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राजा पृथु की महागाथा के बाद, इस एपिसोड में हम सृष्टि के विस्तार की यात्रा पर निकलते हैं। ऋषि परशुराम मैत्रेय को दक्ष प्रजापति की अविश्वसनीय कथा सुनाते हैं, जिन्होंने अपनी अनगिनत पुत्रियों के माध्यम से ब्रह्मांड के सभी प्रमुख वंशों – देवताओं, दानवों, यक्षों, नागों और कई अन्य प्राणियों – को जन्म दिया। जानें कैसे दक्ष की पुत्रियाँ अदिति और दिति, ऋषि कश्यप से विवाह कर देवों और असुरों की जननी बनीं। यह एपिसोड सृष्टि की विविधता, उनके परस्पर संबंधों और ब्रह्मांडीय संतुलन के रहस्यों को उजागर करता है। #VishnuPurana #DakshaPrajapati #KashyapaMuni #Devas #Asuras #Mythology #HinduPuranas #CosmicCreation #S2E6 #HinduMythology #IndianHistory #SpiritualJourney #GodsAndDemons
Transcript
00:00महाराज प्रिथु के धर्म प्रायन शासन में प्रिथवी ने अपने समस्त प्राकृतिक उपहारों को मुक्तहस्ट से लुटाया, जिससे चारों और
00:08समरिध्धी और शांती का अनुपम सामराज जिस्थापित हुआ
00:13देवताओं की प्रसनता और स्रिष्टी के संतुलन के लिए राजा प्रिथु ने अपनी प्रजा के कल्यान हेतु विशाल यग्यों का
00:20आयोजन किया, जिसमें पवित्र आहुतियों से पूरा वातावर्ण पावन हो गया
00:26अपने जेश्ट पुत्र विजिताश्व को कुशल शासन और धर्म की रक्षा का ज्यान देते हुए, महाराज प्रिथु ने उन्हें आने
00:34वाले युग की जिम्मेदारियों के लिए तयार किया
00:38युवा राजकुमार विजिताश्व ने अपनी अध्भुत धनुर विद्या और शास्त्रों के ज्यान से सभी का मन मोह लिया, जिससे वह
00:46प्रजा के चहेते उत्तराधिकारी बन गए
00:49अपनी कठिन साधना और अध्रिश्य होने की अध्भुत विद्या के कारण राजकुमार विजिताश्व को अंतरधान नाम से भी पुकारा जाने
00:58लगा, जो उनके पराक्रम का प्रतीक था
01:02सामराज्य के कोने-कोने में किसान, व्यापारी और रिशिमुनी अत्यंत हर्ष और उल्लास के साथ अपने दैनिक जीवन का निर्वाह
01:10करते थे, जो प्रिथु के सुशासन का प्रमाण था
01:14शीरसागर के अनंत विस्तार में विराजमान भगवान विश्नु ने प्रिथवी पर धर्म के इस सुन्दर और आदर्श राज्य को देखकर
01:22अपनी दिव्यमंध हास्य से अपनी संतुष्टी व्यक्त की
01:27आयू के अंतिन पड़ाव में महाराज प्रिथु ने अपनी सांसारिक यात्रा पूरी कर वन की ओर प्रस्थान करने का निश्चय
01:34किया, ताकि वे ब्रहम ज्यान की प्राप्ती कर सकें
01:38एक अत्यंत भावुक्षण में राजा प्रिथु ने अपने समस्त राजसी अधिकार और चम्चमाता हुआ स्वर्ण मुकुट अपने परम योग्य पुत्र
01:48विजिताश्व को सौंक दिया
01:50राज्या भिशेक के पावन उच्सव में वैदिक मंत्रोच चार के बीच महाराज विजिताश्व को प्रिथवी के नए चक्रवर्ती समराट के
01:59रूप में सिनहासन पर प्रतिष्ठित किया गया
02:02समराट बनने के पश्चात विजिताश्व ने अपने प्रथम शाही यग्य का समपादन किया ताकि उनके राज्य में प्रजा सदा सुखी,
02:11निरोगी और समरिध बनी रहे
02:14महान ब्रह मर्शी अत्री ने राजा विजिताश्व के राजदर्बार में पधार कर उन्हें आशिरवाद दिया और राजधर्म के गूढ रहसियों
02:23से अवगत कराया
02:25विजिताश्व ने अपने पराक्रमी भाईयों को सामराज्य के विभिन चारों दिशाओं का शासक नियुक्त किया, जिससे संपूर्ण प्रित्वी पर कानून
02:34और सुव्यवस्था बनी रही
02:37कालचक्र के प्रवाह के साथ विजिताश्व के यहां तेजस्वी पुत्र हविर्धान का जन्म हुआ, जिसने इस महान वंश की निरंतर्ता
02:45को और आगे बढ़ाया
02:48राजकुमार हविर्धान ने अपने गुरूओं की देखरेख में वेदों, उपनिश्दों और युद्धकला का गेहन अभ्यास चुरू किया, जो भावी राजा
02:56के लिए आवश्चक था
02:58इस स्वर्णिम युग में, जंदलों के हिंसक पशुभी रिशियों के आश्रमों के पास अपनी शत्रुता भूलकर शांत भाव से विचर्ण
03:07करते थे, जहां प्रकृती और मानव में पूर्ण सामन जस्य था
03:12महाराज विजिताश्व ने एकांत में जाकर एक विशाल वटवरिक्ष के नीचे बैठकर अपने पूर्वजों के दिव्यगुनों का स्मरण करते हुए
03:21ध्यान लगाया
03:23स्वर्ग के देवताओं और गंधर्वों ने बादलों के बीच से जाकते हुए इस महान और धर्मनिष्ट वंश की प्रशन सामें
03:30दिव्यगीतों की रचना की
03:33सत्यलोग से स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रह्मा ने राजा प्रिथु के वंश की इस सुव्यवस्थित प्रक्ती को देखकर अत्यंत संतोश
03:41और प्रसन्निता का अनुभव किया
03:44यहीं से राजा प्रिथु और विजटाश्व का यह महान वंश आगे बढ़ा जिसने भविश में प्रजाप्ती दक्ष की पुत्रियों के
03:52आगमन और स्रिष्टी के विविध रूपों के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया
03:57ब्रहमा देव स्रिष्टी के शाश्वत पिता अपनी अनन्त तपस्या से उत्पन हुए संसार की विशालता को निहारते हुए उसमें और
04:06अधिक जीवन तथा चेतना भरने की गहन इच्छा में लीन थे
04:11परंतु उन्हें आभास हुआ कि उनकी मानसिक रचनाए हालां की दिव्यती प्रजन के जटिल चक्र को पूरी तरह से गती
04:19देने में सक्षम नहीं थी और स्रिष्टी को और विस्तारित करने है तु एक नई अधिक प्रचुर उर्जा की आवश्शक्ता
04:26थी
04:27इस गेहन आवश्शक्ता को समझते हुए ब्रहमा देव ने अपनी चेतना को और भी गहराईयों में केंद्रित किया एक अध्वितिय
04:36प्रजाप्ती को जन्म देने के लिए जिन्होंने स्रिष्टी के प्रजन चक्र को सुनिश्चित करना था
04:42उनकी एक आगर तपस्या से एक दिव्य उर्जा पुंज उनके दाहिने अंगुठे से प्रकट हुआ जो तीवर प्रकाश और आध्यात्मिक
04:51शक्ती से दैदी प्यमान था जिसकी आभा से संपूर्ण ब्रहमांड आलोकित हो उठा
04:57और इस असीम उर्जा के केंद्र से प्रजाप्ती दक्ष का उद्भव हुआ एक भव्यक तेजस्वी स्वरूप जो स्वयं ब्रहमा के
05:05तेज और संकल्प का साक्षात प्रतिरूप था
05:09जन्म लेते ही दक्ष ने अपने परम्पिता ब्रहमा के चर्णों में श्रधा पूर्वक प्रणाम किया उनके हृदय में अपने निर्माता
05:17के प्रती अगाध भक्ती और कृतज्यता का भाव उमड रहा था
05:22दक्ष का दिव्य स्वरूप ऐसा था मानो स्वर्ण और अग्नी का संगम हो उनकी कांती इतनी प्रकाशवान थी कि उन्होंने
05:30समस्त दिशाओं को अपनी चमक से भर दिया
05:33ब्रह्मा ने अपने नवीन पुत्र के भीतर एक अध्वितिय संकल्प और प्रजन की असीमित क्षमता को देखा जो अन्यमानस पुत्रों
05:42से कहीं अधिक प्रकर और प्रभावी थी
05:45तब ब्रह्मा देव ने अपनी दिव्यवानी में दक्ष को उनके स्रिजन के विशेश उद्देश से अवगत कराया जो ब्रह्मान्ड में
05:54जीवन की अन्वरत धारा को प्रवाहित करने का महत्वपूर्ण कार्य था
05:59दक्ष ने अपने पिता की आग्या को एक पवित्र कर्तव्य के रूप में स्विकार किया उनके मुखमंडल पर कृतग्यता और
06:07ग्रिड संकल्प का अध्भुत संगम था जैसे वे इस ब्रह्मान्डिय भार को वहन करने के लिए ही जन में हो
06:14अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए दक्ष ने गहन तपस्या आरंभ की उनके एकाग्रध्यान से ब्रह्मान्डिय उर्जाएं उनके चारों
06:23और नृत्य करने लगी जो उनकी आगामी स्रिजन शक्ती का पूर्वाभास दे रही थी
06:30जैसे जैसे उनकी तपस्या गहरी होती गई उनके भीतर से एक अवर्णनिय शक्ती का संचार होने लगा जिसने उन्हें स्रिष्टी
06:38के सुक्ष्मतम तत्वों को आकार देने की क्षमता प्रदान की
06:43ब्रह्मा देव अपनी दिव्यद्रिष्टी से दक्ष की इस तपस्या और बढ़ती हुई आध्यात्मिक शक्ती का अवलोकन कर रहे थे उनके
06:52हृदय में अपने पुत्र के प्रती गर्व और संतुष्टी का भाव था
06:57अन्य प्रजाप्तिगन जो ब्रह्मा के अन्य मानस पुत्र थे भी दक्ष की असाधारन शक्ती और उनके विशिष्ट ब्रह्मांडिये कर्तव्य को
07:05देख कर विस्मईच कित थे
07:08अपनी तपस्या पूर्ण करने के पश्चात दक्ष ने अपनी असीमित उर्जा को स्रिजन के कार्य में लगाया उनके संकल्प से
07:16ही नएने रूपों और जीवों का उद्धव होने लगा
07:20उनकी प्रत्येक दृष्टी और विचार से ब्रह्मांड में नए जीवन के बीज अंकुरित होने लगे जैसे एक दिव्यमाली अपने हाथों
07:29से स्रिष्टी के विशाल उपवन को सीच रहा हो
07:33दक्ष के अथक प्रयासों से स्रिष्टी में विविद प्रकार के वंश और योनिया प्रकट होने लगी जिन में देवता, दानव,
07:41यक्ष और गंधर्व जैसे अनेक स्वरूट शामिल थे
07:45उनकी रचनाये इतनी अध्भुत और वैविध्यपून थी कि स्वयं ब्रहमा भी दक्ष की अध्वितियक शमता और उनके कार्य की विशालता
07:53को देखकर प्रफुलित हो उठे
07:56दक्ष का अटूट समर्पन और उनका द्रिड संकल थी था, जिसने ब्रहमांड के प्रजन चक्र को एक स्थाई गती प्रदान
08:04की, जिससे जीवन की शाश्वत लीला निरंतर प्रवाहित होती रही
08:09इस प्रकार प्रजाप्ती दक्ष ने ब्रहमा के महान स्वपन को साकार किया और वे स्रिष्टी के आधार स्तंभ बन गए,
08:17जिन्होंने ब्रहमांड को अंगिनत वन्शों से परिपूर्ण किया
08:22ब्रहमांडिय चेतना के गहन ध्यान में लीन होकर प्रजाप्ती दक्ष ने सृष्टी के विस्तार हेतु अपने दिव्य संकल्प से असीम
08:30उर्जा का आहवान किया
08:33परंपिता ब्रह्मा के दिव्य आशिर्वाद से प्रजाप्ती दक्ष और महारानी असिकनी को स्रिष्टी के विविध जीवों को जन्म देने वाली
08:41संतानों का सौभाग्य प्राप्थ हुआ
08:43ध्यान की गेहन अगनी से साक्षात दैवत्व रूपी पचास सुयोग्य पुत्रियों का प्रकट्य हुआ जिनकी कांती से दिशाएं आलोकित हो
08:52उठी
08:54समस्ट आकाश मंडल में अलोकिक शंकध्वनी और पुश्पवरिष्टी होने लगी मानो प्रकृती स्वय इन दिव्य माताओं का स्वागत कर रही
09:02हो
09:04दक्ष प्रजाप्ती ने अपनी संतानों के महान भविश्य का अवलोकन किया जो आने वाले युगों में ब्रहमांड की विभिन जातियों
09:12की जन्नी बनने वाली थी
09:15प्रथम पुत्री अदिती जो सूर्य की भांती तेजस्वी थी देवगणों की माता बनने के अलोकिक गौरव से सुशुभित थी
09:24वहीं द्वितिय पुत्री दिती के सौंदर्य में एक रहस्यमई और प्रचंड शक्ती का समावेश था जो दैत्य वन्ष को जन्न
09:32देने वाली थी
09:34जल एवं आदिम शक्तियों से जुडी दनु ने दानव वन्ष की मात्रिका बनने का महान दायत्व अपने उपर लिया
09:42कद्रू और विंताने नागों और पक्षी राज गरूर जैसे शक्तिशाली प्राणियों के वन्ष की उत्पत्ती की नीव रखी
09:50रोहिनी के नेत्रित्व में 27 दिव्य पुत्रियों का समोह नक्षत्रों के रूप में गगन मंदल में चमकने के लिए नियत
09:58हुआ
09:59स्रिष्टी के प्रजाप्ती महर्शी कश्यप का राज सभा में आगमन हुआ जो इन दिव्य देवियों के माध्यम से प्रजाका विस्तार
10:07करने वाले थे
10:08दक्ष प्रजाप्ती ने कश्यप रिशी को अपनी 13 प्रमुख पुत्रिया सौंप कर ब्रहमांड के सबसे बड़े वन्शानुक्रम की शुरुवात की
10:18धर्मदेव को दस धर्म प्रायन पुत्रिया प्रदान की गई ताकि संसार में सत्य, न्याय और नैतिक मूलियों की स्थापना हो
10:26सके
10:28चंदरदेव को 27 नक्षत्र रुपी पुत्रिया सौंपी गई जिससे समय चक्र और रात्रियों की सुंदर्ता को गती मिली
10:37देवर्शी नारद ने अपनी वीना की मधुर जंकार के साथ स्रिष्टी के इस विशाल और संतुलित विभाजन का गुनगान किया
10:45अधिती ने अपने गर्भ से 12 आधित्यों को जन्म देने का संकल्प लिया, जो देव लोग के अमर संरक्षक बनने
10:53वाले थे
10:54दिती और दनुने अपने होने वाले प्रतापी पुत्रों की असीम शक्ती की कल्पना की, जो पाताल और अंधकार्मय लोकों में
11:02राज्य करते
11:04कद्रू और विंता की संतानों के रूप में पाताल के सहस्रफण नागों और आकाश के अजे पक्षी राज गरुर का
11:12मार्क प्रशस्त हुआ
11:14प्रतेक पुत्री के माध्यम से स्रिष्टी में विविध प्रकार के जीव, वनस्पती और प्राकृतिक शक्तियों का प्रादुर्भाव संभव हो सका
11:22इस प्रकार दक्ष प्रजापती ने अपनी पुत्रियों के जरिये ब्रहमांड में जीवन की अद्वितिय विविधता और व्यवस्था की अमर नीम
11:31रखी
11:33प्रजापती दक्ष की सर्वगुन संपन्न पुत्री अदिती असीमित आकाश और अनंत चेतना की साक्षात देवी थी
11:41महामुनी कश्यप के साथ अदिती के पावन विवाह से संपूर्ण ब्रहमांड में शुगता और उर्जा का प्रवाह होने लगा
11:50महर्शी कश्यप के आश्रम में अदिती ने धर्म और ब्रहमांडिय संतुलन की रक्षा हेतु कठोर तपस्या का संकल्प लिया
11:58अदिती की तीवर भक्ती से प्रसन्न होकर दिव्य शक्तियों ने उन्हें तेजस्वी और अमर संतानों का वर्दान दिया
12:06मा अदिती के गर्भाधान से संपून लोकों में अलौकिक प्रकाश फैल गया और समस्त दसों दिशाय दिव्य सुगंद से महक
12:15उठी
12:16समय आने पर देवी अदिती ने बारा अदितियों को जन दिया जो ब्रहमांड के रक्षक और प्रकाश के प्रतीक बने
12:25प्रथम आदित्य के रूप में मित्र देव का प्राकट्य हुआ जो सत्यक, मित्रता और सोहार्थ का संदेश लेकर आए
12:33द्विती आदित्य वरोन देव ने समस्त ब्रहमांडिय जल और नैतिक नियमों का भार अपने कंधों पर संभाला
12:41त्रीतिय आदित्य अर्यमन ने आर्य परंपराओं, बंधुत्व और सामाजिक सुव्यवस्था का मार्ग गर्शन किया
12:49चतुर्थ आदित्य भग ने संपून प्राणियों के भाग्य, सम्रिध्धी और एश्वर्य का वितर्ण आरंभ किया
12:57पंचम आदित्य विवस्वान यानी भगवान सूर्य ने अपने साथ घोडो वाले रत पर सवार होकर जगत को प्रकाश मान किया
13:06छठे और सबसे पराक्रमी आदित्य के रूप में देवराज इंद्र का जन्म हुआ, जिनके हाथों में चम्चमाता वजर सुशोभित था
13:26की बढ़ती शक्ती देख कर असुरों के मन में गहरी इश्या और क्रोध की ज्वाला भड़क उठी
13:33स्वर्ग की रक्षा के लिए देवराज इंद्र और बारा आदित्यों ने दानवों के आक्रमन को विफल कर भयानक युद्ध लड़ा
13:42देवताओं पर आय संकट को देख कर जगनमाता अदिती ने भगवान श्री हरी विश्णू की अनन्य भाव से स्तुती की
13:50अदिती की निश्पाप भक्ती से प्रसन्न होकर भगवान विश्णू ने चार भुजाओं वाले दिव्य रूप में प्रकट होकर दर्शन दिये
14:10अदिती पर पुष्पवर्शा करते हुए उन्हें देवमाता की महान उपाधी से विभूशित किया। इस प्रकार देवी अदिती ब्रहमांड की वह
14:20असीम शक्ती बनी जिन्होंने समस्थ दिव्य देवताओं को जन्म देकर धर्म को अमर कर दिया।
14:26दक्षपुत्री दिती ने रिशी कश्यप से विवाह तो किया, परंतु उसके मन में देवों के वैभव को देखकर अपने लिए
14:34भी अत्यंत शक्तिशाली पुत्रों को प्राप्त करने की तीवर आकांक्षा जागरत हो उठी।
14:40संध्या के समय जब संपूर्ण स्रिष्टी मौन थी, तब दिती अपनी महत्वा कांक्षा के वशीभूत होकर रिशी कश्यप के समक्ष
14:48एक अत्यंत पराक्रमी और अजे पुत्र की याचना लेकर उपस्थित हुई।
14:54रिशी कश्यप ने उसे चेतावनी देते हुए कहा कि यह गोधूली वेला अत्यंत अशुब और रुद्र के गणों के विचर्ण
15:02का समय है, इसलिए इस काल में गर्भाधान विनाशकारी सिद्ध होगा।
15:07अपनी कामुकता और देवों के प्रतीतीवर इर्शया से अंधी होकर दिती ने रिशी के तरकों को अंदेखा कर दिया और
15:15अपनी हट पर अडिग रही।
15:18विवश होकर महर्शी कश्यप ने दिती की इच्छा तो पूर्ण की परंतु उन्होंने भविश्यवानी की की उसके गर्भ से जन्म
15:26लेने वाले पुत्र अत्यंत क्रूर और अधर्मी दैत्य होंगे जो स्रिष्टी में हाहाकार मचाएंगे।
15:33दिती के संताप को देखकर क्रिपालु कश्यप ने उसे सांत्वनादी की उसका एक पौत्र परम विश्नु भक्त होगा, जो संपूर्ण
15:41विश्व में पूजनिय और अमर कहलाएगा।
15:45जैसे ही दिती ने गर्भ धारण किया, उसके शरीर से एक ऐसी भयानक और प्रचंड उर्जा उत्पन्न होने लगी जिसने
15:53तीनों लोकों के सूर्य और चंद्रमा के प्रकाश को भी धुंधला कर दिया।
15:59स्वर्गलोक में इंद्र और अन्य देवता दिती के गर्भ के इस प्रचंड तेज को देखकर थर-थर कामपने लगे और
16:06वे अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित हो उठे।
16:09दिती ने देवराज इंद्र के किसी भी चल से अपने गर्भ की रक्षा करने के लिए सौ वर्षों तक उस
16:16दिव्य और भयानक तेज को अपने भीतर ही रोके रखा।
16:20अंतह जब प्रसव का समया आया, तब दिती के गर्भ से दो महा बलशाली और अत्यंत भयंकर जुरवा बालकों का
16:28जन्म हुआ, जिनका नाम हिरण्याक्ष और हिरण्यक्षिपू रखा गया।
16:33इन दोनों दैटियों के जन्म लेते ही प्रित्वी काम उठी, आकाश से उलकापिंड गिरने लगे और समुद्र अपनी सीमाओं को
16:41लांध कर गर्जना करने लगा।
16:44जेश्ट पुत्र हिरण्याक्ष का शरीर परवत के समान विशाल था और उसकी आखों में सोने की सी चमक थी, जो
16:51अपनी शक्ती के बल पर तीनों लोकों को कुचलने के लिए आतुर था।
16:57कनिष्ट पुत्र हिरण्याक्षिपु अत्यंत बुद्धिमान परंतु क्रोधी और घमंडी था, जिसके मन में देवताओं के विनाश और अमर्ता प्राप्त करने
17:06की तीवर पिपासा धधक रही थी।
17:09दोनों दैत्य भाईयों ने अस्त्रशस्त्र की शिक्षा प्राप्त कर अपनी शक्ती को इतना बढ़ा लिया कि उनकी हुंकार मात्र से
17:17स्वर्ग के देवगन भैभीत होकर छिपने लगे।
17:20महाबली हिरन्याक्ष ने अपनी गदा से समुद्र को मत डाला और अंता उसने संपून प्रित्वी को पाताल लोग के अंधकार्मई
17:29जल में ले जाकर छुपा दिया।
17:31अपने भाई के पराक्रम से प्रेरित होकर हिरन्याक्ष पुने ब्रहमाजी को प्रसन्न करने के लिए मंदराचल परवत पर घोर और
17:40कठिन तपस्या प्रारंभ कर दी।
18:01और नहीं किसी अस्त्रशस्त्र से मारा जा सके।
18:05वर्दान पाकर अहंकारी हिरन्यक्षिपु ने देवलोग पर अधिकार कर लिया और स्वयं को ही संपून स्रिष्टी का एक मात्र इश्वर
18:14घोशित कर दिया।
18:15दिती ने अपनी संतानों के इस प्रचंड सामराज्य को तो देखा, परंतु वह यह नहीं जानती थी कि उनकी यह
18:23असीमित शक्ती ही अंत्ह श्री हरी विश्णू के हाथों उनके विनाश का कारण बनेगी।
18:29प्रजाप्ती दक्ष ने स्रिष्टी के कल्यान और विस्तार के लिए अपनी अत्यंत गुनवान और तेजस्वी पुत्रियों का विवाह देवर्शी कश्यप
18:38से कराने का पावन निर्णय लिया।
18:42परम्तपस्वी देवर्शी कश्यप ने स्रिष्टी के दिव्य संतुलन और विभिन्न वंशों के उदे के लिए दक्ष की सभी पुत्रियों को
18:49अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्विकार किया
18:52दक्ष की अत्यंत तेजस्वी पुत्री दनुने कश्यप से विवाह कर उस बल्शाली दानव वंश का सूत्रपात किया जो अपनी अध्भुत
19:01शक्ती के लिए जाना गया
19:03देवी दनु के गर्ब से अत्यंत शक्तिशाली और विशालकाय दानवों का जन्म हुआ जिनके पच्चापों से प्रिथवी और पाताल लोक
19:12थर्थराने लगे
19:14दानव वंश में विप्रचित्ती जैसे महाबली योध्धा उत्पन हुए जिन्होंने अपनी असीम आसुरी शक्ती से तीनों लोकों में अपनी धाक
19:23जमाई
19:24इसके बाद देवी कद्रुने कश्यप से वर्दान मांगा कि उनके गर्ब से एक सहस्र परम पराक्रमी और विश्धर नागों का
19:33जन्म हो
19:35देवी कद्रु के वे एक हजार दिव्य अंडे पाताल लोग की सुरक्षित और रहस्यमे गहराईयों में दिव्य उर्जा के ताप
19:42से पकने लगे
19:44समय आने पर अंडों के फूटने से नागराज शेशनाग, वासुकी और तक्षक जैसे महाबली नागों का जन्म हुआ जो पाताल
19:53के स्वामी बने
19:55कशब की दूसरी पत्नी विंता ने भी दो अत्यंत पराक्रमी और दिव्य संतानों की अभिलाशा करते हुए दो स्वन अंडे
20:03प्राप्त किये
20:04कद्रु के पुत्रों को पहले क्रीडा करते देख विंता का धैर्य डिग गया और उसने समय से पूर्व ही अपने
20:11पहले अंडे को तोड़ दिया
20:14उस अंडे से टेजस्वी अरुन का जन्म हुआ जिनका शरीर आधा विक्सित था किंतु वे प्रभात के सूर्य की भाती
20:22दीप्तिमान थे
20:24अरुन देव ने अपनी माता विंता को धैर्य रखने का आशिरवाद दिया और आकाश मार्ग से सूर्य देव के रत
20:31के सार्थी का पद संभाला
20:33पूर्ण समय बीतने पर विंता का दूसरा अंडा फूटा और उसमें से महाबली गरुर देव प्रकट हुए जो समस्त पक्षियों
20:42के समराट बने
20:44गरुर ने अपनी विशाल और सुनहरी पंखों को फैला कर जब पहली बार उडान भरी तो उनकी गती से समुद्र
20:51और विशाल परवत काम उठे
20:54इसके पश्चात कदरु और विंता के बीच एक भीशन स्परधा आरंभ हुई जिसने नागों और गरुर के बीच सनातन शत्रुता
21:03का बीज बोया
21:05कशप की अन्य प्रिय पत्नी सुर्भी ने दिवे कामधेनू और अन्य गौवंश को जन्म दिया जिससे संपून चराचर जगत में
21:13पवित्रता का वास हुआ
21:15दक्ष की पुत्री खसा के अंश से रहस्यमई यक्ष और भयंकर राक्षस उत्पन हुए जिन्होंने प्रकृती की दुर्गम कंदराओं को
21:24अपना घर बनाया
21:26देवी इरा के प्रभाव से धर्ती पर सघन वन, औश्धिया और प्रांदायनी वनस्पतिया उत्पन हुई जिससे सूखी धर्ती हरीभी हो
21:35गई
21:36दक्ष की एक अन्य पुत्री मुनी ने दिव्य अपसराओं को जन्म दिया, जिनकी अनुपम सुन्दर्ता और नृतिय से देवराज इंद्र
21:45का अमरावती दर्बार गुँझ उठा
21:47इस प्रकार देवर्शी कश्यप और दक्ष की श्रिष्ट पुत्रियों के मिलन से ब्रहमांड के सभी लोकों में जीवन प्रजातियों और
21:55विविध वन्शों का विस्तार संपन हुआ
21:59महर्शी कश्यप की विविद संतानों के जन्म के साथ ही संपून ब्रहमांड जीवन, चेतना और अनंत शक्तियों के एक विशाल
22:07जीवन्त जाल में बंधने लगा
22:09अधिती के तेजस्वी पुत्रों यानी देवताओं ने स्वर्णेम आभासे दीप्त स्वर्गलोग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया और ब्रहमांडिये व्यवस्था को
22:19संभालने का दायत्व लिया
22:21दिती की कोक से जन में अतिबलशाली दैठ्य पाताल लोग की अतल गहराईयों में अपनी शक्ती का विस्तार करने लगे
22:29जिनके मन में अपने देवभाईयों के प्रती ईश्या का बीज अंकुरित होने लगा
22:34दनु की मायावी संता ने दानव अपनी विशालकाय देह और विनाशकारी शक्तियों के साथ दसों दिशाओं में अपना खौफनाग प्रभाव
22:44फैलाने लगी
22:46कद्रू के हजार मनियों से सुसजित नाग पुत्रों ने पाताल के अंधकार मैं गुफाओं को अपनी दिव्य चमक और फुमकार
22:53से गुंजायमान कर दिया
22:56विन्ता के पराक्रमी पुत्र गरूर और अरोन ने अपनी प्रदीप्त स्वर्ण पंखों की फड़फडाहट से समस्थ गगनमंडल को आलोकित कर
23:04दिया
23:05खसा से उत्पन्य यक्ष और राक्षस प्रजातियों ने घने रहस्य में वनों और परवतिय गुफाओं को अपना अभेध्य दुर्ग बना
23:13लिया
23:14सुर्भी की दिव्यगो संतती ने समस्थ प्रिथवी और देवलोक को अपने पवित्र अमृत तुल्य दूढ से समरिध और पोशित करना
23:23प्रारंब किया
23:23मुनी की संतानों यानी गंधर्वों और अपसराओं के मधूर संगीत और दिव्यन रिती ने समस्थ अंतरिक्ष को ब्रहमांडिय लालित्य से
23:33सराबोर कर दिया
23:35देवराज इंद्र ने अमरावती के रक्नजडित सिनहासन पर आसीन होकर वजरधारन किया जिससे देवलोग की सुरक्षा और वैभव चरम पर
23:44पहुँच गया
23:46पाताल की अंधेरी गहराईयों में माता दिती ने अपने दैत्य पुत्रों के हृद्यों में स्वर्ग पर अधिकार जमाने की उग्र
23:53लालसा का संचार किया
23:56ब्रहमान दिय सीमाओं पर देवताओं और दैत्यों के बीच प्रथम हिंसक मुठ भेड हुई जिसने युगो युगो तक चलने वाले
24:03महासंग्राम की नीम रख दी
24:07सत्यलोक में कमलपुष पर विराजमान पितामह ब्रहमा ने अपने चार मुखों से स्रिष्टी की इस उल्जी हुई अंतरसंबंधित गतिशीलता को
24:15गंभीर द्रिष्टी से देखा
24:18कद्रु और विंता के बीच के प्राचीन छल के कारण पक्षीराज गरुड और नागों के बीच अमिट शत्रुता की ज्वाला
24:25भड़क उठी
24:27सूर्य ने प्रकाश, वरुण ने जल और अगनी ने उर्जा का संतुलन संभाल कर द्रिष्य और अद्रिष्य जगत की गती
24:35को नियंबध किया
24:37पाताल के दैत्य राजाओं ने अजे वर्दान प्राप्त करने के लिए उग्रत अपोबल का मार्ग अपनाया, जिससे स्वर्ग के सिनहासन
24:45हिल उठे
24:46प्रजाप्ती कश्यप ने अपनी समस्थ संतानों को एकत्र कर ब्रहमांडिय धर्म और संतुलन बनाये रखने का अंतिम रिशिसंदेश दिया
24:56शीरसागर की अनंत शया पर शेशनाग की छत्रचाया में लेटे भगवान विश्णु ने स्रिष्टी चक्र के संतुलन को बनाये रखने
25:04का गूड संकल्त लिया
25:06चौदह भुवनों का ब्रहमांडिय धाचा अब पूरी तरह क्रियाशील हो चुका था जहां हर प्रजाती अपने निर्धारित कर्म छेत्र में
25:15प्रवरित्त थी
25:17प्रकाश और अंधकार के बीच का यह नाजुक संतुलन अब एक भयंकर ब्रहमांडिय महायुद्ध की ओर बढ़ रहा था जो
25:25संपून अस्तित्व को बदलने वाला था
25:28समस्त ब्रहमांड के विस्तार से पूर्व महर्शी कश्यप ने अपनी उग्र तपस्या और दिव्य चेतना से प्रजाप्ती के रूप में
25:36संपून स्रिष्टी का मार्ग दर्शन करना प्रारंभ किया
25:41प्रजाप्ती दक्ष ने स्रिष्टी का संतुलन और प्रसार बनाये रखने के उद्देश से अपनी तेरह परम ज्यानी और रूपवती पुत्रियों
25:49का विवाह महर्शी कश्यप से किया
25:52पवित्र वैदिक अगनी को साक्षी मान कर संपन हुए इस महान विवाह समारोह में समस्थ देवों और रिशियों ने नवदमपतियों
26:00पर पुश पवर्शा की
26:02देवी अधिती ने धर्म और सत्य का आश्रय लेकर महर्शी कश्यप की सेवा की जिससे ब्रहमांडिय व्यवस्था की नीम रखी
26:11गई
26:12अधिती के पवित्र गर्व से बारा आधित्य उत्पन हुए जिन्होंने अपने तेज से संपूर्ण लोकों को आलोकित कर अंधकार का
26:20नाश किया
26:21दूसरी और देवी दिती ने अत्यधिक शक्तिशाली संतानों की कामना की जिसके परिणामस्वरूप पराक्रमी दैतियों का जन्म हुआ
26:31दानु के गर्ब से दानवों की विशाल और मायावी प्रजाती का उदे हुआ, जो असीम शक्ती और मायावी शक्तियों के
26:39स्वामी बने
26:41विंता ने महर्शी कश्यप से दो दिव्य अंडों का आशिर्वाद प्राप्त किया, जिनमें आकाश पर शासन करने का अद्भुत सामर्थ्य
26:49छिपा था
26:51समय आने पर उन अंडों से गरूर और अरुन का जन्म हुआ, जिनकी विशाल अगनिस्मान पंखों ने संपूर्ण नभमंडल को
26:59कमपा दिया
26:59कद्रू के गर्ब से सहसरों पराक्रमी नागों की उत्पत्ती हुई, जिन्होंने पाताल लोक और रहस्यमेई भूमियों पर अपना आधिपत्य स्थापित
27:09किया
27:11महर्शी कश्यप ने सुर्भी को अपना दिव्यवर्दान दिया, जिससे कामधेनू और समस्त गौवंश का प्राकट्य हुआ जो जगत का पोशन
27:19करते हैं
27:21मुनी नामक पुत्री ने अपसराओं और गंधर्वों को जन्म दिया, जिन्होंने स्वर्ख, संगीट और नृत्य से स्वर्गलोक को आनन्दित किया
27:31क्रोध्वशा के गर्भ से उग्र और तीक्षन स्वभाव वाले जीवों का जन्म हुआ, जिन्होंने प्रकृती के हिंसक और रक्षात्मक संतुलन
27:39को संभाला
27:40इरा के माध्यम से प्रिथवी पर विशाल वरिक्ष लताएं, औश्धियां और हरीभी वनस्पतियां विक्सित होकर संपूर्ण धरा का श्रिंगार बनी
27:51विश्व की संतानों के रूप में विश्वेदेव अवतरित हुए, जिन्होंने ब्रहमांड में धर्म, न्याय और नैतिक मुल्यों की रक्षा की
28:00समय बीतने के साथ कश्यप की विविद संतानों, देवों, दैतियों, नागों और गरुरों के बीच वर्चस्व की भयनकर स्परधा उत्पन
28:09होने लगी
28:11महर्शी कश्यप ने अपने अगाध ज्यान और दूरदर्शिता से अपनी संतानों के विवादों को शांत कर उन्हें स्रिष्टी के नियमों
28:19का स्मरण कराया
28:21त्रिभुवन में शांती और संतुलन स्थापित करने के लिए कश्यप मुनिने परवत शिखरों पर बैठ कर कठोर तपस्या का मार्ग
28:29अपनाया
28:30समस्त देव, दानव, मानव और प्राणी प्रजाप्ती कश्यप को अपने महान, पूर्वज और कुल्पती के रूप में नमन करते हैं
28:39इस प्रकार महर्शी कश्यप की संतानों से संपूर्ण ब्रहमांड आच्छा दित हुआ और उनका वंश अनंत काल तक स्रिष्टी की
28:47चेतना बना रहा
28:50स्रिष्टी के आरंभिक काल में जब प्रजाप्ती दक्ष की पुत्रियों से विवित प्रजातिया उत्पन्न हो रही थी, तो एक अनियंतरित
28:58विशाल विस्तार हुआ जहां प्रत्येक वंश अपनी इच्छा के अनुसार फैल रहा था, जिससे ब्रहमांड में एक जटिल अ
29:18उन्हें लगा कि इस विशाल का इस रिष्टी को अब एक व्यवस्थित सूत्र में पिरोना अत्यंत आवश्चक है।
29:48पुनह स्थापित करने के लिए धर्म की अवधार्णा का अनावरण किया, जिसके द्वारा समस्त स्रिष्टी संतुलित रहेगी।
29:56इस प्रकार धर्म की दिव्यवधार्णा एक तेजस्वी स्वनश्वित प्रकाश के रूप में ब्रहमांड के केंद्र से फूट पड़ी, जो स्रिष्टी
30:05के प्रतेक कन को एक अगरिश्य पवित्र बंधन में बांधने के लिए तैयार थी।
30:11ब्रहमा ने विश्णों के मार्क गर्शन में विभिन लोकों, नक्षत्रों और प्रजातियों के लिए विशिष्ट सीमाए और कर्तव्य निर्धारित करना
30:20आरंभ किया, जिससे ब्रहमांडिय पदानुक्रम की नीव रखी जा सके।
30:26देवताओं को स्वर्ग के संरक्षक और ब्रहमांडिय उर्जा के संचालक के रूप में उनके दिव्यकर्तव्य सौंपे गए, ताकि वे नियाय
30:34और संतुलन बनाए रख सकें।
30:36असुरों को उनकी शक्ती और चुनौती की प्रवरित्ती के अनुरूप अपनी सीमाओं में रहकर तपस्या और युद्ध के माध्यम से
30:45अपनी शक्ती को विक्सित करने का अधिकार दिया गया, जो ब्रहमांडिय संतुलन का एक महत्वपूर्ण पहलू था।
30:53मानवों को प्रिथ्वी पर कर्म और धर्म के पथ पर चलने, सदगुनों और पापों के बीच चुनाफ करने की अध्वितिय
31:00स्वतंत्रता दी गई, जिससे वे अपनी नेती के शिल्पकार बन सकें।
31:05नाग, गंधर्व, किन्नर, अपसराय, यक्ष और राक्षस जैसे विविध जीवजन्तुओं को भी उनके विशिष्ट निवास, स्थान और ब्रहमांडिय ताने बाने
31:15में उनकी महत्वपूर्ण भूमिकाय सौंपी गई।
31:19भगवान विश्णु ने अपनी चार भुजाओं और शांत द्रिष्टी से स्रिजत हुई इन सभी जातियों और लोकों के बीच दिव्य
31:27संतुलन बनाय रखने की अपनी अप्रिवर्तनिय भूमिका को पुनह स्थापित किया, जिससे धर्म की नीम और भी सुद्रिड हो ग�
31:36ज्यान और पवित्रता के प्रतीक वेदों को ब्रहमा द्वारा प्रकट किया गया, जिसमें धर्म के सभी नियमों, कर्तवियों और नैतिक
31:44सिध्धान्तों को स्पष्ट रूप से सहिताबध किया गया था
31:49ब्रहमांडिय व्यवस्था को बनाए रखने और देवताओं को उर्जा प्रदान करने हे तू, यग्य और पवित्र अनुष्ठानों की स्थापना की
31:57गई, जो मानवों के लिए भी धर्म प्रायन जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए
32:04देवर्शी नारद अपने वीना की मधुर्ध्वनी और ज्यान से परिपून होकर इस ब्रहमांडिय नाटक के प्रतेक पहलू को अत्यंत उचसुकता
32:13से देख रहे थे, धर्म की स्थापना के इन दिव्यक्षनों को अपनी स्मृती में अनकित कर रहे थे
32:20एक भव्य ब्रहमांडिय सभा का आयोजन हुआ, जहां ब्रहमा और विश्णों ने सभी देवों, असुरों और अन्य प्रजातियों के समक्ष
32:28धर्म के संपूर्ण धाचे को प्रस्तुत किया, जिससे सभी को उनके स्थान और नियम स्पष्ठ हो सके
32:36धर्म की स्थापना के बावजूद, देवताओं और असुरों के बीच स्वाभाविक संधर्शों का उदे हुआ, परंतु धर्म के सिध्धानतों ने
32:44उन्हें संतुलन और न्यायपूर्ण समाधान की ओर अग्रसर होने का मार प्रशस्त किया
32:50जब भी धर्म पर संकट आया या संतुलन बिगड़ा, भगवान विश्णु ने अपने विभिन अवतारों के माध्यम से हस्तक्षेप कर
32:59ब्रहमांडिये व्यवस्था को पुनह स्थापित किया, अपनी भूमिका को एक अटल पालक के रूप में सिध्ध किया
33:06इस प्रकार कालचक्रय या समय का ब्रहमांडिये पहिया, धर्म के सिध्धान्तों द्वारा निर्देशित होकर घूमता रहा, प्रत्येक युग में संतुलन
33:15और परिवर्तन को नियंत्रित करता रहा, जो स्रिष्टी की शाश्वत गती का प्रतीक था
33:21ब्रहमा और विश्णू ने अपनी दिव्य उपस्थिती से नवस्थापित व्यवस्था के प्रारंभिक युगों की बारीकी से निगरानी की सुनिश्चित करते
33:30हुए की प्रत्येक जीव अपने नियत स्थान और भूमिका का निर्वेहन करे
33:36अंतर धर्म ने स्रिष्टी के शाश्वत आधार के रूप में स्वयं को स्थापित किया जिसने ब्रहमांड में एक स्थाई शान्ती
33:43और व्यवस्था लाई भविश्य के युगों की जटिलताओं के लिए एक अटूट नीम रखी
33:50जब प्रजाप्ती दक्ष की पुत्रियों के वंश्जों ने समस्त लोकों को अपने विविध अस्तित्व से भर दिया तब इस अथान
33:57फैलाव के पीछे एक अग्रिश अलौकिक शक्ती संतुलन बनाये हुए थी
34:03वैकुंठ लोक के अनंत क्षीर सागर में विराजमान भगवान विश्णू अपनी सुक्ष्म द्रिश्टी से स्रिश्टी की हर एक सांस और
34:11कर्म के तानेबाने को देख रहे थे
34:14देवताओं की बढ़ती रिधि सिध्धी और दानवों की उग्र शक्ती के बीच प्रतिद्वंद्विता गहराने लगी थी
34:21किन्तु विश्णू की सर्वव्यापक उपस्थिती दोनों के अंतरनिहित उद्देशों को नियंतरित कर रही थी
34:28ब्रह्म लोक में आसीन प्रजापिता ब्रह्मा ने अपनी नवनिर्मित स्रिष्टी की जटिलता को देखते हुए नारायन के सर्वव्यापी मार्ग दर्शन
34:36को नमन किया
34:39प्रजाप्ती दक्ष ने अपने महान यग्यों और विशाल वंश्वरिक्ष को देखकर गर्व महसूस किया किन्तु वे इस बात से अन्भिग्य
34:46थे कि यह विशालता केबल हरी की इच्छा का परिणाम थी
34:51हर प्राणी के हृदय में परमात्मा के रूप में वास करते हुए भगवान विश्णु ने समस्त जीवों में कर्म और
34:58धर्म की गुप चिंगारी प्रजवलित की
35:02पवित्र रिशियों ने जब अपने आश्रमों में वेदमंत्रों का उच्चारण किया तब उन्हें विश्णु के अगरिश्य हस्त का संबल अनुभव
35:10हुआ
35:11पाताल लोग की अगाध गहरायों में दिती के दानव पुत्र अपनी अगली चाल सोच रहे थे परंतु कालचक्र की गती
35:19विश्णु के ही नियंत्रण में घूम रही थी
35:23देवराज इंद्र के अमरावती नगर में जब उच्चव की गूँच थी तब भी उस वैभव का वास्तविक संरक्षन केवल श्री
35:30हरी की करुणा से संभव था
35:33समुद्र की गहराईयों से लेकर परवतों के शिखरों तक प्रकृती की प्रत्येक रचना में भगवान विश्णु का सुक्ष्म पालन करता
35:41रूप कार्य कर रहा था
35:43नेती की डोरियों को थामे हुए नारायन ने भावी युद्धो और धर्म की पुनस्थापना के लिए बीजबोने शुरू कर दिये
35:51थे
35:52वैकुंठ में श्री हरी के समीप विराजमान माता लक्ष्मी ने मुस्कुरा कर प्रभू की इस गहन लीला को देखा और
36:00सृष्टी के कल्यान का संकेत दिया
36:03काल पुरुष की गती तेज होती गई और दक्ष के वंशच पूरे ब्रहमांड के कोने कोने में अपने सामराज जस्थापित
36:10करने लगे
36:12अधर्म और अंधकार की आहट भी भविष्य में आने वाले प्रभू के अवतारों के स्वागत की प्रिष्ठ भूमी तैयार कर
36:19रही थी
36:21भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर सुशोभित कौस्तुभ मनी स्रिष्टी की प्रत्येक गतिविधी और प्राणी के भावी भाग्य को प्रतिबिम्बित कर
36:29रही थी
36:31देवर्शी नारद ने अपनी वीना की मधुर जंकार के साथ तीनों लोकों में भ्रमन करते हुए नारायन की इस गुप्त
36:38महिमा का गान किया
36:41वैकुंठ में सुदर्शन चक्र और कौमुद की गदा प्रभु के संकेत की प्रतीक्षा में अपनी संहारक और रक्षक उर्जा को
36:48संजोए हुए थे
36:50कैलाश परवत पर आसीन भगवान शिव ने अपनी योग मुद्रा में विश्णू की इस सुक्ष्म उपस्थिती को सराहा और ब्रहमांडिय
36:59संतुलन पर मुस्कुराए
37:01दक्ष की पुत्रियों से आरंभ हुआ यह वंश्विस्तार केवल प्रजा का निर्मान नहीं था बलकि यह धर्म और अधर्म के
37:09बीच होने वाले महानाट्य का पूर्वरंग था
37:13और इस प्रकार संरक्षन की यह अनंत गाथा जारी रही जहां हर अन्त एक नए डिवाइन अवतार और गाथा का
37:21मार्ग प्रशस्त करता है
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