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Ep #20 में भगवान विष्णु ने ब्रह्मज्ञान और योग के गहरे रहस्य उजागर किए थे। लेकिन क्या आत्मज्ञान की यह यात्रा इतनी सीधी है? Ep #21 में गरुड़ के मन में उठते हैं नए सवाल: ब्रह्मज्ञान के मार्ग पर छिपे कौन से ऐसे शत्रु हैं, जो परम मुक्ति के द्वार पर भी साधक को भटका सकते हैं? भगवान विष्णु विस्तार से बताते हैं माया के सूक्ष्म जाल, अहंकार का अंतिम प्रहार, और वासनाओं के बंधन। जानिए कैसे एक सच्चा गुरु और निरंतर साधना ही इन गुप्त शत्रुओं से लड़ने का एकमात्र मार्ग है, और कैसे जीवन्मुक्ति के बाद भी आत्मा को करनी पड़ती है माया से अंतिम जंग। यह एपिसोड आपको आत्मज्ञान के उस कठिन परंतु परम पावन पथ पर ले जाएगा, जहाँ हर कदम पर साधक की दृढ़ता की परीक्षा होती है। क्या आप तैयार हैं अपने भीतर के 'माया' को समझने के लिए? #गरुड़पुराण #ब्रह्मज्ञान #माया #आत्मज्ञान #मुक्ति #मोक्ष #आध्यात्मिकज्ञान #योग #गुरु #सत्संग #सनातनधर्म #गरुड़पुराणसीरीज
Transcript
00:00ब्रहम ज्यान के गहन रहसियों को जानने के बाद भी गरुर के हृदय में एक और गहरी जिग्यासा उभराई थी,
00:07जिसने उन्हें परमदेव विश्णु के समक्ष विवश कर दिया।
00:11गरुर ने विन्मृता से मस्तक जुकाया, उनके मुख मंडल पर एक अनसुलजी पहेली का भाव स्पष्ट जलक रहा था, जो
00:19ज्यान की पराकाश्था तक पहुँचने के बावजूद उन्हें विचलित कर रहा था।
00:25उन्होंने श्रद्धा पूर्वक प्रश्ण किया कि है प्रभु जब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेती है, तब भी वह
00:32माया के गहन बंधन में कैसे फंस सकती है और साधक परम सत्य प्राप्थ करने के बाद भी भटक क्यों
00:39जाते हैं।
00:41भगवान विश्णु ने गरूर के इस गहन प्रश्ण को धैर्यपूर्वक सुना, उनके दिव्य मुख पर एक शांत करुणामय मुस्कान तैर
00:49रही थी, जो उनके अनंत ज्ञान और प्रेन को दर्शा रही थी।
00:54परम प्रभू ने अपनी मधूर ब्रहमांडिय ध्वनी में बोलना आरंभ किया, जिसमें स्रिष्टी के आरंभ से लेकर अंत तक का
01:02सारा ज्ञान समाहित था।
01:04उन्होंने समझाया कि ज्ञान को केवल जानना एक बात है, परंतु उसे आत्म साथ करके जीवन के प्रत्येक क्षण में
01:12जीना एक अत्यंत भिन्न और कठिन साधना है।
01:16माया कोई बाहरी शक्ती नहीं है, बलकि वह आत्मा के भीतर गहरी बैठी हुई सुक्ष्म प्रवृत्तियों और संस्कारों का ही
01:25एक जटेल जाल है, प्रभुने रहस्योद घाटन किया।
01:29उन्होंने समझाया कि ये सुक्ष्म इच्छाए, भले ही ज्यान प्राप्थ हो गया हो, तब भी राख के नीचे दबी चिंगारी
01:37की तरह सुप्त पड़ी रह सकती हैं, सही अफसर की प्रतीक्षा में।
01:42जागरूक्ता और निरंतर चौक्सी की चुनोती ही सबसे बड़ी है, क्योंकि माया अपने चलावे को अंगिनत रूपों में प्रस्तुत करती
01:50है, जो अत्यंत सुक्ष्म और लुभावने होते हैं।
01:55प्रभू ने अहंकार को माया का प्रात्मिक गड़ बताया, जो प्रबुध आत्माओं में भी व्यक्तिगत पहचान का भ्रम बनाये रखता
02:03है।
02:05उन्होंने विस्तार से समझाया की कैसे मैं और मेरा का यह भ्रम आत्मा की एकात्मता की बौधिक समझ के बावजूद
02:12भी साधक को जक्डे रहता है।
02:16विश्नु ने बताया की आध्यात्मिक अनुभवों से भी आ सकती, ममता एक सुक्ष्म बंधन बन सकती है, जो साधक को
02:24पूर्ण मुक्ती से दूर रखती है।
02:28ब्रहम ज्यान का मार्ग प्रारंभिक अंतरद्रिष्टी से कहीं अधिक है, यह निरंतर आत्मस्मर्पन की एक अथक प्रक्रिया है, जो हर
02:36पल साधना की मांग करती है।
02:40उन्होंने जोर दिया कि माया अनुकूलन करती है, पुरानी बाधाओं के दूर होने पर नई और अधिक जटिल चुनोतिया प्रस्तुत
02:48करती है।
02:50भगवान ने एक सशक्त तैराक का उदाहरन दिया, जिसे एक अध्रिष्य प्रबलधारा धीरे-धीरे अपने मार्ग से विचलित कर देती
02:58है, भले ही उसे अपनी दिशा का ज्यान हो।
03:02ज्यान प्राप्त करने के बाद भी निरंतर साधना, आध्यात्मिक अभ्यास का महत्व अप्रिमित है, क्योंकि यह आत्मा को माया के
03:11सुक्ष्म जाल से बचाता है।
03:14विश्नु ने समझाया कि पूर्व प्रारब्ध कर्मों को भोगना पड़ता है, जो ऐसी परिस्थितिया उत्पन करते हैं, जो साधक के
03:23संकल्प और ज्यान की परीक्षा लेते हैं।
03:27माया के इन जटिल फंदों से निकलने के लिए एक सच्चे गुरु के मार्गर्षन की परम आवश्शकता है, जो पत
03:34को प्रकाशित कर सके।
03:36उन्होंने निशकर्ष निकाला कि मुक्ती कोई एक घटना नहीं, बलकि शुद्धी की एक सतत प्रक्रिया है, जो आत्म ज्यान की
03:45गहराई में निरंतर विक्सित होती है।
03:48गरुर ने भगवान विश्णू के इन गहन शब्दों को सुना, उनकी आखों में अब एक गहरी समझ और परम श्रद्धा
03:56का भाव जलक रहा था, जिसने उनकी सभी शंकाओं को शांत कर दिया।
04:01भगवान विश्णू ने गरुर को समझाया कि माया का यह जाल मात्र बाहरी नहीं, बल्कि यह व्यक्ति की अंतर्तम इच्छाओं
04:09और आसक्तियों से भी बुना जाता है।
04:13उन्होंने आगे बताया कि यह भ्रम कितनी सुक्षमता से उत्पन होता है, जैसे मन में उपजी एक छोटी सी इच्छा
04:21धीरे-धीरे एक विशाल बंधन का रूप ले लेती है।
04:25यह इच्छाए जब पूरी होती हैं, तो मन में आसक्ति पैदा करती हैं, जो हमें क्षण भंगुर सुखों से बांध
04:33कर रखती हैं और मुक्ती से दूर ले जाती हैं।
04:37तक पश्चात आसक्ती से जन्मा अहंकार व्यक्ती को यह विश्वास दिलाता है कि वह अपने प्रयासों से सब कुछ प्राप्त
04:45कर सकता है, जबकि वह माया के चंगुल में अधिक फंस्ता जाता है।
04:51यहां तक की उन्नत साधक भी अपनी आध्यात्मिक प्रक्ती के प्रती सुक्ष्म गर्व में फंसकर स्वयं को माया से परे
04:59समझने की भूल कर बैठते हैं।
05:02माया अपनी अद्रिश शक्ती से उन्हें मुक्ती के किनारे से ठीक पहले वापस खीच लेती है, जब वे आत्मग्यान के
05:10सबसे करीब होते हैं।
05:13भगवान ने समझाया कि योगिक सिध्धियों की प्राप्ती भी एक शक्तिशाली मुहजाल बन सकती है, जो साधक को आत्मग्यान के
05:22मुख्य लक्षे से विचलित कर देती है।
05:26साधक को अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करने या सांसारिक प्रशंसा की इच्छा माया के सुक्ष्म फंदों में से एक है,
05:33जो उसे अहंकार के गहरे गर्त में धकेल देती है।
05:38यह अहंकार और बाहरी मान्यताओं की आसकती अंतह साधक को आंतरिक शान्ती और वास्तवित मुक्ती से वंचित कर देती है।
05:48गरुड ने सुना की इस यात्रा में आध्यात्मिक लाभ या उपलब्धियों को खोने का डर्भी माया का एक अद्रिश्य जाल
05:55है, जो साधक को आगे बढ़ने से रोकता है।
06:00भगवान विश्णू ने द्रिड़ता से कहा कि माया एक छाया की तरह है, जो हर कदम पर मौजूद रहती है,
06:07इतनी सुक्ष्म की उसकी उपस्थिती को पहचानना अत्यंत कठिन है।
06:12गरुर ने महसूस किया कि यह माया भीतर और बाहर दोनों ओर से एक निरंतर युद्ध है, जहां आत्मनिरिक्षन ही
06:21एक मात्र हथियार है।
06:23भगवान ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से गरुर को समझाया कि इस आंतरिक संद्राम को जीटना कितना कठिन है, लेकिन यह असंभव
06:32नहीं है।
06:34गरुर ने भगवान के इन गहन शब्दों को अपनी आत्मा में उतारा, उनकी प्रत्येक शिक्षा को एक अनमोल रत्न की
06:42भानती संजोया।
06:44माया एक अद्रिष्य रेशम के धागे की तरह है, जो इतनी बारीक होती है कि साधक को पता भी नहीं
06:51चलता कि कब वह इस जाल में उलज गया है।
06:55कई बार साधक मुक्ती के बहुत करीब पहुँच जाता है, जब उसे लगता है कि वह माया के सारे बंधन
07:02तोड़ चुका है, तभी वह फिर से फंस जाता है।
07:07यह माया उसे अपने सुक्ष्म आकर्शन से वापस खीच लेती है, जैसे एक अद्रिश्य हात किसी पतंग को आकाश से
07:15नीचे खीच लेता है।
07:18भगवान ने गरूर को समझाया कि विवेक ही वह पैनी तलवार है जो माया के इन सुक्ष्म धागों को काट
07:25सकती है और साधक को भ्रम से मुक्त कर सकती है।
07:30इसके साथ ही वैराग्य की अगनी इन आसकतियों और इच्छाओं को जलाकर राख कर देती है, जिससे मन निर्मल और
07:38मुक्त हो जाता है।
07:41अंत में सभी इच्छाओं और फलों का परम सत्ता को समर्पण ही माया के बंधन से पूर्ण मुक्ती का मार्ग
07:48प्रशस्त करता है।
07:50भगवान विश्णू ने गरूर की ओर एक दिव्य, शांत और प्रेमपूर्ण द्रिश्टी डाली, मानो उसे इस गहन सत्य को समझने
07:59के लिए आशिरवाद दे रहे हो।
08:02गरूर ने अपनी आखें खोली, उसकी आखो में अब केवल परमग्यान और माया के सुक्ष्म जाल को भेदने का अटूट
08:09संकल्प स्पष्ट जलक रहा था।
08:12गरूर की आखो में अब परमग्यान के प्रती अटूट संकल्प के साथ भगवान विश्णू ने माया के भी सुक्ष्मतम आवर्ण
08:20अविद्या के रहस्यमय पर्दे को उठाने का निश्चय किया।
08:24भगवान विश्णू की दिव्यवानी वातावर्ण में गूंजी हे गरूर माया का मूल स्रोत अविद्या है। वह मौलिक अज्ञान जो परम
08:33सक्य को ढख देता है और हमें स्वयन से विमुख करता है।
08:37अविद्या एक ऐसे घने पर्दे के समान है जो आत्मा के प्रकाश को छुपा देती है, जिससे व्यक्ति अपनी वास्तविक
08:46पहचान भूलकर भ्रम में जीने लगता है।
08:50यह मौलिक अज्ञान ही जीवात्मा को उसके शाश्वत, शुद्ध और दिव्य स्वरूप से दूर कर उसे क्षण भंगुर संसार में
08:58उलजाये रखता है।
09:00विश्णु ने समझाया कि अविद्या ही सभी दुखों का मूल कारण है, क्योंकि यह हमें नश्वर्ता के माया जाल में
09:08बांध कर आशा और भय के निरंतर चक्र में फसा देती है।
09:12यह अविद्या ही मैं और मेरा के जूठे बोध को जन्न देती है, जिससे जीव स्वयन को शरीर, मन और
09:20बुद्धी तक सीमित मानने लगता है।
09:23इसी जूठे अहंकार के कारण हम स्वयन को परम ब्रह्मा से अलग एक इकाई समझते हैं, और यही भ्रम हमें
09:31बार-बार जन्मुम्रिक्यू के चक्र में धकेलता है।
09:35गरुर ने गहरी सास ली, उसके मस्तिष्क में यह गहन सत्य एक बीज की भाती अंकुरित हो रहा था, जिसके
09:43प्रकाश से माया का प्रत्येक कोना आलोकित होने लगा।
09:47विश्णु ने कहा, यह प्रिथककरण केवल एक ध्रम है, गरुर्क वास्तव में आत्मा ब्रह्मा से कभी अलग नहीं हुई, यह
09:55बस अविद्या के कारण ऐसा प्रतीत होता है।
10:00अविद्या के कारण ही जीवात्मा जन्मों जन्मों तक कर्मों के बंधन में फंसकर संसार चक्र में भटकती रहती है।
10:08यह अविद्या ही हमें बाहरी वस्तूओं और संबंधों में सुख खोजने के लिए प्रेरित करती है, जबकि वास्तविक आनंद तो
10:16हमारे भीतर ही नहित है।
10:19गरुर ने देखा कि कैसे संसार के अधिकांश प्राणी अविद्या के घने कुहासे में लिपते हुए, सत्य से अंजान अपने
10:27जीवन व्यतीत कर रहे थे।
10:30भगवान विश्णों ने द्रिडता से कहा, इस अविद्या को पहचानना ही मुक्ती की और पहला कदम है, क्योंकि यह इतनी
10:38सुक्ष्म है कि इसे भेदना अत्यंत कठिन है।
10:42इस अज्ञान को दूर करने का मार्ग आत्मनुसंधान, गेहन ध्यान और सच्चे ग्यान की निरंतर खोज में छिपा है।
11:11परन्तु, जब ज्यान का प्रकाश अविद्या के अंधकार को चीरता है, तब आत्मा अपने शुद्ध अविनाशी स्वरूप में प्रकट होती
11:19है।
11:44गरुर ने भगवान विश्णु के चर्णों में शीश नवाया, उसके हृदय में अब माया और अविद्या के समस्त बंधनों को
11:52तोड़ने का अदवितिय सामर्थ्य और द्रिड विश्वास जग्मगा रहा था।
11:57ब्रहम ज्यान के गहन रहस्य को हृदय में धारण कर, गरुड ने अब उस परम सत्य को अपने जीवन में
12:03उतारने का द्रिड संकल्प लिया, ताकि वे माया और अविद्या के सुक्ष्म बंधनों को जड़ से उखार सकें।
12:11उसने ततकाल हिमालय की उँची चोटियों में एक एकांत गुफा का चयन किया, जहां वह अपनी इंद्रियों को वश्मे करके
12:19गहन तपस्या में लीन हो सके, ताकि वासना और आसकती के सभी अवशिष्ट बीजों को जला कर भस्म कर सके।
12:27प्रारंभिक दिनों में गरुर ने अद्वितिय शांती और आनंद का अनुभव किया, मानो उसका चित्त सीधे ब्रहमा के असीम सागर
12:36में समा गया हो, प्रत्येक श्वास के साथ परम चैतन्य से जुड़ता हुआ।
12:42परंतु जब उसका तप गहरा हुआ, तो माया ने अपनी सुक्ष्म लीला आरंभ की एक अध्वितिय रूपवती अपसरा के रूप
12:50में प्रकट होकर, जो वासना के सबसे मनमोहक स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती थी।
12:56गरूर अपने ध्यान में अडिग रहते हुए भी, उसकी उपस्थिती को अपनी गहन चेतना में महसूस कर रहा था।
13:03भगवान विश्नु के वचनों को याद करते हुए कि माया के प्रलोभन क्षनभंगुर और भ्रामक होते हैं।
13:11अपसरा ने अपनी मोहिनी शक्ती का प्रदर्शन किया।
13:14गरूर के मन में वैभव, शक्ती और इंद्रिय सुखों के मनमोहक ग्रिश्य प्रस्तुत किये, जो अतीत की वासनाओं को फिर
13:22से जगाने का प्रयास कर रहे थे।
13:24एक क्षन के लिए गरूर को अपने भीतर एक सुख्षम हलचल महसूस हुई, अतीत की इच्छाओं का एक विस्मृत कमपन
13:32जिसने उसे एक पल के लिए बेचैन किया, लेकिन उसने तुरंत ही इसे माया का एक और रूप पहचान लिया।
13:41उसने अपनी एक आगरता को और भी गहरा किया, अपनी आंतरिक अगनी से उन सभी सुख्षम वासनाओं और कर्मिक बीजों
13:49को जलाने का संकल्प लिया, जो उसे इस परम्मार्ग से विचलित करने का प्रयास कर रहे थे।
13:56वासना की वह साकार प्रतिमा अपने प्रलोभनों के असफल होने पर धीरे धीरे विलीन होने लगी, जैसे धुन्ध सूर्योदय के
14:04साथ छंट जाती है, गरुड के तप के सामने उसका अस्तित्व फीका पड़ गया।
14:10एक विजय की भावना से भर कर, गरुड ने सोचा की उसने वासना पर विजय प्राप्त कर ली है, परन्तु
14:17तभी एक अधिक सुक्ष्म और भावनात्मक बंधन उसके हृदय में उमड पड़ा, अपनी माता विंता और भाई अरोन के लिए
14:25गहरा प्रें।
14:26उसने अपनी मा विंता के स्नेहकून आलिंगन और भाई अरोन के साथ बिताय सुखत क्षणों के स्पष्ट चित्र देखे, जिससे
14:35उसके हृदय में उन्हें पुनर्मिलन की तीवर इच्छा जागरित हुई।
14:40यह आसकती वासना से भिन्न थी, यह पवित्र और निस्वार्थ प्रेम के रूप में प्रतीत होती थी, जिससे गरुड असमंजस
14:48में पढ़ गया कि क्या यह भी माया का एक बंधन हो सकता है।
14:53तभी एक अलोकिक प्रकाश के रूप में भगवान विश्णु की छवी गरुड के मन में उभी उन्हें स्मरण कराते हुए
15:01की सभी प्रकार की आसकतिया, यहां तक की सबसे शुद्ध प्रेम भी जीव को कर्म के चक्र में बांध सकती
15:08हैं।
15:10गरुड ने भारी हृदय से इस सत्य को स्वीकार किया कि सर्वबंध विमुक्त का अर्थ न केवल वासना से मुक्ती
15:17है, बलकि प्रेम के बंधन से भी यदी वह चेतना को परम लक्षे से विचलित करे।
15:23उसने यह निश्चय किया कि सच्चा प्रेम त्याग में नहीं, बलकि आंतरिक अनासक्ती में नहित है, जहां संबंध रहते हुए
15:31भी चेतना मुक्त रहती है।
15:34गरुर ने एक गहन मानसिक अनुष्ठान किया, अपनी समस्त व्यक्तिगत आसक्तियों को ब्रहम ज्यान की अगनी में अर्पित कर दिया,
15:43अपने प्रेन को सार्वभौमिक करुणा में परिवर्तित करते हुए।
15:48जैसे ही उसने अपने अंतिम बंधन को विसर्जित किया, उसे एक गहरी मुक्ती और हलकापन का अनुभव हुआ, मानो उसके
15:56उपर से असंख्य अग्रिश्य जंजीरे तूट कर गिर गई हो।
16:01गुफा के भीतर और बाहर का वातावर्ण भी उसके आंतरिक परिवर्तन को प्रतिबिम्वित करता हुआ, एक नई दिव्य चमक से
16:09जग्मगा उठा, जैसे प्रकृती भी उसकी विजय का जश्न मना रही हो।
16:14गरुड अपनी तपस्या से बाहर आया, अब भावनाओं से रहित नहीं, बलकी वासना और आसक्ती के बंधनकारी स्वरूप से पूरी
16:23तरह मुक्त होकर अपने भीतर ब्रह्मा का अनंत विस्तार अनुभव कर रहा था।
16:29उसने अन्तह यह समझा कि सच्ची स्वतंत्रता कर्मों के नवीनी करण से नहीं, बलकी स्वयन को समस्थ इच्छाओं और बंधनों
16:37से परेस्थित ब्रह्मा के रूप में पहचानने से प्राप्थ होती है।
16:42ब्रह्मा के असीन विस्तार को अपने भीतर अनुभव करते हुए, गरुड ने एक ऐसी शांती और स्वतंत्रता प्राप्त की, जो
16:51उसे पहले कभी ज्यात न थी, मानों वह स्वयन अनंत का ही एक अंश बन गया हो।
16:57गरुड की इस आंतरिक विजय को देखते हुए, भगवान विश्नु के मुख पर एक मधुर रहस्य में मुस्कान छा गई,
17:05जिसमें आने वाली गहन शिक्षा का संकेट छिपा था।
17:09विश्नु ने अपनी दिव्यवानी में कहा, हे गरुड तुमने वासना और आसक्ती के स्थूल बंधनों को तोड़ा है, किन्तु मुक्ती
17:18के द्वार पर एक अंतिम सुक्ष्म शत्रु अभी भी प्रतीक्षा कर रहा है।
17:23उन्होंने समझाया, यह शत्रु है अहंकार स्वयंकी में की भावना, जो तब और भी प्रबल हो जाती है, जब व्यक्ती
17:32ज्यान या तपस्या के उच्च शिखर पर पहुँचता है।
17:36गरुर के मुख पर असमंजस के भाव उभे, वह यह समझने का प्रयास कर रहा था कि ब्रहमा के साथ
17:43अपनी पहचान स्थापित करने के बाद भी कौन सा अहंकार शेश रह सकता है।
17:49विष्णू ने एक सुंदर उपमा दी, जैसे एक स्वच दरपण में एक धूल का कण भी उसकी पूर्ण शुद्धता को
17:57भंग कर देता है, वैसे ही सुक्ष्म अहंकार ब्रहमग्यान को ढख सकता है।
18:03यह मैं जानता हूँ या मैंने मुक्ती प्राप्त कर ली है का सुक्ष्म अभिमान है, जो साधक को ब्रहमा से
18:10पूर्णत्या एकाकार होने से रोक देता है। भगवान विष्णू ने विस्तार से बताया।
18:16गरुर ने अपनी अंतरात्मा में गहराई से जाका, हर कोने को टटोला ताकि उस मैं के अवशेश को पहचान सके,
18:24जो उसे अभी भी परमसक्य से अलग रख सकता था।
18:28विष्णू ने समझाया कि यह अहंकार ही है, जो साधक और ब्रहमा के बीच एक सुक्षम अद्रिश्य विभाजक रेखा खीचता
18:37है, पूर्ण एकात्मता को बाधित करता है।
18:41यहां आध्यात्मिक पहचान का बंधन है, तपस्या में गर्व, ज्यान में घमंड या यहां तक की अपनी वैराग्य वृत्ती पर
18:49अभिमान जो माया का अंतिम और गुप्व स्वरूप है।
18:53गरुर के चहरे पर अब केवल असमंजस नहीं था, बलकि एक गंभीर परेशान करने वाली समझ का भाव था कि
19:02उसने अभी तक पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की है।
19:06विश्नु ने कहा यह अहंकार इतना कप्टी होता है कि वह धार्मिक्ता और आध्यात्मिक शुद्धता का चोला ओड कर आता
19:15है, जिससे इसे पहचानना अत्यंत कठिन हो जाता है।
19:20यही अंतिम युद्ध है गरुड जहां साधक को अपने ही ज्यान से उपजे अहंकार से लड़ना होता है, मुक्ती के
19:27द्वार पर सबसे बड़ी और सुक्ष्म बाधा, विश्नु ने स्पष्ट किया।
19:32इस गेहन रहस्य को सुनकर गरुड ने गहरी सांस ली और अपने लक्षे के प्रती अपनी प्रतिग्या को और भी
19:40द्रिड़ता से दोहराया, अब एक नए अधिक सुक्ष्म युद्ध के लिए तयार।
19:46विश्नु ने मार्ग दर्शन दिया, इसे जीतने के लिए सतत विनमर्ता, निस्वार्थ सेवा और सभी में ब्रह्मा का दर्शन ही
19:54एक मात्र मार्ग है, जहां मैं की भावना पूर्णता घुल जाती है।
19:59उन्होंने समझाया, सच्ची आत्मस्मर्पन वह है, जहां साधक अपने आध्यात्मिक प्रक्ती की अवधार्णा को भी त्याद देता है, केवल ब्रह्मा
20:09ही शेश रहता है।
20:12गरुड ने पुनह गहन ध्यान में प्रवेश किया, अब उसका ध्यान सुक्ष्म अहमकार को पहचानने और उसे विसर्जित करने पर
20:20केंद्रित था, जो उसके ब्रह्मग्यान की अंतिम परीक्षा थी।
20:25उसने अपने भीतर एक पतले, चमकते आवर्ण की कलपना की, जो उसके मैं की भावना को घेर रहा था, सुक्ष्म
20:33अहमकार का वह अंतिम रूप जिसे तोरना था।
20:37विश्नु के वचनों को आत्म साथ करते हुए, गरुड ने समझा की अंतिम एकी करण के लिए अनुभुकर्ता के अस्तित्व
20:44को भी विलीन करना होगा, केवल निर्गुन ब्रहमा ही शेश रहे।
20:49अब एक नए गहन संकल्प के साथ, गरुड इस सबसे सुक्ष्म और अंतिम आंतरिक युद्ध के लिए तयार था। यह
20:57जानते हुए कि माया का परम बंधन स्वयन आध्यात्मिक अहमकार ही है।
21:03अपने सुक्ष्म अहमकार के अंतिम आवर्ण को भेदने के लिए गरुड ने अपनी सारी आध्यात्मिक शक्ती को केंद्रित किया, किन्तु
21:11वह बंधन अग्रिश्य और अति सुक्ष्म होकर भी अभेद्य प्रतीत हो रहा था।
21:17यह माया का परमचल था, जो आत्मज्यान के शिखर पर भी अहमकार का भ्रम बनकर साधक को अपने बंधन में
21:25कस लेता था, मुक्ती के अंतिम द्वार पर एक अग्रिश्य कारागार सा।
21:47जब कोई प्रक्ती न दिखी, तो गरुड के मन में गहन निराशा और भ्रम की लहरें उठने लगी। यह समझते
21:54हुए कि कोई अद्रिश्य शक्ती उसे रोके हुए है।
22:17इसमें अंगिनत भवर और अद्रिश्य धाराये हैं, जो सबसे शक्तिशाली साधक को भी भटका सकती है।
22:24एक अकेला यात्री, चाहे कितना भी कुशल क्यों न हो, इस अगाध सागर में बिना किसी कुशल मार्क गर्शक के
22:32अपनी दिशाखो देता है और अंतर डूब जाता है।
22:37यहां एक सद्गुरु ही वह कुशल नाविक है, जो इस भवसागर की हर लेहर, हर भवर को जानता है, और
22:45अपनी नाव को सीधे मोक्ष के तटकी ओर ले जाता है।
22:49गुरु का ज्यान एक दिव्य कमपास है, जो भटके हुए मन को सही दिशा दिखाता है, जहां शब्द और तर्क
22:57मौन हो जाते हैं, वहीं गुरु की अंतरग्रिष्टी मार्क प्रशस्त करती है।
23:03वह शंकाओं के घने कोहरे को चीर कर सत्यका स्पष्ट दर्शन कराता है, उन सुक्ष्म भ्रमों को उजागर करता है,
23:11जो आक्म ज्यान की राह में अद्रिश्य दिवार बनकर खड़े होते हैं।
23:16गुरु शिष्य के आंतरिक शत्रूओं, काम, क्रोध, लोब, मोह, मद और मत्सर को पहचानने और उन पर विजय पाने में
23:24सहायता करता है, जो ब्रहम ज्यान के मार्क के सबसे बड़े रोडे हैं।
23:30एक सच्चा गुरु मात्र ज्यानी नहीं होता, अपितु वह स्वयं परब्रहम से जुड़ा एक जीवंत माध्यम होता है, जिसकी वाणी
23:38में दिव्य उर्जा और सत्य की गूंज होती है।
23:42वह निस्वार्थ प्रेम और करुणा का सागर होता है, जो शिष्य के हर गिरने पर उसे उठाता है, हर भूल
23:50को क्षमा करता है, और उसे सही मार्क पर ग्रिड़ता से आगे बढ़ाता है।
23:56भगवान विष्णू के शब्दों को सुनते हुए, गरुड के भीतर एक नई समझ जागी, उसे अपने एकाकी संधर्ष की निरर्थकता
24:04और सद्गुरु की अमोग शक्ती का बोध हुआ।
24:08गुरु शिश्य के भीतर छिपी हुई सत्यता को उसके वास्तविक स्वरूप को दरपन की भानती प्रतिबिम्बित करता है, जिससे वह
24:16अपनी अज्ञानता के आवरणों को पहचान सके।
24:20वस्तुता सद्गुरु ही वह पवित्र सेतु है, जो सीमित मै को असीमित ब्रह्मा से जोडता है, संसार के दलदल से
24:28उठाकर आत्मा को परम शान्ती तक पहुचाता है।
24:33परंतु इस सेतु को पार करने के लिए शिश्य को गुरु के प्रती पूर्ण समर्पन, अटूट श्रद्धा और विनय का
24:40भाव रखना होगा, तभी ज्ञान का द्वार खुलेगा।
24:44गुरु की कृपाही वह अगनी है, जो कर्मों के बीज और अहंकार के अंतिम बंधन को जलाकर भस्म कर देती
24:51है, जिससे आत्मा अपनी शुद्ध अवस्था में प्रकाशित होती है।
24:57गेहन चिंतन के बाद गरुर ने अपनी आखें खोली और भगवान विश्नु के समक्ष श्रद्धा पूर्वक सिर जुकाया, उसे अब
25:05सच्चे गुरु की अनिवार्यता स्पष्ठ हो चुकी थी।
25:09एक नए विनमर संकल्प के साथ गरुर अब उस दिव्यमार्ग दर्शक की खोज के लिए तयार था, जो उसे ब्रहमग्यान
25:17के अंतिम पड़ाव तक पहुचाने में सहायक होगा।
25:21गुरु की महिमा को समझ कर गरुर ने अपनी द्रिष्टी भगवान विश्णु पर टिकाई, जो स्वय उस ज्ञान के सागर
25:28थे जिसकी उसे अब खोज थी।
25:32परमात्मा विश्णु ने गरुर की आंतरिक जिग्यासा को समझा और उसे गहन ब्रहमग्यान की ओर ले जाने वाली साधनाओं का
25:40मार्ग दिखाना आरंभ किया।
25:42भगवान ने कहा, हे गरुर, ब्रहमग्यान की स्थिती को बनाए रखने के लिए सबसे पहले गहन ध्यान, ध्याना का अभ्यास
25:50करो, जो मन को एकागर करता है।
25:54उन्होंने समझाया कि यह आंतरिक शान्ती की ओर पहला कदम है, जहां मन की चंचलता शान्त होकर असीम चेतना में
26:02विलीन होने लगती है।
26:05विष्णू ने गरूर को सिखाया कि कैसे अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित करें और धीरे धीरे सभी बाहरी विचारों को
26:13शान्त कर आंतरिक शूने में प्रवेश करें।
26:16गरूर ने आखे मूंद ली और भगवान के वचनों का अनुसर्ण करते हुए अपने भीतर की हलचल को शान्त करने
26:24का प्रयास किया, जहां मन की लहरें अब भी टकरा रही थी।
26:29इसके बाद विश्नों ने आत्मजांच, विचारा के महत्व पर बल दिया, जहां व्यक्ती को स्वयन से मैं कौन हूँ यह
26:36प्रश्ण निरंतर पूछना होता है।
27:01भगवान ने आगे कहा, माया के चंगुल से निकलने के लिए विवेक, विवेका का अभ्यास करो, जो वास्तविक और अवास्तविक
27:09के बीच भेद करना सिखाता है।
27:13उन्होंने समझाया की माया, इंद्रियों द्वारा स्रिजित एक भ्रम है, जो हमें क्षण भंगुर संसार को ही एक मात्र सत्यमान
27:21लेने पर विवश करती है।
27:24शनिक सुखों और शाश्वत आनंद के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए, विश्नु ने ज्यान की तीक्षन तलवार से
27:31भ्रम के बंधनों को काटने का आहवान किया।
27:35इस भेदग्यान से गरूर का मन प्रकाशित हुआ, उसे अब नश्वर और अविनाशी के बीच का सुक्ष्म अंतर स्पष्ट रूप
27:43से दिखाई दे रहा था।
27:45अंतर विश्नों ने वैराग्य, वैराग्य के महत्व पर प्रकाश डाला, जिसे सभी प्रकार की इच्छाओं से विरक्ती के रूप में
27:53समझाया गया।
27:56उन्होंने स्पष्ट किया कि वैराग्य का अर्थ कर्मों का त्याग नहीं, बलकि उनके फलों के प्रती आसकती का त्याग है,
28:03जो मन को मुक्ती की ओर ले जाता है।
28:07यह सिखाते हुए कि व्यक्ती अपने कर्तवियों का पालन करे, किन्तु परिणाम की चिंता से मुक्त होकर, जैसे जल में
28:15कमल निरलिप्त रहता है।
28:18गरुर ने इन गूड शिक्षाओं को अपने हृदय में गहराई से आत्मसाथ किया, महसूस किया कि उसके अस्तित्व का हरकन
28:26ज्यान की वर्षा से सिंचित हो रहा है।
28:29विष्णु ने समझाया की सतत जागरूकता और इन साधनाओं का नियमित अभ्यास मन को माया के जाल से स्थाई रूप
28:37से मुक्त करता है।
28:39निरंतर अभ्यास से अहमकारी इच्छाओं के सूक्षम बीज भी जलकर भस्म हो जाते हैं, जिससे आत्मा अपने शुद्ध, मुक्त स्वरूप
28:48में प्रतिश्थित होती है।
28:51ज्यान और वैराग्य के बल पर गरूर ने भगवान विश्णु को कृतग्यता पूर्वक नमन किया, अब वह ब्रहम ज्यान के
28:59मार्ग पर अडिग रहने के लिए सशक्थ हो चुका था।
29:02भगवान विश्णु ने गरूर को संबोधित करते हुए एक स्थित प्रग्य के सर्वोप्री लक्षणों का वर्णन आरंभ किया, जो आत्मा
29:11की परम स्थिर्ता और प्रग्या का प्रतीक है।
29:15उन्होंने समझाया कि स्थित प्रग्य वह है, जिसकी बुद्धी सभी दिशाओं से आती इच्छाओं को त्याग कर आत्मा में ही
29:22संतुष्ठ होकर परमशांती प्राप्त कर लेती है।
29:27जो व्यक्ती सुख दुख में संभाव रखता है, प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित नहीं होता और अनुकूलता में आसक्त नहीं होता,
29:36वही स्थित प्रग्य कहलाता है।
29:39उसकी बुद्धी भाय, क्रोध और सभी इच्छाओं से मुक्ठ होती है, जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी अप्रभावित
29:46रहता है।
30:13अशांत मन मनुष्य की बुद्धी को हर लेता है, जैसे तीवर वायू नाव को पानी में बहा ले जाती है,
30:20उसे लक्षे से भटका देती है।
30:46जैसे नदिया विभिन दिशाओं से आकर समुद्र में मिलती है, पर समुद्र फिर भी अपनी मर्यादा में अटर रहता है।
30:53वैसे ही स्थितप्रज्य भी सभी इच्छाओं को आत्म साथ कर लेता है बिना विचलित हुए।
31:00कामनाओं का त्याग करने वाला व्यक्ती ही परमशान्ती प्राप्त करता है, न कि वह जो कामनाओं के पीछे भागता रहता
31:08है।
31:10जिसकी बुद्धी आत्मा में ही रमन करती है और बाहरी विश्यों से विरक्थ हो चुकी है, वह इस संसार में
31:17रहते हुए भी सबसे परे हैं।
31:19ऐसा व्यक्ती सभी बंधनों से मुक्त होकर, जीवन मृत्यू के चक्र से उपर उठकर ब्रह्मा निर्वान को प्राप्त होता है।
31:29भगवान विश्यों के ये गहन शब्द गरूर के हृदय में गहरे उतर गए, जिससे उनके अंतर्मन में ज्ञान का एक
31:36नया प्रकाश जगमगा उठा।
31:39गरूर ने महसूस किया कि यह केवल आध्यात्मिक सिध्धान्त नहीं, बलकि जीवन जीने की एक पूर्ण कला है जो परम
31:47स्वतंत्रता की ओर ले जाती है।
31:51उन्होंने भगवान विश्णों की ओर देखा, जिनकी शांट और दिव्य उपस्थिती स्वयन ज्यान का सागर प्रतीत हो रही थी।
31:59गरूर ने कृतग्यता पूर्वक नमन किया, उनकी आत्मा अब स्थित प्रग्य के आदर्श को आत्म साथ करने के लिए पूरी
32:07तरह से तयार थी।
32:09यह दिव्य समबाद केवल शब्दों का आदान प्रदान नहीं था, बलकि आत्मा के गहरे परिवर्तन की एक प्रक्रिया थी।
32:18गरूर के भीतर अब एक द्रिड संकल्प जागा था कि वे इस परमज्यान को अपने जीवन में उतार कर स्थित
32:26प्रग्यता के मार्ग पर अग्रसर होंगे।
32:29भगवान विश्णु ने गरूर को आशिरवाद दिया, जिससे उनका मार्ग और भी स्पष्ठ हो गया और वे ब्रहमज्यान के उच्चतम
32:37शिकरों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित हुए।
32:40भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यवाणी में गरूर को संबोधित करते हुए जीवन मुक्ती का सार समझाया, जो इस भौतिक देह
32:49में रहते हुए भी माया के समस्त बंधनों से पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने की सर्वोच अवस्था है।
32:56गरूर के नेत्रों में अब उस परम सत्य को जानने की तीवर जिग्यासा और भी प्रखर हो उठी थी, जिसकी
33:03खोजमेवे चिरकाल से भटक रहे थे।
33:07विष्णु ने समझाया की जीवन मुक्त वह है जो शरीर धारण किये हुए भी सांसारिक इच्छाओं, रागदवेश और कर्मों के
33:15फल से पूर्णता मुक्त होता है, जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी उससे निरलिप्त रहता है।
33:22ऐसे ज्ञानी पुरुष के सभी कर्म बिना किसी आसकती के लोग कल्यान हेतु संपादित होते हैं, और वे नए कर्मों
33:30का बीज उत्पन्न नहीं करते, जिससे जन्ममृत्यू के चक्र से मुक्ती मिलती है।
33:36गरुर के मन में इस अकर्मन्यता के रहस्य को जानने की उत्सुकता जागरित हुई कि कैसे कोई जीव कर्म करते
33:43हुए भी उसके फल से परे रह सकता है।
33:47विश्णू ने उत्तर दिया कि यह केवल आत्मग्यान की द्रिड़ता से संभव है, जहां करतापन का अहंकार पूरी तरह से
33:55बिलीन हो जाता है और आत्मा शुद्ध साक्षी भाव में स्थित हो जाती है।
34:02ऐसे जीवनमुक्त पुरुष जगत में रहते हुए भी एक अप्रभावित दर्शक के समान होते हैं, जो संसार के नाटक को
34:09बिना किसी आसकती या निर्णय के देखते हैं।
34:14इसके उपरांत भगवान विश्णों ने विदेह मुक्ती की व्याख्या की, जो शरीर त्यागने के उपरांत आत्मा का परम ब्रह्मा में
34:22पूर्ण विलय हैं, जहां द्वैत का कोई अस्तित्व नहीं रहता।
34:26गरुर ने समझा की जीवन मुक्ती उस यात्रा का साधन है, और विदेह मुक्ती उस यात्रा का अंतिम गंतव्य, जहां
34:34सभी प्रकार के अस्तित्व का अंत होकर केवल एकत्व शेश रह जाता है।
34:40जीवन मुक्ती में व्यक्ति का देह रहते हुए भी मन असीम ज्यान से प्रकाशित रहता है, जबकि विदेह मुक्ती में
34:47वह प्रकाश स्वयन ब्रह्मा में समाहित हो जाता है।
34:52भगवान विश्णू ने स्पष्ट किया कि जीवन मुक्त का अस्तित्व संसार के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ के समान होता
35:00है जो दूसरों को भी सत्य की ओर प्रेरित करता है
35:05जबकी विदेह मुक्ती उस परमशान्ती और विश्राम की अवस्था है जहां आत्मा सभी बंधनों और पहचानों से मुक्त होकर अपने
35:13मूल शुद्ध स्वरूप में लोट आती है
35:17गरूर के अंतर्मन में अब यह ज्यान पूर्ण रूप से स्थापित हो चुका था कि दोनों ही अवस्थाएं मुक्ती के
35:24विभिन पड़ाव हैं परन्तु उनका लक्ष एक ही है परमानन्द
35:29विष्णू ने मुस्कुराते हुए कहा कि जीवन मुक्ती का मार्ग श्रेसकर है क्योंकि यह जीते जीही सत्य का साक्षातकार कराकर
35:38लोग कल्यान का अध्भुत अफसर प्रदान करता है
35:42यह वह अवस्था है जहां व्यक्ती अपनी दिव्य चेतना में स्थित होकर भी संसार के दुख और संधर्शों को समझता
35:50है और बिना आसक्ती के उनमें सहायता प्रदान करता है
35:55गरुर के भीतर अब एक नया संकल्प जागा था कि वे न केवल अपने लिए मुक्ती प्राप्त करेंगे बल्कि अपने
36:03ज्ञान से जगत का भी उध्धार करेंगे
36:06यह ब्रहम अज्यान केवल व्यक्तिगत मुक्ती का मार्ग नहीं बल्कि स्रिष्टी के प्रत्येक प्राणी को अज्यानता के अंधकार से बाहर
36:15निकालने का एक दिव्य प्रकाश था
36:18गरुर ने भगवान विश्णु के चर्णों में सादर प्रणाम किया उनका हृदय कृतग्यता और नवजागरन के भावों से भर उठा
36:26था
36:27उनके भीतर अब वह शक्ती जागरित हो चुकी थी जो माया के सबसे गहन बंधनों को भी तोड़कर परम सत्य
36:34की ओर बढ़ने का साहस प्रदान करती है
36:38इस प्रकार गरुड ने ब्रहमग्यान के उस उच्चतम शिखर को प्राप्त किया जहां जीवनमुक्ती और विदेहमुक्ती दोनों ही परम ब्रहमा
36:47के अनंत विस्तार में समाहित हो जाती है
36:51भगवान विश्णु ने अपने दिव्य आसन पर विराजमान रहते हुए गरुड की ओर एक शांत और करुणामई द्रिश्टी डाली मानों
37:00उनके भीतर के नवजागरण को अनुभव कर रहे हुँ
37:04उन्होंने मृदूस्वर में कहा कि ब्रहम ज्यान की प्राप्ती मात्र एक पड़ाव नहीं अपितु आत्मा की अनंत यात्रा का अविस्मर्णिय
37:12आरंभ है जिसके लिए निरंतर साधना आवश्चक है
37:17यह परम ज्यान एक स्थिर गंतव्य नहीं बलकि चेतना की एक सतत प्रवाहित अवस्था है जिसे हर क्षण अपने कर्मों
37:25और विचारों में बनाए रखना पड़ता है
37:29उन्होंने समझाया कि माया के गेहन आवर्ण भले ही क्षणिक रूप से उजल हो गए हों फिर भी सुक्ष्म रूप
37:36से उपस्थित रहते हैं और साधक की द्रिड़ता की परीक्षा लेते हैं
37:42इसलिए विवेक सहीगलत का ज्यान और वैराग्य सांसारिक इच्छाओं से वैराग्य को अपनी यात्रा का अविभाज अंग बनाना होगा जो
37:51परम सत्य की ओर मार्ग प्रशस्थ करते हैं
37:56भगवान ने गरूर को गुरु के महत्व को समझाया जिनके मार्ग गर्शन के बिना इस दुर्गम पत पर अकेले चलना
38:03अंधकार में भटकने जैसा है
38:06एक सच्चा गुरु वह दिव्य प्रकाशस्तम्भ है जो अंधकार में संसार में भ्रमित जीवात्माओं को सत्य के मार्ग की ओर
38:14ले जाता है और उन्हें आत्म ज्यान के शिखर तक पहुँचाता है
38:20उन्होंने जोर दिया कि अटल संकल्प ही सभी बाधाओं को पार करने और इस परम्मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ने का
38:27एक मात्र बल है जो साधक को कभी डगमगाने नहीं देता
38:33जीवन की हर चुनोती, हर प्रलोभन और हर संदे आत्मसाक्षातकार की इस यात्रा में साधक के संकल्प की अगनिप्रीच्षा बन
38:41कराता है
38:43वे गरूर को विश्वास दिलाते हैं कि जो द्रिड़ता से इस मार्ग पर चलते हैं, उनके लिए परम्मुक्ती अवश्यमभावी है
38:52जो सभी बंधनों से परे है
38:55गरूर ने भगवान विश्वास के प्रत्येक शब्द को अपने हिदय में गहराई से आत्मसात किया, उनका अंतर्मन ज्यान के प्रकाश
39:03से और भी अधिक प्रज्वलित हो उठा
39:06उनके भीतर एक नया द्रिड संकल्प जागा, जो उन्हें माया के किसी भी प्रलोभन के सामने जुकने नहीं देगा, बलकि
39:14सत्य के पत्थ पर अडिक खड़ा रखेगा
39:18भगवान विश्णू के मुखमंडल पर एक हलकी मुस्कान आई, जो गरूर की आंतरिक शक्ती और उनके अटूट विश्वास को देखकर
39:26प्रसन्नता व्यक्त कर रही थी
39:29उन्होंने अपनी दिव्य उर्जा का एक अंश गरूर की ओर प्रवाहित किया, जिससे उनकी चेतना और भी अधिक ग्रेड और
39:37उजडवल हो गई
39:39गरूर ने महसूस किया कि अब उनका मार्क स्पष्ट है, दिव्य प्रकाश से आलोकित और वे किसी भी कर्म बंधन
39:46से विचलित नहीं होंगे
39:49भगवान विश्णों ने उन्हें आशिरवाद दिया, यह सुनिश्चित करते हुए कि उनका प्रत्येक कदम परम सत्य की ओर ही बढ़ेगा,
39:57और वे अंत्य परमपद को प्राप्त करेंगे
40:01गरुर ने अपने स्वामी को एक बार फिर श्रद्धा पूर्वक प्रणाम किया, उनके भीतर अब ब्रहम ज्यान का अनंत सागर
40:08लहरा रहा था, जो सभी सीमाओं से परे था
40:13उन्होंने स्वयं को परम ब्रहमा के उस अनंत विस्तार में समाहित पाया, जहां न कोई आरंभ था और न कोई
40:20अंत केवल शाश्वत अस्तित्व का बोध
40:23इस प्रकार गरुर ने न केवल मुक्ती का मार्ग सीखा, बलकि स्वयं मुक्ती के अवतार बन गए, जो सभी प्राणियों
40:31के लिए एक आशा का प्रतीक थे
40:34उनकी यात्रा अनंत काल तक अन्य जिग्यासु आत्माओं को प्रेणा देती रहेगी, जो माया के बंधनों को तोड़कर परम सत्य
40:42की खोज में लगे हैं
40:46ब्रहमग्यान की यह अनंतियात्रा, ग्रिड संकल्प, गुरु कृपा और निरंतर प्रयास से ही पूर्ण होती है, जो प्रत्येक जीवात्मा को
40:54उसके वास्तविक स्वरूप से जोडती है

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