00:00फिल्म स्टाल एक माराथी भाषा की ड्रामा फिल्म है जिसे 12,23 में निर्देशक जैंत दिगंबर सोमालकर ने बनाया
00:08ये उनकी पहली फिल्म है और इसे दून प्रोडक्शन्स ने बनाया जबकि इसे सचिन पिलगामकर ने प्रस्तुत किया
00:15फिल्म में नंदिनी चिक्टे मुकी भूमिका में है
00:18यहा कहानी भारत के ग्रामीन इलाकों में होने वाली अरेंज मैरिज
00:22यानि तैशुदा शादी की परंपड़ा पराधारित है
00:24जहां एक लड़की की शादी उसके जीवन और सपनों से भी ज्यादा जरूरी मानी जाती है
00:30फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह समाज में पितर सत्ता गहराई तक जमी हुई है
00:36और लड़कियां आज भी अपमान और दबाव जिलती है
00:40कहानी एक लड़की सविता की नजर से दिखाये गई है
00:43फिल्म सेवन मार्च डोजन वजीजिसपाइस को अंतराष्टरी महिला दिवस पर रिलीज हुई थी
00:49इसे दर्शकों और आलोचकों दोनों ने बहुत सराहा
00:52खासकर इसके निर्देशन एक सची कहानी और कलाकारों के नैचरल अभिनय की खूप तारीफ हुई
00:58नंदिनी चिक्टे और तरनात खिराटकच के अभिनय को बहुत पसंद किया गया
01:04कहानी महराश्टर के एक छोटे से गाव डोंगर गाव की है
01:07यहां की लड़की सवितावंधारे अपने छोटे से घर में अपने परिवार के साथ रहती है
01:12सविता एक होशियार और समझदार लड़की है
01:15उसका सपना है कि वह अपनी पढ़ाई पूरी करे और आगे बढ़े शायद कोई नौकरी करे या अपने पैरों पर खड़ी हो
01:21लेकिन उसका परिवार खासकर उसका पिता दौलत रावंधारे कुछ और ही सोचता है
01:27वह एक संगरशरत कपास किसान है जो अपने खेतों से जैसे तैसे गुजारा कर रहा है
01:32समाज के लोग और रिष्टेदार बार बार उसे कहते हैं कि अब उसकी बेटी बड़ी हो गई है उसकी शादी कर दो
01:40समाज में ये माना जाता है कि लड़ी की शादी सबसे जरूरी काम है चाहे पड़ीवार के पास पैसे हो यान हो
01:46सविता का पिता भी ही सोचता है कि अगर वह जल्दी शादी नहीं करेगा तो लोग बाते बनाएंगे
01:52उसे डर है कि उसकी बेटी घर में बैठी रहेगी तो समाज उसे और उसके पड़ीवार को नीचा दिखाएगा
01:57धीरे धीरे वह अपनी बेटी की पड़ाई को निजर अंदाज करके उसके लिए रिष्टा डूडने लगता है
02:01फिल्म बहुत ही सच्चाई से दिखाती है कि गावों में शादी के नाम पर लड़कियों के साथ कितना अपमान और भेदभाव होता है
02:09हर बार जब कोई लड़के वाला परिवार समिता को देखने आता है
02:12तो एक जैसा दृश्य होता है
02:14सविता को एक छोटी सी स्टूल पर बैठाया जाता है
02:17सब की नजरें उस पर टिकी रहती है
02:19कोई उसकी रंगत पर टिपपनी करता है
02:22कोई कहता है लंबाई थोड़ी कम है
02:24कोई जात पूछता है
02:25लेकिन किसी को भी ये जानने में दिल्जस्पी नहीं होती कि सविता के सपने क्या है
02:31वा क्या बनना चाहती है, उसे जिन्दगी से क्या चाहिए
02:34सब कुछ बस बाहरी दिखावे और परमपरा पर ठिके है
02:38उसकी माँ और घर की बाकी औरतें कुछ नहीं क्या पाती
02:41वे बस खाना परोस्ती है
02:43चुपचाप खोने में बैठ कर सब देखती है
02:46मानो उनके पास कोई अधिकारी नहीं
02:48सविता हर मुलाकात में अपने मन को मजबूत करती है
02:51पर अंदर से वे टूटी जा रही होती है
02:54इसी बीच सविता अपने कॉलेज में थोड़ी राहत महसूस करती है
02:57वहाँ उसका एक अधियापक है जो महिलाओं की अधिकार और समानता पर पढ़ाता है
03:02उसकी बातें सविता को बहुत प्रभावित करती है
03:05उसे लगता है कि शायद दुनिया में बदलाव संभव है
03:09वहाँ उस अधियापक के साथ कोई प्रेम संबंद नहीं रखती
03:13लेकिन उनके बीच एक चुपचाप समझदारी का रिष्टा बन जाता है
03:17एक ऐसा रिष्टा जिसमें कोई शब्द नहीं बस सोच का मेल है
03:21लेकिन जब वह घर लोटती है तो हकीकत बहुत कठोड लगती है
03:25घर में उसकी शादी का दबाव बढ़ता जा रहा होता है
03:29उसका पिता अब इतना परेशान हो जाता है कि वह अपनी जमीन बेचने तक का सोच लेता है
03:35ताकि अपनी बेडी की शादी की ये पैसे जुटा सके
03:37उसे लगता है कि शादी ही उसकी बेडी की इज़त और भविश्या है
03:42सविता की माँ अंदर से दुखी है लेकिन कुछ नहीं कह पाती
03:45वह भी समाज के डर में बंधी हुई है
03:48सविता का भाई मंग या भी चाहता है कि उसकी बेहन की शादी जल्दी हो जाए
03:53ताकि वह अपनी प्रेमिका को घर में बता सके
03:55उसे लगता है कि जब बेहन की शादी हो जाएगी
03:59तो वह अपने प्यार के बारे में खुल कर बात कर सकेगा
04:02यानि हर कोई अपने स्वार्थ में लगा है और कोई भी सविता की भावनाओं को नहीं समझता
04:07हर नए रिष्टे के आने पर सविता का मन और ठकने लगता है
04:11हर बोसे जांचने पढखने का सलसिला चलता है
04:16जैसे वह कोई वस्तु हो
04:17कोई उसकी आँखों में नहीं देखता बस उसके चेहरे और शरीर को देखता है
04:22यह सब देखकर दर्शक का दिल भारी हो जाता है
04:25फिल्म सविता के जरीए बताती है कि भारत के गामों में आज भी शादी को ही लड़की की मनजिल माना जाता है
04:32चाहे वह लड़की पड़ी लिखी हो या नहीं चाहे उसके सपने कुछ भी हो
04:36कहानी के आगे बढ़ने के साथ सविता की हिम्मत कम नहीं होती
04:40परसिते से विरोध करना चाहती है लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं दिखता
04:45समाज का दबाव, पिता की उमीदें और अपने भविश्य की चिंता सब मिलकर उसे एक जाल में बात देते हैं
04:52फिल्म बहुत ही शांत और वास्तविक तरीके से दिखाती है कि किस तरह एक लड़की को सिर्फ उसके रंग, जात और रूप से आंका जाता है
05:00एक साधारन लड़की के जीवन की ये कहानी पूरे भारत की लाखो लड़कियों की हकीकत बन जाती है
05:06कई बार सविता सोचती है कि अगर वा पढ़ाई पूरी करे और खुद का कुछ करे, तो शायद वा अपने पिता का बोज भी हलका कर सके
05:15लेकिन समाज की परंपरा इतनी मजबूत है कि कोई उसे ये सोचने का मौका नहीं देता
05:20एक दिर्शी में जब एक अमीर परिवार सविता को देखने आता है, तो वे लोग दहेज की बात करते है
05:26पिता का चेहरा जुग जाता है, उसे समझ नहीं आता कि बेटी की शादी इजद की बात है या व्यापार की
05:33यही वह पल है जब फिल्म दर्शकों के दिल को छूती है
05:37फिल्म में ये भी दिखाया गया है कि गाव में औरतों को किस तरह शादी के लिए तैयार की गई चीज माना जाता है
05:43कोई उनकी राए नहीं पूछता, बस उनके लिए फैसले किये जाते है
05:48धीरे धीरे सविता का मन विद्रोह करने लगता है
05:51वह सोचती है कि क्या ये जिन्दगी जीने लायक है जहापनी मरजी की कोई जगा नहीं
05:56कहानी का हर पल समाज के दहेज पर था, जातिवाद और लिंग भेदभाव पर गहरावार करती है
06:03ये फिल्म किसी एक लड़की की नहीं, बल्कि उन सब की आवाज है जो अपने अधिकारों के लिए चुपचाप संगर्श कर रही है
06:09स्टैल का मतलब ही है स्थान, यानि जगा
06:14फिल्म का नाम यताता है कि समाज में एक लड़की की जगा आखिर कहा है
06:18क्या उसकी जगा सिर्फ किसी के घर की बहू बन कर रहना है
06:22या उसे भी अपने सपनों की जगा मिलनी चाहिए
06:24फिल्म का अंत दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है
06:28ये कहानी सिर्फ सविता की नहीं, बल्कि हर उस लड़की की है
06:32जो अपने सपनों के बदले समाज की परंपराओं के बोज तले दबाई जाती है
06:36स्ताल, बहुत ही सादगी, सच्चाई और भावनाओं के साथ बनाए गई फिल्म है
06:42इसमें न कोई चमक दमक है, न कोई बनावटी पन
06:45ये फिल्म दिल को छू जाती है क्योंकि इसमें वो दर्द है जो सच में हमारे समाज में आज भी जिन्दा है
06:51ये फिल्म ये सवाल छोड़ जाती है, कब तक लड़कियां अमस्तपनों को कुर्बान करती रहेंगी, सिर्फ इसलिए की समाज क्या कहेगा
06:58और ये सवाल ही इस फिल्म की असली ताकत है