यमलोक के भयानक नरकों को देखकर विचलित गरुड़ को भगवान विष्णु कर्मों के गूढ़ रहस्य समझाते हैं। क्या कर्मों का यह चक्रव्यूह केवल नरक तक ही सीमित है? इस एपिसोड में हम जानेंगे कैसे हमारे हर छोटे-बड़े कर्म निर्धारित करते हैं हमारा अगला जन्म, और कैसे पुण्य कर्म हमें स्वर्ग लोक तक पहुँचाते हैं। लेकिन क्या स्वर्ग सचमुच अंतिम पड़ाव है, या वह भी मोक्ष की राह में एक अस्थायी विश्राम स्थल मात्र? विष्णु जी बताते हैं मानव जन्म का अनमोल महत्व, धर्म के गुप्त सिद्धांत, और अंत में उस परम मार्ग का रहस्य जो हमें कर्मों के बंधन से मुक्त कर देता है। क्या गरुड़ इस रहस्य को समझ कर पाएगा मोक्ष की ओर पहला कदम? इस रोमांचक यात्रा में हमारे साथ जुड़ें! #गरुड़पुराण #GarudaPurana #Karma #Moksha #स्वर्ग #नरक #हिन्दूधर्म #SpiritualJourney #Liberation #विष्णु #गरुड़ #अध्यात्म #गरुड़पुराण_Ep9
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00:00नरक के अकलपनिये द्रिश्यों से विचलित पक्षीराज गरूर का हृदय तीवर पीडा से भर कर उनके समक्ष उपस्थित भगवान विश्नु
00:08के समक्ष आशा की अंतिम किरण के रूप में विलाप कर उठा।
00:13गरूर ने अपनी आखें बंद कर ली, उनके मन में उन अंगिनत आत्माओं की चीखें गूँज रही थी जिनहें उन्होंने
00:20अभी नरक की अगनी में जलते देखा था।
00:24उनकी आत्मा काम प्रही थी और उन्होंने करुणा के सागर भगवान विश्नु से प्रश्न किया हे प्रभु क्या इस भयानक
00:32और अंथीन दुहक से मुक्ती का कोई मार्ग नहीं है
00:37भगवान विश्नु ने अपनी असीम करुणा से भर कर गरुड की ओर देखा जिनके मन में संसार के समस्थ पापियों
00:44के लिए गहरी सहानु भूती उमड रही थी
00:48मृदु किंतु गंभीर स्वर में स्रिष्टी के पालक ने कर्म के गूढ नियमों का अनावरण करना आरंभ किया जो इस
00:55ब्रहमांड की नीम है
00:58हे गरुड भगवान विश्णु ने कहा यह संसार कर्म के अटूट नियमों से संचालित है जहां प्रत्येक क्रिया एक बीज
01:06के समान है
01:09उन्होंने समझाया कि ये दंड केवल कुरूरता नहीं अपितु उन कर्मों के प्रत्यक्ष परिणाम है जिन्हें आत्मा ने स्वयं अर्जित
01:17किया है
01:19प्रत्येक विचार, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कार्य एक अद्रिश्य ऊर्जा छोड़ता है जो अंत्ता लोटकर अपने निर्माता तक पहुँचती है
01:30गरूर ने व्याकुलता से अपने विशाल पंखों को फड़फडाया यह कलपना करते हुए कि क्या इन अटल नियमों से कभी
01:37कोई बच सकता है
01:40भगवान विश्णु ने गरूर की आंतरिक अशांती को समझा और उन्हें आशवासन दिया की कर्म का विधान पूर्णता निश्पक्ष और
01:48न्याय पूर्ण है
01:51प्रत्येक प्राणी को अपनी इच्छा से कर्म करने की स्वतंत्रता है, विश्णु ने समझाया, परंतु उन कर्मों के परिणाम से
01:59कोई बच नहीं सकता
02:01उन्होंने आगे कहा कि नरक के कष्ट किसी प्रतिशोध का परिणाम नहीं, बल्कि आत्मा द्वारा बोए गए विशैले बीजों के
02:09स्वाभाविक फल हैं
02:12भगवान विश्णु ने संचित कर्म के सिध्धान्त का वर्णन किया, जो आत्मा के साथ जन्मजन मांतर तक यात्रा करता है
02:21इसके उपरांत उन्होंने प्रारब्ध कर्म के विशै में बताया, जो वर्तमान जीवन में आत्मा के भाग्य के रूप में प्रकट
02:29होता है
02:31अंत में उन्होंने क्रियामान कर्म पर प्रकाश डाला, जो वर्तमान क्षण में हमारे द्वारा किये गए चुनाव हैं और भविश्य
02:39का निर्मान करते हैं
02:42गरुर के चहरे पर एक गहरी समझ की जलत दिखाई दी, जैसे ब्रह्मान के गूड रहस्य धीरे-धीरे उनके सामने
02:49खुल रहे हों
02:51यह मत भूलो, गरुर, भगवान विश्णू ने अपनी द्रिष्टी को व्यापक करते हुए कहा कि स्वर्भी केवल शुब कर्मों का
02:59एक अस्थाई प्रतिफल है
03:02उन्होंने समझाया कि पुनियों के क्षीन होने पर आत्मा को पुना मृत्यो लोक में लोटकर कर्मों का चक्र पूरा करना
03:09होता है
03:11गरुर के मुख पर विस्मय और श्रद्धा के भाव उभराए जब उन्होंने इस विशाल ब्रहमांडिय न्याय प्रणाली की गहराई को
03:20समझा
03:21विश्नु ने अंतिम मुक्ती के मार्ग की ओर इशारा करते हुए कहा इस अस्थाई कारावास से परे एक शाश्वत स्वतंत्रता
03:29का मार्ग है
03:30हे गरुर
03:32गरुर ने अत्यंत विनमरता पूर्वक अपने विशाल पंखों को समेटते हुए प्रभु से प्रश्न किया कि इस अद्रिश कर्म चक्र
03:40की उत्पत्ती कैसे होती है और यह जीव को किस प्रकार बांधती है
03:46भगवान विश्नु ने अपने मंध हास्य से संपूर्ण वैकुंठ को आलोकित करते हुए कहा कि कर्म का यह अटल विधान
03:54तीन मुख्य धाराओं, संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण में विभाजित है
03:59उन्होंने समझाया कि संचित कर्म वह विशाल अनन्तकोश है, जिसमें जीवात्मा द्वारा पिछले अंगिनत जन्मों में किये गए सभी अच्छे
04:08और बुरे कारियों का संग्रह होता है
04:12आकाश गंदा के समान घूमते इस संचित कर्म के भंडार को दिखाते हुए प्रभू ने स्पष्ट किया कि यह जीव
04:19के हर बीते हुए पल का एक अटूट और गुप्ट लेखा जोखा है
04:25नारायन ने आगे कहा कि इस संचित भंडार में से कर्मों का वह हिस्सा जो इस वर्तमान जीवन में भोगने
04:32के लिए चुना जाता है उसे ही प्रारब्ध कहते हैं
04:36प्रारब्ध के इसी अटल मार्ग को मनुष्य अपना भाग्य मान लेता है जो उसके जन्म, मृत्य, सुख और दूहक के
04:44मुख्य अवसरों को पहले से ही निर्धारित कर देता है
04:49इसके पश्चात श्री हरी ने क्रिमान कर्म की परिभाशा देते हुए बताया कि यह वह पुरुशार्थ है जो मनुष्य अपने
04:57स्वतंत्र विवेक से इस वर्तमान जन्म में करता है
05:02क्रेमान कर्म को एक नवजात बीज की तरह समझाते हुए प्रभों ने कहा कि आज बोया गया यह नया विचार
05:09या कार्यकल के संचित कर्म का हिस्सा बन जाता है
05:14उन्होंने रहस्यो धातन किया कि केवल शारिरिक कर्म ही नहीं अपितु मन में उठने वाला प्रत्येक अद्रिश्य विचार भी आत्मा
05:22के सुक्ष्म शरीर पर अमिट छाप छोड़ता है
05:26इन सुक्ष्म संसकारों को समझाते हुए नारायन ने कहा कि कोई भी विचार कभी नश्ट नहीं होता बलकि वह समया
05:34आने पर अपना फल देने के लिए ब्रहमांड में सुरक्षित रहता है
05:40पक्षी राज गरोर ने आश्चर यचकित होकर पूछा कि है प्रभु यदि प्रारब्ध पहले से तय है तो क्या जीव
05:47इस जटिल और अनन्थ चक्र से कभी मुक्त हो सकता है
05:51श्री विष्णू ने उत्तर दिया कि निश्काम कर्म अर्थात फलों की आसकती के बिना केवल कर्तव्य बुद्धी से किया गया
05:59कार्य ही इस चक्रव्यू को भेज सकता है
06:03निश्काम कर्म करने वाली आत्मा को दर्शाते हुए प्रभू ने बताया कि जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी
06:10उससे अच्छूता रहता है वैसे ही अनासक्त योगी कर्मों के बंधनों से मुक्त रहता है
06:17उन्होंने आगे एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम बताया कि कोई भी पुन्य कर्म किसी पाप कर्म को मिटा नहीं सकता बलकि
06:25दोनों का फल अलग-अलग भोगना ही पड़ता है
06:30ब्रहमांडिय न्याय की इस शुद्धता को स्पष्ट करते हुए नारायन बोले की अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब अलग-अलग
06:37बही खातों की तरहे रखा जाता है जहां कोई समझोता नहीं होता
06:43यहां तक की देवताओं और स्वयम महापुरुशों को भी जब वे प्रित्वी पर अवतार लेते हैं तो इस भौतिक जगत
06:50के कर्म नियमों का सम्मान करना पड़ता है
06:54गरुर ने इस परम सत्य को सुनकर श्रधा से अपने नयन मूंद लिये और भगवान के चर्णों में पूर्ण रूप
07:01से आत्मस्मर्पन कर दिया
07:04जगतपालक ने गरुर को आशिरवाद देते हुए कहा कि जब कोई आत्मा पूर्ण भक्ती और शर्नागती से मुझे पुकारती है
07:12तो मेरे अनुग्रह से उसके संचित कर्मों के बीज भस्म हो जाते हैं
07:18इस दैविय कृपा का वर्णन करते हुए उन्होंने दिखाया कि कैसे भक्ती की अगनी अज्यान और प्रारब्ध के बंधनों को
07:26सुलगते हुए अंगारों की तरह नश्ट कर देती है
07:30विश्नु ने अपनी दिव्यचर्चा को विराम देते हुए कहा कि कर्म के इस अटल चक्रवियों को समझना ही मोक्ष के
07:38द्वार खोलने की पहली सीधी है
07:42भगवान विश्नु की बातें सुनकर गरूर ने विनमरता पूर्वक हाथ जोड कर पूछा कि है प्रभुक उस परम धर्म का
07:49स्वरूप क्या है जो जीव को नरक की भयानक यंत्रनाओं से सदा के लिए मुक्त कर देता है
07:56श्री हरी ने मुस्कुराते हुए गरूर को बताया कि धर्म केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बलकि वह शाश्वत नियम है जो
08:04संपून ब्रहमांड की व्यवस्था और आत्मा के संतुलन को धारण करता है
08:11परमिश्वर ने धर्म के प्रथम स्तंभ सत्य की महिमा गाते हुए कहा कि जो मनुष्य जीवन में सदा सत्यवादी रहता
08:18है उसका मन निश्पाप होकर दैविय प्रकाश से भर जाता है
08:24सत्य के मार्ग पर चलने वाले जीव की आत्मा अत्यंत निर्मल और तेजस्वी दिखाई देती है जिसके सामने जूट और
08:32छल का अंधकार पल भर भी नहीं ठहर पाता
08:36विश्णु ने धर्म के दूसरे मुख्य आधार अहिंसा का वर्णन करते हुए कहा कि मन, वचन और कर्म से किसी
08:43भी प्राणी को तनिक भी पीडा न पहुचाना ही सच्चा धर्म है
08:48जो मनुष्य समस्त जीवों पर गया द्रिष्टी रखता है और उन्हें अपने समान समझता है उसके पापों की काली छाया
08:56स्वतही विलुप्थ हो जाती है
08:59भगवान विश्णु ने गरुर को आगे समझाते हुए कहा कि करुणा और निस्वार्थ सेवाभाव ही आत्मा को इश्वरिये चेतना से
09:08सीधा जोरते हैं
09:10जब कोई ग्रिहस्थ किसी भूखे या असहाय व्यक्ती को निहस्वार्थ भाव से अन्न और सहारा प्रदान करता है तो उसके
09:18द्वारा किया गया यह पुन्य सीधे बैकुंठ तक पहुँचता है
09:24जगतपालक ने इंद्रियन इग्रह और क्षमा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि क्रोध और वासना पर विजय पाना
09:31सबसे बड़ी आत्मजीत है
09:34जो साधक प्रलोभनों और भौतिक आकरशनों के बीच भी अपने चित्त को स्थिर रखता है उसके कर्म कभी भी बंधनकारी
09:43नहीं बनते
09:45विश्णु ने इमानदारी और अस्ते यानी चोरी न करने का नियम समझाते हुए कहा कि न्याय संगत तरीके से अरजित
09:52धन ही जीवन में सुख और शांती लाता है
09:57चलकपट से बटोरा गया धन भले ही क्षनिक सम्रिधी दे किंतु धर्म और इमानदारी से अरजित रोटी का एक टुकडा
10:04भी आत्मा को अनंत संतुष्टी देता है
10:09नारायन ने निशकाम दान के अध्भुत फल का बखान किया जहां दान देने वाले के मन में अहंकार का लेशमात्र
10:16भी भाव नहीं होना चाहिए
10:18जब कोई दानवीर बिना किसी ख्याती की इच्छा के अपनी संपत्ती का त्याग करता है तो उसका यह कार्य यम्राज
10:26के दंड विधान को भी निश्प्रभावी कर देता है
10:30श्री हरी ने एक महत्वपून रहस्य बताते हुए कहा कि केवल स्वर्ग प्राप्ती की इच्छा से किये गए सकाम कर्म
10:38भी जीव को पुनरजन्म के चक्र में ही बांधते हैं
10:43स्वर्ग में पुनियों का भोग समाप्थ होते ही जीव को पुना मृत्यो लोक में लोटना पड़ता है, इसलिए केवल निशकाम,
10:50भक्ती और धर्म ही परम्मोक्ष दिला सकते हैं
10:55पक्षी राज गरूर भगवान के इन दिव्य वचनों को सुनकर भाव विभोर हो गए और उनका हर एक संशय पूर्णत्य
11:02दूर होने लगा
11:04विष्णु ने आगे बताया कि प्रत्येक जीव को अपनी परिस्थिती और मर्यादा के अनुसार स्वधर्म का पालन करते हुए कर्मों
11:12के फल इश्वर को अर्पित कर देने चाहिए
11:16जब कोई योध्धा, राजा या साधारन मनुष्य अपने कर्तव्य को इश्वर की पूजा मानकर निभाता है तो उसके सारे कर्म
11:24भगवदर्पन होकर पावन हो जाते हैं
11:28नारायन ने उपदेश को पूर्ण करते हुए कहा कि जो प्राणी धर्म के इस पावन मार्ग पर चलता है, यमदूत
11:36कभी उसका स्पर्श भी नहीं कर सकते और वह सीधे मेरे परमधाम को प्राप्थ होता है
11:43नारायन ने गरोड की ओर देखते हुए अत्यंत गंभीर स्वर में कहा कि 84 लाख योनियों में भटकने के बाद
11:50जीव को यह अत्यंत दुरलब मानव शरीर प्राप्थ होता है
11:55उन्होंने समझाया कि पशुपक्षी, कीट पतंगे और वनस्पती केवल पूर्व कर्मों के फल भोगने के लिए जीते हैं क्योंकि उनमें
12:04सहीगलत का निर्णय लेने की चेतना नहीं होती
12:08जन्म जन्मांतर के अंधकार और संधर्ष को पार करके ही आत्मा इस स्तर पर पहुँचती है जहां वह अपने भाग्य
12:16का स्वयन निर्मान कर सकती है
12:19भगवान विश्णु ने रहस्योध घाटन किया कि स्वर्ग में रहने वाले देवता भी पुनह प्रित्वी पर मानव रूप में जन्म
12:27लेने की लालसा रखते हैं ताकि वे मोक्ष प्राप्त कर सकें
12:32पक्षी राज गरुर ने अत्यंत विस्मय और श्रद्धा से अपने पंक सिकोड कर और हाथ जोड कर इस महान सत्य
12:39को सुना जिससे उनकी शंकाएं दूर होने लगी
12:44नारायन ने आगे कहा कि केवल मनुष्य को ही विवेक रूपी वह अमूल्य उफार मिला है जिससे वह नश्वर संसार
12:51और शाश्वत परमाक्मा के भेद को समझ सकता है
12:56परंतु अत्यंत खेद की बात है कि अधिकांश मनुष्य इस अमूल्य जीवन को केवल क्षंधंगुर भौतिक सुखों और वासनाओं में
13:04वैसे ही गवा देते हैं जैसे कोई कांच के टुक्रों के लिए हीरा बेच दे
13:10माया के जाल में फंसाजीव अपनी वास्तविक दिव्य प्रकृती को भूल कर सांसारिक मुहमाया के दलदल में धंस्ता चला जाता
13:18है
13:20श्रीहरी ने गरोड को बताया कि यह मानव शरीर स्वय में संपूर्ण ब्रहमांड का लगुरूप है जिसके भीतर साथ दिव्य
13:28उर्जा चक्र और स्वय इश्वर का वास है
13:32प्रित्वी ही वह एक मात्र कर्म भूमी है जहां नए कर्मों का स्रिजन होता है और पुराने संचित कर्मों को
13:39ज्ञान की अगनी से भस्म किया जा सकता है
13:43मृत्यू के अंतिमक्षणों में जब आत्मा को अपनी भूल का एहसास होता है कि उसने बिना भक्ती के यह अनमोल
13:51जीवन व्यर्थ कर दिया तब उसका पश्चाताप अत्यंत भयानक होता है
13:57नारायन ने समझाया कि केवल मानव शरीर के माध्यम से ही प्राणायाम, ध्यान और योग जैसी साधनाएं संभव हैं जो
14:05आत्मा को परम तत्व से जोडती है
14:09जब कोई मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलते हुए निस्वार्थ भाव से कर्म करता है तो वह धीरे-धीरे साधारन
14:17स्तर से उठकर देवत्व और रिशित्व को प्राप्त कर लेता है
14:21इस यात्रा में संतों की संगती यानी सत्संग उस नौका के समान है जो मनुष्य को संसार रूपी अथा भवसागर
14:30को पार कराने में सहायता करती है
14:33पर्मात्मा ने अपनी योगमाया से गरुर को एक ऐसे ध्यानमगन साधक का दिव्यद्रिश दिखाया जिसकी चेतना सीधे वैकुंट के प्रकाश
14:42में विलीन हो रही थी
14:45उन्होंने स्पष्ट किया कि न तो नर्ग की आतनाओं में और नहीं स्वर्ग के विलासों में मोक्ष संभव है
14:51मुक्ती का द्वार केवल और केवल मानव जन्म की चोखट से ही खुलता है
14:57स्वर्ग तो केवल एक अस्थाई सुनहरी जेल है जहां मनुष्य अपने पुन्यों का भोग करने जाता है
15:04और पुन्यक्षीन होते ही उसे पुना मृक्यों लोक में गिरना पड़ता है
15:10इसलिए बुद्धिमान मनुष्य स्वर्ग की कामना नहीं करते
15:14बलकि वे सीधे मेरे चर्णों की अनन्य भक्ती चुनकर जन्ममन के इस चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाते
15:20हैं
15:22यह सुनकर पक्षीराज गरोर का हरिदय कृतग्यता से भर गया
15:26और उन्होंने मानव योनी के इस परम महत्व को समझकर प्रभु के चर्णों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया
15:34भगवान नारायन ने अपने दाहिने हाथ से वरद मुद्रा बनाकर गरोर को आशिरवाद दिया
15:40और उनके मुख पर संपून ब्रह्मांड के कल्यान की परमशांती और मुस्कान छागई
15:47भगवान नारायन ने अपनी मधुरवानी में आगे कहना प्रारंभ किया
15:51कि जो मनुष्य प्रिथवी पर केवल स्वर्ग प्राप्ती की कामना से यग्य और दान करते हैं
15:57वे मृत्यू के पश्चात अलोकिक देव्यान मार्ग से होकर स्वर्ग लोग की ओर बढ़ते हैं
16:04इस दिव्य मार्ग पर चलते हुए पुन्यात्माओं को अंधकार्मय यम लोग के स्थान पर अत्यंत शीतल, सुगंधित और दैविय प्रकाश
16:12से आलोकित स्वर्ग के भव्य द्वारों के दर्शन होते हैं
16:17स्वर्ग लोग के इन विशाल द्वारों पर रक्षक के रूप में खड़े देवदूत, अत्यंत, शान्त और आदरपून भाव से इन
16:25पुन्यात्माओं का स्वागत पुश पवर्शा और शंकनाद के साथ करते हैं
16:30वहाँ पहुचते ही गंधरवों का मधूर संगीत और अपसराओं का दिव्यन रित्य इन आत्माओं के मन को परमशान्ती और असीम
16:39आनन से सराबोर कर देता है
16:42इसके पश्चात ये पुन्यात्माए देवराज इंद्र की अत्यंत प्रकाशमान सुधर्मा सभा में प्रवेश करती हैं जो कोटी सूर्यों के समान
16:51चमकीले रतनों से सुसज़ित है
16:54वहा सिनहासन पर विराजमान देवराज इंद्र अपने वजर को धारण किये हुए अति तेजस्वी रूप में इन पुन्यात्माओं को उनके
17:03सतकर्मों के आदर स्वरूप आसन प्रदान करते हैं
17:08स्वर्ग के अलोकिक उद्यानों में बहने वाली नदिया साक्षात अमरित की धाराएं हैं जिनके किनारों पर कामधेनु गाएं हरीभी घास
17:16चरती हुई दिव्यदूध की वर्षा करती हैं
17:20वहां स्थित कल्प वरिक्ष अपनी स्वर्णमई शाखाओं से हर उस वस्तु की वर्षा करता है जिसकी कामना वह पुन्यात्मा अपने
17:29मन में मात्र एक क्षण के लिए भी करती है
17:33पुन्य के प्रभाव से इन आत्माओं को हवा में तैरते हुए भव्य और चमकीले विमान प्राप्थ होते हैं जो नीलम
17:40और मानिके जैसे दिव्यपत्थरों से बने महल के समान होते हैं
17:46इन दिव्य महलों में रहते हुए वे आत्माएं बिना किसी शारिरिक कष्ट, गुढ़ापे या बीमारी के हजारों वर्षों तक देवताओं
17:54के समान ही दिव्य भोगों का आनन्द लेती हैं
17:58नंदन्वन के अत्यंत सुगंधित पारिजात पुष्पों की मंदमंद सुगंध से भरा वातावर्ण इन पुन्यात्माओं के हृदय को सदैफ प्रफुलित और
18:07चिंतामुक्त रखता है
18:10रंभा, उर्वशी और मेनका जैसी अपसराये अपनी अलोकिक कला और सुन्दर्ता से इन पुन्यात्माओं का मनोरंजन कर स्वर्ग के आनन्द
18:19को चरम सीमा तक पहुचा देती हैं
18:23किन्तु तभी भगवान विश्णू ने गंभीर होकर गरुर को सचेत किया कि यह संपूर्ण वैभव और सुख केवल तब तक
18:30ही रहता है जब तक की जीव के पुन्यकर्मों का कोश बचा रहता है
18:36स्वर्ग के भोगों का उपभोग करते करते पुन्यात्मा के संचित पुन्यों का क्षय उसी प्रकार होता है जैसे दीपक में
18:44तेल समाप्थ होने पर उसकी लौ धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है
18:50जैसे ही पुने कर्मों का संचय समाप्थ होने की ओर बढ़ता है, उस पुन्यात्मा के कंठ में धारन की हुई
18:57पारिजात की माला मुर्जाने लगती है और उसका तेज फीका पढ़ने लगता है
19:03अपने अंत को निकट देखकर वह आत्मा अत्यंत व्याकुल हो उठती है और स्वर्ग के सुन्दर द्रिश्यों के बीच भी
19:11उसे अपने पतन का भय सताने लगता है
19:15अंत्य पुनियों के पूरी तरह समाप्थ होते ही उस जीव को अत्यंत क्रूर्ता पूर्वक स्वर्ग से नीचे की ओर धकेल
19:22दिया जाता है और वह पुनह बादलों और वर्षा के जल के माध्यम से प्रित्वी पर गिरता है
19:30पक्षी राज गरूर ने बड़े ध्यान से सुना कि किस प्रकार स्वर्ग भी केवल एक शनिक और सुखत कारागार है
19:37जो मनुष्य को पुनह जन्म और मृत्यू के चक्र में धकेल देता है
19:42भगवान नारायन ने स्पष्ट किया कि केवल वही बुद्धिमान मनुष्य परम शान्ती को प्राप्ट करता है जो स्वर्ग की अस्थाई
19:50कामना त्याग कर सीधे मोक्ष और मेरी अनन्य भक्ती का मार्ग चुनता है
19:56यह सुनकर गरूर के भीतर का सारा भ्रम नश्थ हो गया और उन्होंने स्रिष्टी के इस परम सत्य को जानकर
20:04श्री हरी के चर्णों में सिर जुका कर अनन्त कोटी प्रणाम किया
20:08भगवान नारायन ने पक्षी राज गरूर के विस्मय को भापते हुए स्वर्ग के उन अद्रिष्य और जटिल स्तरों का वर्नन
20:16आरंब किया
20:17जहां केवल पुन्यात्माएं ही प्रवेश पाती हैं किन्तु जिनकी अवधी सीमित होती है
20:24उन्होंने इंद्र लोग का वर्नन किया जो अपने भव्य महलों, अलोकिक उध्यानों और मन्दार पुष्पों की सुगंध से परिपूर्ण स्वर्ग
20:32का प्रथम और सबसे प्रसिद्ध द्वार है जहां इंद्र देव का एश्वर्य अतुल्निया है
20:39यहां दिव्य अपसराय अपने मनमोहक नृत्यों और गंधर्व अपने मधोर संगीत से वातावर्ण को जीवंत बनाते हैं, जहां प्रतेक्षण आनंद
20:49और उल्लास से परिपूर्ण प्रतीत होता है
20:53गरुर्ण ने इंद्र लोग की इस भव्यता को देख कर थोड़ी देर के लिए अपने प्रशनों को भुला दिया, जहां
21:00पुने कर्मों का फल भोगने वाली आत्माए स्वर्गिक सुखों में लीन थी
21:05किन्तो भगवान विश्णु ने शीधर ही स्पष्ट किया कि ये सुख क्षन भंगुर हैं और पुने कर्मों के क्षीन होते
21:13ही आत्मा को पुना मर्थ्य लोक में लोटना पड़ता है
21:17उन्होंने बताया कि इंद्र लोक से उपर महर लोक और जनलोक जैसे उच्चतर लोक भी हैं जहां की शांती और
21:25ज्ञान की अनुभूती और भी सुख्ष्म तथा गेहन है
21:29इन लोकों में आत्माय भौतिक इच्चाओं से परे केवल आध्यात्मिक उन्नती और इश्वरिय प्रेम में लीन रहती हैं जहां प्रत्येक
21:38विचार शुद्ध ज्ञान का प्रतीक होता है
21:42यहां का आनंद इंद्रिय जन्य नहीं अपितु आत्मिक है जहां परमात्मा से संबंध की गेहन अनुभूती आत्मा को परम्त्रिप्ती प्रदान
21:51करती है
21:53गरूर ने समझा कि जैसे जैसे लोक उच्छ होते जाते हैं वैसे वैसे भौतिक सुखों की आसक्ती कम होती जाती
22:00है और आत्मिक संतुष्टी का स्तर बढ़ता जाता है
22:05किन्तो भगवान नारायन ने फिर स्मरंड दिलाया कि ये सभी लोक चाहे कितने भी पवित्र और सुक्ष्म क्यों नहों प्रकृती
22:13के गुणों और कर्मों के नियमों से बंधे हुए हैं
22:18गरुड को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उच्च लोकों में भी सुक्ष्म वासनाएं और आसक्तिया आत्मा को पूर्ण मुक्ती प्राप्त
22:26करने से रोक सकती हैं
22:30भगवान ने समझाया कि स्वर्ग में किये गए पुन्य का भी एक निश्चित कार्यकाल होता है जिसके समाप्त होने पर
22:37जीव को पुनह जन्मर्ण के चक्र में लोटना पड़ता है
22:42गरुर ने हृदय से महसूस किया कि स्वर्ग भी अन्तह एक भव्यकारागार ही है जहां स्वर्णजडित पिंजरे में एक दिव्यपक्षी
22:50की तरह आत्मा अस्थाई रूप से कैद रहती है
22:55उन्होंने एक खण के लिए उन आत्माओं को देखा जो अपने पुन्य के समाप्त होते ही स्वर्ग के उच्छ शिखरों
23:02से पुनह मर्त्य लोग की ओर गिर रही थी
23:04एक अद्रिश्य अनिवार्य शक्ती द्वारा खीची जा रही थी
23:10भगवान नारायन ने अपने मुख मंडल पर एक हलकी मुस्कान के साथ कहा कि पुनरजन्म का यह अटल चक्र तभी
23:17तूट सकता है
23:18जब आत्मा सभी लोकों से परे मुझसे जुडने का मार्ग चुने
23:24उन्होंने विस्तार से मोक्ष के मार्ग का वर्णन किया
23:27जहां कर्मों के बंधन पूर्णता विलीन हो जाते हैं और आत्मा जन्ममर्ण के चक्र से स्थाई रूप से मुक्त हो
23:34जाती है
23:36गरुर ने अन्तह जीवन के इस परम सत्य को आत्म साथ कर लिया
23:41कि स्वर्ग का सुख भी एक मृगतरिशना के समान है और वास्तविक आनंद केवल परमात्मा की अनन्य भक्ती में ही
23:48नहित है
23:50भगवान नारायन ने इस मार्ग को निशकाम कर्म और अनन्य भक्ती के माध्यम से प्राप्त करने का सूत्र दिया, जहां
23:58परिणाम की चिंता किये बिना कर्तव्य का पालन किया जाता है
24:03गरुर ने श्री हरी के चर्णों में पुनह सिर जुकाया और प्रतिग्याकी की वे सदैव इसी मोक्ष मार्ग का अनुसर्ण
24:10करेंगे, जिससे आत्मा को वास्तविक और शाश्वत मुक्ती मिल सके
24:15और इस प्रकार कर्मों का यह गुप चक्रव्यू, जिसके भीतर स्वर्ग भी एक अस्थाई जेल था, गरुर के लिए एक
24:23स्पष्ट और मुक्तिदायक सक्य बन गया
24:26भगवान श्री हरी ने आगे समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार अती वर्षा के पश्चात मेख खाली हो जाते हैं,
24:34उसी प्रकार पुन्य समाप्थ होते ही स्वर्गिय भोग का अधिकार भी समाप्थ हो जाता है
24:41स्वर्ग लोक में विचर्ण करती आत्माय अमरावती पूरी की स्वर्ण गलियों, पारिजात के महकते व्रिक्षों और देवकन्याओं के नरीति में
24:49लीन होकर यह भूल जाती हैं कि यह सुख भी सीमित है
24:55अपने पूर्वजन्म के महान दान और धर्म के प्रभाव से आत्मा स्वर्ग के दिव्य अमरित और अपसराओं के वैभव का
25:02वर्षों तक निश्चिन्थ होकर उपभोग करती है
25:06परंतु कर्म चक्र के अटूट नियमानुसार प्रत्येक भोगे गए पल के साथ उस आत्मा का संचित पुन्यकोष धीरे-धीरे क्षीन
25:14होने लगता है
25:17स्वर्ग में पतन का पहला संकेट तब मिलता है जब आत्मा के गले में पड़ी पारिजात माला मुर्जाने लगती है
25:24और उसकी दिव्यकान्ती मंद पढ़ने लगती है
25:29आभाक्षीन होते ही देवडूत और अपसराय उस आत्मा से अपना मुख मोड लेते हैं जिससे स्वर्ग का वह भव्य प्रांगण
25:37भी एकाएक बेगाना लगने लगता है
25:41जिस स्वर्ग को आत्मा ने अपना स्थाई धाम मान लिया था वही स्थान अब उसके लिए भारी भय और मोभं
25:48का केंद्र बन जाता है
25:51तब भगवान विश्णुगरूर को क्षीने पुन्य मर्त्य लोकं विशंती का शाश्वत सत्य बताते हैं जो दर्शाता है कि पुन्य समाप्थ
26:00होते ही मृत्य लोक में लोटना अनिवार्य है
26:04स्वर्ग के द्वार उस आत्मा के लिए बंध हो जाते हैं और वह किसी तूटते हुए तारे की भाती तीवर
26:10गती से आकाश मार्ग से नीचे गिरने लगती है
26:15चीखती और छटपटाती हुई वह आत्मा मेगों और वायुमंडल के विभिन स्तरों को भेदती हुई प्रिथवी के वातावर्ण में प्रवेश
26:23करती है
26:25कर्मों की दिशा के अनुसार वह वर्षा की बूंदों के माध्यम से प्रिथवी पर आकर मिट्टी, जल अथवा औशधियों में
26:33आश्रय लेती है
26:36ततपश्चात वह अन्न के रूप में पिता के शरीर में प्रवेश करती है और फिर माता के गर्भ में एक
26:42नए जीवन का बीजारोपन होता है
26:46नौ महीनों तक अंधकार्मय गर्भ में रहने के बाद वह जीव पुनह रोते हुए इस संसार में जन्म लेता है
26:53और संसारिक मोह के जाल में फंस जाता है
26:57वही आत्मा खिर से बाल्यावस्था, यवन और व्रिधावस्था के दौर से गुजरती हुई काम, क्रोध और तृष्णा के चक्रवियों में
27:06पुनह बंदी बन जाती है
27:09श्री हरी समझाते हैं कि नरक जहां पाप भोगने की भट्टी है, वही स्वर्ग केवल एक सोने का पिंजरा है,
27:16जो आत्मा को मोक्ष से दूर रखता है
27:20यह सुनकर गरूर के नेत्र खुल गए और उन्होंने महसूस किया कि सच्चा सुख स्वर्ग के वैभव में नहीं, बलकि
27:28इस पुनर्जन्म के चक्र से सदा के लिए मुक्थ होने में है
27:32भगवान विश्णू ने सपश्ट किया कि केवल वैराग्य और भक्ती का जल ही कर्मों के इस अटूट बंधन और स्वर्गिय
27:40भ्रम को पूरी तरहद हो सकता है
27:44उन्होंने गरूर को परमपद वैकुंठ धाम का अलौकिक ग्रिश दिखाया, जहां पहुँची आत्माई फिर कभी दुखों और पुनर्जन्म के संसार
27:52में नहीं लोटती
27:54परमज्यान प्राप्त कर पक्षी राज गरूर ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान नारायन के कमलचर्णों में अपना शीष जुकाया और कृतज्यता
28:03व्यक्त की
28:05इस प्रकार स्वर्ग और नरक दोनों की अनित्यता का यह रहस्य सिद्ध हुआ कि केवल प्रभो भक्ती ही जीव को
28:12कर्मों के इस गुप्ट चक्रव्यू से मुक्त करा सकती है
28:17भगवान श्री हरी विष्णु ने मंद मुस्कान के साथ गरुड से कहा कि कर्मों के इस जटिल चक्रव्यू को भेद
28:24कर परमपत पाने का केवल एक ही अमोग हुपाय है
28:29पहला मार्ग भक्ती योग का है जहां जीव अपने समस्त कर्मों, फल की इच्छाओं और अहंकार को पूर्ण समर्पन के
28:36साथ परमात्मा के चर्णों में सौंप देता है
28:41निशकाम भाव से प्रभो को अर्पित किया गया एक छोटा सा पत्र पुष्पिया जल का बूंद भी जन्मों जन्मांतर के
28:48संचित पाप पुने के पहाडों को भस्म कर देता है
28:53जब भक्त किसी सांसारिक फल की इच्छा के बिना कर्म करता है तो उसके कर्म फल नहीं देते और नए
29:00कर्मबीज का निर्मान पूरी तरह थम जाता है
29:04पक्षी राज गरुर परम पिता नारायन की इस मरमसपर्शी वानी को सुनकर भक्ती और असीम कृतग्यता के अश्रूओं से भर
29:12उठे
29:14तत्पश्चात भगवान विश्णू ने ज्ञान योग के गूर तत्व का उदघाटन किया जो अज्ञान के आवर्ण को काट कर जीव
29:21का सत्य से साक्षातकार कराता है
29:25ज्ञान योग मनुष्य को यह बोध कराता है कि वह यह नश्वर शरीर या पंच्चतत्व नहीं बलकि सर्वव्यापी और नित्य
29:33चैतन्य आत्मा है
29:36जिस प्रकार प्रचन प्रज्वलित अगनी इंधन के धेर को क्षण भर में भस्म कर देती है, ठीक उसी प्रकार आत्म
29:43ज्ञान की अगनी समस्थ संचित कर्मों को जला डालती है
29:48परम ज्यान प्राप्थ होते ही अज्यानता का भ्रम सदा के लिए मिट जाता है और आत्मा अपने भीतर ही परमात्मा
29:56का अलौकिक दर्शन करती है
29:59श्री हरी ने समझाया कि भक्ती हरिदय को निर्मल बनाती है और ज्यान बुद्धी को स्थिर करता है और इन
30:06दोनों के संगम से ही परम मुक्ती मिलती है
30:10इस आत्मग्यान और भक्ती के उदे होते ही जन्मम्रित्यु का वह भयानक कालचक्र सदा के लिए तूट कर बिखर जाता
30:18है
30:19कल्युग में इस परमग्यान और मुक्ती को पाने का सबसे सरल मार्ग केवल प्रभु के पवित्र नाम का निरंतर जाप
30:26और स्मरण है
30:29जो प्राणी निरंतर हरिनाम का आश्रय लेता है उसके निकट यम्दूत तो क्या स्वयंकाल भी भयभीत होकर दूर खड़ा रहता
30:37है
30:39भगवान नारायन ने गरूर को आश्वस्त किया कि जो जीव सर्वभाव से मेरी शरण में आजाता है उसके सभी पापों
30:47का क्षय मैं स्वयंकर देता हूँ
30:50यह सुनकर गरूर ने उच्शुकता से पूछा की है नाथ
30:54संसारिक ग्रिहस्त जीवन में उल्जा साधारन मनुष्य इस निश्का मार्क का पालन कैसे कर सकता है
31:02भगवान विश्णों ने उत्तर दिया कि मनुष्य को अपने सभी सांसारिक कर्तव्यों का पालन बिना आसकती के इश्वर की सेवा
31:10समझकर कर्म योग के रूप में करना चाहिए
31:14जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहकर भी उसकी एक बूंद से भी नहीं भीगता उसी प्रकार अनासक्त कर्मयोगी
31:22संसार में रहकर भी कर्मदोश से मुक्त रहता है
31:26इस सन्मार्ग पर बढ़ाया गया एक छोटा सा कदम भी मनुष्य को पतन और नरक की घोर यातनाओं से सरवदा
31:34के लिए सुरक्षित कर देता है
31:37गरूर पुरान के इस अन्तिम और सरवोच रहस्य को जानकर पक्षी राज गरूर का मन पूर्णत है शांत, त्रिप्त और
31:44संशय मुक्त हो गया
31:46और इस प्रकार भक्ती और ज्यान की शरण में आया हुआ जीव कर्मों के इस गुप्ट चक्रव्यू से छूटकर सदैव
31:54के लिए वैकुंठ धाम की अमर्ता प्राप्त करता है
31:58भगवान श्रीहरी विष्णु ने वैकुंठ लोग के परम पावन वातावर्ण में पक्षी राज गरूर को संबोधित करते हुए कर्मों के
32:06बंधन को काटने वाले परम सत्यनिशकाम कर्म का रहस्य बताना आरंभ किया
32:12पक्षी राज गरूर ने अपने विशाल सुनहरे पंखों को समेट कर और अपने दोनों हाथों को श्रधा पूर्वक जोड़कर भगवान
32:20नारायन के मुखारविन से निकलने वाली इस दिव्य अमरितवानी को अत्यंत एकागरता से सुनना प्रारंभ किया
32:28मधुसूदन ने समझाया कि संसार में कोई भी जीव कर्म किये बिनाक्षन भर भी नहीं रह सकता परंतु बंधन कर्मों
32:36से नहीं बल्कि उनके फलों के प्रती मन में छिपी आ सकती और कामना से उत्पन होता है
32:43भगवान ने एक सुन्दर रूपक देते हुए स्पष्ट किया कि जिस प्रकार जल में रहने पर भी कमल का पत्ता
32:50जल की एक बून से भी लिप्त नहीं होता
32:52ठीक उसी प्रकार निशकाम कर्मयोगी संसार में रहकर भी कर्मों के लेट से सरवदा अचूता रहता है
33:00इस दिव्यग्यान को दर्शाने के लिए नारायन ने एक ऐसे राजा का द्रिश्य प्रस्तुत किया जो स्वर्ण मुकुट और राजसी
33:08वस्त्रों से सुसजित होकर भी अपने हृदय में स्वयन को केवल ईश्वर का सेवक मान कर संपूल्ण प्रजा का पालन
33:15करता है
33:17इसके विपरीत सकाम कर्म करने वाले एक व्याकुल व्यापारी का चित्र दिखाते हुए प्रभु ने स्पष्ट किया की कैसे फलों
33:25की त्रिश्ना मनुष्य को चिन्ताओं और आशंकाओं के अग्रिश्य जालों में जकड कर दुखों के चक्रवात में धकेल देती है
33:33प्रभु ने पुनह निश्काम कर्मी का महिमामंदन करते हुए कहा कि जो व्यक्ति लाभानी और जैपराजय को एक समान समझ
33:42कर अपना कर्तव्य पूरा करता है वह रात्री में तारों की शीतल छाव में परम शान्ती का अनुभव करता है
33:50भगवान विश्णू ने गरूर को बताया कि निश्काम भाव से की गई साधना और कर्तव्य कर्म मनुष्य के पूर्व संचित
33:58पाप्पुनियों के बीजों को उसी क्षण भस्म करना प्रारंभ कर देते हैं जैसे प्रजवलित अगनी सूखी लकडियों को नश्ट करती
34:05है
34:21इस गेहन रहस्य को सुनकर पक्षी राज गरूर के मन में जिग्यासा जागी और उन्होंने अत्यंत विनमरस्वर में पूछा कि
34:29इस मायावी संसार के पारिवारिक और सामाजिक बंधनों के बीच एक साधारन मनुष्य इस अनासक्ती को कैसे प्राप्त कर सकता
34:37है
34:39मुस्कुराते हुए कमल्नियन भगवान ने उत्तर दिया कि जब मनुष्य स्वयन को करता मानना छोड़कर स्वयन को उस परम सत्ता
34:46के हाथ की केवल एक कठपुतली या निमित मात्र समझ लेता है तब अहंकार का नाश हो जाता है
34:54प्रभु की वानी के साथ ही अंतरिक्ष में एक तेजस्वी धनुर्धर का बिम उभ्रा जो पूरी एकाग्रता से प्रत्यंचा चड़ाते
35:02हुए भी अपनी द्रिष्टी और कर्म को केवल इश्वर की इच्छा के अधीन समर्पित किये हुए था
35:09श्रीहरी ने स्वधर्म के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कहा कि दूसरों के सरल प्रतीत होने वाले कर्तवियों की तुलना
35:17में अपने कठिन और जन्मजात स्वधर्म का पालन करना ही आत्मा की उन्नती का एक मात्र मार्ग है
35:25चमकते हुए रत पर सवार एक वीर योध्धा का द्रिश दिखाते हुए भगवान ने स्पष्ट किया कि रनभूमी में बिना
35:32किसी व्यक्तिगत ग्वेश के न्याय की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना भी एक महान निश्काम यद्य है
35:40वैकुंठ नाथ ने घोशित किया कि जो साधक अपने कर्मों के फलों को मुझे अर्पित कर देता है उसके कर्मों
35:47का खाता सदा के लिए शून्य हो जाता है और वह सीधे मेरे परमधाम वैकुंठ में प्रवेश का अधिकारी बनता
35:54है
35:55तभी वैकुंठ की स्वर्णेम आभा में यमराज का वह विशाल चित्रपट स्वता विलीन हो गया जिसमें मनुश्यों के पापों और
36:04पुन्यों का अन्वरत लेखा जोखा रखने वाला बही खाता दर्ज था
36:09गरुर पुरान के इस अंतिम और सर्वोच सत्य को हरिध्यंगम कर पक्षी राज गरुर का संपून अस्तित्व परम आनंद से
36:16भर गया और उनके मुख से प्रभु की स्तुती के पावन स्वर गूंजने लगे
36:22नारायन के चतुर्भुज स्वरूप से निकलने वाले कोटी सूरियों के समान तेजस्वी प्रकाश ने संपून ब्रहमांड को आलोकित कर दिया,
36:31जिससे अज्यान का अंधकार सदा के लिए विदा हो गया
36:35करुणा सागर भगवान विश्णु ने अपने अभय मुद्रा वाले हस्ट से पक्षी राज गरुड और संसार के समस्थ संतप्त जीवों
36:43को आशिरवात देते हुए उन्हें माया के इस जाल से मुक्त होने का वर्दान प्रदान किया
36:49और इस प्रकार गरुर पुरान की इस दिव्ययात्रा के पूर्ण होने पर ज्ञान और भक्ती का यह परम गुप चक्रव्यू
36:57सुलज गया जिसने युगो युगो तक मानव जाती को मुक्ती का मार्ग दिखाने का संकल्प पूरा किया
37:04भगवान विश्णु ने अपने परमशांत और गंभीर स्वर में मोक्ष का रहस्य प्रकट करते हुए कहा कि मानव जीवन का
37:11अंतिम और सर्वोच लक्ष इस जन्ममृत्यू के अंतीन संसार्चक्र से पूर्ण मुक्ती पाना है
37:18इस भौतिक जगत के नश्वर बंधनों और क्षण भंगुर सुखों का त्याग कर जब जीवात्मा अपने वास्तवित दिव्यस्वरूप को पहचान
37:27लेती है तब वह मोक्ष की पहली सीधी पर कदम रखती है
37:32पंच्तत्वों से निर्मिक इस नश्वर शरीर के विलीन होने पर जब अंतहकरन पूरी तरह शुद्ध हो जाता है तब समस्थ
37:40सांसारिक वास्तनाएं कपूर की भानती उड़कर विलीन हो जाती है
37:46ज्यान मार्ग पर चलने वाला साधक जब विवेक रूपी तीक्षन खडग से माया के इस असीम और भ्रामक जाल को
37:53काट देता है तब उसे शाश्वत सत्य का साक्षातकार होता है
37:59भक्ती मार्ग के परम प्रवाह में बहकर जब भक्त का अहंकार पूरी तरह गल जाता है तब उसका अस्तित्व भगवान
38:06के अनंत प्रेम सागर में सदा के लिए एकाकार हो जाता है
38:12निश्काम कर्म योग के द्वारा जब मनुष्य अपने प्रत्येक कर्म को बिना किसी फल की इच्छा के परमात्मा को समर्पित
38:19कर देता है तब उसके संचित कर्मों के सारे बीज भस्म हो जाते हैं
38:25अंत समय में प्रान जब सुशुम्ना नाड़ी के माध्यम से उपर की ओर बढ़ते हैं तब मुलाधार से लेकर सहसरार
38:33चक्र तक की यात्रा जीव को परम चेतना के द्वार पर ले आती है
38:38जैसे ही चेतना ब्रहमरंध्र को भेद कर बाहर निकलती है जीवात्मा सासारिक सीमाओं को तोड़कर अनंत ब्रहमांडिय उर्जा में स्वतंत्र
38:47होकर विलीन हो जाती है
38:50इस प्रकार मुक्थ हुई वह दिव्य आत्मा नक्षत्रों, ग्रहों और सूर्यचंद्र की सीमाओं को पार करती हुई उस परमधाम की
38:58ओर बढ़ती है जहां काल की कोई सत्ता नहीं है
39:03सक्त्व, रज और तम नामक तीनों गुनों की सीमा से परे जाकर वह आत्मा उस अव्यक्त, निराकार और स्वयम प्रकाशित
39:11परम ब्रहमा में प्रवेश करती है जहां केवल सत्यकावास है
39:17मोक्ष की यह स्थिती किसी लोक विशेश में जाने का नाम नहीं, बलकि अनंत आनंद, असीम शान्ती और द्वंदवों से
39:24पूर्ण मुक्ती का साक्षात अनुभव है
39:28जैसे पानी की एक बून्द विशाल महासागर में गिरकर अपना प्रिथक अस्तित्व खो देती है, खीक वैसे ही जीवात्मा अविनाशी
39:37परमात्मा में मिलकर स्वयम परमात्मा ही बन जाती है
39:42चतुर भुजधारी भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ गरूर को समझाया कि मोक्ष कोई बाहरी वस्तु नहीं बलकि स्वयन
39:50की आत्मा की गहराई में छिपा हुआ वास्तविक स्वरूप है
39:55पक्षी राज गरूर भगवान के मुक्ष से मोक्ष की इस अलोकिक महिमा को सुनकर श्रद्धा और विस्मय से भरकर एकाग्रचित
40:03होकर उनके चर्णों में बैठ गए
40:06इस दिव्य ज्यान के प्रभाव से गरूर के मन का अंतिम संशय भी उसी क्षन विलीन हो गया, जैसे उदित
40:13होते सूर्य के प्रकाश से रात्री का घना कोहरा स्वतह समाप्थ हो जाता है
40:19देवलोग के समस्ट गंधर्व, देव और रिशिमुनी भी इस परम ज्यान की अमरित वर्षा को सुनकर आकाश से पुष्पों की
40:26वर्षा करने लगे
40:28अत्यंत गदगद कंट से पक्षीराज गरूर ने भगवान जनार्दन के पावन चर्णों में साष्टान दंडवत प्रणाम किया और उनके प्रती
40:37अपनी अनंत कृतग्यता ज्यापित की
40:41क्रिपानिधान श्रीहरी ने अपने दिव्य अभवय हस्त को गरूर के मस्तक पर रखकर उन्हें अविनाशी ज्यान और सदा उनके हृदय
40:48में निवास करने का वर्दान दिया
40:52उसक्षन पक्षीराज गरूर स्वयं को भूल कर पूर्णत है समाधिस्थ हो गए जहां उनके मन की तरंगे शान्त हो गई
40:59और वे पर्मानंद के महासागर में डूब गए
41:03गरूर पुरान के इस अंतिम ज्यान ने संपूर्ण स्रिष्टी को यह शाश्वत संदेश दिया कि कर्मों के इस गुप चक्रव्यू
41:10से मुक्थ होकर मोक्ष पाना ही प्रत्येक जीव का परम अधिकार है