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  • 1 year ago

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00:00मैं ठट गया हूँ यह सासे भी अब बोचले लगती है
00:15दिन लाथ की महनत खाबों के लाशे लगती है
00:20लोगों की बाते रश्टों की तॉलखिया
00:24मेरे दिल पे नक्ष है जैसे सियाहिया
00:29मैं ठट गया हूँ हाथ ठट गया हूँ
00:35कब ठके बोचले मैंने सर पे उठाओं
00:40ना कोई संतन है ना कोई समझता है
00:45मैं चीह के भी खुद को खामुश पाओं
00:59तब आफिस के जगरे सिस्टम के पही हैं
01:05मेरे खाबों को रोंते हर दिन के लंग है
01:09मेरे अपने भी अब पर आये लगते हैं
01:16उनके लेजे भी जैसे बदले लगते हैं
01:20कभी सोचता हूँ कहीं भाग जाओं
01:25खामोशियों में कहीं खुद को चुपाओं
01:30लेकिन मचबूरिया है संजीर जैसी
01:34जो हर बर रोक लेती है रह मेरी
01:50मैं ठक गया हूँ, हाथ ठक गया हूँ
01:55कब तक उठाओं ने पोज रबने से
01:59ना कोई समता है, ना कोई समझता है
02:05मैं चीख के भी खुद को खामोश पाओ
02:20मैं चीख के भी खुद के लिए पाओं

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