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  • 21 minutes ago
'व‍िव‍िधताओं का सम्मान और सभी को संरक्षण...', व‍िजयादशमी के मौक पर बोले मोहन भागवत

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00:00सीधे आपको लिए चलेंगे मोहन भागवा तस्वक बोल रहे हैं
00:03स्वातंत्र सेनानी
00:05स्वामी श्रद्धान अंजजी के बलिदान को सवसाल पूरे हुए है
00:10उसी प्रकार से
00:12उडिसा में वनवासी बंदूओं के बीच में रहकर उनकी सिवा में अपना जीमन लगा देने वाले
00:18और वही पर स्वधर्म रक्षा का उनका बहुत जगाते जगाते जिनका बलिदान हो गया
00:25ऐसे स्वामे लक्ष्मना नंजजी सरस्वत्य महराज के भी जन्मशताब्दी अभी चल रही है
00:32महात्मा फुले जी का भी दोसोवा वर्ष पिछले अकरा 11 एप्रिल से शुरू हो गया है
00:39ऐसे ही आत्मबोत को जगाने वाले बंगाल के श्रीमद राजन आरायन जी बसु जिन्होंने अपने समाज के संगटन की एक
00:50परिकल्पना सामने रखी थी
00:52और स्वा का बोज जगाने के लिए स्वदेशी मेलों का आयोजन अपने मित्रों के साथ प्रवर्थित किया था उनका भी
01:02दोसवा वर्ष चल रहा है
01:05इनका स्मरण करना इसलिए भी समीचीन है कि संगटन का जो कार ये सव वर्षों से चल रहा है
01:14वो इसी स्व को जगाने का काम है उस स्व के अस्मिता के या इठास के आधार पर भारत को
01:23संगटित बलसंपन्द करने के लिए चला है
01:28अभी पंजपरिवर्तंगा उल्लेख हमारे मांजिये प्रांत संगजालक जी नहीं अपने प्रस्ताव नामी किया
01:34उसमें जो एक पहल है वो यही स्वबोध हो स्वदेशी के आचरण की पहल है क्योंकि यह स्वबोध
01:47जिसका प्रत्यंतर हमको संविधान की प्रस्तावना में उद्देशी का में आता है जहां हमने अपने आपको हम भारत के लोग
01:56ऐसा कहा है
01:58वो हमारी जो हम भावना है वो जो हमारा स्व है वो हमारा भावनात्मक बंदन है जिससे इतनी सारी विविजताओं
02:10से भरा हुआ देश प्राचीन समय से एक देश एक समाज एक राष्टर के नाते चलते आया है
02:19क्योंकि हमारे पूर्वजों के पास एक अनुभूती थी संपूर्ण अस्थित्व के एकता थी और उस अनुभूती के आधार पर अपने
02:30पंका विवहार प्रवर्तित करने वाले अनेक सोपानों से बने हुए
02:35उत्कृष्ट तत्वध न्यान के भी हम विरासतदार है हम इसको भूल गए तब हमारा पतन हुगा हम विवाजित हो गए
02:49और दुर्बल हो गए और फिर इतने नीचे गिरते चले गए कि सेकड़ों वर्षों की गुलामी हमको जहलनी पड़ी अब
03:02उस गुलामी से हम
03:03अनेक लोगों के महापुर्षों के भीम प्रयासों के बाद और बलिदानों के बाद मुक्त होकर अपनी एकता और प्रगति के
03:14रहा पर चल पड़े है तो उस हमारे भावनात्मक बंधन को
03:20जिसको उत्तर उत्तर पक्का बनाने का निर्देश अपने समिधान में ही मारगदर्षत तत्वों के प्रकरण में लिखा है
03:29उस भावनात्मक बंधन को फिर से स्मरण करना पड़ेगा स्पष्ट रूप से उसको समझना पड़ेगा वो क्या है और उसके
03:40उनरूप गुनवत्ता का वरण हमको करना पड़ेगा अपने जीवन में हमको उसका व्यवहार करना पड़ेगा
03:47जेश के स्वाधीनता के समय जो वातावरण था को मुख्यासीत आूब करने के लिए प्रहिए करने वाले महापुरुश्टे और उस
04:08समय के समाज को
04:11जितनी तपस्या और समर्पन के द्वारा ये सब करना पड़ा उससे कई गुना अधिक की आवश्यक्ता आज की परिस्थिति में
04:20ये सब करने के लिए हमको पड़ेगी ये परिस्थिति को हम देखतों तो जान में आता है
04:27वो भाव कौन सा है वो तत्व कौन सा है अपना भारत विविद्धता का देश है अनेक प्रकार की प्राकृतिक
04:40विविद्धता है अनेक प्रकार की पंथों की प्राम्तों की जातियों की भाषा खांपान रीती रिवाज सब प्रकार की विविद्धता है
04:51एक होके इस देश को �
04:55चलना है जो चलता आया है और आगे भी चलना है तो आधार भूत तत्वा ऐसा चाहिए जो इन सबको
05:02स्विकार करेगा
05:04इन सबको संवाल लेगा इन सबकी प्रतिष्ठा और सुरक्षा की चिंता करेगा
05:11ऐसा अधार हमारे पास कौन सा है इतरत्र दुनिया के उपलब्ध विचारों में ऐसा कोई नहीं है सौभाग्य से ऐसा
05:22विचार परंपरा से हमारी पास है हमारी सनातन काल से चलती आई जो परंपरा है
05:30और ऊकवल परंपरा के नाते नहीं चल रही उसका जो सत्य है उसकी अनुभूती करने वाले महापुरुष सतत हम को
05:39उपल अब्ध रहे हैं आज भी मिलते हैं वह कागज लिखी नहीं है किवल मन की सोची नहीं है आखन
05:49देखी है ऐसी है अपनी जो परंपरा है वो हमको बताती ह
05:54सिरिष्टी में विविधता हैं. बिल्कुल स्वाभाविक है जितनी स्वाभाविक परिशक्षा абсолют भी है
06:02वह जितनी स्वाभाविक और परिशक्षा नेदिया है उतनी ही संपूर्ण एकस्थित्व ₤ एकता का सत्य अचल है
06:11अटल है और शाश्वत है और मनुष्य को विचार का वरदान भगवान नी दिया है उसकी परिशुद्धी करते हुए वो
06:22अगर अपने में इसको साक्षात कर लेता है और दुनिया में इसको साक्षात देखता है उसके अनुसार जीवन जीता है
06:30तो वही करने से शाश्वत और �
06:33नित्य रहने वाला सुख उसको प्राप्त होता है, जो मनुष्षता की सनातन खोज है, उसी में मनुष्षता आगे बढ़ती है,
06:43उस सुख की खोज के लिए, और इसलिए उस सुख को प्राप्त करना, उस परम सुख को प्राप्त करना, ये
06:51मनुष्य जीवन का धिये है, उसके �
06:58उसके लिए जैसा जीवन चाहिए संपूर्ण विश्व को अपना कुटुम्ब मान कर चलने वाला वैसा जीवन चाहिए यह हमारी परंपरागत
07:06मान्यता रही है
07:08हमारी विविधता के बाउजोज यह मान्यता एक है इसी सत्य को विविधपक्ष से वेदों में हमने गाया था
07:25गुरुद्वारे जाकर यहीद ज्यान सत्संग मिलेगा। कहीं भी जाओ भारती विचारदारा में।
07:32आपको यहीद ज्यान यही सत्संग मिलेगा। सभी विविधता का सम्मान स्विकार करो।
07:39सभी को सवरक्षंडो। ऐसा हमाना स्वभाव परंपरा से।
07:44और उसके कारण और एक बात आई है कि विविधता है वो परिवर्तंशील है इसलिए जीवन में परिवर्तंशील जो होता
07:54है वो बदलते समय के साथ बदलना चाहिए शाश्वत बातों तो सदा कायम रखना चाहिए
08:01यह जो लचीलापन है यह लचीलापन भी इसी सनातन दुरुष्टि का परिणाम है जब हम इस भाव को समझ कर
08:11बरतते रहे जब यह भाव हमारे और भी भाव रहते हैं अपने भाशा के प्रती अपने जाती के प्रती अपने
08:18पंत्र संप्रदाय के प्रती स्वाभावीत भाव है लेकिन इन सबसे उपर हमारा यह भावनात्मक एकता का भारत के अपने राष्ट्रियता
08:28का भाव जब सर्वोच रहा तब हम विश्व में सभी दुर्ष्टी से आदर से जब अब इसको भूल गए तो
08:38आपसका नाता भूल �
08:39अपनापन भूल गए विघटित हो गए उसके कारणट दुर्बल हो गए दुर्बल हो गए ay ayy hai tham bhaiखा गए
08:48हम दरने लगे दुनिया से हम रहेंगे की नहीं
08:52रहेंगे, दुर्बल व्यक्ति अपने आपको दीवारों में बन कर लेता है, संकुचित कर लेता है, वैसा हमने अपने आपको संकुचित
09:01कर लिया, क्रुणवन तो विश्वम आर्यम की बात करने वाले हम लोग समुद्रबंदियादी बंधनों में फस गए,
09:10और ऐसा दुर्बल होने के बाद मनुष्य अपने अस्तित्व को दिखाना चाहता है, तो फिर वो कुछ अहंकार भी पाल
09:19लेता है, हम अहंकारी भी बन गए, और इन सब का परिणाम क्या हुआ, हमारी दुर्गती हुई, हमने अचरन को
09:28त्याग दिया, हमारी दुर्गती हो ग�
09:36इस भावनात्मक आधार को स्मरण करते हुए, उसके आधार पर संगटिक और परस्पर हित कहीं लिए कटिवद्दी जीवन जीना, यह
09:45हमको करना ही पड़ेगा, इसी दुर्टी से सव वर्षों से संग काम करता है, और पिछले वर्षों उसकी शताबदी मना
09:55ही गई, शताब
10:08इसी निमित्त, क्योंकि भारत का स्थान एक बन रहा है विश्व में, और संग के बारे में भी विश्वास बड़ा
10:16है, तो विश्व के देशों में भी भारत, हिंदू और संग इन तिनों के बारे में सही जानकारी देनी की
10:25आवश्रक्ता ध्यान में आई, इस दुर्टी से �
10:28वहां के प्रबोधन का भी आयोजन किया गया जो कारेक्रम हुए उसका अब तक का जो प्राब्त वृत्त है अंतिम
10:37निश्चित वृत्त तो हमको मिलेगा कारेकारी मंडल की बैठक में अभी तक जो वृत्त है वो मैं बताता हूँ आगे
10:45उसके बढ़कर और कुछ होगा
10:47संपर का भीयान किया हर गाउ में हर गर में जाने का भारत के चार लाग एक सट हजार पास्तों
10:56सत्ताइस ग्रामों में हम पहुँचे एवन नगरी यह जो छित रहे उसकी हम बस्तिया कहते हैं दस-दस अजार की
11:05एक बस्ती ऐसे वे 41,006 बस्तियों में पहुँचे
11:1010,19,88,511 घरों में हम पहुँचे हैं, परिवारों में पहुचे हैं।
11:19प्रबुद्धन अगरिक गोष्टिया जिला में आयोजित करना था, 1117 जिलों में ऐसी गोष्टिया आयोजित हुई, उसमें महिलापुरुष मिलाकर 4,26
11:31,497 प्रबुद्धन अगरिक उपस्थित थी।
11:36सभी खंडों में जाती विरादरी के प्रमुखों की सद्भावना बैठके आयोजित करनी थी, 5,036 खंडों में ब्लॉक्स में वो
11:48बैठके संपन्न हुई और वो आगे भी चलेगी, अपेच्छा इसी है धीरे धीरे, हर 2-3 महने में ये सद्भावना
11:56बैठक खंड के यही सब
11:58प्रमुख्लों मिलकर करें, हिंदू सम्मेलन हुए मंडलों में करना था, 10-20 गाओं का एक मंडल होता है,
12:1149,34,187 मंडलों में वो संपन्न हुई, युवा सम्मेलन भी किये गए, जिसमें 49,25,225 युवा उपस्थित रहे,

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