी ज्ञान की ज्वाला अब और प्रजवलित हो रही थी, जिससे
29:14उनके सभी संशय भस्म हो रहे थे
29:18श्री कृष्ण ने अर्जुन की ओर एक सौमय अर्थपूर्ण द्रिष्टी डाली, मानों बिना शब्दों के ही उनके आंतरिक अनुभवों की
29:26पुष्टी कर रहे हुँ
29:28रथ ने अब स्वर्ग लोक, गंधर्व लोक जैसे दिव्य लोकों की पर्तों को पार करना शुरू कर दिया, जहां की
29:35हवा भी सुगंधित और पवित्र थी
29:39जैसे ही वे पृत्वी के वायुमंडल के करीब पहुँचे, दूर्ग शितिच पर नीलाब ग्रह, जीवन और हरियाली से स्पंदित होता
29:47हुआ, दिखाई देने लगा
29:49अब द्वारका नगरी की भव्यता बादलों के पार से जलकने लगी, उसके स्वर्णिम शिखर सूर्य की पहली किर्णों में चमक
29:57रहे थे
29:58रथ द्वारका के एक शांत रमनिय उद्यान में उत्रा, जहां की हवा में पुश्पों की मनमोहक सुगंध घुल रही थी
30:07ब्राहमन पुत्रों ने धर्ती पर पहला कदम रखा, उनके चहरे पर अब भी उस दिव्य यात्रा का अध्भुत अनुभव स्पष्ट
30:15जलक रहा था
30:17श्री कृष्ण और अर्जुन उन्हें अपने साथ लेकर उस ब्राहमन के निवास स्थान की ओर अग्रसर हुए, जिसके हृदय में
30:25पुत्र विरह की पीड़ा अब भी जीवित थी
30:28इधर ब्राहमन अपने छोटे से ग्रह में पुत्रों की अनुपस्थिती से उत्पन गेहन वेदना में डूबा हुआ, भगवान का स्मरण
30:36कर रहा था
30:38जैसे ही श्रीकृष्न अर्जुन और पुत्र ब्राहमन के द्वार पर पहुँचे, वहाँ एक अलोकिक शान्ती और आशा का संचार हो
30:46गया
30:48ब्राहमन ने जब अपने जीवित पुत्रों को द्वार पर देखा, तो पहले तो उसे अपनी आखों पर विश्वास नहीं हुआ,
30:55फिर उसकी आखों से अश्रुधारा बह निकली
30:59पुत्रों ने दौड कर अपने पिता को गले लगाया, और उस पवित्र मिलन से घर में प्रेम और आनंद की
31:06लेहर उमड पड़ी
31:08कृतग्यता से भरे हृदय से ब्राहमन ने भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के चर्णों में साश्टान प्रणाम किया, उनकी महिमा
31:16का गुनगान करते हुए
31:19कृतग्यता से भरे ब्राहमन के नेत्रों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी, जिसने भगवान श्री कृष्ण के चर्णों को धो
31:26दिया, उनके मुख से स्तुती के शब्द फूट पड़े
31:30भगवान श्री कृष्ण ने अपनी करुणा भरी द्रिष्टी से ब्राहमन को देखा और एक सौमे मुस्कान के साथ अपने कमल
31:38जैसे हाथों से उसे उठाने का संकेत दिया
31:42अर्जुन जो इस अध्भुत लीला के साक्षी थे, भगवान श्री कृष्ण की अकल्पनिय शक्ती और करुणा को देखकर विस्मय और
31:50श्रधा से अभिभूत थे
31:53आनन्दित पुत्र अपने पिता के बाद अपनी बिल्खती मा की ओर दोड़े उनकी भुजाओं में खुद को समर्पित करने को
32:00उच्छुप
32:02मा ने अपने हृदय के टुकडों को वर्षों के बिचोह के बाद अपनी भुजाओं में भर लिया और उस आलिंगन
32:09में स्वर्ग का सारा सुख समा गया था
32:12संपूर्ण परिवार ने मिलकर कृतग्यता से भरे हृदय से भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के समक्ष हाथ जोड़कर विनमर प्रार्थनाय अर्पित
32:21की
32:23इस अद्भुत और अविश्वसनिय घटना का समाचार द्वारका की गलियों में तीवर गती से फैल गया
32:41साधारन लीला के साक्षी बनने की लालसा में जैसे जैसे भीड बढ़ती गई द्वारका की सडको पर उत्सव का माहौल
32:50चाने लगा वातावर्ण में आनंद और भक्ती का स्वर गूंजने लगा
32:55भगवान श्री कृष्ण ने ब्राहमन परिवार को अपने शाही महल में आमंत्रित किया जहां उनके सम्मान में एक भव्य उत्सव
33:03की योजना बनाई गई थी
33:06द्वारका के शाही महल के अंदरूनी भाग भव्यता और एश्वर्य से जग्मका रहे थे हर कोने पर दिव्यकला और स्वर्णच्टित
33:15अलंकरन शोभाय मान थे
33:17ब्राहमन परिवार ने जो सादगी में पलेब्धे थे द्वारका महल की अभूत पूर्व भव्यता को देखकर विस्मय और श्रधा से
33:26अपनी आखें चौन्धी आई
33:28एक भव्य भोज का आयोजन किया गया था जिसमें सोने और चादी के पात्रों में स्वादिष्ट व्यंजन परोसे गए जो
33:37ब्राहमन परिवार के सम्मान में थे
33:40भोजन के दोरान श्री कृष्ण और अर्जुन एक दूसरे से शांत भाव से वारता लाप कर रहे थे ब्राहमन परिवार
33:48के चहरे पर लौट आई खुशी का आनंद लेते हुए
33:52अपने खोए हुए समय और अध्भुत यात्रा का स्मरण करते हुए पुत्रों ने अपनी मा को बताया कि वे कैसे
33:59भगवान की कृपा से सुरक्षित और प्रसन्न थे
34:03ब्राहमन की पत्नी ने रानी रुकमेनी के समक्ष अपनी गहरी कृतग्यता व्यक्त की उनकी करुणा और आतिथ्य के लिए हृदय
34:11से धन्यवाद दिया
34:13भगवान श्रीकृष्ण ने उपस्थित सभी को समझाया कि यह घटना केवल एक चमतकार नहीं बलकी परमकरुणा और धर्म की विजय
34:22का प्रतीक है
34:24द्वार्का के नागरिकों ने भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गुनगान करते हुए उन पर पुष्पों की वर्षा की उनकी अध्भुत
34:32लीला को नमन किया
34:34महल के प्रांगण में उत्सव का संगीत गूंज उठा और एक रंगीन शोभायात्रा प्रारंभ हुई जो द्वार्का की गलियों में
34:43आनंद का संदेश ले जाने लगी
34:45उस रात्री ब्राह्मन परिवार ने वर्षों बाद शान्ती और असीम आनंद का अनुभव किया भगवान श्री कृष्ण की करुणा से
34:54उनका जीवन धन्य हो गया था
34:57उस मंगल में रात्री के बाद द्वार का नगरी में एक अध्भुत शान्ती और उत्सव का माहौल छा गया था
35:04जहां ब्राह्मन परिवार के हृदय में वर्षों का दुख अब भगवान श्री कृष्ण की असीम करुणा से अमरित्मय आनंद में
35:12परिवर्तित हो चुका था
35:14इसी बीच हस्तिनापूर से द्वार का पधारे महान धनुर्धर अर्जुन जिनकी ख्याती तीनों लोकों में फैली थी
35:21भगवान श्री कृष्ण के द्वार का आगमन और उनके असाधारन लीलाओं की कहानिया सुन रहे थे
35:27उनके मन में एक वीर सहज गर्व और आत्म विश्वास पष्ट जलक रहा था
35:34तभी वही ब्राहमन दमपती जिनके पुत्र श्री कृष्ण ने लोटाए थे
35:39अत्यंत व्याकुल होकर पुनह राज दर्बार में उपस्थित हुए
35:42इस बार उनके नए जन्मे शिशु के भी जन्म लेते ही अद्रिश्य हो जाने की मार्मिक व्यथा सुनाते हुए
35:50ब्राहमन की करोन पुकार सुनकर अर्जुन का क्षत्रिय हृदय विचलित हो उठा
35:55और उन्होंने अहमकार पूर्वक प्रतिग्याली की वे अगले शिशु को स्वया अपनी दिवेश शक्ती और अस्त्रों से अवश्य बचाएंगे
36:04भगवान श्रीकृष्ण जिनकी लीलाओं का भेद कोई नहीं जान सकता अपनी मंद मुसकान के साथ अर्जुन की प्रतिग्या को स्विकार
36:13किया
36:13मानों वे जानते थे कि आने वाली घटना एक गहरे पाठ की प्रस्तावना मात्र है
36:20अगले शिशु के जन्म की घडी निकट आते ही अर्जुन ने ब्राह्मन के घर के बाहर एक अभेद्य सुरक्षा चक्र
36:27बनाया
36:28अपने दिव्य गांडीव धनुष को धारन किये हुए उसकी तंकार से वातावर्ण गुंजायमान हो उठा
36:35जैसे ही शिशु ने जन्म लिया और उसकी पहली चीख वातावर्ण में गुंजी पलक जपकते ही एक अद्रिश शक्ती ने
36:43उसे अर्जुन की सुरक्षा के बावजूद वायू में विलीन कर दिया
36:48अर्जुन अपने सभी दिव्य अस्त्रों और युद्ध कौशल के बावजूद असफल होकर गहरे सदमे में डूब गये उनका घमंड पल
36:56भर में धूल में मिल गया और उन्होंने स्वयन को अत्यंत अपमानित महसूस किया
37:02इस पराजय से अर्जुन का मन इतना विचलित हुआ कि वे अपने धनुष और बाणों का त्याग कर अगनी में
37:09प्रवेश कर प्राण त्यागने का विचार करने लगे अपने आपको इस संसार के अयोग्य समझते हुए
37:16तभी भगवान श्रीकृष्ण अपने शांत और मनोहारी रूप में प्रकट हुए उन्होंने अर्जुन को स्नेहपूर्वक रोका और उनके कंधे पर
37:25हाथ रखकर उन्हें सांत्वना दी मानो असीम शक्ती का स्रोत स्वयं उनके साथ खड़ा हो
37:32श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि ये शिशु किसी साधारन शक्ती द्वारा नहीं बल्कि एक उच्चतर अद्रिश्य सत्ता द्वारा लिए
37:41गए हैं और उन्हें वापस लाने के लिए वे स्वयं अर्जुन के साथ चलेंगे
37:47ततपश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने अपने तेजस्वी रथ को बुलाया जिसके श्वेट अश्व प्रकाश की गती से दौरते थे और अर्जुन
37:55को अपने साथ बिठा कर वे अनंत ब्रहमांड के अज्यात लोकों की ओर प्रस्थान कर गए
38:02उनके रथने स्वर्ग लोक, महर लोक, जन लोक और तप लोक को पार करते हुए अन्त में उस परम लोक
38:09की सीमा पर पहुँच गया जहां का प्रकाश साधारन नेत्रों के लिए असहय था
38:15प्रकाश के उस पार उन्होंने स्वयन को एक विराठ असीम जलराशी के मध्य पाया जहां अनंत शेशासन पर भगवान विश्णू
38:23अपने परम शांत स्वरूप में शयन कर रहे थे और उनके चारों और वही ब्राहमन पुत्र खेल रहे थे
38:31यह देख अर्जुन अवाक रह गए उनके मन में उठ रहे सभी प्रश्न, सभी गर्व और संदेह क्षन भर में
38:39विलीन हो गए जब उन्होंने साक्षात परमेश्वर को अपनी आखों के सामने देखा
38:45तब भगवान विश्णु जिन्होंने ब्राहमन पुत्रों को अपने पास रखा था ने मधुरवानी में समझाया कि यह सब उनकी ही
38:53लीला थी ताकि अर्जुन को श्री कृष्ण के परम दैवी स्वरूप का बोध हो सके
38:59यह जानकर की उनके मित्र श्री कृष्ण ही वास्तव में समस्त ब्रहमांड के स्वामी स्वयं परम विश्णु हैं अर्जुन का
39:07अहंकार पूर्णता ध्वस्थ हो गया और उनके हृदय में असीम श्रधा जागरित हुई
39:13अर्जुन ने अपने परम गुरु और सखा के चर्णों में स्वयं को समर्पित कर दिया उन्हें अपनी सीमित शक्ती और
39:20भगवान की असीम क्षमता का गहरा बोध हुआ यह उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोर था
39:28श्रीकृष्ण ने सभी ब्राहमन पुत्रों को अर्जुन के साथ वापस लोटाया और उनकी भक्ती को देखकर अर्जुन को गले लगा
39:36लिया जिससे अर्जुन के हृदय में प्रेम और कृतग्यता की एक नई लहर उमड पड़ी
39:42इस घटना के बाद अर्जुन अब केवल एक महान धनूर्धर नहीं रहे बलकि एक परम भक्त भी बन गए थे
39:50जिन्होंने अपने जीवन को श्रीकृष्ण की सेवा और उनके दिव्यसिधानतों के प्रती समर्पित कर दिया
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