00:00उस्व के अस्मिता के या इथास के आधार पर भारत को संगटित बलसंपन्द करने के लिए चला है अभी पंचपरिवर्तंगा
00:11उल्लेख हमारे मान जीनिया प्रांत संगचालक जीनिया अपने प्रस्ताव नामी किया उसमें जो एक पहल है वो यही स्वबोध और
00:20स्वदेशी क
00:20आचरण की पहल है क्योंकि यह स्वबोध जिसका प्रत्यंतर हमको स्वविदान की प्रस्तावना में उद्देशी का में आता है जहां
00:35हमने अपने आपको हम भारत के लोग ऐसा कहा है
00:40वो हमारी जो हम भावना है वो जो हमारा स्वव है वो हमारा भावनात्मक बंदन है जिससे इतनी सारी विविज़ताओं
00:52से भरा हुआ देश प्राचीन समय से एक देश एक समाज एक राष्टर के नाते चलते आया है
01:01क्योंकि हमारे पूर्वजों के पास एक अनुभूती थी संपूर्ण अस्तित्व के एक अता की और उस अनुभूती के आधार पर
01:11अपने पन का व्यवहार प्रवर्वर्थित करने वाले अनेक सोपानों से बने हुए उत्कृष्ट तत्वद न्यान के भी हम विरासतदार है
01:23हम इसको भूल गए तब हमारा पतन हुआ हम विवाजित हो गए और दुर्बल हो गए और फिर इतने नीचे
01:37गिरते चले गए कि सेकड़ों वर्षों की गुलामी हमको जहलनी पड़ी
01:43अब उस गुलामी से हम अनेक लोगों के महापुर्शों के भीम प्रयासों के बाद और बलिदानों के बाद
01:52मुक्त होकर अपनी एकता और प्रगती के रहा पर चल पड़े है तो उस हमारे भावनात्मक बन्दन को
02:02जिसको उत्तरों पर पक्का बनाने का निर्देश अपने समिधान में ही मारवगदर्शत तत्व के प्रकरण में लिखा है
02:11उस भावनात्मक बन्दन को फिर से स्मरन करना पड़ेगा स्पष्ट रूप से उसको समझना पड़ेगा वो क्या है
02:20और उसके उनरूप गुणवत्ता का वरण हमको करना पड़ेगा अपने जीवन में हमको उसका विवहार करना पड़ेगा
02:29देश के स्वाधीनता के समय जो वातावरण था
02:35मुख्यातिती जी ने कहा कि संग अलग वातावरण था उस वातावरण में हमको स्वतंड्र करने के लिए प्रयास करने वाले
02:48महापुरुष्के और उस समय के समाज को
02:53जितनी तपस्या और समर्पन के द्वारा ये सब करना पड़ा उससे कई गुना अधिक की आवश्यक्ता आज की परिस्थिती में
03:02ये सब करने के लिए हमको पड़ेगी ये परिस्थिती को हम देखतो तो ज्यान में आता है
03:09वो भाव कौन सा है वो तत्व कौन सा है अपना भारत विविद्धता का देश है अनेक प्रकार की प्राकुरुतिक
03:22विविद्धता है
03:25अनेक प्रकार की पंथों की प्रांतों की जातियों की भाषा खानपान रीती रिवाज सब प्रकार की विविद्धता है
03:34एक होके इस देश को चलना है जो चलता आया है और आगे भी चलना है तो आधार भूत तत्वा
03:43ऐसा चाहिए जो इन सब को स्विकार करेगा
03:46इन सब को सम्वान लेगा इन सब की प्रचिष्ठा और सुरक्षा की चिंता करेगा ऐसा अधार हमारे पास कौन सा
03:54है
03:57इतरत्र दुनिया के उपलब्ध विचारों में ऐसा कोई नहीं है सौभाग्य से ऐसा विचार परंपरा से हमारी पास है
04:07हमारी सनातन काल से चलती आई जो परंपरा है और उकेवल परंपरा के नाते में चल रही उसका जो सत्य
04:17है
04:17उसकी अनुभूती करने वाले महापुरुष सतत हमको उपलब्धर रहे है आज भी मिलते है वो कागज लेखी नहीं है
04:27केवल मन की सोची नहीं है आखन देखी है ऐसी अपनी जो परंपरा है वो हमको बताती है कि सुरुष्टी
04:37में विविधता है बिलकुल स्वाभाविक है
04:39जितनी स्वाभाविक परिवर्तंशील भी है वो जितनी स्वाभाविक और परिवर्तंशील है उतनी ही संपूर्ण अस्थित्व की एकता का सत्य अचल
04:52है अटल है और शाश्वत है