00:03नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिननदन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ, राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक,
00:13विद्या वाचसपती, गुलाब कुठारी जी का स्पंदन में प्रकाशित आलेक, जिसका शीर्षक है महिला शिक्षा ए
00:24अभधेश एक सांस्रतिक एवं चैतन्य जीवनशैली का देश है, जिसे आज भी अंग्रेजी दा भारतिये चला रहे हैं, इनको शायद
00:32यह भी जानकारी नहीं है, कि हम शरीर नहीं आत्मा है, शरीर जण है, जीएगा कैसे, शरीर तो पंच महाभूतों
00:41से निर्मित, मिट्�
00:42का आश्रह है, इसको क्या शिक्षित करोगे, शरीर की आयू निश्षित है, आत्मा तो न जन्म लेता है, न ही
00:50मरता है, तब माबाप कैसे पैदा कर सकते हैं आत्मा को, वे तो शरीर को पैदा कर सकते हैं, इसी
00:57प्रकार शरीर के आधार पर समाज को पुरुष प्रधान कहना �
01:01ुचित हो नहीं सकता पूरुष तो संपोन ब्रंभार्ण न में एक ही है इश्वर इसीलिए श्रिष्टी इश्वर रधान है आत्मा
01:10तो इस्त्री पूरुष पेड़ पौधे पश्चु पक्षी आदी सभी में समान रूप से प्रतिष्टित है इश्वरह सर्व भूता नाम �
01:18Hrithid Deche Arjunti Shachati
01:20तब प्रशन उठता है कि
01:22शिक्षत किसको करना है
01:24शरीर को, अत्वा, आत्मा को
01:27और क्यों
01:28क्या इस भेद को कोई सरकार समस्ती है
01:30क्या आज की शिक्षा का
01:32मुलियमकन आत्मा के धरातल
01:34पर किया जाता है
01:36प्रत्येक जीवात्मा, उसका भाग्य
01:50आज की शिक्षा तो लाखों को एक से पाठे क्रमों से दी जाती है, सारे बच्चे एक स्वरूप में निकलते
01:57हैं, जैसे कारखानों से बहुती कुदपार निकलते हैं, तब इस पर्धा क्यों नहीं होगी, तब तनाव भी होगा, संघर्ष भी
02:06होगा, हिंसा भी होगी, हाँ, �
02:09रष्टाचार तो पहली सीरी है, शिक्षा ने एक नासूर और पैदा कर दिया, प्रक्रती की युगल स्रिष्टी को दो भागों
02:16में बाट दिया, अगनी सोम, प्रक्रती पुरुष, मैटर, एनरजी, सदा साथ रहते हैं, इनको अलग नहीं किया जा सकता, इसलिए
02:25तो हम अर
02:39पून मदह पून मिदम, पूनात पून मुदच्य दे, पूनस्य पून मादाय, पून मेवावश इश्य दे, इश्वर ही पून है, पितासे
02:48जैसे पुत्र निकलता है, पिता भी पून है, और पुत्र भी पून है, शिक्षा ने पूनता को खंडित करने का
02:56ही प्रयास किया है
02:57नर नारी के युगल को बांटने, स्परधा में खड़ा कर देने का कारे करके, तोनों को अपून रहने को बार्धे
03:06कर दिया
03:07भारत में शिक्षा व्यावसाइकता एवं जीवन की आवश्यक्ताओं के अनुरूप पुरुशों को दी जाती थी
03:14परंपरा आज भी वही चल रही है, आज भी शिक्षा का स्वरूप पौरुशे यही है, लड़की भी पढ़ती है, तब
03:23भी वही व्यावसाइक दिष्टी कोण की ही शिक्षा प्राप्त करती है
03:26उच्ष शिक्षा में तो व्यक्ती होता ही नहीं, केवल विशय पढ़ाय जाते हैं दिरपेक्ष भाव से, जीवन यापन की दिष्टी
03:34से, व्यक्ती शिक्षित होकर मानव के स्थान पर संसाधन बनकर्ण करता है, स्वयम के लिए जीना ही भूल जाता है,
03:43पेट भढ़ना रह
03:44गया, क्या 20-25 वर्षों तक शिक्षा ग्रहन करना पेट भढ़ने के लिए आवश्यक है, क्या माता-पिता की कमाई
03:54खर्च करें और बेरोजगार भूए, यही शिक्षा की सार सकता है, पेट तो अन्य प्रानी भी भढ़ते ही होगे, हम
04:02शिक्षितों कर ऐसा क्या कर रहे हैं,
04:04जो अन्य प्रानी नहीं कर सकते है, और क्या इस्तु जीवन का भी एक मात्र लक्ष्य कमाई करके पेट भढ़ना
04:12ही है, तब भारती शास्त्रों का यह उलखे तग होश क्या मायने रखता है, यत्र नार्यस्तु पुजनते रमनते तत्र देनता
04:21है, क्या इस्तु को शिक्षित
04:24that we have to improve our own knowledge.
04:28Then, the personality of the master's knowledge
04:31is to teach the son of the son and the son,
04:33is to teach the son of the son.
04:36What does the son of the son of the son of the son of the son?
04:41The son of the son of the son of the son of the son of the son of the son.
04:46What do you think about his son?
04:49iisitri purbhuturush mein bheed karne ka aardhthi kiya huwa, yegh khai doonoke bieg kjuu pada ki jaja nahi hai?
04:57Kya shiksháo viduo ko yehan anuman bhi hai ki vartmahan istri?
05:03Shiksháo istri ko sashakta banane ke bajlee istrend tattomu sehi dure le jaa rahi hai.
05:09Usko istri ka bhaav chhoada kar purush bhaav me jinnene ko prerit ewan shikshit kar nahi hai.
05:15Usi ka pari naam hai ki samaj me purush to wo hii khaa raha hai,
05:19केवल इस्त्रियों में परिवर्तन आ रहा है
05:22देर से शादी करना
05:24शादी नहीं करना
05:25Live in relation, Serogate Mother
05:28जैसे नए शब्द
05:29वैवाहिक जीवन में प्रवेश कर गए
05:32साथ जन्मों का संबंध
05:34साथ साल नहीं टिक पा रहा
05:36क्यों? क्योंकि शिक्षा ने
05:38विपरित ध्रूमों को समान कर दिया
05:40आकर्शन अल्पतम रह रहा
05:42देर से शादी और
05:44मोबाईल ने जिव्यासा भरे प्रश्न
05:46समाप्त ही कर डाले
05:48जीवन की दिव्यता को शरीर पर
05:50लाकर खड़ा कर दिया, हमें पशु
05:52बना दिया, आहार, निद्रा
05:54भय मैथुन तक आकर
05:56हमारा जीवन भी सिमट गया
05:58नमस्कार