00:03ुडिशा के कटक के गलियों में मादुर्गा के धर्बार को आखरी रूप दिया जा रहा है
00:08इन्हीं तैयारियों के बीच सयद असलम अली और उनकी टीम दिन रात एक के हुए है
00:15पिछले कई दिनों से असलम महज दो घंटे ही सो पा रही है
00:20मगर असलम के लिए ये सिर्फ एक काम नहीं है
00:23ये पीडियों से चली आ रही विरासत है
00:26रोजी रोटी है और मादुर्गा के प्रतियों की आस्था का हिस्सा भी
00:34परिवार में हिंदू पूजा के लिए सजावत और जहांकिया तैयार करने की परंपरा
00:38हमारे दादा के समय से चली आ रही है
00:41दादा ने पिता को सिखाया, पिता से असलम ने सिखा
00:44और अब पूरा परिवार इसी हुनर को आगी बढ़ा रहा है
00:48मादुर्गा की प्रतिमा के पीछे सजने वाला चमकीला बैक ड्रॉप हो
00:53जरी का काम हो या फिर आभूश्रो जैसी बारीक सजावत
00:57हर डिजाइन में कारिगरों की महनत साफ दिखाई देती है
01:01इस साल असलम छे जहांकिया तैयार कर रही है
01:05जिनकी कीमत करीब साथ हजार से धाई लाख रुपे तक है
01:10उनके साथ लगभग 14 कारिगर काम कर रहे है
01:14इस कहानी का एक एहम केरदार है असलम की पत्नी फरीदा बेगम
01:19फरीदा हर दिन पहले घर के काम निपटाती है
01:23और फिर जरी मखमल और सजावती सामान के साथ जुट जाती है
01:28शादी के 25 साल बाद भी उनका समरपड कम नहीं हुआ है
01:33लाठा भी लगाते हैं, लई भी बनाते हैं
01:37तड़ाब डालना, जरी बठाना, चुमकी बठाना, भिलबड जो कपड़ा सब लगाए था
01:42सारा सब काम करते हैं
01:45वो खोद के देखे, देटने
02:06कटक में हिंदू और मुस्लिम समुदायों की साजेदारी
02:10सिर्फ मूर्तियों और जाकियों तक सीमित नहीं है
02:13यहां मुस्लिम समुदाय के लोग दुर्गा पूजा समीतियों में एहम जिम्मेदारियां भी निभाते हैं
02:21मुस्लिम समुदाय के लोग माकी सजावट से लेकर भोग और बिसर्जन तक कई रस्मों में भाग लेते हैं
02:28Hindu-padosi Muslim-privaroom ke ghar jatay hai, Muslim-privaroom bhi unke teoharoom mein shamil hootay hai.
02:35Aaj jab dèške kai hisso me sampradaiq tanau ki khabre sámne aati hai,
02:41tab kattak ki yye tasvīr eek alag sandeish djeti hai.
02:45Yahaan Siyad Aslam Ali aur unka parivar madurga ke darbar ko sajane mein juta hai.
02:50To dousari or, hindu-muslim-samudai ke log meil kar tiyohar ki paramparau ko aagye badhaa rahi hai.
02:58Udisha ke kattak se e-tv bharat ke liye narayan saahu ki report.