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शिक्षा : भाव निरपेक्ष

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00:55पुछ शिक्षा प्राप्त व्यक्ति एक तो पुष्टैने धंदों में गतिमान तो हो सकता है किन्तु उसके लिए किये परिवर्तन वैसे
01:04प्रमानित होते हैं जैसे की फास्ट फूड उसका शरीर इस्थानिय प्राक्रतिक अन्न के लिए बना है विदेशी खानपान उसको तो
01:12स्वादिष्ट लग सकता है किन्तु जो कर्मचारी पीड़ीगत तौर पर जुड़ा है वह परंपरा से बाहर जीकर कसन नहीं हो
01:21बाता दो देशों के दर्शन आमने सामने खड़े दिखाई देती हैं आधुनिक शिक्षा आर्थिक प्रगति और उपकर्णों को अधिक महत्
01:31उनकी वाशिक योजना लाभानी पर आधारित होती है व्यक्ति प्रधान नहीं होती भारती लोग कर्म व्यक्ति का त्व्याभार तथा सुख
01:40दुख में भागीदारी पर आधारित होते हैं नए संस्थानों में higher and fire एक नियमित भाशा है वहां आपको पीड़ियां
01:49दिखा�
01:50नहीं देती आज मैं पत्रीका को भी देखू तो तीसरी पीड़ी अभी जुड़ी हुई दिखाई पड़ती है संपूर्ण वातावरन एक
01:58सूत्र में बना है सुख दुख में कर्मचारी सीधे उपर संपर्क कर सकता है यही सुरक्षा का सबसे बड़ा कारण
02:08बनता है नए ल
02:19जरिया माली काना अधिक होता है माली बागवान का कम होता है इसलिए उनकी दृष्टी तो फलो पर रहती है
02:26सीचने पर नहीं होती विदेशी शिक्षा और अंग्रेजी माध्यम में भारत जैसे देशों का तो नाम ही नहीं होता हमारे
02:35दर्शन ज्यान परंपरा को तो भूलन
02:38के लिए बाध्य होना पड़ जाता है सच पूछो तो शिक्षा में विशय पढ़ाये जाते है व्यक्ति की तो चर्चा
02:45ही नहीं होती व्यक्ति गौन या अध्रिश्य ही हो जाता है यूँ कहो वह तो घर जाकर शिक्षा को लागू
02:54करने की मशीन बन जाता है उसके चिंतन की �
02:57दिशा तय हो चुकी होती है व्यक्ति पूर्ण रूप से रुपांतरित होकर आता है इसका कारण है कि उसका आत्मिक
03:04धरातर सुप जाता है आत्मा तो उसकी शिक्षा में होती ही नहीं है और हम शरीर नहीं है वह शरीर
03:12को जिष्टी में रखकर जीवन को लक्षित करता है बह
03:29ुच्च शिक्षा मंत्राले भी मानव संसाधन मंत्राले के नाम से ही जाना जाता था।
03:41नई उच्च शिक्षा संसाधन पैदा कर रही है, जो किसी की उत्पादक्ता बढ़ाने में काम आए, ऐसी सामगरी को संसाधन
03:49कहते हैं।
03:50जड़ होता है संसाधन अचेतन, जो चेतन व्यक्ति उच्च शिक्षा के मंदिरों में जाता है, वह संसाधन बनकर बाहर आता
03:59है।
03:59वही व्यक्ति जब यहां आकर पुष्टैनी काम में जुड़ता है, तो उसके ज्यान की पोल खुल जाती है।
04:06वह कर्मचारियों को संसाधन से अधिक नहीं मान सकता।
04:10मानविय दिष्टी का अभाव ही उनके मध्या बड़ी दूरी बना देता है।
04:14सारा कुछ यांत्रिक इस्तर पर पहुच जाता है, कई इस्तर के व्यवस्थापक बीच में खड़े हो जाते हैं, सबका एक
04:22ही रक्षिय रह जाता है वार्षिक लाभ में बढ़ोतरी।
04:25हम तो यह पढ़ते आये हैं कि कोई भी बीच अपने फल नहीं खाता, उसे तो जमीन में गड़कर पेड़
04:32बन जाना है, आशिक्षित पेड़ बनने को आत्रु नहीं है, वह तो स्वैम की कमाई को खुद ही भोगना चाहता
04:39है, भले ही नौकरी करता रहे है।
04:42किसी भी पुष्टैनी व्यवसाय का आकलन करके देखें, तो एक आमूल चूल रिष्टी भेद दिखाई देगा। वहां इश्वर भी होगा,
04:52आत्मा ही होगा और फलता फूलता व्यवसाय भी होगा। यह सारा कुछ उच्च शिक्षा ने छीन लिया।
04:59हमने नकल की भातिक वाद की, चका चौन्ध की, स्वयम आत्म केंद्रित होने की, वैसे भी शिक्षा ने प्रक्रतितत विभिनता
05:07समाप्ती ही कर दी, जहां दो व्यक्ती एक जैसे नहीं होते।
05:12आज हर परिक्षा में लाखों लाख व्यक्ती एक से बनकर निकलते हैं। वही स्पर्धा का कारण है। वही प्रतिस्पर्धा का,
05:21संघर्ष का और मूल में बेरोजगारी का।
05:24शिक्षा ने व्यक्ती का बेक्षा भाव इतना बढ़ा दिया कि यदि पूरी नहीं हुई, तो वह अपराध ही बन जाता
05:31है। क्या बेरोजगारी और अपराध सीखने के लिए उम्र का महत्वपूर्ण भाव और माबाप की कमाई खर्चनी पड़ती है।
05:40विश्व एक पेड़ है, देश एक पेड़ है, परिवार एक पेड़ है। इसी तहर व्यवसाय भी एक पेड़ है। पेड़
05:47के हर अंग का अपना अपना कार्य है।
06:10रिदय, गुर्दे, आखे, ना, कान, आदी सबको अपना अपना कार्य करते रहना है। जड़ों में जो पानी, खाद, आदी सीचा
06:19जाएगा, वह स्वता ही सबको कार्य के अनुपात में पहुच जाएगा।
06:24किसी को कोई शिकायर नहीं, पेड़ हो या शरीर सब स्वस्त रहेंगे। नई शिक्षा में माली सेचता है, मालिक नहीं।
06:32उसे फल मात्र चाहिए, तब या तो स्वयम माली बनकर कार्य करें, अच्वा माली को मालिक जैसा सम्मान दें।
06:40असंभा, नमस्कार।

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