00:03नमस्कार, मैं श्वेता दिवारी आप सभी का अभिनंदन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक
00:11विद्यावाचस्पती गुलाप उठारी जी का परिवार में प्रकाशित आलेख, जिसका शीर्षक है दिपोत्सव, संरक्
00:29प्रधि की रक्षा, निरंतरता तथा धर्म से जोडता है। ब्रम्हांडिय इस्तर पर भाईदूज का महत्व यहां है कि स्टिष्टी में
00:36सबकुछ शरणशील है। काल, परिवर्तन और वृत्यू अनिवाद्य है। लेकिन प्रेम, करुना, संबंध और धर्म ही जीवन को �
00:44अर्थ देते हैं। जिस प्रकार तारे अपने संतुलन से चमकते हैं, उसी प्रकार मानव जीवन भी संब्रिध्धी और उत्तर दायतु
00:54के संतुलन से ही सार्थक बनता है। भाईदूज का अफसर संब्रिध्धी को संबंधू और धर्म से जोडने वाला ब्रम्हांडिय सं�
01:02देश है। हमारे पर्व केवल सामाजिक उत्सव या उल्लास के माध्यम नहीं है। ब्रम्हांडिय सत्य प्रक्रति के रितुचक्र और मानविय
01:11चेतना के बीच के गहरे तालमिल को दर्शाते हैं। कार्थिक मास के ये पर्व केवल परंपरा नहीं। ब्रम्हांड के संचाल
01:20उर्जा के प्रवाव और संतुलन के प्रतीक हैं। जब इन पर्मों को इस थूल भौतिकता से उपर उठकर ब्रम्भांडी एस्तर
01:28पर देखते हैं, तो इनके गहरे और विराट अर्थ समझ में आते हैं।
01:53परिवार में भाई भहनकास ने एक दूसरे की चिन्ता और सम्मान ही वह आधार है जो खटिन समय में जीवन
02:01को सहारा देता है। ब्रम्मांडी इस तर पर यह संदेश है कि मनुष्य अपने एहंकार से उपर उठकर स्रिष्टी के
02:08संतुलन का हिस्सा बने। भारतिय पर वकिवल
02:11प्रतितियों और रस्मों का समुव नहीं है। वे मनुष्यों के जीवन, समाज और स्रिष्टी के मूल सिधानतों को समझने की
02:19सांकेति भाषा है। दिपावली पर्व लक्ष्मी, अर्थात सम्रिध्धी, पोशन, सौंदर्य और एश्वर्य से जुड़ा है। भाई दोश क
02:41संतुलन और निरंतर्ता से जुड़ी हो। दिपावली पर अमावस्या की अंधेरी रात में दीप जलाना, अंधकार से प्रकाश, अभाव से
02:51सम्रिध्धी, अज्ञान से ज्ञान और असंतुलन से संतुलन की और यात्रा का प्रतीक है। लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं
03:00वे जीवन में पोशन, संसाधन, सौभाग्य, स्टिजन और सम्रिध्धी की उर्जा है। ब्रंभान में सभी कुछ आदान, प्रदान और संतुलन
03:09के नियम से तिका है।
03:30प्रतीक है कि सम्रिध्धी प्राप्त करना एक बात है, उसका सही उपयोग और संरक्षन करना दूसरी बात। यही से भाईदूज
03:38का महत्व शुरू होता है। भाईदूज का अतिक मास के शुकल पक्ष की द्वितिया तिथी को मनाया जाता है। इसे
03:45यम द्वितिया भी कहा
03:46जाता है। इस दिन बहन भाई के माथे पर तिलक लगाती है, आरती करती है और उसकी लंबी उम्र, सुक,
03:53सम्रिध्धी तथा कल्यान की कामना करती है। बहन की सुरक्षा, सम्मान और सहयोग का वचन भाई देता है। यह रिष्टे
04:01की आपचारिकता नहीं बलकि विश्वास
04:03करुणा और जिम्मेदारी का उत्सव है। धार्मिक मानेता के अनुसार इसी दिन यम्राज ने बहन यमुना से मिलकर उनका आतिथ्यस
04:12विकार किया था। इसलिए से यम्दृतिया कहा जाता है एक अन्या कथा में कृष्ण और सुबत्रा का उल्लेख मिलता है।
04:30इन कथाओं
04:32में बहने वाली जीवन की धारा है। भाईदूश का संदेश है कि जीवन के सुचारू संचालन के लिए अनुशासन यम
04:39और प्रवाह यमुना दोनों का संतुलन आवश्यक है। एक के बिरा दूसरा अधुरा है। यहां एक बात सपष्ट करना आवश्यक
04:48है कि भाईदूश
04:49का अर्थ कोई खगोलिय घटना या ग्रहन अक्षत्रों का गणित नहीं है। यह एक प्रतिकात्मक और आध्यात्मिक दृष्टी है। इसका
04:57अर्थ है व्यक्ति परिवार और समास से उपर उठकर स्रिष्टी के मूल सिध्धानतों में इस परवका संदेश समझाता है। प्
05:18पहन करुणा, पोशन, स्मृति और कल्यान की कामना का परियाय है। भाई, रक्षा, धर्म, साहस और उत्तरदाइद्व का प्रतिक है।
05:26एक के बिना दूसरा अधूरा है। यही बात लक्ष्मी सम्रिध्धी पर भी लागू होती है। लोक संग्रह की भावना ही
05:33सम्रिध्ध
05:33के यश को एश्वर्य में प्रस्तुत करती है। तारे स्वयमेव नहीं चमकते, वे अपने तंत्र में गुरुत्व और उर्जा के
05:43संतुलन से चमकते हैं। यह संतुलन बिगडे तो तारा स्वयम बिखर जाता है। मानव जीवन में भी यही नियम लागू
05:50होता है। सम्रिध
05:51ज्यान प्रकाश एश्वर्य की स्थिता ही सुख की आनंद की अनुभूती है। नमस्कार।