विष्णु पुराण की गाथा में इस सप्ताह, हम ब्रह्मांड के 14 लोकों - स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल के रहस्यों को उजागर करते हैं! परशुराम ऋषि हमें सृष्टि के विभिन्न आयामों और ब्रह्मा के अद्भुत सृजन चक्रों का विस्तृत विवरण देते हैं। जानें कैसे देवताओं, मनुष्यों, असुरों और समस्त प्राणियों का प्रादुर्भाव हुआ और कैसे यह संपूर्ण सृष्टि विष्णु की दिव्य शक्ति से संचालित होती है। यह एपिसोड आपको ब्रह्मांड की संरचना और आपके अपने अस्तित्व के बारे में गहरी समझ देगा। #VishnuPurana #CosmicCreation #HinduMythology #ब्रह्मांडकेलोक #सृष्टि #देवता #मानवउत्पत्ति #सनातनधर्म #YouTubeIndia #MythologySeries #Puranas #SpiritualJourney #IndianCulture #Hinduism #Cosmology #ब्रह्मा #विष्णु #असुर #लोक
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00:00महर्शी परशुराम ने मैत्रे को संबोधित करते हुए कहा कि काल केवल मानव द्रिष्टी का मापदंड नहीं, बलकि भगवान विश्णु
00:08की चेतना का अनंट और अविरल प्रवाह है.
00:12उन्होंने समझाया कि त्रुटी और लव की अत्यंत सुक्ष्म इकाईयों से आरंभ होकर काल मनुश्यों के वर्षों और ततपश्चात देवताओं
00:21के दिव्य वर्षों में विभाजित होता है.
00:24प्रथम युग सत्य युग में धर्म पूर्ण रूप से चारों चर्णों पर स्थापित रहता है, जहां तपस्वी रिशिमुनी ब्रहमग्यान के
00:32परम तेज में लीन होकर विचर्ण करते हैं.
00:36त्रेता युग का आगमन होते ही धर्म का एक चरण क्षीन हो जाता है और यग्ये अगनी तथा धर्मनिष्ट राजाओं
00:43द्वारा समाज की रक्षा का विधान बनता है.
00:48द्वापर्युग में धर्म केवल दो चर्णों पर तिकता है और यग्यों के साथ साथ कर्मकांड और महासंग्रामों की नीम पड़ती
00:56है जो न्याय का संतुलन बनाती हैं.
01:00चतुर्थ चरण कल्युग में अंधकार और अधर्म का प्रभाव बढ़ जाता है, जहां सत्य का प्रकाश अत्यंत क्षीन होकर केवल
01:08शुद्ध हरिनाम संकीरतन में सीमित रह जाता है.
01:12जब ये चारों युग एक साथ पूर्ण होते हैं, तब बारह हजार दिव्य वर्षों का एक महायुग निर्मित होता है,
01:20जो स्रिष्टी का एक संपूर्ण चक्र कहलाता है.
01:24ऐसे इकत्तर महायुगों का समुह मिलकर एक मनवंतर बनता है, जिसके अधिपती एक मनु और उनके साथ सब्तर्शी स्रिष्टी का
01:33संचालन करते हैं.
01:3514 मनवंतरों की यह विशाल अवधी ब्रहमा जी के केवल एक दिन यानी एक कल्प का निर्मान करती है, जो
01:43अत्यंत आश्चर्य जनक है.
01:46जब ब्रहमा जी का दिवस आरंभ होता है, तब संपूर्ण ब्रहमांड में जीवन, नक्षत्र और समस्त लोग पुनह जागरित होकर
01:54क्रियाशील हो उठते हैं.
01:57परशुराम जी ने बताया कि ब्रहमा जी का यह विशाल दिवस केवल भगवान विश्नु के संकल्प और असीम उर्जा से
02:04ही संचालित रहता है.
02:07ब्रहमा जी का दिन समाप्थ होते ही प्रलै की विनाशकारी रात्री आती है, जिसमें तीनों लोग जल मगन होकर परमात्मा
02:15की योग निद्रा में विलीन हो जाते हैं.
02:19अनन्त महासागर की तरंगों पर शेशनाग की शया पर विश्राम करते श्रीहरी के भीतर ही संपूर्ण संसार सुक्ष्म रूप में
02:27सुरक्षित रहता है.
02:29प्रलै की रात्री बीतने के पश्चात जब नया कल्प उदित होता है, तो ब्रहमा जी पुनह प्रकट होकर नवस्रिष्टी की
02:37रचना का कार्य आरंभ करते हैं.
02:40यह सुनकर मैत्रे जीने हाथ जोड़कर अत्यंत विस्मय और भक्ती से पूछा की इस विशाल समय चक्र में मनुष्य का
02:49अस्तित्व कितना नगण्य है.
02:52परशुराम जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि यद्यपी शरीर नश्वर है, परंतु भगवान विश्णू की भक्ती जीव को इस काल
02:59चक्र से परे अमर कर देती है.
03:03उन्होंने बताया कि परमेश्वर विश्णू के रोमचिद्रों से अंगिनत ब्रह्मान उत्पन्न और विलीन होते हैं, जिनकी कोई गणना नहीं कर
03:11सकता.
03:13काल का यह चक्र निरंतर घूमता रहता है, जहां केवल वही भक्त अचल स्थान पाते हैं, जो नारायन के चर्णों
03:20में द्रिड विश्वास रखते हैं.
03:24मैत्रे ने उच्सुक होकर पूछा कि हैं महर्शी, ऐसा कौन सा भाग्यशाली जीव हुआ, जिसने अपने ध्रुव संकल्प से काल
03:31के परे अमर्पद प्राक्त किया.
03:34महर्शी परशुराम की आखों में स्नेह की जोती जग्मगा उठी और उन्होंने बालक ध्रुव की वह अमर गाथा सुनानी आरंभ
03:43की, जो ब्रह्मांड में अटल भक्ती की मिसाल बनी.
03:47जब स्रिष्टी का प्रारंभिक अंधकार छटने लगा, तब भग्वान ब्रह्मा क्षीर सागर के दिव्य कमल पुष्प पर विराजमान होकर गहरे
03:55ध्यान में लीन हो गए.
03:57अपने चारों दिव्य मुखों को खोलते ही भग्वान ब्रह्मा के प्रचंड तेज से संपून ब्रह्मांड का कोना कोना प्रकाशमान हो
04:05उठा.
04:07ब्रह्माजी के पूर्वी मुख से पावन ओम की ध्वनी गुंजी और स्वर्ण अक्षरों में सुसज्यत रिगवेद की रिचाय प्रकट हुई.
04:15उनके दक्षिनी मुख से यजुर्वेद की अगनिस्मान लाल रश्मिया निकली, जिन्होंने दिव्य यग्यों और धार्मिक अनुष्ठानों की नीम रखी.
04:25पश्चिमी मुख से नीलमनी के समान चमकता सामवेद उदित हुआ, जिससे ब्रहमांड में दिव्य संगीत और सामगान का प्रवा हुआ.
04:35उत्तरी मुख से पन्ना निर्मित हरित किर्णों में अथर्ववेद का प्राकट्य हुआ, जिसमें तंत्र, आयूर्वेद और गूड विद्याओं का ज्यान
04:43था.
04:44चारो वेदों के प्रकट होने पर ब्रहमाजी ने इस समस्त ज्यान राशी को स्वर्णिन पांडुलिपियों के रूप में संग्रहित किया.
04:53तत्पश्चात ब्रहमाजी ने मानव जीवन को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुशार्थों के आधार पर व्यवस्थित किया.
05:02ब्रहमाजी के मुख और विचार मन्थन से ज्ञान और भक्ती का प्रतीक माने जाने वाले ब्रहमन वर्ण की उत्पत्ती हुई.
05:10उनकी शक्तिशाली भुजाओं से क्षत्रिय वर्ण का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्हे धर्म और समाज की रक्षा का भार सौपा गया.
05:32जिन्होंने अपनी निहस्वार्थ सेवा से समाज को मजबूती दी. इन चारों वर्णों ने ब्रहमाजी के सम्मुख खड़े होकर समाज में
05:41संतुलन और धर्म का पालन करने का संकल्त लिया.
05:45जीवन के प्रथम चरण हेतु ब्रहमाजी ने ब्रहमचर्य आश्रम स्थापित किया, जहां युवा शिश्य ज्यांग अर्जन करते थे.
05:54द्वितिय चरण में ग्रिहस्ट आश्रम का विधान हुआ, जिसमें दमपती यग्य और कर्मकांड द्वारा परिवार का पोशन करते थे.
06:03त्रीतिय चरण वानप्रस्ट आश्रम ने मनुष्य को सांसारिक जिम्मेदारियों से परे इश्वर ध्यान की प्रेणा दी.
06:11चतुर्थ चरण सन्यास आश्रम द्वारा पूर्ण वैराग्य अपना कर केवल मोक्ष की प्राप्ती का मार्ग निर्धारित हुआ.
06:20देवर्शी नारद ने अपनी वीना बजा कर ब्रहमाजी द्वारा रचित इस संपूर्ण स्रिष्ट विधान का गुनगान किया.
06:28स्रिष्टी के इस महान संतुलन पर स्वर्ग से देवताओं और अपसराओं ने पारिजात के सुगंधित पुष्पों की वर्षा की.
06:36स्रिष्टी की इस सुद्रिध नीम पर ही अब धुरूव की अमर भक्ती और अविचल तपस्या का महान इतिहास लिखा जाना
06:44था.
06:45जब ब्रहमा जी ने स्रिष्टी की व्यवस्था स्थापित करने के लिए परम ध्यान लगाया, तब उनके मानस्पुत्रों के जन्म की
06:53असीम उर्जा पूरे ब्रहमांड में गुंजूठी.
06:57ब्रहमा जी के संकल्प से उनके मन से साथ परम ज्यानी रिशियों का प्राकट्य हुआ, जो समस्त ज्यान और धर्म
07:04के मूल आधार बने
07:06मरीची रिशी ब्रहमा के मानस से दिव्य प्रकाश की किरण की भांती प्रकट हुए, जिनका तेज करोडों सूर्यों के समान
07:14भास्वर था
07:15परम तपस्वी अत्री मुनी का प्राकट्य हुआ, जिनकी आखों में ब्रहमान्दिय करुणा और चेतना का अध्भुत संगम झलक रहा था
07:24अंगिरस रिशी अगी अगनी के भास्वर स्वरूप में उत्पन हुए, जिनका मुखमंडल अलोकिक दिव्य आभा से ददीप्यमान था
07:34महान शास्त्रवेट्टा पुलस्त्य रिशी का प्राकट्य हुआ, जिनके हाथों में पवित्र वेद और कमंडलु सुशोभित्थे
07:42पुला रिशी अपने शांत और सौमे रूप में प्रकट होकर ब्रहमान्दिय संतुलन और योग विद्या के प्रतीक बने
07:50क्रतु रिशी का आगमन हुआ, जिन्होंने वैदिक यग्यों और अनुष्ठानों की शक्ती को समस्त लोकों में प्रज्वलित किया
07:59परम पावन वशिष्ठ मुनी ब्रहमा जी के मन से उत्पन्न होकर आत्म ज्यान और सत्य के अमर प्रतीक के रूप
08:06में स्थापित हुए
08:19इसने घोर तपस्या करके अपनी पुत्रियों की स्रिष्टी की, जो समस्त देव, असुर और जीवों की जन्नी बनने वाली थी
08:28मरीची के पुत्र महर्शी कशप ने प्रजापती दक्ष की कन्याओं से विवाह कर समस्त जीवजगत के विस्तार का मार्ग प्रशस्त
08:36किया
08:37देवी अदिती और कशप के योग से तेजस्वी देवों का जन्म हुआ, जिनके राजा इंद्र ने स्वर्गलोक में धर्म की
08:45स्थापना की
08:47देवी दिती और कशप के वंश से पराक्रमी असुरों का जन्म हुआ, जो अपार बलशाली और पाताल के स्वामी बने
08:55दनु के गर्ब से विशालकाय दानवों का उद्भव हुआ, जिनका विशाल शरीर और अपार शक्ती ब्रहमांड को जंकृत करती थी
09:05गंधर्वों और अपसराओं के सुन्दर समोह ने जन्म लिया, जिनकी संगीत और नृत्य की कला से संपून स्वर्गलोक गुंजायमान हो
09:13उठा
09:15कद्रू के वंश से नागों और मनियों से सुशोभित सर्पों का जन्म हुआ, जिन्होंने पाताल लोग की गहराईयों में अपना
09:22राज्य बसाया
09:24विन्ता के तेजस्वी पुत्र पक्षी राज गरुड का जन्म हुआ, जिनकी स्वर्ण पंकों की गड़गडाहट से समस्त दिशाएं काम उठी
09:34प्रजाप्तियों के इस महान वन्शक्रम से पृत्वी पर पशुपक्षी, व्रिक्षवन स्पती और संपूर्ण जीवन का विविध जाल फैल गया
09:43भगवान विश्णू और ब्रहमा जी ने इस अद्भुत और विशाल स्रिष्टी के तानेबाने को देखकर संपूर्ण ब्रहमांड को अपने आशिरवाद
09:51से परिपूर्ण कर दिया
09:53जब वाराह अवतार ने पृत्वी को रसातल से निकाल कर स्थिर किया, तब प्रथम पुरुष स्वयंभुव मनु और प्रथम नारी
10:01शत्रूपा ने इस पावन धरा पर मानव सभ्यता का पहला चरण रखा
10:07ब्रहमा जी ने अपने सत्य लोग के दिव्य कमल सिनहासन से प्रकट होकर मनु और शत्रूपा को नए युग में
10:14स्रिष्टी विस्तार और धर्म स्थापना का अमर आशिरवाद प्रदान किया
10:19राजा स्वयम्भोव मनु ने सत्य और अहिंसा के सिध्धानतों पर आधारित प्रथम राज्य की स्थापना की जिसने समस्थ भावी मानव
10:28सभ्यताओं के लिए नैतिक नियम तय किये
10:31महारानी शत्रूपा ने प्रथम वैदिक रसोई और यज्यवेदी का निर्मान करके ग्रिहस्थ धर्म और आध्यात्मिक समर्स्ता की अमूल्य परंपरा का
10:41शुभारंब किया
10:43कालांतर में मनु और शत्रूपा के घर तीन परं तेजस्वी पुत्रियों आकूती, देभूती और प्रसूती तथा दो महाप्रतापी पुत्रों प्रियवरत
10:52और उत्तानपाद का जन्म हुआ
10:55मनु ने अपनी जेश्ट पुत्री आकूती का विवाह प्रजाप्ती रुची से किया, जिन से आगे चलकर धर्म और समरिधी के
11:03प्रतीक यज्यदेव और दक्षिना देवी का प्राकट्य हुआ
11:08यज्यदेव और दक्षिना के दिव्य सन्योग से उत्पन्न आहुतियों ने संपूर्ण ब्रह्मांड में आध्यात्मिक उर्जा और पवित्रता की एक नई
11:16लहर गोडा दी
11:18द्वितिय पुत्री देवहूती का विवाह महान प्रजाप्ती करदम रिशी के साथ बिंदुसर सरोवर के मनोरम तटपर अत्यंत सादगी और भक्ती
11:27के साथ संपन्न हुआ
11:30तपस्या के प्रभाव से प्रजाप्ती करदम ने अपनी पत्नी देवहूती के लिए एक आलोकिक उड़ने वाले स्वन विमान की रचना
11:38की जो ब्रहमान की यात्रा करने में सक्षम था
11:42कुछ समय बाद देवहूती के गर्भ से भगवान विश्नु के पंचम अंशवतार सांख्य शास्त्र के प्रवर्तक भगवान कपिल मुनी का
11:50प्रादुर्भाव हुआ
11:52भगवान कपिल ने अपनी माता देभूती को सांख्य दर्शन और भक्ती योग का वह परम ज्ञान प्रदान किया जो आत्मा
12:00को अज्ञान के बंधनों से मुक्त करता है
12:04कप्रिल मुनी के उपदेशों को आत्म साथ कर माता देभूती ने उसी स्थान पर सिद्ध समाधी प्राप्त की और उनका
12:12शरीर पवित्र नदी रूप में परिवर्तित हो गया
12:15मनु की तीसरी पुत्री प्रसूती का विवाह ब्रहमा जी के मानस पुत्र प्रजाप्ती दक्ष से हुआ जिन्होंने विशाल वंश परंपरा
12:24का निर्मान किया
12:26प्रसूती और दक्ष की 24 कन्याओने धर्म, कश्यप और अन्य महर्शियों से विवाह कर समस्थ चराचर जगत में सद्गुनों और
12:34जीव जन्तुओं की उत्पत्ती की
12:37इधर स्वयंभोव मनु के बड़े पुत्र प्रियवरत ने अपने दिव्य रत पर सवार होकर संपून पृत्वी की परिक्रमा की और
12:45अध्भुत पराक्रम दिखाया
12:48प्रियवरत के रत के पहियों के विशाल निशानों से ही इस धर्ती पर साथ विशाल महाद्वीपों और साथ अथा महासागरों
12:55की रचना हुई
12:57राजा प्रियवरत ने अपने साथ योग्य पुत्रों को इन सातों द्वीप्राज्यों का सार्वभाउम समराठ बनाकर न्यायपूर्ण शासन की नीम रखी
13:06मनु के छोटे पुत्र उत्तानपाद भी एक अत्यंत धर्मनिष्ट और पराक्रमी राजा बने
13:13जिनका राजदर्बार न्याय और वैभव का केंद्र माना जाता था
13:18राजा उत्तानपाद का विवाह दो रानियों सुनीती और सुरुची से हुआ
13:23जिससे उस महान गाथा की प्रिष्ठ भूमी तैयार हुई जिसने ध्रूव के भाग्य का निर्धारन किया
13:30स्रिष्ठी का कार्यभार आने वाली पीढियों को सौंप कर स्वयंभुव मनु और शत्रूपा शांत मन से वन की ओर तपस्या
13:38के लिए प्रस्थान कर गए
13:41स्वयंभुव मनु के प्रतापी पुत्र राजा उत्तानपाद का सामराज्य चारों दिशाओं में वैभव और धर्म की साक्षात प्रतिमूर्ती बन कर
13:49चमक रहा था
13:51न्यायप्रिय राजा उत्तानपाद अपने भव्यस्वन सिनहासन पर बैठ कर अपनी प्रजा के कल्यान के लिए धर्मानुकूई शासन करते थे
14:00राजा की जेश्ट पत्नी महारानी सुनीती अत्यंत विनमरत, धर्मनिष्ट और साद्गी की प्रतिमूर्ती थी जो सदैव इश्वर भक्ती में लीन
14:10रहती थी
14:11देवी सुनीती अपने शांत अंतहकरण से महल के देवाले में दीप प्रजवलित कर समस्ट जगत के कल्यान की प्रार्थना करती
14:20थी
14:21वही राजा की कनिष्ट पतनी सुरुची अपने अप्रतिन सौन्दर्यक, तीखे नयननक्ष और असीम अहमकार के कारण महल में सर्वोपरी बनना
14:30चाहती थी
14:42राजा उत्तानपाद राणी सुरुची के अनुपम लावन्य और सम्मोहन के पाश में इसकदर बंधे थे कि वे उनके हर हट
14:49को सहर्ष स्विकार कर लेते थे
14:53समय बीतने पर महारानी सुनीती की कोख से एक परमतेजस्वी और शांत स्वभाव वाले बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम
15:01ध्रुव रखा गया
15:03कुछ समय पश्चात प्रियरानी सुरुची ने भी एक सुन्दर बालक को जन्म दिया, जिसका नाम उत्तम रखा गया और पूरे
15:11राज्य में उत्सव मनाया गया
15:14राजा उत्तानपाद अपने छोटे पुत्र उत्तम के परती अत्यधिक आ सकत थे और उसे सदैव अपनी गोध में बिठा कर
15:22लाड़ प्यार करते थे
15:24ननहा ध्रुव अपनी माता सुनीती के साधे आंगन में प्रकृती के सानिध्य में साधगी और उचे संसकारों के साथ बड़ा
15:32हो रहा था
15:34इसके विप्रीत सुरुची का पुत्र उत्तम स्वर्ण आभुष्णों और राजसी वैभव के अतिरेक में अहंकारी वातावर्ण के बीच पल रहा
15:42था
15:44रानी सुरुची ने राजा के मन में सुनीती के प्रती उपेक्षा के बीज बोना शुरू कर दिये ताकि उसका अपना
15:50पुत्र ही राज्य का एक मात्र उत्तराधिकारी बने
15:55सुरुची के वश में होकर राजा उत्तानपाद धीरे धीरे अपनी न्यायप्रियता भूलकर अपनी ही जेश्ट पत्नी सुनीती से विमुख होने
16:03लगे
16:05अपनी उपेक्षा से दुखी हुए बिना देवी सुनीती अपने पुत्र ध्रुव को सदाचारी बनने और नारायन की भक्ती करने की
16:13शिक्षा देती रही
16:15राजमहल अब दो हिस्सों में बंट चुका था जहां एक ओर सुनीती का कोना मौन साधना से युक्त था और
16:22दूसरी ओर सुरुची का भाग को लाहल से भरा था
16:26बालक ध्रुव ने अपनी माता की आखों में छुपे हुए मौन दोहक को देख कर कौतुहल वश उनसे अपने अधिकारों
16:34के बारे में पूछा
16:36सुनीती ने नम आखों से अपने पुत्र को गले लगाया और कहा कि इस संसार में केवल श्री हरी नारायन
16:43ही सबके परम आश्रेदाता और न्याय करता है
16:48उपर छजे से रानी सुरुची ने माम बेटे के इस पवित्र प्रेम को अत्यंत गहिना और इर्श्या की कुटिल मुस्कान
16:55के साथ देखा
16:57इस प्रकार राज महल के भीतर उठ रहा यह मौन अंतरकलह अब एक ऐसी महान कथा की प्रिष्ठ भूमी तैयार
17:05कर रहा था जो युगो-युगो तक अमर होने वाली थी
17:09सूर्य की पहली किरण के साथ राजा उत्तानपाद का भव्य वैदिक महल स्वर्नेम आभा से जग्मगा उठा जहां आज नेती
17:17एक हृदय विदारक अध्याय लिखने जा रही थी
17:21सरल और सात्विक वातावर्ण में अपनी मा के पास पल रहे बालक ध्रूव के मन में आज अपने पिता का
17:28सनेह पाने की तीवर उतकंठा जागरित हुई
17:32अपने ननहे कदमों से खुशी से जूमता हुआ बाल ध्रूव राजप्रासाद के भव्य गलियारों से होकर पिता की राजसभा की
17:39ओर बढ़ने लगा
17:42जैसे ही ध्रूव ने विशाल और वैभवशाली राजसभा के विशाल द्वारों में प्रवेश किया, वहां मंत्रियों और सभासदों का भव्य
17:50जमावरा था
17:50सिनहासन पर विराजमान थे महाराजा उत्तानपाद, जिनका विशाल और तेजस्वी स्वरूप राजसी ठाटबाट से सुशोभित हो रहा था
18:01राजा के ठीक बगल में रानी सुरुची गर्व और अहमकार से दीप्त खड़ी थी, जिसके वस्त्राभूशन उसकी अत्यधिक प्रियता का
18:10बखान कर रहे थे
18:12महाराजा उत्तानपाद की गोद में रानी सुरुची का पुत्र उत्तम अत्यंत लाड़ प्यार से बैठा हुआ पिता का दुलार पा
18:19रहा था
18:21अपने पिता की गोद में अपने छोटे भाई को मुस्कुराते देख बाल ध्रुव की आखों में भी पिता के सनेह
18:28की आस चमक उठी
18:30निश्पाप बालक ध्रुव अत्यंत उच्सुक्ता के साथ अपनी ननही बाहे फैलाए राजा के सिहासन की सीधियों की ओर बढ़ा
18:39राजा उत्तानपाद ने अपने जेश्ट पुत्र को आते देखा और एक पल के लिए उनका हृदय वातसल्य से भर गया
18:47पर सुरुची के भई ने उन्हें रोक लिया
18:50इससे पहले की ध्रुव अपने पिता का स्पर्श भी पाता राणी सुरुची इर्श्या और क्रोध से जलती हुई जपटकर आगे
18:58आई
19:00राणी सुरुची ने ध्रुव का कोमल हाथ कठोरता से जटका और उसे राजसिनहासन से दूर पीछे धकेल दिया
19:08राणी सुरुची की कठोर और विशैली वानी पूरी सभा में गूंज उठी जिसने निर्दोश बालक के हृदय को तीर की
19:16भाती छलनी कर दिया
19:18सुरुची ने कड़े शब्दों में कहा कि तू राजा का पुत्र होकर भी इस सिनहासन पर बैठने के योग्य नहीं
19:25है क्योंकि तू मेरी कोख से नहीं जन्मा
19:29राणी ने ध्रूव का उफास उड़ाते हुए कहा कि यदि पिता की गोध चाहिए तो भगवान विश्नु की तपस्या कर
19:36और अगले जन्म में मेरी कोख से जन्म ले
19:40अत्यंत अपमानित और आहत होकर बालक ध्रूव में रोते हुए अपने पिता की ओर रक्षा और न्याय की आज से
19:47देखा
19:49किन्तु सुरुची के मोहपाश में जकडे राजा उत्तानपाद सिर जुकाए पत्थर की भांती निस्तब्ध बैठे रहे और अपने पुत्र की
19:57रक्षा न कर सके
20:00राजसभा में उपस्थित ज्यानी मंत्री और गुरुजन इस अनर्थ को देखकर गहरेक शोब और लज्जा से अपनी आखे जुका गए
20:08पिता के दर्बार से मिले इस निर्मम आघात से ननहे ध्रूव का कोमल हरदय तूट गया और वह बिल्ख बिलक
20:15कर रो पड़ा
20:17सिसते हुए बालक ध्रूव ने अपमान जनक राजसभा छोड़ दी और अपनी माता सुनीती के पास एक अटूट भक्ती संकल्प
20:26के साथ दौर पड़ा
20:28अपनी सौतेली मा के कटू वचनों के बान से घायल होकर छोटा राजकुमार ध्रूव रोते हुए राजसभा से बाहर की
20:35ओर भागा
20:37अत्यंत वेदना और अपमान से भरा ध्रूव अपनी मा सुनीती के साथगी भरे महल की ओर दौरता चला गया
20:45राणी सुनीती जो अपने कक्ष में भगवान विश्नु के ध्यान में मगन थी ध्रूव की सिस्कियों को सुनकर चिंतित हो
20:53उठी
20:54ध्रूव ने आते ही अपनी मा की गोद में अपना चेहरा छिपा लिया और बिल्ख बिल्ख कर रोने लगा
21:02सुनीती ने ममता से भर कर ध्रूव के सिर को सहलाया और उसे शांत करने की कोशिश करने लगी
21:09सुनीती ने ध्रूव का आसुओं से भीगा चेहरा उपर उठाया और उसके इस अपार दुख का कारण पूछा
21:17ध्रूव ने टूटी आवाज में बताया कि कैसे महारानी सुरूची ने उसे पिता की गोध से उतार कर कटू वचन
21:25कहे
21:26ध्रूव ने बताया कि सुरूची ने उसे ताना मारा कि बिना उसकी कोख से जन में उसे सिनहासन पाने का
21:33कोई अधिकार नहीं है
21:36अपने पुत्र के दुख से सुनीती की आखे भी भर आइंद, फिर भी उन्होंने अपने विवेक और धैर्य को बनाये
21:43रखा
21:44मा सुनीती ने ध्रुव को समझाया कि जीवन में मिलने वाला आदर या अपमान मनुष्य के पूर्व जन्मों के कर्मों
21:51का ही फल होता है
21:54उन्होंने कहा कि सांसारिक सिनहासन और राजा का प्रेमक्षनभंगुर है जो आज है और कल समाप्थ हो सकता है
22:03सुनीती ने ध्रुव से कहा कि यदि वह सर्वोप्रिस थान चाहता है तो उसे केवल जगत्पिता भगवान विश्नु की शरण
22:11में जाना चाहिए
22:13उन्होंने बताया कि श्रीहरी ही इस स्रिष्टी के परमदाता है जिनकी भगती से मनुष्य को वह पद मिलता है जिसे
22:21कोई छीन नहीं सकता
22:23मा के इस आध्यात्मिक ज्यान को सुनकर बालक ध्रुव के मन से निराशा दूर होने लगी और एक नया संकल्प
22:30जाग उठा
22:32ध्रुव ने अपनी मा से पूछा कि वह भगवान विश्णु को प्रसंद करने के लिए कहा जाए और कैसे उनकी
22:39साधना करे
22:41सुनीती ने कापते हरिदय से ध्रुव को घने वन में जाकर एकागरचित होकर श्रीहरी की कठोर तपस्या करने का मार्ग
22:49बताया
22:50रानी सुनीती ने अपने बालक के मस्तक पर अपना हाथ रख कर उसे विजय और भक्ती का आशिरवाद दिया
22:58राजसी सुख सुविधाव का त्याग कर ध्रुव ने राज महल छोड़ कर घने जंगल की ओर प्रस्थान करने का द्रिढ
23:05निश्चय कर लिया
23:07मा सुनीती का हरिदय पुत्रमोह में व्याकुल था, किन्तु उन्होंने अपने अश्रुओं को रोक कर ध्रुव को मुस्कुराते हुए विदा
23:15किया
23:16अपनी मा का आशिरवाद लेकर छोटा ध्रुव बिना किसी भय के भगवान विश्चु की खोज में पवित्र मधुवन की ओर
23:24चल पड़ा
23:26राजमहल के अपमान से व्यथित ननी उंगलियों में अटूट संकल्प लिये बालक ध्रुव घने और रहस्य में वन की ओर
23:33अकेला बढ़ चला
23:35कांटों और नुकीले पत्थरों से घायल होते कोमल चर्णों के बावजूद ध्रुव के मुख पर केवल भगवान विश्चु को पाने
23:43की तीवर अभिलाशा चाई हुई थी
23:46भयानक वन्य जीवों और अंधेरी जाडियों के बीच भी ध्रुव बिना किसी भय के केवल श्री हरी के चिंतन में
23:53लीन होकर आगे बढ़ता रहा
23:56जब ध्रुव ने सच्चे हरिदै से मार्ग दर्शन के लिए पुकारा तब उसकी अनन्य भक्ती से वैकुंठ लोग की धारा
24:03आंदोलित हो उठी
24:05आकाश से एक अलोकिक स्वर्णिम प्रकाश पुंच धर्ती की ओर उत्रा और घने जंगल का हर कोना दिव्यकांती से जग्मगा
24:13उठा
24:15हाथ में महती वीना धारन किये नारायन नारायन का मधूर कीर्तन करते हुए देवर्शी नारत ध्रुव के समक्ष प्रकट हुए
24:23परम ज्यानी देवर्शी नारत को अपने सामने देख कर बालक ध्रुव ने अत्यंत भक्तिभाव से उनके चर्णों में साष्टान प्रणाम
24:32किया
24:34नारत मुनी ने ध्रुव के द्रिढ निश्चय को परखने के लिए उससे पूछा की इतना छोटा राजकुमार इस भयानक वन
24:41में क्यों भटक रहा है
24:44ध्रुव ने भरे मन से अपनी सौतेली माता के कटू वचनों की व्यथा सुनाई और परमपिता विश्चनु की गोद पाने
24:51का अपना द्रिढ संकल्प व्यक्त किया
24:54नारत जी ने परीक्षा लेते हुए कहा कि यह आयू खेलकूद की है और वन के कठोर कश्ट एक ननहे
25:02बालक के बसकी बात नहीं है
25:05ध्रुग ने हाथ जोड कर विन्यपूर्वक कहा कि गुरुदेव मेरा यह संकल्प अटल है और भगवान विश्चनु की प्राप्ती के
25:13बिना मैं पीछे नहीं हटूंगा
25:16बालक का निश्काम और अटूट ग्रिढ निश्चय देखकर देवर्शी नारत का हृदय वातसल्य और अपार आनन से भर गया
25:25नारत मुनी ने प्रसन्न होकर अपना वर्देहस्ट बालक ध्रूव के मस्तक पर रखा और उसे विश्चनु भक्ती का योग्य पात्र
25:33स्विकार किया
25:34देवर्शी ने ध्रूव को यमुना तट पर स्थित पवित्र मधुवन जाने का परामर्ष दिया जो तपस्या के लिए परम पावन
25:42स्थान है
25:44उन्होंने ध्रूव को स्नान, आच्मन और ध्यान की गूड वैदिक विधिया समझा कर मानसिक शुद्धी का मार्ग प्रदर्शित किया
25:53नारद जी ने ध्रूव के ध्यान हेतु भगवान विष्णू के मनमोहक चतुर्भुज स्वरूप का अती सुन्दर और विशद वर्णन किया
26:01इसके पश्चात देवर्शी नारद ने ध्रूव को परम शक्तिशाली बारह अक्षरों वाले महामंत्र ओम नमो भगवते वासुदेवाई की दीखशादी
26:11उस महामंत्र के उच्चारण मात्र से ही सम्पूवन वन प्रांतर अलोकिक स्पंदन और शांती के प्रकाश से सराबोर हो गया
26:20ध्रूव ने परम श्रद्धा के साथ मंत्र ग्रहन किया और उसके हृदय में ज्यान और भक्ती का अखंड दीपक प्रजवलित
26:28हो उठा
26:30नारत जी ध्रूव को सफलता का आशिर्वाद देकर अंतरधान हो गये और ध्रूव परम उच्साह के साथ मधुवन की ओर
26:37प्रस्थान कर गया
26:40देवर्शी नारत के वचनों को हृदय में धारण कर ननहा ध्रूव महुवन के घने और रहस्य में जंगलों की ओर
26:47कदम बढ़ाता है
26:49यमुना के पवित्र तट पर पहुँचकर पांच वर्ष के राजकुमार ध्रूव ने तपस्या के लिए एक शांत और दिव्यस्थान का
26:57चयन किया
26:59ननहे बालक ने कुशा के आसन पर बैठ कर पदमासन लगाया और अपनी कोमल आखे बंद कर ध्यान की मुद्राधारण
27:06की
27:08ध्रूव ने अपने हृदय कमल पर चतुर्भुज भगवान विश्नु के अत्यंत मनोहारी और तेजस्वी रूप का ध्यान केंद्रित किया
27:17आकाश मार्ग से देवर्शी नारद उस परम निश्ठावान बालक की भक्ती को देखकर अत्यंत हर्षित और गगगध हो रहे थे
27:25ध्रूव के कोमल कंट से ओम नमो भगवते वासुदेवाय का महामंत्र उचारित होकर पूरे वन में गूंजने लगा
27:34रितुए बदलती रही और भीशन गर्मी की तप्ती धूप भी उस नन्हे तपस्वी के अडिग निश्चय को डिगा न सकी
27:42तपस्या के प्रथम चरण में ध्रूव ने अन्न का पूर्ण त्याग कर केवल सूखे पत्तों और कंद मूल पर जीवन
27:49व्यतीत किया
27:51ध्रूव की दिव्य चेतना से आकर्शित होकर वन के हिंसक जीव भी अपनी शत्रुता भूल कर उनके चारों और शांत
27:59भाव से बैठ गए
28:01तपस्या के अगले कठिन चरण में बालक ने जल का भी त्याग कर दिया और केवल वायू का सेवन कर
28:08ध्यान में लीन रहा
28:10अपनी तपस्या को और उग्र बनाते हुए ध्रूव केवल एक पैर के अंगूठे पर खड़े होकर ब्रहमांड के स्वामी को
28:17पुकारने लगा
28:19बालक के अंगूठे के भार से प्रित्वी डग्मगाने लगी और उसके भीतर से एक तीवर दिव्य उर्जा उत्पन होने लगी
28:28स्वर्गलोक में देवराज, इंद्र और अन्य देवता ध्रूव के शरीर से निकलती प्रचंड तपन को देखकर अत्यंत भैभीत हो उठे
28:37इंद्र ने ध्रूव की तपस्या भंग करने के लिए अपनी माया से भयंकर आंधियों और भयानक मायावी राक्षसों को मधुवन
28:45भेजा
28:47भयंकर दहारते हुए डरावने राक्षसों ने बालक को डराने का प्रयास किया, परंतु ध्रूव का मन भगवान विश्नु में लीन
28:54रहा
28:56चारों और उठती धूल और धधकती अगनी की ज्वालाओं के बीच भी ध्रूव सुमेरु पर्वत की भांती अचल खड़े रहे
29:04ध्रूवने प्राणायाम करते हुए अपनी श्वास को भीतर ही रोक लिया, जिससे ब्रहमांड की समस्त वायू स्तम्भित हो गई
29:13चराचर जगत के सभी जीवों की श्वास रुधने लगी और तीनों लोकों में हाहाकार मच गया
29:20व्याकुल होकर स्रिष्टी रचिता ब्रहमा और सभी देवगण भगवान विश्नु की शरण में वैकुंठ धाम पहुँचे
29:28अपने अनन्यबाल भक्त की पराकाश्ठा को देख कर कृपानिधान भगवान विश्नु मंदमंद मुस्कुराएं और दर्शन देने के लिए उद्यत हुए
29:38परमज्ञानी रिशी परशुराम अपने आश्रम में संध्या की लालिमा के बीच बैठ कर शिश्यों को ब्रहमांड के अंतिम सत्यों का
29:46उपदेश देने लगते हैं
29:49वे समझाते हैं कि कैसे आदिदेव विश्नु की इच्छा मात्र से ही यह संपूर्ण स्रिष्टी एक दिव्य हिरन्यगर्भ के रूप
29:56में उत्पन हुई थी
29:59रिशी के अनुसार यह 14 भुवन रूपी लोक भगवान नारायन की इच्छा के अग्रिश धागे में पिरोए हुए चमकीले मोतियों
30:07के समान है
30:09वे पाताल के अंधकार्मय साथ लोकों का वर्णन करते हैं जहां महान नाग देव नारायन की व्यवस्था के अनुसार पाताल
30:17की असीम संपदा की रक्षा करते हैं
30:21इसके बाद वे कर्मभूमी प्रित्वी का गुनगान करते हैं, जहां मानव अपनी नेती का निर्मान करते हुए मोक्ष की प्राप्ती
30:29का प्रयास करता है
30:32रिशी परशुराम स्वर्ग लोग के एश्वर्य का चितरण करते हैं, जहां कल्पवरिक्ष की छाया में देवतागन अमरित का पान कर
30:40सुखी जीवन जीते हैं
30:43वे महरलोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक जैसे उच्च लोकों का वर्णन करते हैं, जहां परम तपस्वी रिशी केवल शाशात प्रकाश
30:52में ध्यान मगन रहते हैं
30:55तभी शिश्यों के सामने भगवान विश्णु का वह विराट रूप प्रकट होने लगता है, जिसमें संपूर्ण 14 लोक समाय हुए
31:03दिखाई देते हैं
31:05रिशी समझाते हैं कि गगन में चमकने वाले सूर्य और चंद्रमा वास्तव में भगवान नारायन के दो दैविय नेत्र हैं
31:13जो कालचकर को नियंत्रित करते हैं
31:17संसार में बहने वाली यह प्राणवायू पर मात्मा का ही श्वास है जो छोटे से तिनके से लेकर देवताओं तक
31:24को जीवन प्रदान करती हैं
31:27वे एक छोटी सी चीन्टी की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि इसका स्पंदन भी उसी विराट पुरुष की
31:35धड़कन से जुड़ा हुआ है
31:37वे अनन्त सागरों को प्रभु का रक्त बताते हैं जो बादलों के रूप में बर्सकर सूखी धर्ती को नया जीवन
31:45और हर्याली प्रदान करता है
31:48परशुराम जी समझाते हैं कि सत्यूग से कल्यूग तक का यह अनन्त काल्चकर प्रभु विश्नु के चर्णों में समर्पित एक
31:56महानदी की भांती बहता है
31:59वे शिश्यों को बताते हैं कि इस महान स्रिष्टी में मानव जन्म सबसे अमूल्य है क्योंकि केवल इसी योनी में
32:07जीव मोक्ष प्राप्त कर सकता है
32:10मानव मन की उलजनों को समझाते हुए वे कहते हैं कि सांसारिक माया के जाल से केवल वही मुक्त होता
32:17है जो इश्वर के प्रती समर्पित होता है
32:21वे भक्ती मार्ग का महत्व बताते हैं कि एक तुछ पुष्प भी यदी सच्चे प्रेन से अर्पित किया जाएं तो
32:28वह सीधे नारायन के चर्णों में पहुँचता है
32:32तभी प्रत्येक सच्चे भक्त के अंतहकरण में भगवान विश्णु की वही मनमोहक नील छवी प्रकट होकर अज्ञान के अंधकार को
32:40सदा के लिए मिटा देती है
32:43रिशी के इन वचनों को सुनकर वहां उपस्थित सभी शिश्यों के हरिदय असीम शान्ती और भक्ती के अलौकिक रस्से सराबोर
32:52हो जाते हैं
32:54परशुराम रिशी अपने दोनों हाथ जोड़कर उस सर्वव्यापी और करुणामई परमेश्वर को अपना अंतिम भावपूर्ण प्रणाम निवेदित करते हैं
33:04यह पावन प्रसंग शीरसागर में शेशनात पर विराजमान भगवान नारायन की उस अनंत और आनंदमई छवी के दर्शन के साथ
33:13संपन होता है
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