सवाईमाधोपुर. गली-मोहल्ले में घूमता श्वान हो या जंगल-क्षेत्र में नजर आने वाला बंदर, इनके काटने को मामूली समझना भारी पड़ सकता है। शरीर पर छोटा सा घाव दिखने के बावजूद संक्रमित पशु के काटने से रेबीज का संक्रमण हो सकता है। खास बात यह है कि एक बार रेबीज के लक्षण सामने आने के बाद बीमारी बेहद गंभीर हो जाती है। ऐसे में पशु के काटने के बाद घाव को नजरअंदाज करने के बजाय तत्काल चिकित्सा लेना बेहद जरूरी है।
जिले में लोगों में बढ़ी जागरूकता का असर अब रेबीज के मामलों पर भी देखने को मिल रहा है। पशु के काटने के बाद अस्पताल पहुंचकर समय पर टीका लगवाने के प्रति लोगों की गंभीरता बढ़ी है। हालांकि श्वान और बंदर के काटने के मामले अभी भी बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं। जिला अस्पताल में हर माह करीब 250 से अधिक लोग ऐसे मामलों में उपचार के लिए पहुंच रहे हैं। तीन महीने में 917 लोग पहुंचे अस्पताल जिला अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार जून, जुलाई और अगस्त में श्वान व बंदर के काटने के 917 मामले सामने आए। जून में 347, जुलाई में 300 और अगस्त में 270 लोगों ने उपचार कराया। आंकड़ों से साफ है कि मामलों की संख्या में धीरे-धीरे कमी आई है, लेकिन पशु काटने की घटनाएं अभी भी चिंता का विषय बनी हुई हैं।
जिला अस्पताल में पर्याप्त इंतजाम, ग्रामीण क्षेत्रों में परेशानी
जिला अस्पताल में रेबीज से बचाव के लिए आवश्यक इंजेक्शन और दवाइयां पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। हालांकि जिले के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधाओं की कमी के कारण मरीजों को जिला अस्पताल तक आना पड़ रहा है। खण्डार, चौथ का बरवाड़ा, फलौदी और मलारना डूंगर क्षेत्र के सीएचसी-पीएचसी में पशु काटने के मामलों में उपयोग होने वाला सीरम उपलब्ध नहीं होने से लोगों को उपचार के लिए जिला अस्पताल आना पड़ता है। इससे ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को समय और दूरी दोनों की परेशानी उठानी पड़ रही है।
माह श्वान-बंदर के काटने के मामले
जून 347 जुलाई 300
अगस्त 270 कुल 917
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एक्सपर्ट व्यू...
समय पर उपचार ही रेबीज से बचाव का सबसे बड़ा उपाय
श्वान, बंदर या किसी अन्य वन्यजीव के काटने को हल्के में नहीं लेना चाहिए। काटने के बाद बिना देरी किए चिकित्सकीय सलाह लेना और निर्धारित समय पर रेबीज का टीका लगवाना बेहद जरूरी है। घाव को सामान्य चोट समझकर घर पर ही उपचार कर छोड़ देना लापरवाही हो सकती है। समय पर टीकाकरण और आवश्यक उपचार से रेबीज के खतरे को काफी हद तक टाला जा सकता है। जिला अस्पताल में रेबीज के इंजेक्शन और दवाइयां पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। प्रतिमाह औसतन 250 पशु-काटने के मरीज यहां उपचार के लिए पहुंच रहे हैं। हालांकि खण्डार, चौथ का बरवाड़ा, फलौदी और मलारना डूंगर के स्वास्थ्य केंद्रों पर सीरम उपलब्ध नहीं होने से इन क्षेत्रों के मरीजों को उपचार के लिए जिला मुख्यालय आना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हों तो मरीजों को समय पर उपचार मिल सकेगा। डॉ. आरपी मीना, प्रभारी, मॉडल रेबीज क्लिनिक, सवाईमाधोपुर