00:08राचे के सडकों पर अभी दुर्गापुजा की रौनक पुरी तरह नहीं उत्री है लेकिन पंडालों के पीछे एक अलग दुनिया
00:14दिन रात जाग रही है कहीं बांस का धाचा खड़ा हो रहा है कहीं कप्ड़ी और सजावटी समान लगाये जा
00:20रहे हैं तो कहीं कारिगर किसी
00:22थीम को अंतिम आकार देने में जूटे हैं कुछ दिनों बाद यहीं पंडाल हजारों लोगों के आकर्शन का केंद्र होंगे
00:29लोग तश्वीरे लेंगे वीडियो बनाएंगे और इसकी भव्वता की तारीफ करेंगे लेकिन क्या किसी की नजर उन हाथों पर भी
00:37जाएगी ज
01:08आपने लोग है 24 घंड रात दिन रात दिन हो जाता है कभी बारीश हो तो मौसम खराव हो तो
01:17इसना टाइम होता है
01:20राचिके पंडालों के पीछे काम करने वाले कारीगर हर साल दूर दराज के इलाकों से यहां पहुँचते हैं।
01:26खास कर पस्चिम मंगाल के मेद्दीपूर और बिहार के कुछ इलाकों से बड़ी संख्या में कलाकार और मजदूर आते हैं।
01:33इनके लिए दुर्गापूजा सिर्फ तवहार नहीं बलकी कमाई का बड़ा मौका भी है।
01:38तीन से चार महिनी तक परिवार से दूर रहकर यही पंडाल उनका ठीकाना बन जाता है।
01:43तीन माइने के ज़्यादा हुआ है।
01:55तो खूस होकर लोटता है कि नहीं अपना परदेश जब जाता है तो खूस है।
02:03तो आच्छा ही है वह ब्रवस्था तो अच्छा ही है वह आदमी जो खाएगा खाली पैंडल नहीं है।
02:13उनका ध्याद भी अच्छा रहेगा हुआ उनका कॉमिती का ध्याद आच्छा हमी नहीं आच्छा.
02:22पूस है को नहीं होता करता है पूस होकर जाते है।
02:33ज़रूर देना करते है।
02:35I don't know.
02:36I don't know.
02:39All the people are happy to do.
02:41How many months are you going to do it?
02:45I've worked for a half a month.
02:51Because I've worked for a long time.
02:55I've worked for a long time.
02:58Pooja की तारीक जैसे जैसे नजदिक आती है, काम की रप्तार भी बढ़ती जाती है, दीन का उजाला खत्म होने
03:04के बाद भी काम नहीं रुपता, कोई धाचा तयार करता है, कोई सजावट में जुटा है, तो कोई थीम को
03:10अंतिम रूप देता है, सिमीत संकसादनों के बीच तैस
03:14समय पर पंडाल तयार करना इनके सामने सबसे बड़ी चुनोती होती है, पुजा समीतियां इनके रहने और खाने की विवस्था
03:22पंडाल के आसपास अस्थाई तोर पर करती है, अलग-अलग शिप्त में काम करने वालों के लिए भुजन की विवस्था
03:29भी उसी हिसाब से चल
03:44अलग-अलग डिस्टिक से ये लोग आते हैं, इन लोगों का यही दो महिना जो है, इन लोगों का लगातार
03:51काम चलता है, दो महिना ही इन लोगों को हम लोग पेमेंट लेते हैं, ये एक्ट्योल में इन लोगों का
03:57एक मेट होता है, ठिकेदार होता है, उसके थुरू हम लो�
04:03We will be able to take two-to-fact.
04:05I was born from Pujwa.
04:08I am done by the project.
04:10I will go to the work from the car.
04:12The job is required to be a job.
04:15How many teams are?
04:17I have to go to the car.
04:20I think it's about 15-30.
04:21I think it's about 40.
04:22When Pujwa is a town,
04:24the car looks like the car looks like the car.
04:28But it is like this,
04:30the car looks like the car looks like the car looks.
04:32foreign