श्रीमद्भागवतम् के इस नए एपिसोड में हम सूर्यवंश के गौरवशाली इतिहास में गोता लगाते हैं, जहाँ वैवस्वत मनु के पुत्रों से लेकर अयोध्या के संस्थापक इक्ष्वाकु तक की गाथा unravel होती है। परम भक्त राजा अम्बरीष की अटूट श्रद्धा और दुर्वासा मुनि के क्रोध की अग्निपरीक्षा देखें, जब सुदर्शन चक्र ने भक्त की रक्षा की। इस दिव्य कथा में भक्ति, धैर्य और भगवान विष्णु के भक्तों की महिमा का अद्भुत दर्शन करें। #BhagavataPurana #Suryavamsha #KingAmbarisha #DurvasaMuni #SudarshanaChakra #HinduMythology #Devotion
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00:00ब्रहमांड के गूड रहसियों को उजागर करते हुए, शुकदेव जी महाराज ने हस्तिनापूर के भव्य दर्बार में उपस्थित उच्सुक राजा
00:08परीक्षित को 14 मनवंतरों की दिव्य संरचना और उनकी चक्रिय व्यवस्था का विस्तार से ज्यान दिया, जिससे सत्य
00:15के नए आयाम प्रकाशित हुए, उनकी व्याख्या के साथ ही सभा के उपर आकाश में एक अग्रिश्य चमतकारी उर्जा प्रकट
00:25हुई, जिसमें ब्रहमांडिय समय चक्र के विभिन्न मनवंतरों की जलकी आक्षन भर के लिए तैरती हुई प्रतीत हुई, जो जीवन
00:32और स्
00:45थापित धर्म और व्यवस्था की महिमा का वर्नन किया, जिसके आधार पर यह युग चल रहा है।
01:15मसात कर लिया था और वे एक उतक्रिष्ट शासक बनने के सभी गुनों से परिपूर्ण थे। इक्षवाकु की आखें एक
01:24नए राज्य की स्थापना के स्वपन से चमक रही थी, जहां धर्म और न्याय का अखंड शासन हो और वे
01:30अपने वंश के लिए एक महान विरासक छो
02:02परिपूर सकें।
02:03वे सर्यू नदी के तट पर पहुँचे, जहां उन्होंने एक रमनी और उपजाव भूमी देखी, जो एक भव्य राजधानी के
02:12लिए उप्युक्त प्रतीत हुई, मानो स्वयन देवताओं ने उसे चुना हो।
02:17रिशियों ने इस स्थान के शुब संकेतों और दिव्य उर्जा को महसूस किया, और घोशनाकी की यह वह पवित्र भूमी
02:25है, जहां से एक ऐसे सामराज्य का उदे होगा, जो युगो युगो तक धर्म और न्याय का प्रतीक बनेगा।
02:33इक्षवाकु ने तुरंत उस स्थान पर अपनी नई राजधानी की नीम रखने का आदेश दिया, जिसे बाद में अयोध्या के
02:40नाम से जाना गया, जिसका अर्थ है जिस पर कोई युद्ध न कर सके।
02:45शीघ्र ही कुशल कारीग्रों और वास्तुकारों ने विशाल दीवारों, भव्य महलों और विस्त्रित सडकों का निर्मान आरंब किया, जिससे एक
02:54सुनियोजित और भव्य नगर का खाका आकार लेने लगा।
02:59वर्षों के अथक परिश्रम के बाद अयोध्या एक अजेर और अद्वितिय नगरी के रूप में खड़ी हुई, जिसकी भव्यता और
03:07सुरक्षा अद्भुत थी, और जो दूर दूर तक अपनी कीर्थी फैला रही थी।
03:13भव्य समारोह में वैदिक मंत्रोच चार और शंकनाद के बीच इक्षवाको को अयोध्या के प्रथम समराट के रूप में राज्याभिशेक
03:21किया गया, उनके माथे पर राज्मुकुट सुशोभित हुआ और वे सूर्यवंश के संस्थापक बने।
03:27अनेक प्रतिष्थित रिशिमुनियों और देवताओं ने उपस्थित होकर उन्हें आशिर्वाद दिया और यह घोशनाकी की उनका वंश सदियों तक धर्म
03:37और न्याय की मशाल को प्रजवलित रखेगा।
03:40इस प्रकार भगवान सूर्य के तेजस्वी पुत्र वैवस्वत मनुसे उत्पन्न महाराज इक्षवाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाकर सूर्यवंश की
03:51स्थापना की जो भविश्य में कई महान राजाओं और मर्यादा पुरुशोत्तम भगवान राम का वं�
03:59इक्षवाकु ने न्याय, धर्म और प्रजा कल्यान को सर्वोच प्राथमिकता दी, अपने राज्य में शान्ती और समरिधी सुनिश्चित की और
04:08सभी के लिए एक आदर्श शासक का उदाहरन प्रस्तुत किया।
04:27उन्होंने अपनी प्रजा को बाहरी आक्रमनों से सुरक्षित रखा, अपनी सेना को सुद्रिड किया, और अपने राज्य की सीमाओं को
04:35विस्तार दिया, जिससे सूर्यवंश की प्रतिष्ठा और शक्ती में व्रिधी हुई।
04:41इक्षवाकु ने न केवल एक सामराज्य की स्थापना की, बलकि उन्होंने एक ऐसे नैतिक और आध्यात्मिक आधार की भी नीव
04:49रखी, जिस पर आने वाली पीधिया अपने गौरवशाली इतिहास का निर्माण कर सकें।
04:56अपनी आयू के अंतिन चरण में, महाराज इक्षवाकु ने राज्य का भार अपने योग्य एवन धर्मनिष्ठ पुत्र विकुक्षी को सौंपकर
05:04स्वयमवन में तपस्या हेतु प्रस्थान किया।
05:08महाराज विकुक्षी ने पिता के पच्चहनों पर चलते हुए अयोध्या को वैदिक आदर्शों से सीचा और विशाल अश्वमेध यग्यों के
05:16माध्यम से राज्य में धर्म की स्थापना की।
05:20विकुक्षी के पश्चात उनके महाप्राक्रमी पुत्र पुरंजय राजा बने, जिनकी अध्भुत वीर्ता और दिव्य तेज की चर्चा तीनों लोकों में
05:29फैल गई।
05:30जब असुरों के भयंकर आक्रमन से देवलोक संकट में पड़ा, तब इंद्रदेव स्वयं महाराज पुरंजय से सहायता मांगने अयोध्या पधारे।
05:41भगवान विश्णु के आदेश पर इंद्र ने एक विशाल दिव्य बैल का रूप धारण किया और पुरंजय उसकी कूबड़ पर
05:48सवार होकर युद्ध भूमी में उत्रे जिससे उनका नाम ककुच्थ पड़ा।
05:54ककुच्थ ने अपने अचूक बानों की वर्षा से दैत्य सेनाप्ती और उसकी विशाल सेना का सहार करके देवताओं को पुनह
06:02स्वर्ग का निश्कंटक राज्य दिलाया।
06:05देवलोक में विजय पता का फहराने के बाद महाराज ककुच्थ का अयोध्या लोटने पर पुषपवर्षा और धोलनगाडों की मधुर ध्वनी
06:14से भव्य स्वागत हुआ।
06:16ककुच्थ के कुशल और न्यायपूर्ण शासन में कृषी और व्यापार ने अभूतपूर्व प्रक्ती की जिससे अयोध्या की धर्ती अन्न और
06:25धन्धाने से भर गई।
06:27ककुच्थ के उपरांत उनके धर्म प्रायन पुत्र अनेना ने सिन्हासन संभाला और अपनी प्रजा की संतान्वत रक्षा करते हुए राज्य
06:36की सीमाओं को सुरक्षित रखा
06:39सूर्यवंशी राजाओं ने प्रिथवी को केवल एक राज्य नहीं, अपितु गोमाता के समान पवित्र मानकर उसकी प्राकृतिक संपदा का सदैव
06:48सनरक्षन किया
06:49पीधी दर पीधी, इक्षवाकू के वन्षज अपने तपोबल और पराक्रम से निर्दोश रिशियों के आश्रमों को उपदरवी असुरों के भैसे
06:58मुक्त रखते रहे
07:00राजा प्रिथु की महान परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सूर्यवन्ष के राजाओं ने नगर्नगर में औश्धालियों और अनक्षेत्रों का निर्मान
07:09कराया
07:11इक्षवाकु वन्ष के प्रतापी राजा श्रावस्त ने आगे चलकर श्रावस्ती नामक एक नए और वैभवशाली नगर का निर्मान करके सामराज्य
07:20का विस्तार किया
07:22कालांतर में सूर्यवन्ष में राजा कुवल्याश्व हुए जिनके समय में रेत के नीचे छिपे भयंकर दैत्य धुन्धु ने चारों और
07:30तबाही मचा रखी थी
07:32रिशी उतंक की प्रार्थना पर राजा कुवल्याश्व अपने 21,000 वीर पुत्रों की विशाल सेना लेकर धुन्धु का वत करने
07:41मरुभूमी पहुँचे
07:43दैत्य धुन्धु द्वारा उगली गई विशैली अगनी की ज्वालाओं को राजा कुवल्याश्व ने अपने जलस्त्रों के योग से शांत कर
07:51दिया
07:52कठोर संधर्ष के पश्चात कुवल्याश्व ने धुन्धु का अंत कर दिया, जिससे संसार में शान्ती स्थापित हुई और वे धुन्धुमार
08:00नाम से विख्यात हुए
08:03धुन्धुमार ने जीवन के उत्तरार्ध में अपने शेष धर्मनिष्ट पुत्र द्रिधाश्व को राजसिनहासन सौंपकर स्वयंको इश्वर भक्ती में समर्पित कर
08:12दिया
08:13महाराज द्रिधाश्व और उनके उत्तरधिकारियों ने अयोध्या को न केवल बाह्य शत्रूओं से सुरक्षित रखा, बलकि हरिकीर्तन और परोपकार को
08:23प्रजा के जीवन का मुख्य अंग बनाया
08:26इस प्रकार इक्षवाकु वन्ष में सत्य और भक्ती की जो नीव रखी गई, वह आने वाले महान समराटों और स्वयन
08:34श्रीहरी के अवतारों के स्वागत के लिए तत्पर हो रही थी
08:38पीढियों तक इक्षवाकु वन्ष के राजाओं ने धर्म, न्याय और प्रजापालन को अपना सर्वोपरी कर्तव्य मान कर सुर्यकुल की महिमा
08:46को निरंतर बढ़ाया
08:49इसी पुन्य भूमी पर एक ऐसे बालक का जन्म हुआ, जिसके भीतर राजसी रक्त के साथ साथ इश्वरिय प्रेम की
08:56गहरी आस्था भी प्रवाहित होती थी, जिसका नाम था अंबरीश
09:01बच्पन से ही युवराज अंबरीश को राजसी सुखों के बजाय धर्म ग्रंथों के अध्ययन और भगवान विश्णु के ध्यान में
09:09अधिक आनंद आता था
09:11उन्होंने अपनी युवावस्था में ही यह समझ लिया था कि सच्चा एश्वर्य बाहरी संपदा में नहीं, अपितु आत्मा की शुद्धी
09:19और परमात्मा से जुरने में नहित है
09:23आत्र जब राज्या भिशेक का समयाया, तो उन्होंने अयोध्या का मुकुट धारन तो किया, किन्तु उनके मन में सदैव श्रीहरी
09:31का ही वास रहा
09:33उन्होंने अपने राज्य के प्रत्येक कार्य को भगवान विश्णु की सेवामाना और प्रजा को भी भक्तिमय जीवन जीने के लिए
09:41प्रेरित किया
09:43उनकी धर्म प्रायंता और न्याय प्रियता से अयोध्या नगरी धंधान्य और शांती से परिपूर्ण हो गई जहां हर नागरिक ने
09:51सुख और संतोष का अनुभव किया
09:55चक्रवर्ती समराठ होते हुए भी उनका व्यक्तिगत जीवन अत्यधिक सादा था और वे सासारिक सुखों में कभी आसक्त नहीं हुए
10:04उनकी धर्म प्रायन पत्नी और पुत्र भी उनही के पच्चिनों पर चलते हुए भगवान विश्नों की भक्ती में लीन रहते
10:11थे
10:12जिससे राजपरिवार एक आदर्श उदाहरन बन गया
10:16विशेश रूप से वे एकाद्शी के वरत का अत्यंत कठोर्ता से पालन करते थे
10:22जिसमें वे अनजल त्याग कर श्रीहरी के चिंतन में लीन रहते थे
10:27स्वर्गलोक में देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों पर हरिगुन गाते हुए
10:32अंबरीश की अनुपम भक्ती को महसूस किया
10:36वे मन ही मन ऐसे परम भक्त की प्रशंसा कर रहे थे
10:40जिसने संसार की मोहमाया को त्याग कर स्वयं को पूर्णत है भग्वान को समर्पित कर दिया था
10:47एक बार महाराज अंबरीश ने अपनी भक्ती को और गहरा करने के लिए
10:52एक विशाल अश्वमेध यग्य का अनुष्ठान करने का संकल्प लिया
10:56उस यग्य की पवित्र अगनी से उठती दिव्य उर्जा सीधे वैकुंठ धाम तक पहुँच रही थी
11:03जहां स्वयं भग्वान विश्णू ने उसे स्विकार किया
11:07महाराज अंबरीश ने अपने वरत और निष्ठा से सभी देवताओं को प्रसंद किया
11:13और उनकी भक्ती ने तीनों लोकों में अपनी कीर्टी फैलाई
11:18किन्तु कभी कभी परम भक्ती की भी अगनी परीक्षा होती है
11:22और इस परीक्षा को लेने के लिए प्रित्वी पर महर्शी दुर्वासा का आगमन हुआ
11:28अपनी तपस्या के बल पर दुर्वासा मुनी ने अंबरीश के अद्वितिय धर्म प्रायंता और भक्ती को पहचाना और उनकी परीक्षा
11:36लेने के लिए अयोध्या की ओर प्रस्थान किया
11:39इस बीच महाराज अंबरीश ने एकादशी का अपना व्रत सफलता पूर्वक पूर्ण किया था और अब वे पारण करने तथा
11:48ब्राहमनों को भोजन कराने के लिए तयार थे
11:52ठीक उसीक्षन जब अंबरीश पारण करने वाले थे उनके महल के द्वार पर अप्रत्याशित रूप से महर्शी दुर्वासा आ खड़े
12:00हुए
12:02महराज अंबरीश ने अपनी मर्यादा के अनुसार महर्शी दुर्वासा का अत्यंत आदर पूर्वक स्वागत किया और उन्हें भोजन के लिए
12:10निमंत्रित किया
12:12महर्शी दुर्वासा ने राजा अंबरीश का निमंतरन स्विकार किया
12:16किन्तु स्नान के उपरां थी भोजन ग्रहन करने का आग्रह करते हुए नदी की ओर प्रस्थान किया
12:23उधर द्वाजशी तिथी का शुब पारण मुहूत धीरे-धीरे समाप्थ हो रहा था
12:29और राजा अंबरीश अपनी पत्नी के साथ चिंतित मुद्रा में महर्शी की प्रतीक्षा कर रहे थे
12:36धर्म संकट में फंसे महाराज अंबरीश ने अपनी समस्या के समाधान हेतु ततकाल अपने राजपुरोहितों और विद्वान ब्राहमनों को मंतरना
12:45के लिए बुलाया
12:59इस प्रकार भगवान का स्मरण करते हुए, राजा अंबरीश ने अतिथी के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए केवल एक बूंद
13:07जल ग्रहें कर अपने एकाद्शी व्रत का प्रतीकात्मक पारण किया।
13:12अपने स्नान और अनुष्ठान पूर्ण कर, महर्शी दुर्वासा अब राजा अंबरीश के महल की ओर लोटे, जहां उन्हें भव्य भोजन
13:21के लिए निमंत्रित किया गया था।
13:24जैसे ही महर्शी दुर्वासा ने महल में प्रवेश किया, उन्होंने अपनी योग शक्ती से तुरंत यह अनुभव कर लिया कि
13:31राजा अंबरीश ने उनसे पहले ही पारण कर लिया है।
13:36अपने अपमान से क्रोधित होकर दुर्वासा का शांत स्वरूप पल भर में ही उग्र रूप में बदल गया और उनकी
13:43आखें अगनी के समान धधकने लगी।
13:47यह मेरा घोर अपमान है गरचते हुए दुर्वासा ने अंबरीश पर आरोप लगाया। तुमने अतिथी का अनादर कर केवल अपनी
13:55भूख मिटाई है जबकि मैंने तुम्हें प्रतीक्षा करने को कहा था।
14:00महाराज अंबरीश ने अत्यंत नमरता पूर्वक उत्तर दिया, हे महर्शी मैंने केवल जल्पान किया है ताकि शुभ महूर्थ समाप्त न
14:09हो और मैं आपका अपमान करने की कलपना भी नहीं कर सकता।
14:15अंबरीश के विनमर उत्तर से और भी क्रोधित होकर दुर्वासा ने अपने माथे पर हाथ फेरा और अपनी जटा से
14:22एक भयंकर कृत्या को प्रकट किया जिसका उद्देश राजा को नश्ट करना था।
14:28वह भयंकर कृत्या अपनी भयानक गर्जना के साथ राजा अंबरीश की ओर लपकी उसका एक मात्र लक्ष उन्हें निगल जाना
14:37था।
14:39अपनी रक्षा के लिए कोई प्रयास किये बिना, राजा अंबरीश ने अपनी आखे बंद कर ली और पूर्ण विश्वास के
14:46साथ भगवान विश्णु के चर्णों में स्वयं को समर्पित कर दिया।
14:51जैसे ही कृत्या अंबरीश पर जपटने वाली थी, उनके अटल विश्वास और भक्ती के कारण भगवान विश्णु का अमोग सुदर्शन
15:00चक्र आकाश से बिजली की गती से प्रकट हुआ।
15:04सुदर्शन चक्र ने एक पल में उस कृत्या को अपने तेज से भस्न कर दिया, उसे राख में बदल कर
15:10राजा अंबरीश को आसन्न खत्रे से मुक्त किया।
15:15कृत्या का सहार करने के बाद सुदर्शन चक्र अब अत्यंत क्रोध में महर्शी दुर्वासा की ओर मुड़ा, जो अपने ही
15:22अस्त्र के विनाश से भयभीत थे।
15:26सुदर्शन चक्र की अगनी से बचने के लिए भयभीत दुर्वासा बिना सोचे समझे महल से बाहर भागे उनकी गती में
15:33अब क्रोध नहीं बलकी केवल आत्मरक्षा का तीवर भय था
15:38अपनी प्रानरक्षा के लिए दुर्वासा सर्वप्रथम स्रिष्टी के पालक भगवान ब्रह्मा के पास पहुँचे जो अपने दिव्य लोक में विराज
15:47मान थे
15:49ब्रह्मा ने दुर्वासा को बताया कि भगवान विश्नु का सुदर्शन चक्र अजे है और वे स्वय भी उसके क्रोध से
15:56किसी को नहीं बचा सकते
15:59ब्रह्मा से निराश होकर दुर्वासा अब कैलाश परवत की ओर भागे ताकि भगवान शिव से सहायता प्राप्त कर सकें जो
16:07तीनों लोकों के स्वामी है
16:11दुर्वासा मुनी ने अन्ता कैलाश परवत के बरफीले शिकरों पर कदम रखा जहां ब्रह्मांड के संहारक भगवान शिव अपनी गहन
16:19समाधी में लीन थे
16:22वहां उन्होंने महादेव को देखा अपने दिव्यत तेजस्वी रूप में बाग की खाल धारन किये हुए जटाओं से गंगा प्रवाहित
16:30होती और त्रीतिय नेत्र बंद किये गहन ध्यान में लीन
16:35अत्यंत भैभीत और लाचार दुर्वासा मुनी ने अपनी समस्त विनमर्ता के साथ त्रिलो की नाथ के समक्ष साष्टान प्रणाम किया
16:44और उनकी कृपा के लिए मौन प्रार्थना करने लगे
16:48दुर्वासा की हृदय विदारक पुकार और उनकी विवश्टा की तीवर उर्जा ने महादेव की समाधी को भंकिया और उन्होंने धीरे
16:56-धीरे अपने कमल नैनों को खोला
16:59शान्त और गंभीर मुद्रा में भगवान शिव ने दुर्वासा मुनी के भैभीत चहरे को देखा उनके आगमन का कारण तुरंत
17:08समझ गए और अपनी दिव्यद्रिष्टी से सारी स्थिती को जान लिया
17:13घोलेनाथ अपने सहच करुणा भाव से दुर्वासा के दर्द को समझते हुए अपनी गंभीर और मधुरवानी में बोले है मुनिवर
17:21आप किस संकट से घिरे यहां आये हैं
17:25दुर्वासा ने कापते हुए स्वर में अपनी संपूर्ण कथा शिव को सुनाई और विशेश रूप से सुदर्शन चक्र के भयावः
17:33पीछा करने का वर्णन किया जिसकी ज्वाला उनकी हर सांस के साथ करीब आती जा रही थी
17:41महादेव ने एक गहरी सांस ली और बोले है दुर्वासा मैं तीनों लोकों का स्वामी होते हुए भी भगवान विश्णु
17:48के सुदर्शन चक्र के क्रोध को शांत करने में असमर्थ हूँ
17:53उन्होंने आगे स्पष्ट किया भगवान विश्णु अपने भक्तों के इतने अधीन है कि उनका चक्र भी केवल उनकी इच्छा और
18:02उनके भक्त की रक्षा के लिए ही कार्य करता है
18:06महादेव ने दुर्वासा को अन्तिम उपाय सुझाया तुम्हें स्वय भगवान विश्णु की शरण में जाना होगा वही तुम्हें इस विकट
18:14संकट से मुक्ती दिला सकते हैं
18:18ब्रहमा और शिव दोनों से निराश होकर दुर्वासा मुनी ने महसूस किया कि अब कोई भी देवता उनकी सहायता नहीं
18:26कर सकता और उनका अंत निकट है
18:29अपनी अंतिम आशा के साथ भयभीत दुर्वासा ने वैकुंट की ओर दौड लगाई क्योंकि उन्हें पता था कि केबल भगवान
18:38विश्णु ही उन्हें इस मिर्क्यू के मुक्ष से बचा सकते हैं
18:42अंतह वैकुंट के स्वर्ण द्वारों पर पहुँच कर दुर्वासा मुनी ने अपनी समस्ट अहमकार को त्याग कर विनमरता से उस
18:50परमधाम में प्रवेश करने की अनुमती मांगी
18:54वैकुंट के अंदर उन्होंने परमेश्वर भगवान विश्णु को अपने अनन्त नाग पर विश्राम करते हुए देखा जिनकी निल्मनी सी काया
19:03अनन्त शान्ती और सौंदर्य बिखेर रही थी
19:07दुर्वासा मुनी ने तुरंट भगवान विश्णु के चरण कमलों में गिरकर अश्रुपूल्ण नेत्रों से अपनी रक्षा के लिए करोन पुकार
19:15की अपने समस्थ अपराधों की क्षमा याचना करते हुए
19:19भगवान विश्णु ने दुर्वासा को उठाया उनके आसूओं को पोच्छा और अपनी शान्त मनमोहक वाणी में बोले है मुनिवर मेरे
19:28भक्तों के प्रती तुम्हारा यह कृत्य अत्यंत अनुचित था
19:33भगवान ने आगे स्पष्ट किया मैं अपने भक्तों के अधीन हूँ और मेरा चक्र केवल उनकी रक्षा के लिए ही
19:40प्रकट होता है और मैं स्वयंभी उसे रोक नहीं सकता
19:45विश्णू ने दुर्वासा को अंतिन समाधान बताया इस चक्र को केवल राजा अंबरीश ही शांत कर सकते हैं जिनके प्रती
19:53तुमने अपराद किया है तुम्हें उन्ही से क्षमा मांगनी होगी
19:58दुर्वासा मुनी ने अंतह अपनी तुर्टी का पूर्णत है एहसास किया और राजा अंबरीश की भक्ती की शक्ती को पहचानते
20:06हुए अपने अहंकार को छोड़ दिया
20:09पूरी तरह से हंबर्ड और पश्चाताप से भरे हुए दुर्वासा मुनी ने वैकुंट से विदाली और अब उनका एक मात्र
20:17लक्षय राजा अंबरीश के पास लोटकर क्षमा याचना करना था
20:22वैकुंट से विदाले कर दुर्वासा मुनी का मार्ग जिसके हर पद पर पश्चाताप की अगनी धधक रही थी
20:29उन्हें तीवर गती से राजा अंबरीश के राजमहल की ओर खीच रहा था उनके हृदय में केवल ख्षमा की अभिलाशा
20:36शेश थी
20:38जैसे ही मुनी ने अपनी यात्रा जारी रखी उन्हें राजा अंबरीश की अटूट भक्ती और उस दिव्यचक्र की अविस्मनिय शक्ती
20:47बार-बार स्मरण होती रही जिसने उन्हें विश्व के कोने-कोने तक दोड़ाया था
20:52अंतह कई दिनों की यात्रा और अन्वरत आत्मचिंतन के पश्चात दुर्वासा मुनी उस भव्य प्रवेश द्वार के सम्मुख खड़े थे
21:01जहां से राजा अंबरीश का धर्मनिष्ट शासन फैला हुआ था
21:06महल के भीतर राजा अंबरीश अपने दर्बारियों और सम्मानित ब्राहमनों के साथ बैठे अपने व्रत के पारण की तयारियों में
21:14लीन थे जब दुर्वासा मुनी के आगमन की सूचना उन्हें मिली
21:20दुर्वासा मुनी के अचानक आगमन से सभी आश्चर यच्कित रह गए विशेशकर अंबरीश जिनके हृदय में मुनी के प्रती कोई
21:28द्वेश नहीं अपितु केवल आदर का भाव था
21:32विन्मर्ता पूर्वक उठकर राजा अंबरीश ने स्वया आगे बढ़कर मुनी का स्वागत किया और उन्हें आदर पूर्वक आसन ग्रहन करने
21:41का निवेदन किया जैसे कोई पुत्र अपने पिता का सतकार करता है
21:46मुनी दुर्वासा ने अंबरीश की अप्रतिम विन्मर्ता और आतिथ्य को देख कर अपने मन में शेश बचे अहंकार के अंतिमकन
21:54को भी त्याग दिया और उनका हृदय पूर्णत पश्चाताप से भर गया
22:00अंबरीश ने मुनी से आग रह किया कि वे भोजन ग्रहन कर उनका वरत पारण करें और मुनी ने सहर्ष
22:07स्विकार करते हुए कहा कि वे स्नान के पश्चात लोटकर भोजन करेंगे
22:13इसके पश्चात दुर्वासा मुनी पवित्र सर्यू नदी के तटकी ओर प्रस्थान कर गए उनका उद्देश्य स्नान कर शारिरिक और मानसिक
22:21रूप से शुद्ध होना था पर उनके मन में एक और योजना भी थी
22:27नदी के निर्मल जल में प्रवेश करने के बाद दुर्वासा मुनी ने जानबूच कर अपने स्नान और ध्यान की अवधी
22:34को बढ़ाया जिसका उद्देश्य राजा अंबरीश की धर्मनिष्ठा की अंतिम परीक्षा लेना था
22:41सूर्य आकाश में धीरे-धीरे पश्चिम की ओर खिसक रहा था और शुब पारण का मुहूर्ट निकट आ रहा था
22:48परन्तु मुनी दुर्वासा अभी भी नदी से वापस नहीं लोटे थे
22:53अंबरीश अपने कक्ष में चिन्तित मुद्रा में बैठे थे क्योंकि धर्म शास्त्र के अनुसार व्रत का पारण शुब मुहूर्ट में
23:00ही करना आवश्यक था अन्यथा व्रत खंडित हो जाता
23:05एक और अतितियों का अनादर करने का भय था दूसरी और अपने व्रत का धर्मनियम भंग होने का संकट जिसने
23:12राजा को एक गहन धर्म संकट में डाल दिया
23:15राजा अंबरीश ने अपने दर्बार में उपस्थित सभी सम्मानित ब्राहमनों और रिशियों को एकत्र कर अपनी विकट परिस्थिती और धर्म
23:25संकट को उनके सम्मुख रखा
23:28अंबरीश ने विनमरता पूर्वक पूछा ये ज्यानी ब्राहमनों कृपा कर मुझे इस दुविधा से बाहर निकालें जहां मुनी की प्रतीक्षा
23:37और व्रत के नियम के बीच मेरा धर्म फसा हुआ है
23:42ब्राहमनों ने गहन विचार विमर्ष किया और धर्म शास्त्रों का अवलोकन करते हुए राजा को एक मध्यमार्ग सुझाया जो धर्म
23:50और आदर दोनों का पालन करता था
23:54उन्होंने कहा हे राजन आप केवल भगवान का चर्णामरित ग्रहन कर पारण कर सकते हैं क्योंकि जल अन्न नहीं है
24:01और इससे व्रत धंग नहीं होगा नहीं मुनी का अनादर होगा
24:07ब्राहमनों की इस धर्म सम्मत सलाह को सुनकर अंबरीश के हृदय को शान्ती मिली और उन्होंने ततकाल उस पवित्र विधान
24:15का पालन करने का निश्चय किया
24:18इसके पश्चात उन्होंने श्रधा पूर्वक भगवान के विग्रह से लिया गया पवित्र चर्णामरित जल ग्रहन किया जिससे उनका व्रत का
24:26नियम भी बना रहा और मुनी दुर्वासा का अनादर भी नहीं हुआ
24:31मुनी दुर्वासा अभी भी नदी में ही थे अपने ध्यान में लीन यह जानने के लिए कि अंबरीश अपने धर्मसंकट
24:39में क्या निर्णय लेते हैं परन्तु उन्हें राजा की अप्रतिम धर्मनिष्ठा का अनुमान न था
24:45यमुना तट पर अपने नित्य संध्यावंदन और स्नान ध्यान पूर्ण करने के उपरांत महर्शी दुर्वासा तेजस्वी पच्चापों के साथ राजा
24:54अंबरीश के राजप्रांगन की ओर प्रस्थान करने लगे
24:59महर्शी दुर्वासा अत्यधिक गर्व और स्वाभिमान के साथ राजप्रांगन में प्रविष्ठ हुए
25:05यह अपेक्षा करते हुए कि राजा अंबरीश उनके स्वागत में समस्त उत्तम व्यंजन सजाकर प्रतीक्षा कर रहे होंगे
25:13जैसे ही राजा अंबरीश ने महर्शी दुर्वासा को आते देखा
25:17वे ततकाल अत्यंत विनय और श्रधा भाव से शीष जुकाकर हाथ जोडे उनके चर्णों की ओर बढ़े
25:25परंतु महर्शी दुर्वासा ने अपनी तपोबल द्रिष्टी से क्षण भर में यह भांप लिया कि राजा ने उनके भोजन ग्रहन
25:33करने से पूर्व ही जल रूप में पारण कर लिया है
25:37यहां आभास होते ही कि वरत का नियम पूरा करने हेतु जल रहन किया गया है दुर्वासा मुनी का मुखमंडल
25:44अत्यंत भयंकर लाल हो गया और उनका संपून शरीर क्रोध की ज्वाला में जलने लगा
25:50अत्यंत कड़कती आवाज में दहारते हुए दुर्वासा मुनी ने अंबरीश पर तंसकसा कि उन्होंने एक सम्मानित अतिथी ब्राहमन का घोर
25:59तिरसकार किया है
26:02राजा अंबरीश ने अपने हाथ जोड़कर अत्यंत नमरता पूर्वक उत्तर दिया कि उन्होंने केवल धर्म के विधान की रक्षा हेतु
26:10चर्णामरित की एक बिंदु ग्रहें की थी ताकि अतिथी का अपमान भी न हो
26:17आंकार और अतिक्रोध से अंधे हो चुके दुर्वासा मुनी ने राजा की एक भी मर्यादायुक्त बात न सुनी और इसे
26:24राजसी दंभ मान कर दंड देने का हट ठान लिया
26:28क्रोध से कापते हुए महर्शी दुर्वासा आगे बढ़े और उनका कमंडल तथा ब्रहमदंड उनके भीशन ताप से स्वयन थर्थराने लगे
26:38अपने तपोबल का अनुचित प्रयोग करते हुए दुर्वासा मुनी ने अपनी जलती हुई जटा से एक केश उखाडा और उसे
26:46महाविनाशकारी मंत्र के साथ प्रित्वी पर पटक दिया
26:50उसी क्षन धर्ती चीर कर काले धुएं और भयंकर बिजली की गर्जना के साथ एक विशालकाय राक्षसस्वरूपा कृत्या प्रकट हुई
26:59उस क्रित्या का रूप अत्यंत विक्राल था, लप्टों जैसी लाल आखें, नुकीले भयावधान्त और हाथ में महाविनाशकारी जलती हुई तलवार
27:10जिससे मृत्यू का आभास हो रहा था
27:13महर्शी दुर्वासा ने अपनी थर्थराती उंगली से राजा अंबरीश की ओर संकेट करते हुए कृत्या को ततकार राजा का वत
27:21करने का निर्देई आदेश दिया
27:24दुर्वासा का संकेट पाते ही कृत्या ने अपनी भीशन ज्वाला में तलवार हवा में उठाई और पूरी राजसभा को कपा
27:32देने वाली चीतकार भरी हुंकार भरी
27:35इस भयानक द्रिश को देखकर राजप्रांगण में उपस्थित समस्त प्रजा, मंत्री और पुरोहित भय से चीखते हुए प्राण बचाकर इधर
27:44उधर भागने लगे
27:46कृत्या अपने भारी और विनाशकारी कद्मों से धर्ती को कमपाती हुई राजा अंबरीश का सिर धर से अलग करने हेतु
27:54तीवर गती से उनकी ओर जप्ती
27:57परंतु परम भागवत राजा अंबरीश तनिक भी भयभीत नहीं हुए वे अपनी आखे मूद कर हाथ जोडे स्थिर खड़े रहे
28:05और अपना सर्वस्व भगवान विश्नु के चर्णों में अर्पित कर दिया
28:10राजा का यह अटल भक्तिभाव और अनन्य शर्नागती देखकर वैकुन्ठप्ती भगवान श्री हरी का परम रक्षक चक्र स्वतह जागरत हो
28:19उठा
28:20अचानक आकाश से सहसरों सूरियों के समान अत्यंत जाजवल्यमान और देधी प्यमान दिव्य प्रकाश का एक विशाल पुन्ज राजा अंबरीश
28:29की रक्षा हेतु अवतरित हुआ
28:32अंबरीश के मस्तक के ठीक उपर भगवान विश्नु का सुदर्शन चक्र प्रज्वलित ज्वालाओं और चक्राकार तेज के साथ प्रकट होकर
28:40अंबरीश और कृत्या के मध्य ढाल बनकर खड़ा हो गया
28:45सुदर्शन चक्र से फूट्ती असहय ज्वालाओं और देधी प्यमान प्रकाश ने उस भयानक राक्षसी कृत्या की आखों को क्षण भर
28:53के लिए अंधा कर दिया
28:55चक्र की तीवर घूर्णन गती से उत्पन प्रचंड पवन के थपेडों से कृत्या चीतकार कर उठी और पीछे हटने का
29:03निश्वल प्रयास करने लगी
29:05बिना किसी विलंब के श्रीहरी का वह अमोग चक्र कृत्या की ओर प्रचंड वेग से बढ़ा और उसकी असुरी काया
29:13पर तूट पड़ा
29:14चक्र की अलौकिक अगनी का स्पर्श होते ही वह भयनकर राक्षसी देखते ही देखते भस्म होकर क्षन भर में धूली
29:22में बदल गई
29:24अपनी ही कृत्या को पलक जपकते नश्थ होते देख क्रोधी महर्शी दुर्वासा स्तब्ध रह गये और उनका हतप्रप चहरा भय
29:32से पीला पड़ गया
29:34दूसरी और राजा अंबरीश बिना किसी भय के हाथ जोड़े खड़े रहे और भगवान विश्नु के प्रती उनका अमूल्य विश्वास
29:42और अधिक सुद्रिड हो गया
29:45राक्षसी का सहार करने के पश्चात चक्राकार ज्वालाओं से घिरा सुदर्शन चक्र अब महर्शी दुर्वासा की ओर मुड़ा
29:54भक्त का अपमान करने के अपराद के कारण सुदर्शन चक्र से तीवर क्रोध की लहरें उत्पन होने लगी, जिससे संपूर्ण
30:02वातावर्ण तपने लगा
30:04सुदर्शन के उस प्रचंड ताप को सेहन करने में असमर्थ दुर्वासा मुनी को अपनी भूल और अहंकार का भान होने
30:12लगा
30:13दुर्वासा के माथे पर चिंता के स्वेध बिंदू उभरा आये और उनका रिशसुलब दंभ भगवान के चक्र के सम्मुख धराशाई
30:21हो गया
30:23जैसे ही सुदर्शन चक्र दुर्वासा की दिशा में एक विशाल अगनिगोले की भानती बढ़ा, महर्शी के प्रान भय से कांप
30:30उठे
30:32अपने प्रानों की रक्षा हे तु दुर्वासा मुनी ने अपना कमंडल वही छोड़ा और योगबल से आकाश मार्ग की ओर
30:39भाग खड़े हुए
30:42परंतु सर्वव्यापी सुदर्शन चक्र भी एक प्रजवलित पुच्छल तारे की भानती गगन में मुनी का पीछा करने लगा
30:50दुर्वासा ने भैभीत होकर पीछे मुड कर देखा तो उन्हें चक्र का देधी प्यमान रूप अपने अत्यंत समीप आता हुआ
30:57दिखाई दिया
30:59महर्शी ने अपनी रक्षा हेतु अनेक सिध्धियों और तपोबल का प्रयोग किया किन्तु सुदर्शन के तेज के आगे उनकी हर
31:07शक्ती निश्पल सिध्ध हुई
31:10भूलोग पर कोई शरण न पाकर दुर्वासा मुनी उच्चतर दिव्य लोकों की ओर तीवर गती से पलायन करने लगे
31:18अंतरिक्ष में तारों और दिव्य बादलों के बीच भी श्रीहरी का चक्र बिनारुके निरंतर उनका पीछा करता रहा
31:26इधर राजप्रांगन में राजा अंबरीश ने क्रोध या बदले की भावना रखने के बजाय दुर्वासा मुनी की कुशलक्षेम के लिए
31:34प्रार्थना आरंभ कर दी
31:37धर्म प्रायन राजाने प्रतिग्याली की जब तक महर्शी दुर्वासा सकुषल लोटकर भोजन ग्रहें नहीं कर लेते वे स्वयंपारण नहीं करेंगे
31:47इस प्रकार ब्रह्मांड में एक और अभूत पूर्व भक्ती का द्रिश था तो दूसरी और भक्त द्रोही का पीछा करता
31:54सुदर्शन चक्र
31:56प्रज्वलित सुदर्शन चक्र के भय से कापते हुए महर्शी दुर्वासा अपनी प्रानरक्षा हेतु आकाश मार्ग से ब्रहमांड के विभिन लोकों
32:05में पागलों की भांती भागने लगे
32:08असीम गती से दिशाओं को चीरते हुए दुर्वासा मुनी सीधे सत्यलोक पहुँचे और ब्रहमाजी के चर्णों में गिरकर सुदर्शन चक्र
32:16के प्रकोप से बचाने की गुहार लगाने लगे
32:20अपने कमल सिनहासन पर विराजमान चतुर्मुख ब्रहमाजी ने अत्यंत विवशता और दुरक भरे भाव से दुर्वासा की ओर देखा और
32:29चक्र को रोकने में अपनी असमर्थता व्यक्त की
32:33ब्रहमाजी ने स्पष्ट किया कि श्रीहरी द्वारा अपने परम भक्त अंबरीश की रक्षा हेतु छोडे गए चक्र का उलंधन करने
32:40की शक्ती ब्रहमाण्ड के रच्चिता में भी नहीं है
32:45ब्रहमाजी के जवाब से निराश और अत्यंत भयभीत दुर्वासा मुनी सत्यलोक से पुन्ह अंतरिक्ष में कूद पड़े जबकि सुदर्शन की
32:53अगनी उनकी जटाओं को जुलसा रही थी
32:57तत्पश्चात दुर्वासा मुनी बर्फ से ढके कैलाश परवत की ओर भागे और महादेव शिव से अपनी प्रानरक्षा की भिक्षा मांगने
33:05लगे
33:07भगवान शिव ने अपने त्रिनेत्र खोले और कैलाश के द्वार पर मंदराते हुए प्रजवलित सुदर्शन चक्र को देखा, जिसकी ज्वालाओं
33:15से बर्फ पिघर रही थी
33:18महादेव ने बड़े शांत स्वर में दुर्वासा को समझाया कि भक्त वत्सल श्रीहरी के इस अमोग अस्त्रकी गती को रोग
33:25पाना संपून स्रिष्टी में किसी के लिए भी संभव नहीं है
33:30शिव जी ने निर्देश दिया कि उनकी रक्षा केवल और केवल वही राजा अंबरीश कर सकते हैं, जिनका उन्होंने अपने
33:39तपोबल के अहंकार में अपमान किया था
33:42महादेव के वचनों को सुनकर दुर्वासा का अहंकार पूरी तरहे तूट गया और वे कापते हुए कैलाश से पुनह आकाश
33:50में उर चले
33:52अंतिम उपाय के रूप में दुहखी और ठके हुए दुर्वासा मुनी सीधे भगवान विश्नु के परमधाम वैकुंठ लोक की ओर
34:00बढ़े
34:01वैकुंठ में प्रवेश करते ही दुर्वासा मुनी शेशनाग पर विराजमान भगवान विश्नु और माता लक्ष्मी के श्रीचर्णों में आगिरे
34:11अश्रुपूरत नेत्रों और कापते हाथों से दुर्वासा ने श्रीहरी से अपने सुदर्शन चक्र को वापस बुलाने और अपने प्राणों की
34:19भिक्षा मांगी
34:21भगवान विश्नु ने अत्यंत मधुर और गंभीर मुस्कान के साथ दुर्वासा को देखा और कहा कि वे स्वय अपने भगतों
34:29के प्रेम में पूर्णतय परतंत्र हैं
34:33श्रीहरी ने कहा कि वे अपने अनन्य भक्तों के हिदय में निवास करते हैं और उनके सच्चे निशकाम भाव के
34:40सामने भगवान की अपनी स्वतंत्रता समाप्थ हो जाती है
34:45उन्होंने दुर्वासा को बताया कि राजा अंबरीश इस समय भी बिना अन्नजल ग्रहें किये केवल दुर्वासा की ही मंगल कामना
34:53और जीवन रक्षा के लिए प्रार्थना कर रहे हैं
34:57भगवान विश्णु ने सुदर्शन चक्र को रोकने से इनकार करते हुए कहा कि चक्र की गती केवल उसी भक्त की
35:04क्षमा और क्रिपा से नियंत्रित हो सकती है
35:08विश्णु जी ने मुनी को आदेश दिया कि वे तुरंत अपना रिशित्व का अहंकार त्याग कर अयोध्या जाएं और राजा
35:16अंबरीश के चर्णों में गिरकर ख्षमा याचना करें
35:20भक्ती की श्रेश्थता और अपने अहंकार की भूल समझकर दुर्वासा मुनी ने श्रीहरी को बारंबार प्रणाम किया
35:29अंत्य जीवंदान और ख्षमा की एक मात्र आशा लेकर महर्शी दुर्वासा वैकुंट से लौट कर तीवर गती से प्रिथवी लोग
35:36में राजा अंबरीश के महल की ओर दौड पड़े
35:40रिशित्व का सारा अहंकार त्याग कर भैभीत महर्शी दुर्वासा तीवर गती से आकाश मार्ग से प्रिथवी लोग की ओर भागे
35:48जबकी सुदर्शन चक्र निरंतर उनके पीछे काल बनकर मंडरा रहा था
35:54उधर अयोध्या के भव्य राज महल में परम प्रतापी राजा अंबरीश भगवान विश्नु के ध्यान में लीन होकर अपने द्वाज्शी
36:02व्रत के पारण की प्रतीक्षा कर रहे थे
36:05अचानक राजसभा के द्वार खुले और हाहाकार मचाते हुए महर्शी दुर्वासा ने महल के भीतर प्रवेश किया
36:13उनका शरीर भय से कांप रहा था और सांसे उखड रही थी
36:18महल के ठीक उपर आकाश में प्रल्यंकारी सुदर्शन चक्र आटिका
36:23जिसकी प्रचंड अगनी और तीवर्ता से संपूर्ण अयोध्या नगरी कांप उठी
36:29रिशी दुर्वासा ने बिना किसी संकोच के स्वयं को राजा अंबरीश के चर्णों में समर्पित कर दिया
36:35और अपने प्राणों की रक्षा के लिए हाहाकार करने लगे
36:39एक महान ब्रहमर्शी को अपने चर्णों में गिरा देख
36:43राजा अंबरीश का हृदय दलानी और करुणा से भर उठा
36:47और वे तुरंत उन्हें उठाने के लिए आगे बढ़े
36:52अश्रुपूर्ण नेत्रों से दुर्वासा मुनी ने कहा
36:54हे राजन
36:56मैंने अपनी विद्या और तपस्या के मद में आपका अपमान किया
37:00मुझे इस दैविय क्रोध से बचाए
37:04अंबरीश ने आकाश की ओर देखा
37:06जहां साक्षात यमराज की भांती सुदर्शन चक्र मुनी को भस्म करने के लिए आतुर होकर चमक रहा था
37:14राजा अंबरीश ने हाथ जोड कर अत्यंत विनमर्ता से भगवान विश्नु के परम अस्त्र सुदर्शन चक्र की स्तुती करना प्रारम्ध
37:22किया
37:24उन्होंने कहा है सुदर्शन
37:26आप साक्षात नारायन के तेज हैं
37:29आप संपून स्रिष्टी के रक्षक हैं और धर्म की मर्यादा बनाए रखने वाले हैं
37:35सुदर्शन चक्र मुनी के प्राण हरने को उद्यत था
37:39किन्तु राजा की प्रार्थना सुनकर उसकी विनाशकारी ज्वालाएं कुछ शान्थ होने लगी
37:46अंबरीश ने अपनी सत्यता की शपत लेते हुए कहा
37:49यदि मैंने मन, वचन और कर्म से कभी किसी का अहित न किया हो तो है चक्र दे
37:55आप शान्थ हो जाए
37:58राजा के निश्चल और परमत्यागी हृदय की पुकार सुनकर भगवान श्रीहरी का वह सुदर्शन अस्त्रपूरी तरह से शान्थ और शीतल
38:07हो गया
38:08भग्ती की इस पराकाश्ठा को देख कर सुदर्शन चक्र ने राजा अंबरीश को प्रणाम किया और धीरे धीरे आकाश में
38:16उपर की ओर बढ़ने लगा
38:19अंता वह दिव्य चक्र वैकुंठ लोग की ओर लोट गया जिससे संपूर्ण वातावर्ण में एक अपूर्व शान्ती और दिव्यता चा
38:27गई
38:28महर्शी दुर्वासा के नेत्रों से अश्रु बह रहे थे वे समझ गए कि भगवान के अनन्य भक्त की शक्ती किसी
38:35भी तपस्वी के तपोबल से कहीं अधिक श्रिष्ट है
38:40राजा अंबरीश ने तुरंत रिशी दुर्वासा को सम्मान पूर्वक आसन पर बिठाया और उनके लिए उत्तम जलत था भोजन की
38:48व्यवस्था करवाई
38:50मुने दुर्वासा ने बड़े प्रेम से वह भोजन ग्रहें किया क्योंकि वे एक वर्ष से अधिक समय से भूखप्यास से
38:57पीडित होकर भटक रहे थे
39:00भोजन के पश्चात त्रिप्थ होकर महर्शी दुर्वासा ने राजा अंबरीश को हृदय से आशिरवाद दिया और उनके धैर्य तथा परमक्षमाशील
39:09स्वभाव की प्रशंसा की
39:12इस प्रकार भक्ती की अगनिप्रीक्षा में राजा अंबरीश विजी हुए और देवगणों ने स्वर्ग से उन दोनों पर दिव्य पुश्पों
39:20की वर्षा की
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