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गरुड़ पुराण के इस छठे अध्याय में जानिए मृत्यु के बाद आत्मा की 1 वर्ष तक चलने वाली 16 भयावह नगरों (षोडश पुर) की यात्रा! भगवान विष्णु ने पक्षीराज गरुड़ को बताया कि परिजनों द्वारा किए जाने वाले मासिक पिंड दान और श्राद्ध का आत्मा की इस कठिन यात्रा में क्या महत्व है और कैसे पिंड दान न मिलने पर आत्मा तड़प-तड़पकर भयंकर प्रेत योनि में चली जाती है। #GarudaPurana #Mythology #Yamaloka #PindaDaan #ShorashaPura #SanatanDharma
Transcript
00:00गरुड अपनी विशाल आखों में चिंता लिये, भगवान विश्णू से प्रश्न करते हैं कि बिना अनजल के सुक्ष्म यातना शरीर
00:08इस वर्ष भर की दुर्गम यात्रा कैसे सहपाता है।
00:12भगवान विश्णू मंद मुस्कान के साथ अपनी अनंत द्रिष्टी ब्रहमांड के गूड रहसियों पर केंद्रित करते हुए उत्तर देने को
00:20ततपर होते हैं।
00:23प्रभु बताते हैं कि यह सुक्ष्म यातना शरीर अत्यन्थी नाजुक और पंचभूतों से रहित होने के कारण हर पल पीडा
00:31का अनुभव करता है।
00:34यह मार्ग छियासी हजार योजन का है जो गेहन अंधकार और अंगिनत बाधाउं से भरा एक असीमित विस्तार है।
00:54पहला नगर सौमयपुर है जहां आत्मा को क्षण भर के लिए शांती का भ्रम होता है जो शीघर ही तूट
01:01जाता है।
01:03इस नगर में शरीर ना होने पर भी आत्मा को भूख और प्यास की असहनिय वेदना का अनुभव होता है
01:10जिससे वह व्याकुल हो उठती है।
01:13अगला सौरीपुर है जहां भूत प्रेतों की छायाय मंदराती हैं और आत्मा को भयभीत करती हैं बिना किसी वास्तविक सहारे
01:22के।
01:24पुर्जितपुर में आत्मा को अपने प्रियजनों की म्रिगतरिशना दिखती है जो उसे आशा देती है पर अंत्य और भी गहरा
01:32दोहक पहुचाती है।
01:35यामपुर में आत्मा को दूर से यमदूतों और यमराज के सामराज्य की जहलत मिलती है जिससे उसका भय और बढ़
01:42जाता है।
01:44घोरपुर नामक पांच वानगर जहां पापियों को दी जाने वाली भविश्य की यंत्रनाओं की गुंजे और डरावनी आकृतिया आत्मा को
01:53विचलित करती हैं।
01:55फिर आता है निर्भयपुर एक छलावा जहां आत्मा को लगता है कि उसे शान्ती मिल गई पर यह केवल यात्रा
02:03को लंबा करने वाला एक पड़ाव है।
02:07वाताधानपुर में पश्चाताप की तेज हवाय आत्मा के चारों और घूमती हैं। उसे अपने पिछले कर्मों का स्मरण कराती हैं
02:16और पीडा देती हैं।
02:19अविचिपुर जहां आत्मा को लगता है कि वह एक अनन्त शूने में गिर रही है जिसका कोई अन्त नहीं और
02:26भैसे कापती है।
02:29बहुपुर में अनेक ध्यामक मार्ग और द्वार आत्मा को दिगभ्रमित करते हैं उसे अपने गंतव्य से अनिश्चित कर देते हैं।
02:38रोधनपुर में आत्मा अपने पीछे छोड़े गए प्रियजनों के करुण विलाप और अपने स्वयं के अधूरे सपनों की प्रतिध्वनिया सुनती
02:46हैं।
02:48शोगपुर में आत्मा पर अपने सांसारिक बंधनों और खोई हुई चीजों का बोज असहनिय हो जाता है, जिससे वह गहन
02:56विशाद में डूब जाती है।
02:59नाना क्रांथपुर में पाप पुने के मिश्रित विचारों का आक्रमन होता है, जिससे आत्मा को मानसिक और भावनात्मक यात्ना सहनी
03:08पड़ती है।
03:10सुतप्थपुर एक ऐसा नगर है, जहां तीवर आंतरिक अगनी और निराशा आत्मा को जलाती है, मानो हर इच्छा और पाप
03:19का ताप अनुभव हो रहा हो।
03:21अंतर रौदरपुर आता है, जहां यम्राज के भयंकर दूट अंतिन पड़ाव की घोशना करते हैं, और आत्मा यमलोक के द्वार
03:30पर काप उठती है, पिंड दान के बिना भविश्य की भयावता का सामना करने के लिए तयार।
03:36यमलोक के द्वार पर पहुँचते ही, आत्मा को एक असहे गुरुत्वा कर्शन ने अपनी ओर खीचा, मानो सहसरों वर्षों का
03:44भार उस पर अचानक आपड़ा हो।
03:47यह सौमेपूर था, पहला नगर जहां आत्मा को अपने कर्मों का लेखा जोखा नहीं, बलकि एक अजीब सी शांती और
03:55प्रचंड धकान का अनुभव करना था।
03:59अंदर प्रवेश करते ही, आत्मा के अस्तित्व पर भारीपन छा गया, मानो उसके हर अनुमें अंगिनत जन्मों की यात्रा का
04:07बोज समा गया हो।
04:09अतीत के कर्म, सुख और दुहक की स्मृतिया एक धूमिल स्वपन की तरहा आत्मा के मानस पटल पर उभरने लगी,
04:17जिससे उसका अंतर्मन व्याकुल हो उठा।
04:20यह थकान केवल शारिरिक नहीं, बलकि आत्मिक थी, जो उसके अस्तित्व के मूल को निचोड रही थी, उसे पूरी तरहा
04:29हर कदम, हर विचार एक भारी संधर्ष था, जैसे समय और स्थान की अवधार्णा ही उसके लिए एक बोज बन
04:36गई हो।
04:38जैसे ही वह गिरने को था, एक सुक्ष्म दिव्य प्रकाश की किरणने उसे घेरा, मानो कहीं दूर से कोई अद्रिश्य
04:46शक्ती उसे सहारा दे रही हो।
04:49यह प्रकाश एक अध्भुत उर्जा में परिवर्तित होकर आत्मा के भीतर समाने लगा, जिससे उसे एक शनिक राहत और एक
04:57नई रहस्यमय शक्ती का अनुभव हुआ।
05:01यह उर्जा प्रित्वी पर श्रधा पूर्वक किये गए पिंड दान का प्रत्यक्ष परिणाम थी, जो आत्मा को इस भयानक यात्रा
05:09में सहारा देने के लिए प्रकट हुई थी।
05:12ठीक उसीक्षन एक दिव्य उपस्थिती प्रकट हुई, भगवान विश्णु अपने शांत और तेजस्वी रूप में आत्मा के समक्ष खड़े होकर
05:21उसे मार्ग गर्शन देने के लिए उद्यत थे।
05:25भगवान विश्णु ने अपनी शांत वाणी में समझाया कि कैसे प्रिथवी पर पहले बारह दिनों तक किया गया पिंद दान
05:33ही आत्मा के लिए इस मार्ग में प्राणवायू बनता है।
05:37उन्होंने बताया कि यह पिंद दान केवल एक कर्मकांड नहीं, बलकी श्रद्धा और प्रेम का संचार है जो आत्मा को
05:45मृत्यु लोग की भीशन यात्रा में सहारा देता है।
05:49प्रत्येक पिंद एक शक्तिशाली उर्जा स्रोत में बदल जाता है, जो आत्मा की ठकी हुई इंद्रियों और अस्तित्व को नवीन
05:58शक्ती प्रदान करता है।
06:01सौमयपुर में यह उर्जा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां की ठकान और अकेलेपन से आत्मा को लड़ने के लिए
06:09इसी का बल मिलता है।
06:12आत्मा ने पहली बार महसूस किया कि प्रित्वी पर उसके अपनों का प्रेम इस अद्रिश्य रूप में भी उसके साथ
06:19यात्रा कर रहा है।
06:22विश्णु ने समझाया कि पहला पिंद विशेश रूप से सौमयपूर की यात्रा के लिए ही अर्पित किया जाता है, जिससे
06:29आत्मा को प्रारंभिक कठिनाईयों से उबरने में मदद मिले।
06:33उनके शब्दों से आत्मा को न केवल शक्ती मिली, बलकि एक गहन समझ भी विक्सित हुई कि उसके कर्मों का
06:41प्रभाव मृत्यू के बाद भी व्याप्त रहता है।
06:45इस दिव्यग्यान से परिपून होकर आत्मा ने सौमेपुर के शांत फिर भी कठिन पत पर आगे बढ़ने का निश्चे किया,
06:54अब और अधिक सासी और तयार।
06:57सौमेपुर की खामोशी अब केवल एक चेतावनी नहीं, बलकि एक ठहराव थी, जहां आत्मा ने अपनी यात्रा का पहला महत्वपून
07:06पड़ाव पार किया था।
07:08पिंड दान की शक्ती से संचालित, आत्मा अपने अगले पड़ाव की ओर अग्रसर हुई, यमलोग के अगाध रहसियों को जानने
07:16के लिए तयार।
07:18आत्मा ने सौमयपूर की शान्ती को पीछे छोड़ते हुए, अब अपने सामने सौरिपूर के अगनिप्रीक्षन को अनुभव करना शुरू किया,
07:27जहां बातावर्ण एक भयंकर भट्टी साथ अपने लगा था।
07:31जैसे ही आत्मा आगे बढ़ी, प्रत्यक्षन के साथ उत्तरोत्तर बढ़ती हुई गर्मी ने उसे अंदर तक जुलसाना शुरू कर दिया,
07:40मानो उसके अस्तित्व को ही पिघला रही हो।
07:44अचानक एक चीखती हुई अस्थाई हवा ने आत्मा को जख जोर दिया, जो समय और स्थान की सीमाओं को तोड़ती
07:51हुई, उसे अपनी प्रचन शक्ती से दूर धकेलने का प्रयास कर रही थी।
07:57आत्मा ने स्वयं को इन ज्वलंत हवाओं और दहकती गर्मी के बीच संभाले रखने की भरसक कोशिश की, जहां हर
08:04सास एक चुनोती और हर पल एक अनंत पीडा था।
08:09इस भयानक परीक्षा के बीच भी, पिंड दान की पवित्र स्मृती आत्मा के भीतर एक मंद लौकी तरह जग्मगाई, उसे
08:17आगे बढ़ने की शक्ती प्रदान करती रही।
08:21जैसे जैसे आत्मा सौरिपुर के हरिदय में प्रवेश करती गई, गर्मी और हवा का वेग और भी तीवर हो गया,
08:28मानो यह च्षेत्र उसके धैर्य की अंतिम सीमा को परख रहा हो।
08:33हर दिशा से प्रहार करती हुई उर्जा ने आत्मा को बेथाशा ठका दिया था, जिससे उसकी चमक मंद पढ़ने लगी
08:41और वह अत्यंत नाजुक अवस्था में पहुँच गई।
08:45इस बंजर जुल से हुए विस्तार में, जीवन का कोई निशान नहीं था, केवल अनंत ज्वालाएं और हवा का भयावा
08:53विलाप जो हर कोने से गूंज रहा था।
08:57दूरक्षितिज पर एक शनिक शीतलता का भ्रम दिखाई दिया, जो शीघर ही तीवर गर्मी की लहरों में विलीन हो गया,
09:04आत्मा को एक जूठी आशा देकर फिर से निराशा में डुबो दिया।
09:09अपनी समस्थ शेश शक्ती को समेट कर आत्मा ने सौरिपूर की भयानक देहलीज को पार किया, यद्यपी कमजोर पढ़ चुकी
09:17थी।
09:18आत्मा ने कदम रखा, सौरिपूर की अगनी से निकल कर उसने नागेंद्र भवन के दमगोंटू और सरपिल शेत्र में प्रवेश
09:26किया, जहां हवा में विश और भय की गंध घुली हुई थी।
09:31घनी छायाओं के बीच से सहसा असंख्य विशैले सर्प फुफकारते हुए प्रकट हुए, जिनकी आखें अंधेरे में चमक रही थी
09:39और उनकी जीभें भयानक रूप से लपलपा रही थी।
09:43आत्मा ने देखा कि उसी क्षेत्र में कई अन्य अधिक विरूपित आत्माय प्रेत अपने प्रियजनों द्वारा अनुष्ठानों की उपेक्षा के
09:52कारण कष्ट में फंसी हुई थी।
09:55विशयले सर्प उन लाचार प्रेतों पर जपट रहे थे। उनके अद्रिश शरीरों को अपने जहरीले डंकों से बार-बार छेद
10:03रहे थे। जिससे वे दर्ध से चीखने पर मजबूर थे।
10:07इस भयानक ग्रिश को देखकर आत्मा काम्प उठी उसने उन प्रेतों के अन्खे दर्ध को महसूस किया और भय तथा
10:16करुणा का एक मिश्रण उसके भीतर उमड पड़ा।
10:20उन प्रेतों की दैनिय अवस्था उन जीवित परिजनों की घोर उपेक्षा का परिणाम थी, जिन्होंने उनकी मृत्यू के बाद आवशक
10:28संसकारों और पिंड दान को पूर्ण नहीं किया था।
10:32इस वीभत स्पीडा को देख कर आत्मा ने अपने स्वयं के लिए किये गए पिंड दान के महत्व को गहराई
10:39से समझा, जिसने उसे इन प्रेतों के समान भाग्य से बचा लिया था।
10:45निराशा से भरी हुई प्रेतात्माई चीतकार कर रही थी, व्यर्थी सर्पों की पकड से बचने का प्रयास करती रही, उनकी
10:53हर कोशिश केवल और अधिक पीडा ही ला रही थी।
10:57अपनी आंतरिक शक्ती और पिंड दान के संरक्षन से मार्क दर्शित होकर, आत्मा ने सावधानी पूर्वक इस सर्पिल लाबिरिंट से
11:05होकर अपना रास्ता बनाया, हर फुफकार से बच्चती हुई।
11:10अंतर, उन भयावः प्रेतों और विशैले सर्पों के राज्य को पीछे छोड़ते हुए, आत्मा नागेंद्र भवन से बाहर निकली, उसके
11:18हृदय में देखी गई पीडा का बोच लिये हुए, पर अब आगे के लिए तैयार।
11:24नागेंद्र भवन के विशैले दायरे से मुक्त होकर, आत्मा ने एक नए और अकल्पनिय पत पर अपने कदम बढ़ाए, जहां
11:32आगे की यात्रा की भयावता उसे पुकार रही थी।
11:37सामने का मार्ग पत्रीला और बंजर था, जिस पर कोई वनस्पती नहीं थी, और जहां हवा में एक तीखी शुष्क
11:44गंध फैली हुई थी, जो हर सांस के साथ आत्मा को जखचोर रही थी।
11:50शितिच पर दूर, भय और पीडा के प्रतीक, शैलग्राम के भयानक नुकीले परवत शिखर दिखाई दिये, जो आकाश को चीरते
11:58हुए दैत्यकाय दान्तों की तरहे प्रतीत हो रहे थे।
12:02जैसे जैसे आत्मा उन भीशन चोटियों की ओर बढ़ी, ठंडी, कटीली हवा ने उसके आभासी शरीर को भेदना शुरू कर
12:11दिया, जो उसे आने वाली कठिन चढ़ाई का पूर्वा भास दे रही थी।
12:16शैल ग्राम की धर्ती स्वय एक यातना थी, जहां हर कदम नुकीले पत्थरों और चट्टानों के टुक्डों पर पढ़ता था
12:24जो आत्मा के सुक्ष्म शरीर को भी पीडा पहुँचा रहे थे।
12:28चढ़ाई शुरू होते ही, आत्मा ने अपनी आंतरिक शक्ती को जुटा कर पहले नुकीले धलान पर कदम रखा, लेकिन हर
12:37प्रयास ने उसके आभासी रूप को एक अद्रिश कट के साथ चीर दिया, जिससे असहनिय पीडा हुई।
12:43तीवर दर्द की लहरेंग उसके पूरे अस्तित्व में फैल गई, जैसे अंगिनत अद्रिश बलेड उसे काट रहे हो, जिससे उसकी
12:52गती धीमी पड़ गई और उसका संकल्प डगमगाने लगा।
12:56अचानक एक स्वर्गिय प्रकाश चमका और आत्मा के मन में अपने परिवार ग्वारा किये जा रहे मासिक श्राध की एक
13:04ज्वलंत छवी उभराई, जो उसे संबल प्रदान कर रही थी।
13:09उस द्रिश में एक भक्त परिवार, जिसमें एक व्रिध पिता, उनकी शांत पत्नी और उनके दो युवा पुत्र शामिल थे,
13:18सभी पारंपरिक वस्त्रों में सजे थे, पवित्र वेदी के सामने पिंडदान और तरपन कर रहे थे, उनके चहरे पर श्रधा
13:26और भक्ती का भ
13:38उती हुई, उस पीडित आत्मा की ओर प्रवाहित हुई, इस पवित्र उर्जा के स्पर्ष से आत्मा के अंदर एक नई
13:46शक्ती का संचार हुआ, उसके आभासी शरीर के घाव भरते महसूस हुए और उसे आगे बढ़ने की अदमय इच्छा मिली,
13:54फिर से द्रिड संकल्प के
13:57साथ आत्मा ने शैलग्राम की बरफीली, नुकीली चट्टानों पर अपनी चढ़ाई फिर से शुरू की, इस बार उसके मन में
14:04अपने परिवार के प्रेम और भक्ती की शक्ती थी, लेकिन शैलग्राम की क्रूरता कम नहीं हुई थी, रास्ते में अचानक
14:13परवत के बड़े
14:14हिससे ढहने लगे, जिससे आत्मा को निरंतर संभल कर रहना पड़ा।
14:44उस भयानक द्रिश्य को देखा, लेकिन उसके हृदय में अब भय के बजाय द्रिडता और कृतग्यता का भाव था।
14:52प्रत्येक कठिन चढ़ाई और प्रत्येक धहते हुए मार्ग पर विजय पाते हुए, आत्मा ने अपने लक्षय की ओर अथक परिश्रम
15:00किया, केवल अपने भीतर की शक्ती और उस दिव्य सहारे पर भरोसा किया।
15:06अंतह एक लंबे और कष्टप्रद संधर्ष के बाद आत्मा शैलग्राम के एक अपेक्षाकृत सपाट पठार पर पहुँची, जहां उसने एक
15:15क्षण के लिए रुक कर अपनी यात्रा की भयावता का अनुभव किया।
15:20पीछे मुर कर देखने पर नुकीले शिक्रों की एक अन्थीन भूल-भूलिया फैली हुई थी, हर चोटी एक चुनोती और
15:28हर दरार एक भयावा खत्रा थी, जिसे उसने चमतकारी धंग से पार कर लिया था।
15:34अभी भी आगे और भी अधिक भयानक चोटिया और गहरी खाया प्रतीक्षा कर रही थी, जिससे यह स्पष्ट था कि
15:43आत्मा की यात्रा का यह केवल एक छोटा सा पड़ाव था।
15:47आत्मा ने भयभीत द्रिश्टी से सामने देखा, जहां पत एक रहस्यमई अंधकार में घाटी में परिवर्तित हो रहा था, जिसके
15:56सिरे अकलपनिय उचाई पर लुप्त थे।
15:59जैसे ही वह आगे बढ़ी, घाटी की दिवारे धीरे-धीरे सिकुरने लगी, एक संकीर्ण मार्ग बनाते हुए जो स्वयें एक
16:08प्राचीन और जीवित कारागार जैसा प्रतीत होता था।
16:12आत्मा ने महसूस किया कि उसने क्रॉंचपुर की सीमा में प्रवेश कर लिया है, जहां का मार्ग एक तलवार की
16:20धार से भी अधिक तीक्षन और केश के समान महीन हो गया था।
16:25पत्थरों की जीवित्सी दीवारों ने हर तरफ से दबाव बनाना शुरू कर दिया, मानोवे आत्मा को उसकी पापमय कृतियों के
16:32लिए कुचलने को तैयार हो।
16:35असहनिय पीडा की लहरें आत्मा के हर कन से गुजरी, जैसे उसके अस्तित्व को निचोडा जा रहा हो, और एक
16:43मुख चीख उसके अग्रिश मुख से निकली।
16:46आसपास कई अन्य पापियों की आत्माय भी उसी दारोन यंत्रना से गुजर रही थी, उनकी भयानक चीखें उस संकीन घाटी
16:55में गूंच कर आतंक फैला रही थी।
16:58यह मार्ग केवल शरीर को ही नहीं, बलकि आत्मा के हंकार और सांसारिक मोह को भी कुचलने के लिए बनाया
17:06गया था, हर इंच एक कठोर आत्मशोधन था।
17:10क्रोचपुर की दीवारों से एक भयाव, काली उर्जा निकल रही थी, जो आत्मा के मन में गहन निराशा और अस्तित्व
17:18हीनता का भय भर रही थी।
17:21अपने अस्तित्व के अंतिन सिरे तक धकेल दी गई आत्मा, दर्द की एक भयानक लहर के साथ, अंत्ता उस भयाव
17:29संकीर्णता से बाहर निकलने में सफल रही।
17:33क्रोचपुर से बाहर निकलते ही, आत्मा ने एक गहरी, अद्रिश्य सांस ली, उसका शरीर पीड़ा और थकान से काप रहा
17:41था, परंतु यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई थी।
17:45आगे बढ़ते हुए, आत्मा ने एक और भव्य परंतु भयानक नगर देखा, जिसके उचे द्वार से भयानक चीखों और कोडों
17:53की मार की आवाजें आ रही थी।
17:56दूर से ही उसने देखा कि क्रूर यमदूत, जिनके शरीर काले और विशाल काय थे, पापियों को बिना दया के
18:04कोडे मार रहे थे।
18:07जैसे ही आत्मा क्रूर पूर के द्वार से गुजरी, उसे तुरंत दो भयंकर यमदूतों ने रोक लिया, जिनकी आखें जलते
18:14अंगारों सी लाल थी।
18:16एक यमदूत ने अपनी भयानक नुकीली जीब बाहर निकाली और दूसरे ने आत्मा की ओर अपनी भयानक चमकती हुई कोडा
18:25लहराया।
18:27आत्मा ने भयभीत होकर देखा कैसे एक अन्य आत्मा को निर्ममता से कोडों से पीटा जा रहा था क्योंकि उसके
18:35परिवार ने पवित्र संसकार नहीं किये थे।
18:38यह देखकर आत्मा कामप उठी, यह जानते हुए कि अब उसकी बारी है और उसे अपने परिवार की लापरवाही का
18:46परिणाम भुगतना पड़ेगा।
18:49यमदूतों ने करकश स्वर में पूछा, तुम्हारे परिवार ने तुम्हारे पिंडदान और श्राध के अनुष्ठान क्यों नहीं किये, है पापी
18:57आत्मा।
18:59आत्मा ने डरी हुई आवाज में जवाब दिया कि उसके परिवार ने सांसारिक मोह में पढ़कर उसके अंतिम संसकारों की
19:07उपेक्षा की थी।
19:08इस बात से क्रोधित होकर यमदूतों ने एक भयंकर चीक के साथ अपने चमकते कोडे से आत्मा को बेरमी से
19:17पीटना शुरू कर दिया।
19:19आत्मा ने हर वार के साथ चीतकार की महसूस कर रही थी कि यह उसके परिवार के अपूर्ण संसकारों का
19:27दर्ध है।
19:27आत्मा को अब भी यमदूतों के कोडों की पीड़ा महसूस हो रही थी जब उसे निर्मंता से एक नए उजाड
19:35परिद्रिश की ओर घसीटा गया।
19:38दूर क्षितिच पर उन्हें एक चमकता हुआ मायावी नगर दिखाई दिया जिसकी चमक तपती भूमी पर नाचती हुई सी लग
19:46रही थी यह विचित्रंगर के बाहरी किनारे थे।
19:49जैसे ही वे पास आये, आत्मा ने अपनी आखों के सामने स्वादिष्ट व्यंजनों से सजी मेजों और शीतल बहती धाराओं
19:58का एक अत्यंत मनमोहक म्रिगत्रिशना देखा।
20:02यमदूतों ने क्रूर्ता से म्रिगत्रिशना की ओर इशारा किया, आत्मा की भूख और प्यास का उपहास करते हुए, उसे उस
20:10भयानक प्रलोभन की ओर धकेल दिया।
20:13अपनी सभी पीडाओं को भुलाकर आत्मा ने अपनी बची हुई शक्ती को एकत्रित किया और उस आकरशक किन्तु मायावी द्रिश्टी
20:22की ओर बढ़ने लगी।
20:24तप्ती रेत और नुकीली चट्टानों से भरी, उस भयावा यात्रा में हर कदम एक अनकहा दर्द था, जो आत्मा के
20:32भीतर की आशा को छलनी कर रहा था।
20:35जैसे जैसे आत्मा मायावी जल्धारा के करीब पहुची, पानी की हर लेहर इतनी स्पष्ट और शीतल लगने लगी कि उसकी
20:44प्यास असहनिय हो उठी।
20:46अदम एप्यास से व्याकुल, आत्मा ने अपना हाथ उस कथित शीतल जल्धारा की ओर बढ़ाया, उसकी अंगुलिया आशा और भय
20:55के बीच काप रही थी।
20:57लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियों ने पानी को छुआ, वह तुरंत एक उबलते हुए तेज तेजाब में बदल गया, जिसने
21:05आत्मा की उंगलियों को जला डाला।
21:08एक हृदय विदारक चीख के साथ आत्मा ने अपना हाथ पीछे खीच लिया, उसके शरीर में भयानक दर्द की लहरेन
21:16दोड़ गई, मानो वह आग में जल रहा हो।
21:20इस भयावध द्रिश को देखकर दूर खड़े यमदूतों के क्रूर चहरे पर एक विक्रित उनमादी हंसी फूट पड़ी, जो आत्मा
21:28के दर्द को और बढ़ा रही थी।
21:31प्यास के बाद अब भूख की तीवर पीडा ने आत्मा को जकड लिया, और उसने अपनी बची हुई आशा के
21:38साथ एक स्वादिष्ट दिखने वाले फल की ओर हाथ बढ़ाया।
21:43जैसे ही उसकी उंगलियों ने उस मायावी फल को छुआ, वह क्षन भर में एक ज्वलंत संक्शारक पदार्थ में बदल
21:51गया, जिसने आत्मा के दूसरे हाथ को भी जला डाला।
21:54अब दोनों हाथों की पीडा से व्याकुल आत्मा ने एक और चीख निकाली, दर्थ से छटपटाते हुए धर्ती पर गिर
22:03गई, उसके शरीर में असहनिय पीडा लहरें डौड गई।
22:07तभी ब्रह्मांडिय प्रकाश के एक तीवर विस्पोट के साथ भगवान विश्नु एक दिव्यदर्शन में प्रकट हुए, जिनका मुखमंडल शांत और
22:17आखों में असीम ज्यान चमक रहा था।
22:20भगवान विश्नु ने समझाया कि यह विचित्रंगर सांसारिक इच्छाओं और मोह का प्रतीक है, जहां हर भौतिक सुख की लालसा
22:29दस गुना अधिक पीडादायक बन जाती है।
22:32उनके दिव्यमुख से निकली प्रत्येक बात ब्रह्मांडिय सत्य को प्रतिध्वनित कर रही थी, जो कर्मों के फल और वासनाओं के
22:41भयानत परिनामों को उजागर कर रही थी।
22:44आत्मा ने अपनी अधूरी इच्छाओं और परिवार द्वारा उपेक्षित संसकारों के दर्धनाक संबंध को समझते हुए, अपने भाग्य की कठोर
22:53वास्तविक्ता को स्वीकार किया।
22:56आत्मा की पीडा को परियाप्त जानकर यमदूतों ने उसे फिर से उठाया और विचितरंगर के हृदय की ओर खीचने लगे,
23:04जहां और भी भयानक यातनाय प्रतीक्षा कर रही थी।
23:09इस प्रकार आत्मा विचितरंगर के उस शाश्वत ध्रम और जलते हुए निराशा के बीच अकेली छोड़ दी गई, एक अंथीन
23:17चक्र में जहां हर आशा अंतह एक कड़वी, तेजाबी सक्चाई बन गई।
23:23विचितरंगर के दहकते भ्रम से निकल कर आत्मा को अचानक एक अनपेक्षित भीशन ठंड ने जकड लिया, जिसने उसकी पीडा
23:31में एक नई बरफीली परत जोड़ दी।
23:34उसी क्षन दो विशाल का यमदूत, जिनकी आखें जलते अंगारों सी थी, आत्मा को निर्दैता से खीचते हुए गहरे, अंधकार्मय
23:44रसातल की ओर ले जाने लगे, जहां विचितरंगर के भ्रम फीके पड़ रहे थे।
23:49जैसे जैसे वे नीचे उतरते गए, हवा अत्यंत सघन और भारी होती गई, तापमान अकलपनिय शूनि से भी नीचे गिर
23:58गया, जो भवाताप के आगमन का भयावह संकेट दे रहा था।
24:03अचानक आत्मा को भवाताप के बरफीले दाएरे में धकेल दिया गया, एक ऐसा लोक जहां बरफीले तूफान भयंकर रूप से
24:11गरचते थे और क्रिष्टलिय हिंपात अस्तित्व के हर कन को चीर देता था।
24:17आर्कटिक हवा का हर जोंका आत्मा के सुक्ष्म शरीर को हजारों तेस धारदार उस्तरों की तरह चीर रहा था।
24:25जो भीशन नीचे की जमीन फिसलन भरी, काली बर्फ का एक विश्वास घाती विस्तार थी, जहां असहनिय ठंड आत्मा के
24:33हर कन में रिसकर उसे लगातार पीडा दे रही थी।
24:37यहां पिंडदान उर्जा से रहित आत्माए सबसे अधिक संधर्ष करती थी, उनके सुक्ष्म शरीर गर्मी को बनाए रखने में असमर्थ
24:46थे, जो उन्हें पारदर्शी कापते हुए प्रेतों में बदल रहा था।
24:51आत्मा ने भयानक रूप से देखा कि उसके चारों और अन्य दंडित आत्माए धीरे-धीरे जम रही थी, उनकी चीखें
24:59गुंजती थी क्योंकि उनके शरीर अंगिनत बर्फीले टुक्रों में बिखर जाते थे।
25:05यमदूत जिनके चहरे कठोर उदासींता से जड़े हुए थे, अपनी जलती हुई चाबुक से जमे हुए अवशेशों को तोड़ते और
25:14बिखेरते हुए धूल की तरह बिखेर रहे थे।
25:16फिर आत्मा को दुखाडा में और गहराई से धकेल दिया गया, जहां वायुमंडलिय दबाव इतना अधिक था कि ऐसा लगता
25:25था मानो पूरा ब्रहमांड ही उसे चारों और से कुचर रहा हो।
25:30उसका सार संकुचित महसूस हुआ, उसका हर तंतु अकलपनिय भार के नीचे खिंच रहा था, मानो उसके अस्तित्व को एक
25:39अनंत सुक्ष्म बिंदु में निचोडा जा रहा हो।
25:42अन्य पीडित आत्माओं के विक्रित अध्जमे हुए शरीर दबाव से विक्रित होकर मूग पीडा में छटपटा रहे थे, उनके रूप
25:50लंबे और चप्टे हो गए थे।
25:53हवा ही एक गाढ़ा, चिपचिपा पदार्थ बन गई थी, जिससे हर सुक्ष्म श्वास एक संधर्ष बन गया, उसकी अवास्तविक फेपडों
26:02में एक जलती हुई अनुभूती पैदा हो रही थी।
26:06सूर्य के प्रकाश और गर्मी की यादें आत्मा के पीड़ित मन में कौनधती थी, केवल बर्फीली निराशा की ओवर्वेल्मिन भावना
26:15को तीवर करने के लिए।
26:18यमदूत उनके रूप धुंधली, बर्फ से धकी रोशनी में और भी विशाल और भयानक दिखाई देते थे, आत्मा को अथा
26:25गहराई में धकेलते रहे।
26:28आत्मा ने एक मूख अनसुनी आचना में चीख मारी, उसका सुक्षम स्वर कुचल देने वाली ठंड और दबाव के खिलाफ
26:36दुखाडा की गरज्टी खामोशी में खो गया।
26:40उसका रूप जो कभी कुछ हद तक स्थिर था, अब डगमदा रहा था और विक्रित हो रहा था, चरम तत्वों
26:47के अथक आक्रमन के आगे जुक रहा था, बरफीले रसातल में एक भूतिया चमक बन गया।
26:54पिंददान की अनुपस्थिती अब वास्तव में प्रकट होती है, उसे किसी भी अवशिष्ट गर्मी या शक्ती से बंचित कर देती
27:01है, जिससे वह बरफीले कश्टों के प्रती पूरी तरह से कमजोर हो जाती है।
27:08जैसे जैसे उसकी पीडा तीवर होती गई, आत्मा ने अपनी पहचान के अंतिम अवशेशों को खोना शुरू कर दिया, उसका
27:16उद्देश्य अंथीन दर्द के एक मात्र प्रेट में बदल रहा था।
27:21इस प्रकार दुखाडा की अनंत ठंड और कुचल देने वाले अंधकार में आत्मा अंत्तह एक भयावः प्रेट में ठोस हो
27:29गई, अपने बरफीले यातना ग्रह में फंसी एक शाश्वत पीडित प्रेट आत्मा।
27:35दुखाडा की बरफीली पकड से मुक्त होने के बजाए, प्रेट आत्मा को एक अद्रिश्य भयानक खींच ने अपनी ओर खींचा,
27:43उसे नए असहनिय यातना की ओर धकेल दिया।
27:47एक घूमते हुए अंधकार और तीवर शीतलता के भंवर से होकर प्रेट को निर्ममता से एक ऐसे लोक में धकेल
27:55दिया गया जहां की उश्मा असहनिय थी, मानो उसे किसी जलती हुई भट्टी में फेंक दिया गया हो।
28:02सूतप तभवन का भयावः परिद्रिश्य सामने आया, जहां बारह प्रजवलित कृत्रिन सूर्य आकाश में जल रहे थे, प्रत्येक किरण से
28:11असहनिय पीडा बरस रही थी।
28:13प्रत्येक सूर्य ब्रहमांडिय न्याय की एक जलती हुई आख के समान, एक असहनिय तीवर्ता के साथ नीचे चमकता था, प्रेत
28:23के सुक्ष्म शरीर पर तुरंत हमला करता था।
28:27हवा ही दमगोंटू गर्मी से जिल मिला रही थी, नीचे की जमीन पिघली हुई पीडा में बदल गई जहां हर
28:34कदम एक दहकता हुआ दाग बन जाता था।
28:37प्रेत का रूप यद्यपी आध्यात्मिक था, इन बारह सूरियों के निरंतर केंद्रित ताप हमले के तहट किनारों से स्पष्ट रूप
28:45से कामपने और घुलने लगा।
28:48उसका सूक्ष्म शरीर उसके पूर्व अस्तित्व का एक अवशेश भट्टी में रखे कागस की तरह फफोले पढ़कर जड़ने लगा, जिससे
28:57कच्ची आध्यात्मिक पीडा उजागर हो रही थी।
29:01यह यातना दोहरी थी, पिघलने की शारिरिक अनुभूती और अस्तित्वहिंता में घुलने का अस्तित्वगत भय इसका अपना सार खत्रे में
29:10था।
29:11उसके सांसारिक जीवन की यादें, धुन्धली और दूर की, चमकी और फिर ओजल हो गई, सूतप तभवन की अत्यधिक वर्तमान
29:21वेदना द्वारा भस्म हो गई।
29:23पिंददान न मिलने के कारण प्रेट को कोई सांत्वना या पोशन नहीं मिला, और वह स्वयं को पूरी तरह से
29:30असुरक्षित पाया, बारह दहकते हुए गोलों के खिलाफ एक असहाय प्रेट,
29:36निरंतर घटते हुए प्रेट के रूप से शुद्ध निराशा का एक मूख, कंठस्ट चीख उभरी, जो नरक की शक्ती के
29:43सामने एक मात्र धुन्ध के समान था,
29:47जैसे ही उसका अस्तित्व पूर्ण विनाश के कगार पर लग रहा था, ब्रहमांडिय धाराओं में एक अचानक हिंसक बदलाव ने
29:55प्रेट को दूर खींच लिया,
29:58दहक्ती गर्मी अचानक एक नए, समान रूप से क्रूर यातना में बदल गई, रोधरपुर के तूफानी आकाश उपर मंडरा रहे
30:06थे,
30:08विशाल ओले एक दुरभाव नापूर्ण शक्ती से भरे हुए, अशुब गहरे लाल बादलों से गिरने लगे, प्रेट पर कुचलने वाले
30:16वार करते हुए,
30:18बर्फीले प्रभाव के बीच, चमकते, गर्म अंगारों की एक निरंतर वर्षा नीचे गिरी, उसके कमजोर रूप को जला और जुलसा
30:26रही थी,
30:28सूतप तभवन की ज्वालाओं से पहले ही कमजोर और विक्रित हो चुका प्रेट, अब ठंडे उलों और दहक्ती आग के
30:35सन्युक थमले के नीचे लड़खडा रहा था,
30:39प्रत्येक ओले का प्रहार ऐसा लगता था मानो एक परवत उसकी आत्मा को कुचर रहा हो,
30:45जबकि प्रत्येक अंगारा उसके सुक्ष्म खोल के भीतर पीडा का एक नया नरक प्रजवलित कर रहा था,
30:53रौदरपुर में कोई राहत नहीं थी, छिपने के लिए कोई कोना नहीं था,
30:57केवल एक अथक मार अप्रायश्चित के लिए डिजाइन किये गए कष्टों की एक संगीत मय धुन,
31:04यातना के इन दोहरे चरम सीमाओं के बीच फंसा, प्रेट की मूग चीखें उजाड बंजर भूमी में गूज रही थी,
31:12जो उसके अंथीन भयावह अभिशाप का एक वसीयत नामा था,
31:17प्रेट को ऐसा लगा मानो उसके अस्तित्व का हर एक कन रौदरपुर की अनवरत यातनाओं से क्षत्विक्षत होकर एक अज्यात
31:25और अधिक भयावह पत की ओर धकेला जा रहा था,
31:30जैसे ही उसने एक नई सीमा में प्रवेश किया, आकाश से एक बरफीली वर्षा शुरू हो गई,
31:36जो प्रत्येक बूंद के साथ उसके सुक्ष्म शरीर को भेदती हुई, पयोवर्षन के जमे हुए दायरे की घोशना कर रही
31:44थी,
31:45प्रत्येक ओले और बरफीली बूंद उसके भीतर एक अनकही पीडा जगाती थी,
31:50जो एक ऐसे घाव की तरह महसूस होती थी, जिसे कभी भरा नहीं जा सकता, क्योंकि पिंड़ दान की उपेक्षा
31:58का पाप भारी पड़ता रहा,
32:00थंडी वर्षा ने उसके सुक्ष्म रूप को धीरे-धीरे जमाना शुरू कर दिया,
32:05जो उसके भीतर के हर दर्द को तीवर कर रही थी, और उसे उसके सांसारिक जीवन की उदासीनता की याद
32:12दिला रही थी,
32:14अंतह बर्फीले पयोवर्षन से बाहर निकलते हुए, प्रेत ने एक नए और अधिक उजाड परिद्रिश की ओर अपना मार्ग बनाया,
32:23जहां प्रत्यक कदम एक अंतहीन यात्रा का संकेत था, जैसे ही उसने शीताध्या में प्रवेश किया, एक अप्राकृतिक ठंड ने
32:32उसे अपनी आगोश में ले लिया, जहां हड्डियों को जमा देने वाली बर्फीली हवाओं ने उसके अस्तित्व को जखजोर कर
32:40रख दि
32:52प्रत्यक बर्फीला जोंका उसकी आत्मा को भीतर तक चीरता था, जो उसे उन रिष्टों की उपेक्षा की याद दिलाता था,
33:00जिन्हें उसने अपने भौतिक जीवन में अंदेखा कर दिया था
33:05उसके हृदय में उत्पन्न टीस उन वंशजों के लिए उसके प्रेम और कर्तव्य की एक कसैली याद दिलाती थी, जिन्होंने
33:13उसे पिंड दान से वंचित रखा था, जिससे उसकी पीड़ा अनंध हो गई थी
33:19अंगिनत वर्षों तक जमा देने वाली ठंड को सहने के बाद, प्रेत ने शीताध्या के बरफीले विस्तार से आगे बढ़कर,
33:27शितिच पर एक नई भयावः चुनौती को देखा
33:31जैसे जैसे वह बाहुभीती के निकट आता गया, भयावः चीखें और राक्षसी फुस्फुसाहतें हवा में घुलने लगी, जो यह संकेट
33:40दे रही थी कि वह अब आतंक के एक नए मुहाने पर खड़ा है
33:46बाहुभीती में प्रवेश करते ही, प्रेट ने अपने आपको गुंजती हुई खाईयों के एक जटिल जाल में पाया, जहां अथा
33:54गहराईया अपने ही भयावः रहसियों को उजागर करती थी
33:58खाईयों की अंधकारमय गहराईयों से भयानक छाया प्राणी उभरने लगे, जिनकी आखें जलते हुए अंगारों की तरह चमकती थी, जो
34:08प्रेट की कमजोर आत्मा को निशाना बना रहे थे
34:12आतंकित प्रेट अब तक की हर यातना से अधिक भयभीत, इन अनंत राक्षसों के सामने पूरी तरह से असहाय महसूस
34:20कर रहा था, जिनके पंजे उसके सुक्ष्म अस्तित्व को चीरने के लिए तयार थे
34:26चाया प्राणियों की तीखी चीखें हवा को चीरती थी, और उनके बर्फीले पंजे प्रेट के सुक्ष्म खोल को खरोंचते थे,
34:35जिससे एक ऐसी पीडा होती थी जो भौतिक घावों से भी गहरी थी
34:40इस अथाह पीडा में प्रेट को अपने संसारिक जीवन की सभी उपेक्षाए एक तीवरस पश्टता के साथ याद आई
34:48जैसे जैसे पच्चतावे की लहरें उसके भीतर उम्डी बाहुभीती का आतंत कई गुना बढ़ गया, मानो शहर स्वयन उसके अपरायश्चितित
34:57पापों पर क्रोधित हो
35:00उसकी मूग चीखें अब और भी भयानक बाहुभीती की गहरी खायों में गुन्जती थी, जो एक ऐसी आत्मा का वसीयत
35:08नामा थी, जिसे न तो शान्ती मिली और नहीं मुक्ती
35:13बाहुभीती के अंथीन क्षितिज से परे, एक भयावह, विशाल शहर की चाया उभरने लगी, जो समयमना का अप्रत्याशित आगमन था
35:23पूरी तरह से तूट चुका, आशा से रहित, प्रेत अब एक अद्रिश्य बल द्वारा समयमना के काले द्वारों की ओर
35:30खीचा जा रहा था, जहां उसके अंतिम और सबसे भयानक न्याय की प्रतीक्षा थी
35:36आत्मा समयमना के उन विशाल काले द्वारों के सम्मुखा पहुँची, जिनकी चाया ने उसे एक अज्यात भय से जकड लिया
35:45द्वार, अभेद्य और भयंकर किसी प्राचीन राक्षसी सभ्यता के अवशेश जैसे खड़े थे, जिनके उपर दरावनी आकृतिया उकेरी गई थी
35:56जैसे ही प्रेट द्वारों के पास पहुचा, एक अद्रिश्य उर्जावान बाधा ने उसे तीवर बल के साथ पीछे धकेल दिया
36:06अपनी निराशा में चिल्लाता हुआ, प्रेट ने बार-बार प्रवेश करने का व्यर्थ प्रयास किया, लेकिन हर बार उसे क्रूरता
36:14से धकेल दिया गया
36:15तभी आकाश से एक गहन, दिव्यवानी गुमजी, जिसने ब्रहमांड के रहस्य और आत्मा के दुर्भाग्य को उद्धाटित किया
36:25यह भगवान विश्णू की वानी थी, जो अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए, शांत और गंभीर ब्रहमांड के नेती के
36:33साक्षी
36:35भगवान विश्णू ने शांत स्वर में समझाया कि इस आत्मा को मृत्यू के बाद किये जाने वाले सपेंड़ दान अनुष्ठानों
36:43से वंचित रखा गया था
36:45पिंड़ दान के बिना हे गरुड विश्णू ने समझाया आत्मा पित्रिलोक की यात्रा और यमलोक में प्रवेश के लिए आवश्यक
36:53आध्यात्मिक उर्जा प्राप्त नहीं कर पाती
36:57इस भयावह सत्य को सुनकर प्रेट आत्मा एक बार फिर गेहन पीड़ा और पच्चतावे की मूग चीख में सिमट गई
37:06सपिंड़ दान के अभाव में इस आत्मा को यमलोक में प्रवेश से वंचित किया जाता है जहां इसका उचित न्याय
37:13होता
37:14बलकि इसे प्रेट योनी के शाप का सामना करना पड़ता है एक ऐसी स्थिती जहां इसे अनंत काल तक भटक
37:22ना होगा
37:24जैसे ही भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य शक्ती का आहवान किया आकाश में सोला भयानक नगरों की एक भयावह कापती
37:32हुई छवी उगई
37:34इन नगरों में आत्माओं को निरंतर भूख, प्यास और पीडा से त्रस्त देखा गया जो बिना किसी शांती के भटक
37:42रही थी
37:43उन्हें बिना किसी आश्रे या सहानु भूती के हर मोर पर केवल अकेलापन और निरंतर कष्ट जेलना पड़ता था
37:52अपनी भयावह नेती का साक्षात कार कर भटकती प्रेत आत्मा का अस्तित्व भय और निराशा के अथा सागर में डूख
38:00गया
38:01भगवान विश्णू ने अपनी गहरी ब्रहमांडिय आखों से प्रेत को देखा जिसमें ब्रहमांडिय न्याय की अडिक ग्रिडता जहलक रही थी
38:11यहां आत्मा अब एक प्रेत के रूप में इन सोला नगरों में अनंत काल तक भटकेगी जब तक इसे मोक्ष
38:18न मिले
38:19एक अद्रिश्यक प्रचन शक्ती ने प्रेत को समयमना के द्वारों से दूर विशाल बंजर भूमी में धकेल दिया
38:27अब यहां आत्मा अकेले ही अन्थीन और उजार प्रेत लोग के सोला नगरों के बीच अपनी शाश्वत यात्रा शुरू करती
38:35है
38:37इसकी मोक चीखें अब और भी भयानक प्रेत योनी के ठंडे निर्मम आकाश में अनसुनी गूंजती रही

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