00:00उडिशा के कटक की गलियों में नवरात्र की रौनक है। पंडाल सज रहे हैं। लेकिन बालू बाजार में एक ऐसा
00:09मंडप है जहां दुर्गा पूजा सिर्फ एक त्योहार नहीं। पांच सदियों से चली आ रही विरासत है। यहां मादुर्गा की
00:17प्रतिमा ना तो बाजार
00:19सियाती है ना ही इसमें सिंथेटिक रंगों का इस्तिमाल होता है। इमली के बीज, बेल का गोंद, शंक का चूरा,
00:27गुढ़ल और हल्दी इनहीं प्राकरतिक चीजों से तयार होती है मादुर्गा की प्रतिमा और सबसे खास बात जो हाथ मा
00:35की प्रतिमा बनाते हैं वही हाथ
01:04उनकी पूजा भी करते हैं।
01:07प्रतिमा को आकार देते हैं। ये परंपरा एक दो पीड़ी की नहीं बलकि 500 साल से जादा पुरानी बताई जाती
01:15है। इस मंडप की परंपरा की कहानी चैतन्य महाप्रभू से भी जुड़ी बताई जाती है।
01:22साल 1508 में पूरी जाते वक्त चैतन्य महाप्रभू बालू बाजार में ठहरे थे। उन्होंने एक पवित्र घट स्थाफित कर मा
01:34दुरगा की पूजा सुरू की।
01:36पूरी रवाना होते वक्त उन्होंने बंगाल के नादिया इलाके के नोदिप से साथ आए बनरजी परिवार के फदफ्यों को यहीं
01:47रुक कर हर साल फार्दी पूजा कराने की जिम्मेदारी दी।
01:51पहले यहाँ पूजा पवित्र घट के जरिये होती थी। पर साल 1514 में दस भुजाओं वाली मादुरगा की मिट्टी की
02:01प्रतिमा बनाई गई थी।
02:03साल 2002 में यहाँ चांदी की भव्य चांदी मेधा लगाई गई थी। जिसमें करीब 350 किलो चांदी का इस्तमाल हुआ
02:12था।
02:12समय बदला, शहर बदला, पूजा के तौर तरीके भी बदले। लेकिन बालू बाजार के इस मंडप में 500 साल पुरानी
02:21परंपरा आज भी सांस ले रही है।
02:25कटक से ETV भारत की लिए नारायन साहू की रिपोर्ट