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Our Islamic content focuses on presenting the teachings of Islam through the Quran and authentic Hadith, emphasizing values such as knowledge, wisdom, patience, justice, and compassion. We aim to explain Islamic concepts in a clear and accessible way, making them relevant for both Muslims and non-Muslims who wish to understand Islam beyond stereotypes. Topics include Islamic beliefs, daily life guidance, moral lessons, stories of the Prophets, and reflections on spirituality and faith in the modern world.
In addition to religious education, our channel strongly emphasizes history. We explore Islamic history alongside world history, highlighting major civilizations, scholars, discoveries, and events that shaped human progress. From the Golden Age of Islam to ancient and medieval civilizations, our historical videos aim to connect past knowledge with present understanding. These videos are designed to inspire curiosity and respect for diverse cultures and intellectual traditions.
We also present scientific and educational content, especially where science and history intersect. Our videos discuss scientific discoveries, natural phenomena, astronomy, medicine, mathematics, and contributions of Muslim scholars to modern science. We believe that learning science enhances critical thinking and helps viewers appreciate the complexity and harmony of the universe. Wherever possible, our content is presented using reliable sources, research-based explanations, and clear visuals to make complex ideas easy to understand.
This channel is ideal for students, researchers, educators, and lifelong learners who enjoy informative and meaningful content. Our goal is not only to inform, but also to encourage reflection, critical thinking, and respectful dialogue. We strive to maintain accuracy, balance, and responsibility in every video we publish.
By combining Islamic teachings, historical insight, and scientific knowledge, this channel serves as a platform for learning that bridges faith and intellect. Like and follow us on World Informative Videos to explore knowledge that enlightens the mind, strengthens understanding, and connects history, science, and spirituality in a meaningful way.
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00:00ये कहानी है एक यतीम लड़के की, जिसके हाथों में ऐसी मिठास थी कि इनसान तो इनसान, जिन्नाद भी उसके
00:07दीवाने हो गए, मगर उसे ये मालूम नहीं था कि जिस बस्ती में वो महीनों से रह रहा है, वहाँ
00:13एक भी इनसान नहीं।
00:15और जब एक रात उस पर ये खौफनाक हकीकत खुली, तो उसकी रूख काप उठी, क्योंकि उसे वहाँ लाने वाली
00:22परासरार औरत, कोई आम औरत नहीं थी, वो जिन्नाद की मलिका थी, मगर हैरत की बात ये है कि उन
00:30जिन्नाद को उस लड़के के हाथों की मिठास से मुहबत ह
00:33गई, लेकिन जब इनसानों की लालच उस बस्ती तक पहुँच गई, तो फिर ऐसा वाकिया हुआ, जिसने सब कुछ बदल
00:41दिया, एक पुराने शहर के पुराने बाजार में, एक हलवाई की दुकान थी, दुकान का नाम था रशीद हलवाई, और
00:49रशीद वाकी बड़ा ना
01:03वो बच्चा था, जो उसकी दुकान के पीछे कमरे में, रात के अंधेरे में बैठ कर हलवा बनाता था, उस
01:11बच्चे का नाम यूसुफ था, यूसुफ का न कोई बाप था न मा, न कोई घर था न आसरा, वो
01:17साथ साल का था जब मा गई, नौ साल का था जब बाप गई, और �
01:22फिर वो उस शहर की गलियों में भटकता रहा, यहां तकि रशीद ने उसे उठाया, मगर उठाना मुहबबत से नहीं
01:28था, वो भरती थी, जैसे कोई बाजार से सस्ता मजदूर खरीदता है, खाना मिलेगा, सोने की जगे मिलेगी, बस काम
01:37करता रहा, पैसे नहीं मिलेंगे, क
01:51खडिया काटता, आग जलाता, आटा गुंदता, चीनी पीसता, उसके ननहे ननहे हाथ, जो कभी किसी किताब को छुने के लिए
02:00बने थे, वो सारा दिन गरम देगों से लड़ते रहते, रात को वो दुकान के पिछले हिस्से में एक फटी
02:06चटाई पर सोजाता, और कभी कभी
02:08सपने में अपनी मा की आवाज सुनता, नरम, मीठी आवाज जो कहती थी, यूसुफ, सबर कर बेटा, अल्ला देख रहा
02:17है, और यूसुफ सबर करता रहा, लेकिन जो बात रशीद को कभी समझ ना आई, वो ये थी, यूसुफ के
02:24हाथों में कुछ था, कुछ ऐसा जो न सिख
02:27खाया जा सकता था, न खरीदा जा सकता था, जब यूसुफ हलवा बनाता तो उसकी खुश्बू गली के मोर तक
02:33जाती, जब वो बर्फी तराशता तो वो इतनी सफेद और चिकनी होती जैसे चांदी का टुकड़ा काटा हो, जब वो
02:40शीरा पकाता तो उसका रंग सोने जैसा
02:43हो जाता, लोग कहते थे कि रशीद के हाथ का जादू है, मगर असल जादू यूसुफ के हाथों में था,
02:50और रशीद ये जानता था, और यही जानना रशीद के दिल में एक कीड़ी की तरह खाने लगा, यूसुफ अब
02:5720 साल का हो गया था, लंबे कतका, दुबला मगर मज�
03:01पूत, आखे बड़ी और साधा, चहरे पर बच्पन की मासूमियत अभी बाकी थी, उसकी जबान पर कभी शिक्वा नहीं आता
03:09था, ना आखों मिजद, जो मिलता खा लेता, जितना मिलता पहन लेता, मगर एक दिन, एक दिन ऐसा आया, जिसने
03:18सब कुछ बदल दिया, रशीद
03:31पकाने हैं कि अमीर साहब को याद रह जाएं, यूसुफ ने सारी रात जाग कर काम किया, आग की लपटे
03:38उसके चहरे को जलाती रही, हाथ चलते रहे, पीठ दर्द करती रही, मगर वो बनाने में लगा रहा, और वो
03:46मीठे, वो ऐसे बने कि अमीर ने पहला लुकमा लिया, �
03:50और आखे मूंदली, रशीद मिया, ये हाथ किसके है, रशीद मुस्कुराया, हुजूर, मेरा अपना हुनर है, ऐसा हुनर आज तक
03:59कहीं नहीं चखा, कुछ खास है उस मिठाई में, रशीद का चहरा तम-तमाया, खुशी से नहीं, हसत से, वो
04:07रात, वो वाकिया रशीद के द
04:19पिलने न देता, और फिर रशीद ने सोचना शुरू किया, अगर यूसुफ ने किसी से ये राज सीख लिया, या
04:26खुद अपनी दुकान खोल ली, तो हसत की आग एक दिन जल उठी, वो सुबह रशीद का मूड पहले ही
04:32खराब था, रशीद दुकान पर आया तो देखा कि �
04:35एक गहक यूसुफ से बात कर रहा है, सिर्फ ये पूच रहा था कि ये हलवा कौन बनाता है, यूसुफ
04:41ने सादगी से कहा, जी मैं बनाता हूँ, इतनी सी बात, मगर रशीद के लिए ये इतनी सी बात आसमान
04:49का गिरना थी, वो गुस्से में लाल पीला हो गया, उसने यूस
05:04यूसुफ हैरान खड़ा रहा, उसकी बड़ी बड़ी आखों में आसु आ गए, मगर कापते होंटों से एक लफज न निकला,
05:10उसने अपनी वो छोटी सी गठडी उठाई, जिसमें एक फटा कुरता और एक पुराना कंबल था, और वो मुड़ गया,
05:18रशीद ने पीछे से �
05:19चिलाया, और सुन, अगर तुने कही ये कहा कि तु मेरे यहां काम करता था, तो तुझे उस शहर से
05:26निकलवा दूंगा, समझा, यूसुफ ने पलट कर नहीं देखा, वो बस चलता रहा, गली के मोड पर वो रुख गया,
05:35पीठ दीवार से लगाई, गठडी जमीन पर रखी,
05:37और पहली बार, पहली बार उसने इतना जोर से रोया, वो रोता रहा, रोता रहा, मा को याद किया, बाप
05:46को याद किया, उन दस सालों को याद किया, जो उसने उस जालिम की दुकान पर काटे थे, और फिर
05:53रो रो कर ठक गया तो सर घुटनों में छुपा लिया, और धीरे ध
05:59तू ही है, बस तू ही है, शाम धल गई, बाजार खामोश हो गया, दुकाने बंध हो गई, गलिया सुनसान
06:07हो गई, और तारी की आई, यूसुफ ने आखे उठाए तो देखा कि आस्मान पर तारे निकलाए हैं, इतने तारे,
06:15इतनी रोशनी, मगर जमीन पर तनहाई का अंधेर
06:18वो उठा और बाजार से बाहर की तरफ निकल गया, शहर के आखरी सिरे पर एक पुराना कुआ था, जिसके
06:26पास कुछ पुराने दरक्त थे, लोग उधर कम ही जाते थे, कहते थे रात को उस कुए के पास अजीब
06:33अजीब आवाजे आती है, मगर यूसुफ को उस वक्त डर से
06:36ज्यादा थकावत थी, वो एक दरक्त के नीचे लेट गया, कंबल ओढ़ा और आखे मूंदली, रात गहरी होती गई, और
06:45फिर रात के ठीक उस पहर में, जब आसमान का आखरी तारा डूपता है, और अभी फजर की सफेदी नहीं
06:52फूटी होती, यूसुफ को एक खुश्ब�
06:56जो न किसी फूल की थी न अतर की, कुछ और थी, हलकी, मीठी, पुरानी हवाओं में बसी हुई, जैसे
07:04मिट्टी पर पहली बारिश के बाद आती है, मगर उससे भी ज्यादा नशीली, यूसुफ ने आखे खुली, और उसने देखा,
07:12कोई के पास, चांदनी में एक औरत खड
07:15थी, लंबा सफेद लिबास, मगर जो आखे नजर आ रही थी, उन में ऐसी रोशनी थी, जो किसी इनसानी आख
07:23में नहीं होती, जैसे किसी ने दो सितारे आखों में डाल दिये हो, यूसुफ का दिल धड़का मगर वो उटकर
07:31बैठ गया, औरत ने नरम आवाज में कहा, यूस
07:45मैं नूर बान हूँ, और मैं बहुत दूर से आई हूँ, तुझे देखने, तेरे हाथों की खबर पहुची है हम
07:53तक, तेरे मीठे बनाने का हुनर कोई आम हुनर नहीं, अल्ला ने तेरे हाथों में कुछ रखा है, जो हमने
08:00कभी नहीं देखा, यूसुफ ने कुछ न कहा, ब
08:15इस्द मिलेगी, मुआवजा मिलेगा, क्या तू चलेगा मेरे साथ, यूसुफ के दिल में एक तरफ डर था, एक तरफ बेचारगी,
08:24उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं था, उसने कहा, कहा है ये बस्ती, नूर बानो ने आसमान की तरफ
08:31इशारा किया, दूर नहीं, पास ह
08:34है, मगर नजर नहीं आती जब तक कोई दिल से न ढूंडे, यूसुफ ने कहा, ठीक है, नूर बानो आगे
08:41बढ़ी, और वो चलने लगी, जंगल की तरफ, अंधेरे की तरफ, परासरार खामोशी की तरफ, और यूसुफ उसके पीछे चलता
08:50रहा, अगर आपको हमारी कहानी �
08:52पसंद आ रही है, तो हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें, ताकि आपको ऐसी मजीद कहानिया सुनने को मिले, वो चलते
08:59रहे, जंगल का रास्ता, फिर एक वादी, फिर पत्थरों के दर्मियान एक पकडंडी, रात की हवा में दरखतों की सरसराहट,
09:08दूर कही उल्लू की आ�
09:22और दिल में एक यकीन था, एक सुकून था, जो किसी नामालूम जगे से आ रहा था, घंटों बाद, जब
09:29यूसुफ को लगने लगा था कि शायद वो भटक गया है, शायद ये सफर कभी खत्म नहीं होगा, नूर बानों
09:35ने हाथ उठाया और रुख गई, डेख, यूसुफ
09:39ने आगे देखा, और उसकी आखे खुली की खुली रह गई, एक बस्ती, एक पूरी बस्ती, मगर ऐसी जैसी उसने
09:48कभी नहीं देखी थी, घर पत्थर के थे मगर उन पर ऐसी नकाशी थी, जैसे कारिग्रों ने सदिया लगाई हो,
09:55गलिया चौडी और साफ थी, फानूस जल
09:59रहे थे, मगर उनकी रोशनी अजीब थी, न सोने जैसी न सफेद, कुछ दर्मियानी, कुछ नीलगू, कुछ ऐसी जो देखने
10:08वाले को सुकून दे, दरक थे, बाग थे, और हवा में ऐसी खुश्बू थी जैसे हजार फूल एक साथ खिल
10:15गए हो, रात का वक्त था मगर बस
10:28बसती है, नूर बानो ने कहा, ये मेरी बसती है, यहां मेरे लोग रहते हैं, तु यहां काम करेगा, मीठे
10:35बनाएगा, और यहां के लोग तेरी मिठाई खरी देंगे, मगर ये लोग, वो अजीब क्यों लग रहे हैं, नूर बानो
10:43एक लमहे के लिए रुकी, फिर बोली, रा
10:57तही सो गया, उस रात उसने सपने में अपनी मा देखी, मा मुस्कुरा रही थी, सुबह हुई तो यूसुफ ने
11:05आखे खोली और एक लमहे के लिए सोचा, ये सब क्या था, ख्वाब, मगर वो जिस कमरे में लेटा था,
11:12वो हकीकी था, दीवारे पत्थर की छट पर लकडी का का
11:17रोशंदान से हलकी रोशनी आ रही थी, नूर बानो दर्वाजे पर थी, उट गए, नाश्ता कर लो, और फिर मैं
11:24तुझे दुकान दिखाऊंगी, यूसुफ ने नाश्ता किया, ऐसा खाना जो उसने उम्र में कभी नहीं खाया था, सादा मगर बेंतिहाल
11:33अजीज, उसने क�
11:34पूछना चाहा, ये कैसे बना, ये किसने पकाया, मगर बात आगे न बढ़ा सका, फिर नूर बानो उसे लेकर बस्ती
11:43के वस्त में आई, वहाँ एक दुकान थी, खाली, साफ, मगर सजी हुई, दीवारे पत्थर की, अंदर बढ़ी देगे, मसाले
11:53और चीजे रखी हुई थी
11:55ये तेरी दुकान है, जो चाहिए बना, यहां के लोग तेरी मिठाई के मुंतजर है, यूसुफ ने हैरत से देखा,
12:03मेरी दुकान, हाँ, और हर दिन जो कमाएगा वो तेरा, कोई रशीद नहीं है, यहां जो तेरा हक्षी ने, यूसुफ
12:11की आखे भराई, उसने देख को हा�
12:14लगाया, मसालों को सुंगा, और फिर अपनी आस्ती ने चढ़ाई, पहला दिन यूसुफ ने हलवा बनाया, खालिस देसी घी में,
12:23आहिस्ता आहिस्ता, पूरी महबबत से, उसकी खुश्बू पूरी बस्ती में फैल गई, और फिर लोग आने लगे, दोस्तों, लेकिन उसक
12:33के बाद जो हुआ, वो किसी ने सोचा भी ना था, लोग आये तो यूसुफ ने उन्हें देखा, और एक
12:38लमहे के लिए उसका दिल अटका, ये लोग, ये अजीब थे, उनके कद मामूली से कुछ लंबे थे, उनकी आखों
12:46में एक अजीब सी चमक थी, जब वो बात करते तो �
12:49आवाज बिलकुल आम होती मगर उस आवाज में एक गहराई थी, जैसे किसी कुए में से बोल रहे हो, मगर
12:56वो मोहस्ब थे, शाइस्ता थे, अदब से आये, मिठाई ली, कीमत दी, और तारीफ की, एक बड़े में से आवाज
13:05आई, माशा अल्ला, क्या हाथ है इस लड़के का
13:09यूसुफ शर्माया, और जब वो पहले दिन घर लोटा, उसके हाथ में सोनी के सिक्के थे, उसके अपने महनत से
13:17कमाई हुए, उसने वो सिक्के हथेली पर रखे और देर तक देखता रहा, फिर आखे उपर उठाई, आसमान की तरफ,
13:25और बस इतना कहा, या अल्ला तेरा श�
13:37जाना, नूर बानो हर दिन आती, हाल पूचती, कभी कभी बस्ती की पुरानी कहानिया सुनाती, यूसुफ को उस बस्ती से
13:46मुहबबत होती जा रही थी, मगर कभी कभी रात को, जब नीन दूर होती, वो महसूस करता कि यहां कुछ
13:53है जो वो समझ नहीं पा रहा, जैसे कि रा
14:07उन्हें मालूम हो कि दूसरा कहा है, जैसे कि नूर बानो का साया, कभी कभी गलत तरफ पढ़ता था, मगर
14:15यूसुफ उन सवालों को दिल की गहराई में दबा देता, यहां किसी ने उसे नुकसान नहीं पहुचाया, यहां वो आजाद
14:22था, यहां वो खुश था, और उसकी �
14:25दुकान दिन बदिन मशूर होती जा रही थी, लोग दूर दूर से आते, कम असकम यूसुफ यही समझता था, वो
14:33मुक्तलिफ तरहे के लिबासों में होते, मुक्तलिफ बोलिया बोलते, मगर जब वो मिठाई खाते तो सबका एक ही चहरा होता,
14:40आखे मूंद लेना, ठंडी स
14:55हलवा, केवडे की बर्फी, मुश की फेनी, और हर चीज जो उसके हाथ से निकलती वो ऐसी होती जैसे उसमें
15:02रूह हो, एक दिन एक अजीब महमान आया, वो भी दूसरों जैसा ही लग रहा था, लंबा कद, चमकदार आखें,
15:11मगर उसके लिबास पर नक्शोनीगार कुछ म�
15:13और उसकी आवाज में एक वजन था, जो आम लोगों की आवाज में नहीं होता, उसने दुकान पर आकर हर
15:20चीज चखी, देर तक बैठा रहा, फिर बोला, लड़के, तेरा नाम यूसुफ है, जी, और तु यहां कैसे आया, यूसुफ
15:29ने सादगी से कहा, नूर बानो लेकर �
15:32आदमी के चहरे पर एक अजीब तास्सुर आया, हैरत और एहतिराम का मिला जुला, नूर बानो ने खुद लाया तुझे,
15:39खुद? जी, आदमी कुछ देर खामोश रहा, फिर धीरे से कहा, तो वाकी खास है लड़के, नूर बानो किसी को
15:47खुद लेकर नहीं आती, और वो उ
15:50उटकर चला गया, यूसुफ बाद में काफी देर सोचता रहा कि उस बाद का क्या मतलब था, मगर जवाब नहीं
15:56मिला, उस रात नूर बानो आई, मामूल की तरह बस्ती की गली में बैठे, वो बाते करते रहें, सितारों के
16:03बारे में, पुराने जमानों के बारे में, यूस�
16:19उसने, नूर बानो चुप हो गई, लंबी खामोशी, फिर बोली, क्या तू वाकी जानना चाहता है, हाँ, अभी नहीं, अभी
16:28वक्त नहीं है, कुछ चीजे वक्त पर समझ आती है, वक्त से पहले समझने की कोशिश करो, तो उल्जन होती
16:35है, यूसुफ ने मजीद नहीं पू
16:49और पूरी बस्ती मिलकर जश्न मनाती है, यूसुफ को भी शामिल होना है, बलकि उसे सबसे खास मिठाई बनानी है,
16:58यूसुफ खुश हुआ, उसने पूरी रात महनत की, नई चीजे बनाई, ऐसी जो उसने कभी नहीं बनाई थी, उसके हाथ
17:07उस रात एक खास कैफियत में थ
17:09जैसे कोई उन्हें चला रहा हो, जैसे कोई उन्हें बता रहा हो कि क्या डालना है, कितना डालना है, सुबह
17:16जब मिठाईया तैयार हुई, यूसुफ खुद उनकी खुश्बू से हैरत में पड़ गया, जश्न शुरू हुआ, बस्ती के लोग जमा
17:24हुए, सब, पूरी बस्त
17:26और यूसुफ ने पहली बार उन्हें एक जगे सब को इकठा देखा, और पहली बार, पहली बार यूसुफ के दिल
17:34में एक वहशत उठी, ये लोग, ये बहुत अजीब थे, उनके चेहरे पर बाज, उकात, ऐसे तासुर आते जो इनसानी
17:43नहीं लगते थे, उनकी आखे कभी
17:45कभी ऐसे चमकती थी, जैसे जानवर की आख अंधेरे में चमकती है, उनकी हसी में एक अजीब गहराई थी, और
17:53फिर जश्न के दर्मियान, बस्ती के सरदार आये, बड़ा, वकार वाला, सफेद लिबास में, मगर जब उसने कदम रखे, तो
18:01जमीन से कोई आवाज नहीं आई
18:03बिल्कुल भी नहीं, जैसे वो चल नहीं रहा, बलकि तैर रहा हो, यूसुफ का दिल डुबा, दोस्तो, लेकिन उसके बाद
18:12जो हुआ, वो किसी ने सोचा भी न था, सरदार यूसुफ के पास आए, उसकी मिठाई चखी, एक लमहे के
18:19लिए आखे बंद की, फिर आखे खोली
18:22और यूसुफ को देखा, लड़के, तेरे हाथों में जो बरकत है, वो इनसानों में शायद ही मिलती है, अल्ला ने
18:29तेरे हाथ में जाइका दिया है, यूसुफ ने सर जुकाया, सरदार ने नूर बानों की तरफ देखा, और कुछ ऐसी
18:36जबान में बोला, जो यूसुफ समझ
18:51हो रहे थे, आज सब एक साथ उट खड़े हुए, ये लोग कौन है, उनके कद क्यों मुक्तलिफ है, उनकी
18:57आखों में वरोशनी क्या है, उनके कदमों की आवाज क्यों नहीं आती, रात को फानुस बुचते क्यों नहीं, और सरदार
19:04की वो आवाज, वो जबान कौन सी थी, य
19:19दुनिया के साथ एक और दुनिया है, नजर नहीं आती मगर मौजूद है, और मा ने बताया था, जिन्नाद भी
19:25अल्ला के बंदे हैं, मगर वो अलग मखलूग है, और तब एक बिजली सी कौंदी यूसुफ के दिमाग में, नूर
19:33बानों का साया, गलत तरफ, कदमों की आवा
19:47और नूर बानों, वो कौन है, अगली सुबह यूसुफ का सामना नूर बानों से हुआ, नूर बानों ने हमेशा की
19:55तरह मुस्कुरा कर कहा, अच्छी नीन हुई, यूसुफ ने इस बार सीधा आखों में आखे डाल कर कहा, नूर बानों,
20:02मुझे सच बताओ, ये लोग, ये �
20:05बस्ती, तुम, क्या हो तुम, नूर बानों का चहरा एक लमहे के लिए बदला, फिर वो आहिस्ता से बैठ गई,
20:13तू पूछना चाहता है, हाँ, और अगर जवाब डरावना हो तो, तो भी बताओ, नूर बानों ने लंबी सांस ली,
20:22यूसुफ, ये बस्ती जिन्नात की बस्
20:35मुक्का मारा हो, जिन्, हाँ, मैं, मैं जिन्नात की बस्ती में हूँ, हाँ, यूसुफ खड़ा हो गया, वो पीछे हटा,
20:45एक कदम, दो कदम, उसका पूरा जिस्म कापने लगा, उसके मुझे आवाज नहीं निकली, नूर बानों ने जल्दी से कहा,
20:54रुख, डर मत, सुनो म�
20:59दहशत से फैली हुई थी, तुमने मुझे, तुमने मुझे यहां फसाया है, नहीं, यूसुफ, नहीं, सुनो, छोड़ो मुझे, मुझे जाना
21:10है, मुझे घर जाना है, नूर बानों ने आवाज में एक अजीब सी ताकत भरी, यूसुफ, यूसुफ रुख गया, उस
21:20आवा
21:29पकड़ा नहीं, मैंने तुझे बचाया था उस रात, उस कोई के पास एक और मखलूक थी, जो तुझे देख रही
21:36थी, बुरी नजर से, मैं उसे हटा कर तेरे पास आई थी, यूसुफ ठहर गया, आखों में आसु थे, सांस
21:44तेज थी, क्यों, तुमने मेरी मदद क्यों की, �
21:48नूर बानों ने धीरे से कहा, क्योंकि मैंने तुझे देखा था, उस रात, जब तु रशीद की दुकान के बाहर
21:55बैठा रो रहा था, और तेरी उस दुआ में, उस सादा सी दुआ में, ऐसी सच्चाई थी कि आस्मान हिला,
22:02कौन सी दुआ, अल्ला, तु ही है, बस तु ही है
22:06बस ये तीन अलफाज, मगर उन्ही तीन अलफाज में इतनी ताकत थी, कि हम सुनते ही मुतवज्जा हो गए, यूसुफ
22:14फूट फूट कर रोने लगा, और उस रोने में डर भी था, हैरत भी, और कही कही सुकून भी, नूर
22:21बानों ने उसे सब कुछ बताया, कि ये बस्ती हम
22:33अला को मानते हैं, नेकी को पसंद करते हैं, कि उन्होंने कभी किसी इनसान को नुकसान नहीं पहुँचाया, बलकि कई
22:40बार मदद की है, और कि यूसुफ के हाथों की बरकत, वो उन्हें पहले से मालूम थी, कि उसकी मिठाई
22:47की खुश्बू, वो सिर्फ दुनिया में नहीं
23:03यूसुफ चुप बैठा रहा, बहुत देर चुप रहा, फिर उसने पूछा, और अगर मैं रहूं, नूर बानों की आखों में
23:10एक चमक आई, तो फिर रहा, मगर जानते हुए, आखें खुली रखते हुए, और जब जाना चाहे, जा सकता है,
23:18यूसुफ ने गहरी सांस ली,
23:20और कहा, ठीक है, अगले और नूर बानों, वो हर रोज किसी सहिली की तरह साथ रहती, बाते करती, मदद
23:29करती, आहिस्ता आहिस्ता डर कम होता गया, आहिस्ता आहिस्ता आदत होती गई, उस पुराने शहर में जहां से यूसुफ आया
23:37था, रशीद हलवाई ने सोचना शुर�
23:44यूसुफ के जाने के बाद से रशीद के हाथों में वो बात नहीं रही थी, उसके मीठे बेजाईका लगने लगे,
23:51गाहक कम हो गए, अमीर की दस्तक्वान से उसका नाम हट गया, और बाजार में लोग कहने लगे कि रशीद
23:58हलवाई का हुनर खत्म हो गया, ये सुनकर रश
24:13बाजार में किसी ने बताया कि जंगल के उस पार किसी बस्ती में एक नौजवान हलवाई है, जिसकी मिठाई का
24:19जिक्र दूर दूर तक हो रहा है, लोग कहते हैं कि वो बस्ती आस्मानी है, वो हलवाई कोई आम इनसान
24:26नहीं, रशीद ने फॉरण पहचाना, यूसुफ, और
24:30रशीद का दिल भड़क उठा, वो बाजार के अपने दोस्तों के पास गया, दो तीन लालची, चालाक आदमी जो पैसों
24:37के लिए कुछ भी कर सकते थे, रशीद ने कहा, उस लड़के को खत्म करना है, उसकी दुकान तबाह करनी
24:44है, जो उसे पनाह दे रहा है, उसे बदनाम
24:46करना है, और अगर हो सके तो उसे यहां खींच लाना है, एक आदमी ने कहा, मगर सुना है, वो
24:52बस्ती अजीब है, लोग कहते हैं, वहाँ कोई इनसान नहीं बलकि कुछ और है, रशीद ने हाथ हिलाया, ये सब
24:59वहम है, लोग उसी लड़के को मशूर करने के लिए कहानिया �
25:03बना रहे हैं, और साजिश तयार हुई, उन्होंने पहले कासित भेजा, शहर के अमीर के दरबार में, एक जूटी शिकायत
25:12कि जंगल के उस पार एक जगे एक लड़का है, जो लोगों को बीमार कर रहा है, उसकी मिठाई में
25:18जहर है, उसे कैद किया जाए, अमीर के दरबार म
25:33वो आम निगाहों से ओजल थी, मगर उन्होंने बाहर से शोर किया, आवाजे लगाई, और फिर एक काम किया, जो
25:41बिलकुल गलत था, उन्होंने जंगल में आग लगा दी, आग फैलने लगी, बस्ती के बाहर दरखतों में शोले उठे, धुआ
25:49आसमान तक गया, बस्ती में हल
26:03शीद और उसके साथ ही, यूसुफ का चहरा सुर्ख हो गया, जुल्म का ये सैलाब कहा तक आएगा, बस्ती के
26:10लोगों ने अपनी ताकत से आग पर काबू पाया, ऐसे तरीकों से जो यूसुफ की समझ से बाहर थे, मगर
26:17कुछ नुकसान तो हुआ, सरदार सक्त नाराज हु�
26:32क्या फैसला, ये आग तेरी वजह से लगी है, उसलिए नहीं कि तूने कुछ घलत किया, बल्कि उसलिए कि तेरे
26:40दुश्मन हमारी तरफ आ रहे हैं, तुझे इनसानों के दुनिया में वापस जाना होगा, और अपना सामना करना होगा, यूसुफ
26:48खामोश रहा, फिर आहिस्
27:02पर खड़ी थी, आखे भरी हुई, यूसुफ, मुझे पता है क्या कहना है, अल्ला तेरे साथ है, हाँ, वो हमेशा
27:11से साथ है, यूसुफ ने मुड़ने से पहले एक बार पूरी बस्ती को देखा, चल पड़ा, सुबह हुई तो यूसुफ
27:18शहर के बाजार में था, सालों बा
27:32मगर यूसुफ मुक्तलिफ था, उसके कंधे सीधे थे, आखों में सुकून था, कदमों में ठहराव था, उसने एक खाली जगे
27:41देखी, पुराने एक साब की दुकान की जगे जो बंध हो गई थी, उसने मालूम किया, जगे किराय पर थी,
27:48उसके पास सोने के सिक्के थे, न�
27:55यूसुफ ने वो जगे ली, और तीन दिन में, बिलकुल तीन दिन में, उसने अपनी दुकान बनाई, चोथे दिन सुबह
28:03उसने आग जलाई, देख चढ़ाई, और हलवा बनाना शुरू किया, खुश्बु फैली, पहले गली में, फिर बाजार में, फिर मोहले
28:12में, लोग �
28:13रुख गय, एक बुढ़ा आदमी आया, सुंगा, आखे मूंद ली, ये खुश्बु, ये मैंने पहले भी सुंगी है, मगर कहा,
28:22यूसुफ ने मुस्कुराते हुए कहा, आइए चखिये, दोस्तो, लेकिन उसके बाद जो हुआ, वो किसी ने सोचा भी ना था,
28:30रशीद, जो
28:31बाजार में था, उसने वो खुश्बु सुंगी, और उसका रंग सफेध हो गया, ये खुश्बु, ये वही खुश्बु थी, वही
28:40जो उसकी दुकान में थी, जब यूसुफ होता था, रशीद बाजार में भागता आया, और यूसुफ को देखा, तू, तू
28:48यहाँ, मैंन
28:59दुकान बंद कर, यहाँ तेरी जगे नहीं, बाजार के लोग जमा होने लगे, यूसुफ ने रशीद की आखों में देखा,
29:07बिलकुल सीधा, बगैर कप पहट के, और कहा, रशीद सहब, मैंने तुम्हारी दुकान पर दस साल दिये, एक पैसा नहीं
29:15लिया, न शिक्वा किय
29:17न बात की, आज मेरी अपनी दुकान है, अपना काम है, मुझे न रोकने की जरूरत है, न मैं तुम्हें
29:24रोक रहा हूँ, अल्ला का रिज्क बढ़ता है, लूटा नहीं जाता, बाजार में सन्नाटा ज़ा गया, रशीद के साथ ही
29:32आगे बढ़े, मगर बाजार के लोगों न
29:35रास्ता रोक लिया, एक बुढ़े ने कहा, रशीद, शर्म करो, ये लड़का तुम्हारी दुकान का सुतून था, और तुमने उसे
29:43धक्के दे कर निकाला, अब उसे यहां भी नहीं रहने दोगे, खबर अमीर के दरबार तक पहुँची, वही अमीर जिसने
29:50कभी यूसुफ
29:51की मिठाई चकी थी, और कहा था, ये हाथ किसके हैं, अमीर ने कासित भेजा, जो हलवाई बाजार में आया
29:58है, उसे दरबार मिलाओ, यूसुफ गया, अमीर ने यूसुफ को देखा, फिर मिठाई मंगवाई, फिर चकी, और आखे बंद कर
30:07ली, जब आखे खोली तो बोले, �
30:10यही था वो हुनर जो मैंने बरसों पहले चका था, मैं भूला नहीं, फिर अमीर ने पूछा, तुम कहा थे
30:17इतने साल, यूसुफ ने एक लमहा सोचा, फिर कहा, एक ऐसी बस्ती में जो हर इंसान को नजर नहीं आती,
30:24मगर जहां मुझे नीकी मिली, इस्त मिली, और अल्ला की
30:28रहमत का साया मिला, अमीर ने सोचते हुए कहा, क्या वबस्ती, हुजूर, कुछ बाते जबान से नहीं कही जाती, अमीर
30:37ने एक लमहे यूसुफ को देखा, फिर कहा, तुम्हारी आखों में एक नूर है, जो मैंने कभी-कभी सिर्फ उन
30:44लोगों में देखा है, जो अल्ला के
30:46क्रीब होते हैं, या जिन पर अल्ला की खास नजर हो, यूसुफ ने सर जुकाया, अमीर ने साज़िश की फाइल
30:53देखी, रशीद की जूटी शिकायत पर मबनी, फिर रशीद को दरबार में बुलाया, रशीद आया, मगरूर, अकड़ा हुआ, अमीर ने
31:03कहा, रशीद, ये �
31:05शिकायत तुमने की थी? जी हुजूर, उस लड़के की मिठाई में, रुको, अमीर ने हाथ उठाया, मैंने खुद चखी है
31:13उसकी मिठाई, जूट मत बोलो मेरे सामने, रशीद का मुग बंध हो गया, और जंगल में आग, रशीद का रंग
31:21उड़ गया, अमीर ने ठंडी आ
31:35नुकसान पहुचाने की कोशिश की, उसके अलावा जंगल में आग लगाना, ये सब जुर्म है, रशीद जमीन पर गिर गया,
31:43हुजूर, मुआफ, मुआफी का फैसला यूसुफ करेगा, अमीर ने यूसुफ की तरफ देखा, यूसुफ क्या कहते हो? यूसुफ ने रशी�
31:56उसे जुल्म सहने पर मजबूर किया, फिर निकाला, फिर आग लगवाई, और यूसुफ के दिल में क्या आया? गुसा? इंतकाम?
32:05नहीं, सुकुन, उसने कहा, हुजूर, मुझे उससे कुछ नहीं चाहिए, ना बदला, ना माल, ना मुआफी, अल्ला ने मेरा हिसाब
32:15अपने
32:25खबर सुन रहा था, एक आवाज उठी, फिर दूसरी, फिर हजार आवाजे, लोग कह रहे थे, माशा अल्ला, ये लड़का,
32:34ये कोई आम नहीं, अमीर ने यूसुफ को रोका, यूसुफ, मैं तुम्हें एक ओधा देना चाहता हूँ, मेरे दर्बार का
32:42खास हलवाई, नहीं
32:54वालों ने खुशी के नारे लगाए, मगर यूसुफ ने सर जुकाया, और धीरे से कहा, हुजूर, आपकी महरबानी, मगर मैं
33:03ये नहीं ले सकता, मेरी दुकान है, मेरा काम है, मेरा रिस्क है, मैं किसी का एहसान नहीं लेना चाहता,
33:10बस अल्ला का, आपका शुक्रिया, अमी
33:23भी सही हो, उसे दौलत का लालच नहीं होता, क्योंकि वो जानता है कि असल दौलत क्या है, यूसुफ अपनी
33:30छोटी दुकान पर वापस आ गया, आग जलाई, देख चढ़ाई, और जब पहला हलवा तयार हुआ, खुश्बू उठी, तो उस
33:38खुश्बू में एक नई चीज
33:39जो पहले नहीं थी, कुछ और नशीला, कुछ और गहरा, कुछ और दिल में उतर जाने वाला, लोग आने लगे,
33:48धीरे धीरे, फिर आहिस्ता आहिस्ता, फिर हुजूम, यूसुफ की दुकान मशूर हो गई, और रात को कभी कभी, जब बाजार
33:58खामोश हो जाता, और तारे �
34:00निकल आते, यूसुफ दुकान की सेडियों पर बैठता और आसमान को देखता, और कभी कभी हवा में वो खुश्बु आती
34:08थी, वही मीथी, नशीली, पुरानी हवाओं वाली खुश्बु, और यूसुफ मुस्कुरा देता, क्योंकि वो जानता था, नूर बानो याद कर
34:17�
34:18जालिम अपना बोज खुद उठाता है, रशीद को किसी ने सजा नहीं दी, उसके जमीर ने दे दी, उसकी दुकान
34:25बंध हो गई, न किसी ने बंध की, बस होती चली गई, क्योंकि चोरी की हुई बरकत हमेशा वापस चली
34:33जाती है, और दोस्तों, ये कहानी यहां खत्म नही
34:36होती, बलकि ये कहानी एक सबक की शुरुआत है, अल्ला की रहा में जो सबर करे, अल्ला उसे कभी जाया
34:43नहीं होने देता,