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Transcript
00:00शंत सदगुरदेव की सेवा में अपने जीवन को समर्पित करना बहुत कठिन बात है
00:08संत सेवा कोई खिलवार नहीं है
00:12भगवत सेवा कर सकते हो लेकिन संत सेवा नहीं कर सकते हैं
00:17बहुत कठिन है संत सेवा
00:19शी श्यामानंद जी के परमप्री सिस्षी स्री रसिक मुरारी जी दिते
00:27हरदयानंद जी के सिस्षी स्यामानंद जी उनके सिस्षी स्री रसिक मुरारी जी
00:38गुर्देव ने जो मंत्र और नाम दिया इसका जो निरंतर जब करते महाबल साली हो जाते है
00:45شामानन Shakti ji ने जो भजन पध्धती बताई जो मंत्र बताया जो नाम बताया
00:52लग गए रात दिन उसी में रशिक मुरारी जी तो गुरू प्रदत भजन से महाबलवान हो गए
01:00जो भजन से युक्त होता है गुरु प्रशाद गुरु कृपा होती उसी के द्वरा भक्ती का अदभुत प्रचार होता है
01:11उस समय लुप्त हो चुकी थी भक्ती मानो
01:14तो स्री गुरु की कृपायों गुरु प्रदत भजन के बल से
01:19शंत सेवा भगवतिय श्गायन और भक्ति का अद्भुत प्रताप सी रशिक मुरारी जी ने प्रगट किया
01:30रशिक मुरारी जी भजन बल गुर्देव का प्राप्त किया फिर एक दिन गुर्देव से पूछा हरी कैसे प्रशन होते हैं
01:39तो उनका सादु सेवा से यदि सादु सेवा नियम पुर्वक देन्यता पुर्वक भाव पुर्वक की जाए तो भगवान संतों की जिव्या से ही प्रशाद पाते हैं
01:52स्वाद ले लेकर संतों की जिभ्या से पाते हैं
01:55संतों का चरणामर्त उतारा जाए
01:57संतों की आर्ति की जाए
01:59संतों को प्रशाद पवाया जाए
02:01तो भगवान बहुत जल्दी प्रशन हो जाते हैं
02:05गुरू आग्यां
02:07शिरशिक मुरारी जी ने संत सेवा का बड़ा ही बिस्तार किया
02:12रोज शंतों का निवंत्रण
02:15और आपको बताए
02:18धनी बनना हो तो बिलकुल सरल उपाय है
02:22अकाट्य उपाय है
02:24धनी सब बनना चाहते लेकिन
02:27पाप करके बनना चाहते है
02:29अधर्म करके बनना चाहते
02:37कि फिर निकलने को नहीं मिलेगा इस माया समुद्र से द्यान रखना ये जो सोचते ना बहुत जल्दी धनी बन जाने के लिए एक उपा है बहुत जल्दी कृपा हो जाएगी बहुत जल्दी धनी बन जाओगे क्या शंतों की सेवा सुरू कर दो
02:53रशिक मुरारी जी ने गुरू आज्या का पालन शंत सेवा करने पर शंत सेवा का बहुत कठिन ब्रत है बहुत कठिन ब्रत है क्योंकि अलग-अलग सो भाव के संत अलग-अलग भाव के शंत ध्यान से सुना जाए संत सेवी भाव रखने वाले उपासक आपकी एक विलक्षन �
03:23चाहिए की उसमें यह ने देखना चाहिए कि इनके पैर गंदे हैं, इनमें क्या लगा हुआ। नहीं जब चरणों दक उतार रहा है तो सब के भले खुष्ठ घोना हो उनके चरणों में।
03:33चरणों में, लीला हो सकती है, वह ही भगवान हो सकते हैं, ध्यान रखना, जब चरण धोने के लिए संतों के बैठते हो आप लोग, तो उनी में से ऐसे आ सकते हैं, घरणित भेस धारन करके, जिनको छूना भी अच्छा नहीं लगेगा, बहुत चाव भाव से उनके चरण धो
04:03रशिक मुरारी जी के धन क्या था, संतों का चरण उदग भर भर के माट में ऐसे, उपर विराजमान की आसन पे, और रोज उनकी परिक्रमा, रोज सास्टांग दंडवत, और रोज चरणाम्रत पान, रोज चरणाम्रत उतरवाना, और संतों को भोग पवाना,
04:20संतों के चरणाम्रत में किशी भागशाली की निष्ठा होती है, मटकों में भर भर के रखें, जैसे कोई अब संपत्ती रखता है, ऐसे हैं, बड़ी कृपा है, गुरुजनों की बड़ी कृपा है, जिनको संतचरणाम्रत में, उसकी पूझा करते, आरती उतारते, परिक्र
04:50ये निश्था होती है
04:52चरणामट से
04:54बहुत दिव्यताय प्राप्त हो जाती
04:57बहुत दिव्यताय प्राप्त होती है
04:59जबतक गुरु वचनों पर विश्वास नहीं होता
05:06तब तक बल नहीं आता अभ्यात्म का
05:08आपके हिरदय में संत वैश्णवों के प्रति अपार सुख देने की भावना आ गए
05:15क्योंकि गुरुदेव ने कहा संत सेवा में ही भगवान की प्राप्ति होगी
05:19शीप प्रियादास जी कह रहे कि सिक मुरारी जी की संत सेवा की महिमा का बरणन
05:28या संतों के प्रतिभाव का बरणन एक जीव्याए मैं कैसे करूँ इतनी अपार संत सेवा की भावना मेरी बुद्धी ठकित हो जाती इनकी महिमात देख करके संत सेवा की
05:40आप बड़े समाहरों से श्री गुरू उच्षो मनाया करते थे उसमें पूरे दिन कथा किर्तन सत्संग भोज भंडारा होता रहता था
05:52साफ शंतों को बड़ा सुख प्रदान करते थे यह उच्षो बारा दिन तक लगातार गुरू उच्षो चलता
06:00बारण दिन भक्तों की भीड रेती जो देखने में अत्यांत आनंद प्रदान करने वाली हती है
06:08उच्षो चल रहा था संत सेवा का प्रशाद पवाने के पहले सब संतों का चर्णाम्रत उतारा जाता था
06:17और सीधे वो चर्णाम्रत रशिक मुरारी जी के पास जाता और वो चर्णाम्रत पी करके प्रफुलित हो जाते
06:24आज जब संतों का चर्णाम्रत दिया गया तो रशिक मुरारी जी बोले क्या बात है
06:31आज संत चर्णाम्रत में मुझे वो प्रफुलता वो आनंद वो श्वाध नहीं मिला
06:41जितने वहाँ उपस्थी थे सब लोगों ने पान किया उनुनका नहीं है तो वैसे ही जैसे रोज उतरता है उनका नहीं
06:47आज हमें श्वाद नहीं मिल ला है
06:51संत चर्णाम्रत का हमें आनंद नहीं मिल ला है
06:55भला और लोगों की स्थिती क्या कि वो इस बात को जान पाते
07:00आपने का कोई अपराद कर दिया संतों का
07:05किशी संत के पर तुमारी घ्रणा बुद्धी हो गई
07:09इसलिए चर्णाम्रत उतारने पर भी आज़स्वाद नहीं मिल ला
07:12बुलाओ चर्णाम्रत उतारने वाले संतों को बुलाया गया
07:18किशी संत के परती कोई अपराद
07:21तो उनका हाँ एक संत आये थे कोड़ी
07:24कुष्ट था उनके शरीर में पैरों में भी तो उनका चर्णाम्रत नहीं दोया और उनको हटा दिया
07:32अरे इसलिए ये अपराध समस्त संतों की चर्णाम्रत का प्रभाव छीन कर दिया
07:41वो श्वाद रही भगवत प्रशाद चर्णाम्रत का दिब श्वाद तो निष्ठावान पुर्षों को ही अनुभों में आता है
07:50श्वयम रशिक मुरारी जी उठे और उन संत की खोज की उनको बुलाया उनका चर्णाम्रत उतार कर
08:03सोचो पैरों में गलित कुष्ट पीमवाद आ दी निष्ठा काम करेगी शिश्यों ने तो इसलिए अटा दिया था कि ये चर्णाम्रत गुरु जी के पास थोड़ी पहुँचाएंगे
08:16स्वयम्रसिक मुरारी जी ने चर्णाम्रत उतारा और चर्णाम्रत पान करके नेतर प्रवाहित करते हैं का हाद श्वादा आया है
08:26ये संत निष्ठा
08:28ये संत निष्ठा
08:30संत सेवा बहुत कठिन है
08:32ये बात ध्यान रखिएगा
08:34हो सकता है आप चर्णामृत उतार रहें
08:37और आपको लाट मार दें
08:38ए कैसे उतारता है इतनी जोर से उतारता है
08:41चर्णामृत आपको हाथ जोड के
08:43कि खड़े रहना है। खड़े रहना जी।
08:46ए जी क्या? दुर्ष्ट कहीं का, पाखन्री कहीं का।
08:50बोलना नहीं है। भगवान है वो आए है तुम्हारी परिक्षा लेने के लिए।
08:57जो भगवान के चरणारविंद की प्रीति प्राप्त करने के लिए भगवत भक्तों की आराधना करते उनमें मान नहीं रहता
09:08ये बहुत सुक्ष्म विशह है सबह मान प्रद आप अमानी मान रहीत हो जाना
09:18एक बार रशिक मुरादी जी राजाओं के समाज में बिराजमान हो करके यही बात करे थे कि बड़े से बड़े साधम से जो प्राप्त नहीं होता वो संत सेवा से प्राप्त हो जाता है
09:30जो मनोयोग पुर्वक संत सेवा करता है
09:35उसको बड़ी उचाई की स्थिती प्राप्त होती
09:37इतने में बड़े राज़ शमाज में बैठ करें
09:42कांत में चर्चा करें
09:43उदर संत सेवा और हल्ला मचा
09:45गाली गलोज ये सब
09:47देखो ये ध्यान रखने का भी सह संत सेवा में
09:50भगवान ऐसे ही लीलाएं करवाएंगे
09:55जिससे तुम्हें दोस दर्सन हो जाए
09:57एक संत भगवान
09:58बोले पत्तल लगाई बोले पतल लगाओ
10:02बोले किस बात के लिए कई पत्तल में तो सबको पाना होता है
10:06बोले एक पत्तल अभी पाएंगे
10:08वो एक पत्तल साम के
10:10चार वजे उस समय पाएंगे दे
10:12सोटा का में
10:13सोटा भांग उसी से गोटते थे
10:16अब उतर नहीं देंगे हम
10:19तो गाली गलो लडाई जगडा अदे
10:21बड़ी विचित्र भगवान की सेवा
10:24तो सांती से भगवान करवा लेते
10:25भाक्ति की सेवा बड़ी विचित्र बड़े
10:27विचित्र विचित्र भग्त है
10:29अब वो संत जो है
10:32पारस मांग रहे थे
10:34डंडे का सोटे का पारस
10:36परोशने वाले लड़ गए
10:38अब वाँ उपदेश कर रहे थे
10:41कि संत सेवा महान भगवत प्रभुनों का घरही में तुरंत उठ करके आयो सबको सांध करते हुए आये और कहा अवो समझ गए कि मान था है कि आयो का भगवन आप नाराज के हो रहे हो गुस्सा आई उनको तो जो खीर और सब्जी सब परोस गई थी पूरा पत्तल उठा मारा म
11:11आपने डाज तनिक भी क्रोध नहीं किया जान बूझ करके कोई अपराद करो मत यदि तुम्हें वो पीट देते हैं और हमें ये सुनने को मिलता है कि आपने कुछ नहीं का आपको दो थपड मारे तो हमारी चाती फूल जाएगी और ये सुनने को मिला कि चार जबान चढ़
11:41सेवा होती वहां लीला एसी करेंगे प्रभू इसलिए बहुत सादु सेवा कठिन बेवहार है रसिक मुरारी जी के मुख पे पूरा पत्तल मारा है गुसा जानी चाहिए लेकिन उन्होंने ऐसे एक सीत भी ने गिरने दिया और इतना ही नहीं रसिक मुरारी को कट वचन गाल
12:11हुए आज हमें सीत प्रशाद मिला आप तो बहुत करुणा में हैं ए दो पत्तल लगाए और अपने संथ सेखा तुम्हारे अंदर सेवा का भाव नहीं आज से तुम्हारी परोश्चने की सेवा से थम्हें भैशकार किया जता है निकाला जता है ऐसे संथ के साथ बरताव कर
12:41और संतों में दोस दरसन ना हो ये बड़ी कठिन बात है क्योंकि उनके बेवार ऐसे होते हैं
12:47बेवार होते हैं बड़े बिलग-बिलग संत होते हैं बहुत बिलग-बिलग संत होते हैं
12:51एक दिन रसिक मुरारी जी ने सुना कि सामने वाले बगीचे में संत समाज आई हुई है, मंडली, तो आप बड़े भाव से दर्सन करने के लिए चले, संतों के लिए बहुत सावधान हो करके जाईए, उनके प्रति दोस दर्सन होएं, तो संत दर्सन मात्र से पाप का नाश हो
13:21कि बहुत पैनी दृष्टी सी देखा, ऐसे समय में आ गए कि संत को शंकोच हो गया, बहुत उदार हरदय के थे, आपको आते देखकर कि इतने महान संतार हैं, क्या सोचेंगे कि संत मंडली में संत जन हुका पीते हैं, जहां वसिक मुरारी जी को देखा तो उन्होंने हुका
13:51कि अईसा ही कुछ समझ लो कि कुछ लिलाएं ऐसी सिद्ध पुरुषों में होती हैं कि वो नजर न लगे बस धिटोना, बिलकुल संतों को समझ पाला, अब उनको जब रशिक मुरारी जी की दृष्टी पड़ी, तो उनको संकोच हो गया, रे मैं गलत समय पे आ गया, संत भ
14:21क्या हो गया, क्या हो गया महराज को क्या हो गया, रसिक मुराईजीन का बहुत पेट में दर्द हो गया, महराज तुरंत और सधी की बेवस्था की जाए, कुछ न को, बुले नहीं मेरी एक और सधी है, अगर मुरीनी को मिल जाए तो ठीक हो जाएगा पे, तो जो संत छुप
14:51से पिरे आहां देखो संत करपा से संत प्रशादी हो ने हमारा पेट दर्द ठीक कर यह देखो कि कहीं संत को संकोच हो गया तो यह अपराद न बन जाएगा नहीं नहीं इतने निर्मल हरदे के कि तुरंत पेट पकड़के बैठके दर्द हो रहा है और हुका दिया पिया नहीं
15:21तो अब संकोच क्या करना बहुत विचित्र बहुत विचित्र शाद सेवा में क्योंकि उनके ऐसे विचित्र कोट के आश्रण होते हैं कि संसय हो जाएगा कि ऐसा कैसे हो सकता है और वो अंदर से सच्ची मानिये बिल्कुल निरलेफ हैं कहीं कोई आ सकती नहीं कहीं कोई दो
15:51कि रसिक मुरारी जैसे धर्म दुरंधर भगवत लीला में डूबे विये संत सेवी
15:58इसलिए कहा कि ये धूम्र पान सास्त निशिद है
16:03रसिक मुरारी जी ने बिल्कुल पान नहीं किया था
16:06केवल उनकी लीला थी उनको दूर संकोच करने के लिए
16:10इसलिए कोई साधक इसका अनुकरण न करे
16:14साधक अनुकरण न करे
16:16तो ये व्यसन भया सिद्धों के पच सकते
16:19साधक इसमे न फसे
16:22साधक समस्त व्यसनों से मुक्तो करी भगवत आराधना में जाता है