वृत्रासुर वध के बाद इंद्र पर फिर मंडराया ब्रह्महत्या का साया! 🔥 स्वर्ग छोड़ भागने को मजबूर हुए देवराज। खाली सिंहासन पर कौन बैठेगा? जानिए कैसे एक धर्मात्मा राजा नहुष, इंद्र पद पाकर अहंकार में चूर हो गए और उन्होंने ऋषियों का अपमान किया। इंद्राणी के धैर्य और अगस्त्य मुनि के क्रोध ने कैसे नहुष को स्वर्ग से गिराकर सर्प बना दिया? इस एपिसोड में देखें सत्ता के मद और अहंकार का भयावह अंत, और देवलोक के अस्थिरता की अद्भुत कथा! #भागवतपुराण #नहुष #इंद्र #ब्रह्महत्या #अगस्त्यमुनि #देवलोक #कर्मफल #अहंकार #पौराणिककथा #श्रीमद्भागवतम्
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00:00देवलोक और दानवों के युद्ध भूमी में इंद्र और वृत्रासुर का महा संग्राम अपने चरम पर पहुँच चुका था, जहां
00:07वजर की प्रचंड उर्जा से पूरा वातावर्ण धर्रा रहा था।
00:12वृत्रासुर अपने विशालकाय शरीर और अजे शक्ती के साथ इंद्र के हर प्रहार को जहलते हुए भी अविचल खड़ा था,
00:20मानो वह अपने अंत को स्विकार कर चुका हो।
00:24अंतिम उर्जा बटोर कर इंद्र ने अपने वजर को ओम के दिव्य उच्चारण के साथ वृत्रासुर की ओर ऐसे फेंका,
00:32जैसे कोई ब्रहमांडिय बिजली आकाश चीर कर नीचे आई हो।
00:36वजर ने वृत्रासुर के विराट शरीर को भेद दिया, जिससे एक भयंकर गर्जना हुई और चारों और तीवर प्रकाश की
00:45एक लहर फैल गई, जिसने कुछ क्षणों के लिए युद्ध भूमी को अंधा कर दिया।
00:51वृत्रासुर का दानविय रूप कामपने लगा और धीरे-धीरे एक अध्भुत दिव्य जोती में परिवर्तित होने लगा, जो उसके भीतर
00:59से फूट रही थी, पीडा नहीं, बलकि परम शांती का प्रती, उसका विशालकाय शरीर धीरे-धीरे विलीन हो गया, और
01:08उसके स
01:09पर एक अत्यंत तेजस्वी, पवित्र जोती उपर की ओर उठने लगी, जो देवलोग को भी प्रकाशित कर रही थी, यह
01:18जोती सीधी बैकुंठ धाम की ओर प्रस्थान कर रही थी, मानो स्वया भगवान विश्नु उसे अपने पास बुला रहे हो,
01:26एक दुरलब और पवित
01:39पुली रह गई, उन्होंने दानव वित्रासुर के भीतर छिपे परम भक्त को पहचाना, जिसे माया के आवर्ण ने ढका हुआ
01:47था, और वे सभी नत्मस्तक हो गए, स्वर्ग के द्वारपालों ने इस अध्भुत जोती का स्वागत किया, जो सीधे बैकुंठ
01:56धाम में प्र
02:09जल्द ही उनके चहरे पर एक अजीब सा भय और भ्रम चाने लगा, जिस दानव का उन्होंने सहार किया था,
02:17वह न तो मरा था और नहीं पराजित हुआ था, बलकि उसने एक परमपत प्राप्त किया था, यह विचार इंद्र
02:24को विचलित कर रहा था, ततपश्चात एक सुक्
02:37पारण पाप नहीं था, जिस क्षण वृत्रासुर का दिव्यमोक्ष हुआ, उसी क्षण इंद्र के हृदय में ब्रहमहत्या का भय धर
02:46कर गया, एक असहनिय बोज उनके आत्मा परा पड़ा, युद्ध भूमी का वातावर्ण अचानक बदल गया, जहां पहले विजय का
02:55उल
03:01प्रित्वी पर वनस्पतिया मुर्जाने लगी, नदिया सूखने लगी और पवन में एक विलापसा घुल गया, प्रकृती भी इंद्र के पाप
03:09से त्रस्थ हो उठी, तभी आकाश में एक भयानक विकृत आकृती उभरने लगी, जो ब्रहमहत्या का साकार रूप थी, एक
03:19क
03:19पाली, धुएंदार, विशालकाय, प्रेतनी, जिसकी आखें अंगारों सी देहक रही थी, उसकी उपस्थिती से पूरा ब्रहमांड काप उठा, और वह
03:30सीधे इंद्र की ओर बढ़ने लगी, उसके हर कदम पर विनाश और भय की गूंश थी, इंद्र ने भय भीत
03:37होकर अपन
03:38दिव्य शक्ती का अनुभव किया, पर ब्रहमहत्या के सामने वह भी निर्बल प्रतीत हो रहे थे, उनके चहरे पर मृत्यु
03:45का आतंक छा गया।
04:08ते हुए चला आ रहा था। ब्रहमहत्या का भयानक चीतकार अंतरिक्ष में गूंज उठा, जो इंद्र के हृदय में गहरी
04:16जड़े जमाए बैठे डर को और भी तीवर कर रहा था।
04:38इंद्र कर रही थी जहां से इंद्र गुजरे थे। दर और थकान से चूर इंद्र एक गहरे घने जंगल में
04:46जाचिपे जहां सूर्य की किरने भी मुश्किल से पहुच पाती थी।
04:51जैसे ही इंद्र ने कुछ पल की राहत महसूस की, जंगल की शांती ब्रहमहत्या के आगमन से भंग हो गई।
04:59पाप की राक्षसी अपनी घेनित गंध से रास्ता सूंगते हुए, ठीक उसी दिशा में बढ़ती चली गई जहां इंद्र छिपे
05:07थे।
05:08इंद्र ने तब अपने दिव्य रूप को त्याग कर एक सुक्षम अद्रिश्य रूप धारन कर लिया, ताकि वह ब्रहमहत्या की
05:16पकड़ से बच सकें।
05:19ब्रहमहत्या कुछ क्षणों के लिए विचलित हुई, क्योंकि इंद्र का दैविय सार अब अद्रिश्य हो गया था, पर उसकी क्रूरता
05:26कम नहीं हुई।
05:28इंद्र ने एक अतिसुक्षम कमल के तने के अंदर प्रवेश कर लिया, जहां वह अपनी अंतिम आशा के रूप में
05:35छिपे रहे।
05:37बाहर ब्रहमहत्या की भयावः शक्ती पूरे वातावर्ण में फैल गई, हर पत्ते और हर पानी की बूंद में इंद्र को
05:45खोजने का प्रयास कर रही थी।
05:48कमल के तने के भीतर छिपे इंद्र का हरिदय भय से काम प्रहा था, यह जानते हुए कि पाप अभी
05:54भी उसके पीछे पड़ा है।
05:58देवलोग के अन्य देवतागन इंद्र के इस दुरगम भाग्य को देख कर भय और चिंता से स्तब्ध रह गए।
06:05इंद्र की पहले की महिमा धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही थी, ब्रहमहत्या के पाप का बोज उनके दिव्यतेज को क्षीन
06:13कर रहा था।
06:16ब्रहमहत्या ने अंत्य कमल के उस पवित्र सरोवर को घेर लिया, जहां इंद्र छिपने का व्यर्थ प्रयास कर रहे थे।
06:24उसकी उपस्थिती से पानी उबलने लगा और हवा में भयावा सन्नाट आचा गया, जैसे की प्रकृती भी उसके आतंक से
06:32काप रही हो।
06:34इंद्रक तने के रेशो में सिंटे हुए, महसूस कर रहे थे कि हर पल उनके अस्तित्व की सीमा तूट रही
06:40है।
06:43ब्रहमहत्या ने सरोवर में अपना हाथ बढ़ाया, उसकी हर उंगली एक भयानक नागिन की तरहे कमल के तने की ओर
06:50बढ़ रही थी।
06:52परमेश्वर की क्रिपा से कमल का तना अद्भुत रूप से मजबूत बना रहा, ब्रहमहत्या उसे भेदने में असमर्थ थी।
07:01ब्रहमहत्या का क्रोध बढ़ता गया, वह कमल के चारों और मंदराती रही, उसके भयानक इरादे अभी भी इंद्र का पीछा
07:09कर रहे थे।
07:10विवश होकर ब्रहमहत्या एक भयानक काली छाया बनकर मानसरोवर के तटपर प्रतीक्षा करने लगी, जबकी कमल का तना अभेद्य बना
07:20रहा।
07:20सुक्ष्म रूप धारण कर कमल के पतले डंठल के भीतर छिपे देवराज इंद्र अत्यंत भयभीत होकर अश्रु बहाते हुए श्रीहरी
07:29के चर्णों का ध्यान करने लगे।
07:31ब्रह महत्या के असीम पाप के ताप से मुक्ती पाने के लिए इंद्र उस एकांत जल जन्तुमय तने के भीतर
07:39निरंतर नारायन का नाम जबते रहे।
07:43देखते ही देखते एक हजार दिव्य वर्ष बीत गए। किन्तु देवराज इंद्र उस जल प्रपात और कमल की ओट में
07:50सर्वता निश्प्रिय होकर छिपे रहे।
07:53उधर राजा के बिना संपून स्वर्गलोक दिशाहीन हो गया और अमरावती की दिव्य आभा धीरे-धीरे मलिन पढ़ने लगी।
08:02इंद्र के नेत्रित्व के अभाव में प्रकृती का संतुलन बिगड़ने लगा, वर्षा रुप गई और तीनों लोकों में प्रचन सुखाड
08:10चाने लगा।
08:11यग्यकुंडों की पवित्र अगनी बुझने लगी और देवताओं तक हविश्य न पहुचने से उनकी दिव्य शक्तियां क्षीन होने लगी।
08:20स्वर्ग को दुर्बल और राजाविहीन पाकर पाताल से दैट्य सेनाएं पुन संगठित होकर अमरावती की सीमाओ पर मंडराने लगी।
08:30अमरावती के विशाल राजसभा भवन में एकत्रित होकर सभी देवगन अत्यधिक व्याकुलता के साथ खाली सिनहासन को ताकने लगे।
08:40देवरागी शची अपने पती इंद्र के विरह में व्याकुल होकर स्वर्ण भवन में अकेली बैठी अश्रुपूर्ण नेत्रों से प्रार्थना कर
08:48रही थी।
08:49उसी संकट के समय ब्रहमर्शी नारद अपनी महती वीना बजाते हुए देवसभा में पधारे और उदास देवताओं को शांत किया।
09:00नारद जी ने देवताओं को सूचित किया कि इंद्र मानसरोवर के कमल नाल में सुरक्षित हैं, किन्तु ब्रहमहत्या का प्रायश्चित
09:08कर रहे हैं।
09:10तब देवगुरु ब्रहस्पती और ब्रहमा जी ने विचार विमर्श करके निर्णय लिया कि जब तक इंद्र नहीं लोटते, स्वर्ग को
09:18एक नए धर्मनिष्ठ राजा की आवश्च्चता है।
09:22पितामा ब्रहमा ने चेतावनी दी की यदी स्वर्ग का सिनहासन अधिक समय तक खाली रहा, तो अधर्म का सामराज्य सर्वत्र
09:30फैल जाएगा।
09:32महर्शियों ने प्रित्वी लोग पर अपनी द्रिष्टी डाली और सो अश्वमेध यग्य करने वाले सर्वगुन संपन्न राजा नहुष को चुना।
09:41राजा नहुष एक परम्न्यायप्रिय और पुन्यात्मा समराट थे, जिनके तपोबल और धर्म प्रायंता से तीनों लोग प्रभावित थे।
09:51महर्शिगन प्रित्वी पर उत्रे और राजा नहुष के समक्ष स्वर्ग का कार्यभार संभालने तथा इंद्रपद स्विकार करने का प्रस्ताव रखा।
10:01नहुष ने विनमरता पूर्वक कहा कि वह एक साधारन मनुष्य हैं और देवराज का पद संभालने के योग्य स्वयन को
10:09नहीं मानते।
10:10रिशियों ने अपने तपोबल से नहुष को देवताओं का तेज और अधिकार प्रदान किया जिससे वह स्वर्ग के नए राजा
10:18के रूप में स्वीक्रित हुए।
10:21अत्यंत वैभव और तड़क भड़क के साथ नहुष स्वर्ग लोक में प्रविष्ठ हुए और इंद्र के सिनहासन पर बैठे जहां
10:28से उनके अहंकार का बीजारोपन हुआ।
10:32नहुष ने इंद्र के वैभवशाली सिनहासन पर बैठ कर स्वयं को तीनों लोकों का स्वामी समझा और उनके मन में
10:39मत का विश्ध धीरे-धीरे फैलने लगा, जिससे देवलोक का दिव्य संतुलन डग्मगाने लगा।
10:46स्वर्ग के नवधिप्ती नहुष का अहंकार प्रति दिन बढ़ता गया, जिससे वह इंद्रपुरी के एश्वर्य और अधिकारों का अनियंत्रित उपभोग
10:55करने लगे, अन्देखी करते हुए उन कर्तव्यों की जो एक देवराज को निभाने होते हैं।
11:01नहुष के मदोनमत्त व्यवहार के कारण यग्य और अनुष्ठान स्वर्गलोक तथा प्रित्वी लोक में धीरे-धीरे बाधित होने लगे, जिससे
11:10देवताओं को मिलने वाली शक्तीक्षी होने लगी।
11:15देवतागन, इंद्र की अनुपस्थिती और नहुष की उदासीन्ता से शक्तिहीन महसूस करते हुए अपने दिव्यतेज को खोने लगे, जिससे तीनों
11:24लोकों में उनकी सुरक्षात्मक आभा कमजोर पढ़ने लगी।
11:29असुरों ने देवलोग की इस बिगर्ती स्थिती और देवताओं की घट्ती शक्ती को भांप लिया और उनकी पुरानी शत्रुता की
11:37ज्वाला पुन्ह धधक उठी।
11:58जहां देवताओं का प्रभाव कमजोर पढ़ गया था, जिससे मनुष्यों में भय और अराजक्ता फैलने लगी।
12:06स्वर्गलोग की सीमाई भी असुरों के छोटे-छोटे हमलों से असुरक्षित होने लगी, जिससे देवगणों में चिंता और भय व्याप्थ
12:13हो गया जो पहले कभी नहीं देखा गया था।
12:17नहुष अपने भोग विलास में डूबे, इन बढ़ते संकटों की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे, बलकि वे देवराज के
12:25पद को अपनी व्यक्तिगत सुख सुविधाओं का साधन मानते थे।
12:30तीनों लोकों में हाहाकार मचने लगा, पृत्वी पर धर्म का हरास हुआ, पाताल में असुरों का उत्पात बढ़ा, और स्वर्ग
12:38में देवगणों का मनोबल गिरने लगा।
12:41देवताओं की शक्ती के क्षीन होने से रिश्मुनी भी अपनी तपस्या में बाधाएं महसूस करने लगे, जिससे उनके आश्रमों में
12:49अशान्ती फैल गई।
12:51देवर्शी नारद तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए, इस बढ़ती अराजकता और नहुष के पतनशील शासन को देख अत्यंत चिन्तित
13:00हुए।
13:01स्वर्गलोक में देवगणों ने एक गोपनिय सभा बुलाई, जहां उन्होंने नहुष के अहंकार और असुरों के बढ़ते आतंक पर गंभीर
13:10चर्चा की।
13:12कुछ प्रमुख रिशियों ने भी स्वर्गलोक पहुँचकर देवगणों को सलाह दी की इस गंभीर संकट का समाधान केवल परमपिता ब्रहमा
13:20ही कर सकते हैं।
13:23देवराज नहुष की बढ़ती मनमानी और तीनों लोकों में फैल रही अव्यवस्था के कारण स्वर्गलोक के राजसी द्वार पर भी
13:31असुरों के साय मंडराने लगे थे।
13:34अंतह सभी देवगण और रिशिमुनी एक जुठ होकर इस विकट परिस्थिती से उबरने और तीनों लोकों में शान्ती बहाल करने
13:42के लिए ब्रहमा लोक की ओर प्रस्थान करने का निर्णय लिया।
13:47ब्रहमा लोक की यात्रा पर निकले देवगणों और रिशियों के हृदय में एक नई आशा जागरित होई की स्रष्टा ब्रहमा
13:54ही इस वैश्विक अव्यवस्था का अंत कर सकते हैं।
13:59वे दिव्य मार्ग से होते हुए ब्रहमा लोक के भव्य प्रवेश द्वार की ओर बढ़े जहां से स्रिष्ट करता ब्रहमा
14:06का वास था, जिसकी आभा से पूरा ब्रहमांड प्रकाशित होता था।
14:11ब्रहमा लोक पहुँचकर देवगणों और रिशियों ने अत्यंत श्रद्धा और विनय के साथ प्रजापती ब्रहमा के दिव्य दर्शन किये।
14:21देवगणों ने विनमरता पूर्वक तीनों लोकों की दैनिय स्थिती, नहुष के अहंकार और असुरों के बढ़ते उत्पात का वर्णन करते
14:29हुए ब्रहमा जी से सहायता की याचना की।
14:33देवगणों की करोन पुकार सुनकर, स्रिष्टी के आदिपिता, चतुर मुखी ब्रहमा ने गहन चिन्ता से उतप्रोथ होकर अपने दिव्य नेत्र
14:42खोले और ब्रहमांड के हर कन को स्पर्श करने वाली अपनी सरवग्य द्रिष्टी से स्थिती का आतलन किया।
14:48ब्रहमा जी ने अत्यंत धैर्य पूर्वक देवगणों को संबोधित करते हुए समझाया कि वृत्रासुर का वध करने की शक्ती केवल
14:57इंद्र में ही है, किन्तु ब्रहमहत्या के पाप के कारण इंद्र अद्रिष्य हो गए हैं।
15:03तब उन्होंने एक अध्भुत समाधान प्रस्तुत किया, प्रित्वी लोक के एक धर्मात्मा और पराक्रमी राजा नहुष को अस्थाई रूप से
15:12स्वर्ग का अधिपती बनाना, ताकि देवलोक में फिर से व्यवस्था स्थापित हो सके।
15:19ब्रहमा जी के वचनों को सुनकर, देवगणों के चहरों पर आशा की एक नई किरन जगमगा उठी, क्योंकि उन्हें इस
15:26विकट परिस्थिती से निकलने का मार्ग मिल गया था।
15:30ब्रहमा जी की आग्या पाकर सभी देवगण और रिशिगण नवजीवन की आशालिये प्रित्वी लोग की ओर प्रस्थान करने लगे, जहां
15:40राजा नहुष अपने राज्य का संचालन कर रहे थे।
15:44देव लोग से प्रित्वी लोग तक की उनकी यात्रा स्वर्णिम आभासे प्रकाशित मार्ग पर त्वरित गती से संपन हुई, जैसे
15:52स्वयंकाल भी उनकी सहायता कर रहा हो।
15:56वे अंत्व प्रित्वी पर उतर आये और राजा नहुष के भव्य सामराज्य में प्रवेश किया, जहां नहुष अपनी प्रजा के
16:03कल्यान के लिए न्याय और धर्म का पालन करते हुए शासन कर रहे थे।
16:09देवगणों ने राजा नहुष को उनके राज महल में पाया, जहां वे अपने मंत्रियों और दर्बारियों से घिरे हुए, प्रजा
16:16हितैशी निर्नय ले रहे थे। उनकी आभा एक पराक्रमी राजा के समान थी।
16:23देवताओं ने अपनी दिव्य उपस्थिती से वातावर्ण को पवित्र करते हुए राजा नहुष को इंद्र के पद की पेशकश की,
16:30जो उनके असाधारन पराक्रम और धर्म प्रायंता का प्रतीक था।
16:36नहुष देवगणों की अप्रत्याशित उपस्थिती और देवराज इंद्र के पद की पेशकश से क्षन भर के लिए विस्मय में डूब
16:43गए, फिर उन्होंने विन्मरता पूर्वक अपनी सहमती दी, उनके मन में देवताओं की सेवा का भाव जागरित हुआ।
16:51देवगण नहुष की स्वीकृती से प्रसन्न होकर उन्हें स्वर्गलोक ले जाने के लिए तैयार हुए जहां उनका राज्याभिशेक होना था।
17:01एक भव्य दिव्यरत अपनी स्वर्णेम आभा से आकाश को प्रकाशित करता हुआ। नहुष को लेकर स्वर्गलोक की ओर अग्रसर हुआ।
17:10जहां देवताओं का निवास था।
17:13स्वर्ग के भव्य इंद्रलोक में पहुँच कर नहुष का राज्याभिशेक एक अविस्मनिय समारोह के साथ संपन हुआ। जहां देवगणों और
17:21रिशियों ने उन्हें इंद्र के आसन पर प्रतिष्ठित किया।
17:25अब स्वर्ग का नया अधिपती नहुष था, जिसने अपने पराक्रम और धर्म से इंद्र के सिंधासन को सुशोभित किया, जिससे
17:34देवलोक में फिर से व्यवस्था और शांती का आगमन हुआ।
17:38शुरुआत में नहुष ने अपनी विनमरता और न्याय प्रियता से सभी देवों और रिशियों का मन मोह लिया और स्वर्ग
17:46में एक सुखद और स्थिर वातावर्ण स्थापित किया।
17:49किन्तु इंद्र के अतुल्य वैभव और शक्ती ने धीरे-धीरे नहुष के मन में अहंकार के बीज बोने शुरू कर
17:57दिये और उसकी मानविय विनमरता क्षीन होने लगी।
18:20जिससे देवगणों और रिशियों में हलकी चिन्ता उत्पन्न होने लगी।
18:49कोने को आतुर था।
18:51स्वर्ग के प्रत्येक कोने से अब नहुष के आदेश गूंजते थे।
18:56जिनमें सत्ता की मादक्ता और घमंड का स्पष्ट संकेत था।
19:13कि वह भूल गया कि यह पद केवल एक अस्थाई न्यास था, जिसका वह क्षन भर का स्वामी था।
19:20उसका व्यवहार अब केवल आदेश देने वाला नहीं रहा, बलकि वह देवसभा में भी देवताओं को तुछ समझने लगा और
19:28उनकी राय को निरादर से खारिस करने लगा।
19:32स्वर्ग की पवित्र परंपराओं और विधानों को वह अपनी नवधिग्रहीत शक्ती के सामने गौन समझने लगा, मानो नियम केवल सामान्य
19:41मोर्टल्स के लिए हो, उसके लिए नहीं।
19:44उसके दर्बार में चापलूसों की संख्या बढ़ने लगी, जो उसके हर अन्याय पूर्ण निर्णय की सराहना करते और उसके अहंकार
19:53को और हवा देते रहते थे।
19:56महान रिशिमुनी जो पहले स्वर्ग में सम्मान पाते थे, अब नहुष की बदलती प्रवृत्ती को देखकर अपनी भविश्यवानियों और चेतावनियों
20:05में और अधिक मुखर होने लगे।
20:08नहुष ने स्वर्ग के वैभव का प्रदर्शन करने के लिए अभूत्पूर्व उत्सवों और भोजों का आयोजन किया, जहां देवगणों से
20:16भी अधिक सम्मान उसके व्यक्तिगत सेवकों को दिया जाने लगा।
20:20कभी कभी वह बिना किसी कारण के छोटी छोटी बातों पर देवगणों को अपमानित करने से भी नहीं हिचकता था,
20:30जिससे स्वर्ग का सामन जस्य बिगड़ने लगा।
20:33कुछ देवताओं ने नहुष को नमरता पूर्वक सलाह देने का प्रयास किया, लेकिन उनका प्रयास आग मेगी डालने जैसा साबित
20:41हुआ और नहुष का क्रोध और बढ़ गया।
20:45स्वर्ग के वातावर्ण में अब देवत्व की दिव्य आभा के स्थान पर एक प्रकार का तनाव और भय चाने लगा
20:52था, जो नहुष के हंकारी शासन की देन थी।
20:56एक दिन नहुष ने अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए एक यग्य का आयोजन करने का आदेश दिया, जिसमें रिशियों
21:04को भी अपनी शर्तों पर शामिल होने को कहा गया।
21:07इस अनुचित मांग से कई महान रिशियों को आगहात लगा, जिन्होंने हमेशा अपने सम्मान और स्वतंत्रता को सर्वोच रखा था।
21:18स्वर्ग में नहुष के ऐसे दुरागरह बढ़ते गए और वह अब सार्वजनिक रूप से रिशियों और ब्रहम ज्यानियों का भी
21:25उपहास करने लगा, उन्हें अपनी शक्ती के सामने तुछ बताता।
21:30एक बार एक युवारिशी जो अपनी तपस्या के लिए प्रसिध था, नहुष के दरबार में आया और उसे विनमरता पूर्वक
21:38अपने कर्तवियों की याद दिलाई, परन्तु नहुष ने उसका मजाक उड़ाया।
21:44यह घटना स्वर्ग में एक चर्चा का विशय बन गई और देवताओं के बीच यह डर बढ़ने लगा कि नहुष
21:51की निरंकुष्टा अंतह उनके लिए विनाशकारी होगी।
21:55नहुष की आग्या थी कि सभी रिशिमुनी चाहे वे कितने भी महान क्यों नहों, उसके समक्ष दंडवत प्रणाम करें, जो
22:03उनकी तपस्या और ज्ञान का सरासर अपमान था।
22:07उसके नए नियम के अनुसार स्वर्ग के सबसे व्रिद्ध और सम्मानित रिशियों को भी अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता
22:15और उसके दरबार में प्रवेश के लिए अनुमती लेनी पड़ती थी।
22:20नहुष ने रिशियों को यह उपदेश देना भी शुरू कर दिया कि उनकी तपस्या और ज्ञान उसके इंद्रपत की शक्ती
22:27के समक्ष कुछ भी नहीं है।
22:30इस अपमानजनक व्यवहार ने रिशिग्नों के धैर्य की सीमा पार कर दी और उनके मन में अब नहुष के प्रती
22:37क्रोध की अगनी प्रजवलित होने लगी।
22:40आमकार के शिखर पर बैठा नहुष यह भूल गया था कि रिशिमुनियों का अपमान करना स्वय अपने विनाश को निमंतरन
22:48देना है एक ऐसी भूल जिसकी कीमत उसे शीघर ही चुकानी पड़ेगी।
22:54स्वर्ग के ऐश्वर्य और इंद्रपद के मद में चूर नहुष की आखें अब देवराज इंद्र की अनुपस्थित रानी शची पर
23:02जाटी की।
23:04अपने पती इंद्र के वियोग में उदास शची, स्वर्ग के सुखैश्वर्य के बीच भी अकेली और विमंस्क बैठी थी।
23:12इंद्रपद के मद में मधोश नहुष ने अपनी कामुक इच्छा को पूर्ण करने के लिए देवदूतों द्वारा शची को अपने
23:20पास आने का आदेश भेजा।
23:22यह अपमानजनक संदेश सुनकर शची का हरिदय भाय और क्रोध से काम उठा और उनकी आखों से अशुरुधारा बह निकली।
23:32नहुष की इस दुस्साहस्पूर्ण मान को ठुकराते हुए शची ने तुरंत इस विकट स्थिती का समाधान खोजने का निश्चय किया।
23:53देवगुरु ब्रहस्पती का आश्रम एक शांत और पवित्रस्थान था, जहां ज्यान और तपस्या का दिव्य प्रकाश सदा व्याप्त रहता था।
24:02फ्रिदय में पीडा लिये शची, नमरता पूर्वक देवगुरु ब्रहस्पती के सम्मुक हुपस्थित हुई, जिनकी आभा ज्यान और करुणा से दीप्त
24:11थी।
24:12अपनी दिव्य द्रिष्टी से देवगुरु ब्रहस्पती ने शची के आगमन के पीछे के गहन कष्ट और असुरक्षा को तुरंत भांप
24:20लिया।
24:22अश्रुपूर्ण नेत्रों से शची ने देवगुरु को नहुष के अहंकार, उसकी कामुक इच्छा और अपने उपर मंदरा रहे भयानक खत्रे
24:30की पूरी कहानी सुनाई।
24:32नहुष की नीच्टा सुनकर देवगुरु ब्रहस्पती का शांत मुखमंडल क्षन भर के लिए क्रोध से लाल हो उठा, क्योंकि यह
24:40अधर्म की पराकाश था थी।
24:43अपनी प्रिय शिश्या को आश्वस्थ करते हुए, देवगुरु ने शची को अपनी सुरक्षा का बचन दिया और किसी भी कीमत
24:51पर उन्हें नहुष के पाप्पूर्ण चंगुल से बचाने का संकल्प लिया।
24:56नहुष के बढ़ते अहंकार को रोकने और शची की रक्षा के लिए देवगुरु ब्रिहस्पती ने अपनी गहन बुद्धी से एक
25:03चतुर योजना पर विचार करना आरंभ किया।
25:07उन्होंने शची को सलाह दी की वह नहुष के सामने कुछ शर्ते रखे जिससे उसे समय मिल सके और उसके
25:14अहंकार को और भी बढ़ने का अफसर मिले।
25:18गुरु ब्रिहस्पती के निर्देशों का पालन करते हुए शची द्रिड़ता के साथ स्वर्गलोक लोट आई, उनके मन में अब आशा
25:26और गुरु के दिखाए मार्ग का अवलंब था।
25:30अपनी इच्छा की पूर्ती में विलंब होता देख, अहंकारी नहुष का धैर्य जवाब देने लगा और वह शची को फिर
25:37से बुलाने की तयारी में था।
25:40शची ने साहस बटोर कर नहुष के समक्ष यह शर्त रखी कि वह उसे तभी स्विकार करेंगी जब वह रिशियों
25:47द्वारा खींची गई पालकी में बैठ कर उसके पास आएगा।
25:52नहुष ने शची की इस अजीबो ग्रीब शर्त को अपने अहंकार की एक और विजय मान कर तुरंट स्विकार कर
25:59लिया। यह सोचे बिना की यह उसके विनाश का मार्ग है।
26:04अपनी अहंकारी मान को पूरा करने के लिए नहुष ने ततकाल समस्त रिशिमुनियों को अपनी पालकी ढोने का आदेश दिया,
26:12जो उनके लिए घोर अपमान था।
26:15नहुष के इस घोर अपमान जनक आदेश ने रिशिगनों के हृदय में प्रतिशोध की अगनी को और भी अधिक प्रजवलित
26:22कर दिया, पर वे ततकालिक रूप से विवश थे।
26:26विवश रिशिमुनियों ने अपने अपमान को हृदय में दबा कर स्वर्णिम पालकी को ढोने की तयारी की, उनका प्रत्येक अंग
26:34इस अपवित्र कार्य से काप रहा था।
26:37स्वर्ग के नवशासक नहुष अपने माथे पर अहमकारी विजय का मुकुट धारन किये, तिरसकार भरी द्रिश्टी से उन पूजनिय रिशियों
26:46की ओर बढ़ते हुए, मंद मंद मुस्कुरा रहा था।
26:50आंकार से फूला नहुष स्वर्णिम पालकी मेजा बैठा, उसका राजसी आसन और भी उचा लगने लगा, मानो वह स्वर्ग से
26:58भी उपर उठ गया हो।
27:00तब व्रिधावस्था के बोज तले जुके और अपमान से पीडित रिशिग्नों ने अनिक्छा से उस भारी पालकी को अपने कंधों
27:09पर उठाया, उनके चहरों पर क्रोध और पीडा का मिश्रण था।
27:14पालकी रिशियों के बोजिल और अपमानित कदमों के साथ अत्यंत धीमी गती से आगे बढ़ रही थी, प्रत्येक पग में
27:22युगों का आक्रोश समाया हुआ था।
27:25नहुष का धैर्य जवाब देने लगा, उसकी अहमकारी आखों में अधीर्ता और क्रोध की ज्वाला धधकने लगी, क्योंकि उसे इतनी
27:33धीमी गती स्वीकार नहीं थी।
27:36उसने क्रोध में भर कर अपनी राजसी मुद्रा त्याग कर पालकी में बेचैनी से हिलते हुए उन पूज रिशियों को
27:44अधिक तेजी से चलने का आदेश दिया।
28:06उनके हृदय में अपमान की अगनी भीशन रूप से जल उठी यह शब्द असहनिय थे।
28:13नहुष के इन ध्रेनित शब्दों ने विशी अगस्त्य के दिव्यतप और सहन शीलता की सभी सीमाओं को तोर दिया। उनकी
28:20आभा क्रोध से प्रजवलित हो उठी।
28:23शन भर के लिए अगस्त्य मुनी ने पालकी को अचानक रोक दिया। जिससे वह जटके से हिल गई और नहुष
28:31का आसन डग्मदा गया।
28:33क्रोध से लाल आखों और कमपित होठों के साथ अगस्त्य मुनी ने अपना सिर घुमा कर अहमकारी नहुष की ओर
28:41देखा उनके चहरे पर तपस्या का तेज और न्याय का संकल्प था।
28:45उनकी गर्जना स्वर्ग में गूंज उठी ओ अहंकारी नराधम। तेरी मूर्खता ने सभी सीमाए लांग दी है।
28:54तुमने रिशियों का अपमान किया है।
29:24अलकाय और घिनोने सर्प में परिवर्तित हो गया, जिसका दर्शन मात्र भय उत्पन करता था।
29:31शापित नहुष अब एक विशाल सर्प के रूप में लडखडाती पालकी से धड़ाम से नीचे गिरा और स्वर्ग लोग की
29:39पवित्र भूमी पर पटक दिया गया।
29:42संपूर्ण देवलोग थर्रा उठा, जैसे ही अभिशप्त नहुष धर्ती की ओर गिरने लगा, उसका भयावह पतन स्वर्ग की शांती भं
29:51कर रहा था।
29:53रिशिगन और अन्यदेवगन आतंक और विस्मय से भरे हुए नहुष के उस भयानक पतन को देखते रहे, जो उनके सामने
30:01घटित हो रहा था।
30:03दूर से इंद्र की पतनी शची ने नहुष के इस पतन को देखा, उसके हृदय में वर्षों की पीडा के
30:10बाद एक आशा की किरन जागी न्याय की विजय हुई थी।
30:15संपूर्ण देवलोग थर्रा उठा, जैसे ही अभिशप्त नहुष धर्ती की ओर गिरने लगा, उसका भयावः पतन स्वर्ग की शांती भं
30:23कर रहा था।
30:25रिशिगन और अन्यदेवगन आतंक और विस्मय से भरे हुए नहुष के उस भयानक पतन को देखते रहे, जो उनके सामने
30:34घटित हो रहा था।
30:36दूर से इंद्र की पतनी शची ने नहुष के इस पतन को देखा, उसके हृदय में वर्षों की पीडा के
30:43बाद एक आशा की किरन जागी न्याय की विजय हुई थी।
30:47जैसे जैसे नहुष नीचे गिर रहा था, उसके भीतर एक असहय पीडा और तीवर रुपांतरण की प्रक्रिया आरंभ हो रही
30:56थी।
30:57इस कष्ट दायक्षन में उसे अपनी उद्दंडता और इंद्रानी शची के समक्ष की गई शर्थ की याद सताने लगी, जिसने
31:05उसके भाग्य को इस भयानक पतन की ओर मोरा था।
31:10शची ने सपश्ट कर दिया था कि वह केवल उसी को पती रूप में स्विकार करेगी जो बड़ेबडे रिशियों से
31:17पाल की उठवा कर अपनी सर्वोच सत्ता सिद्ध करेगा।
31:21आंकार में अंधे नहुष ने तुरंत इस अपमानजनक शर्थ को स्विकार कर लिया, यह जानते हुए भी कि यह रिशिगनों
31:29का घोर अपमान होगा।
31:31अपनी सत्ता के मद में चूर होकर उसने आदेश दिया कि सबतर्शियों सहित समस्त रिवियर्ड रिशिगन उसकी पाल की उठाएंगे।
31:40स्वर्ग के मारगों पर बड़े-बड़े रिशियों द्वारा उठाई गई अपनी भव्य पाल की में बैठकर नहुष का अहंकार अपनी
31:48चरम सीमा पर था।
31:50पाल की की धीमी गती से अधीर होकर उसने रिशियों को तेज चलने का आदेश दिया। उसकी आखों में घोर
31:58अवमानना जहलक रही थी।
32:00अपने चरम अहंकार में उसने अगस्त्य मुनी को अपने पैर से धक्का दिया। चिलाते हुए सर्प।
32:08सर्प उन्हें और अधिक गती से चलने को कहा। अगस्त्य मुनी का शांत तपस्वी मुखमंडल क्षन भर में क्रोध की
32:16ज्वाला से प्रदीप्थ हो उठा। उनकी आखें ब्रहमांडी अगनी के समान जलने लगी।
32:23सब्तर्शियों में सर्वश्रिष्ट अगस्त्य मुनी ने नहुष को तुरंत श्राप दिया। तुने मेरा अपमान किया और मुझे सर्प कहा। तो
32:31जा तुही सर्प बन जा।
32:34श्राप के प्रभाव से नहुष का राजसी शरीर ततकाल विक्रित होने लगा। दिव्य आभूशन तूटकर बिखर गए और त्वचा पर
32:42शल्क उभरने लगे।
32:44उसके सुंदर मानव रूप ने एक विशाल भयानक सर्प के रूप में बदलना शुरू कर दिया, जो स्वर्प के मारगों
32:52पर दर्द से छटपटा रहा था।
32:55जैसे ही उसका परिवर्तन पूर्ण हुआ, पालकी से गिरकर वह एक विशाल सर्प के रूप में आकाश से धर्ती की
33:02ओर गिरने लगा।
33:03स्वर्गलोक में उपस्थित सभी देवगण और रिशिगण आतंकित होकर इस भयावध रिश्य के साक्षी बने, जो अहंकार के विनाशकारी परिणाम
33:14को दर्शाता था।
33:15नीचे गिरते हुए नहुष को अपने द्वारा किये गए पापों का पश्चाताप होने लगा, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी
33:24थी।
33:25अंतर विशालकाय सर्प नहुष तीवर गती से गिरते हुए पृत्वी के घने वनमे जागिरा, जहां वह अपने श्राप के साथ
33:33रहने को अभिशप्त था।
33:36स्वर्ग का सिनहासन अब खाली हो गया था, और नहुष एक शक्तिशाली राजा से एक शापित सर्प में परिवर्तित होकर,
33:44अपने अहमकार का दंड भोगने के लिए धर्ती पर पड़ा था।
33:49पतन के आघात और अपने शापित रूप को देखकर, नहुष का मन गलानी और पश्चाताप की अगनी में जल उठा,
33:57जब उसे अपने स्वर्णिन अतीत और वर्तमान की दैनिय स्थिती का बोध हुआ।
34:03स्वर्ग का सिनहासन अब खाली था, उसकी चमक फीकी पड़ गई थी, मानो उसने अपने पूर्व राजा के अहंकार की
34:10भयावः गूंच को आत्मसात कर लिया हो।
34:14समस्त देवलोक में एक गहन सननाट आचा गया था, नहुष के पतन ने देवों के मन में भय और अनिश्चित्ता
34:21का एक नया अध्याय खोल दिया था।
34:24देवगन चिंतित मुद्रा में एकत्र हुए, उनके मुख पर भय और भविश्य की आशंकाओं की गहरी छाया स्पष्ट रूप से
34:32अनकित थी।
34:34रिशिमुनी और देवगन स्वर्ग के भविश्य पर विचार विमर्ष करने के लिए एक महत्वपूर्ण सभा में एक जुठ हुए, जहां
34:42गंभीर चिंतन की ध्वनी गूंज रही थी।
34:46देवों के गुरु ब्रहस्पती ने गंभीर स्वर्ग में धर्म की स्थापना और स्वर्ग के लिए एक न्यायपूर्ण शासक की परम
34:54आवश्शक्ता पर बल दिया।
34:56अन्य देवों ने एक शक्तिशाली इंद्र के अभाव में असुरों की बढ़ती शक्ती और देवलोक में अराजक्ता फैलने की आशंका
35:04व्यक्त की।
35:06समस्थ देवगणों ने सर्वसम्मती से इस गंभीर संकट का समाधान खोजने के लिए सर्वोच दिव्य मार्गदर्शन प्राप्त करने का निर्णै
35:15लिया।
35:16सभी देवगण और विशिगण मार्गदर्शन हेतू सृष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा की शरण में उनकी दिव्य लोक ब्रहमलोक की ओर
35:25प्रस्थान करते हैं।
35:27स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रह्मा अपने दिव्य कमल सिनहासन पर विराजमान थे उनके मुख पर असीम शांती और ज्यान की
35:36आभा चमक रही थी
35:39ब्रह्मा जी ने देवों की व्यथा को शांतचित्थ होकर सुना और अपने दिव्य ज्यान से उन्हें उनकी दैनिय स्थिती का
35:46कारण बताया
35:48उन्होंने समझाया कि नहुष का भाग्य उसके अपने अहंकार और कर्मों का ही परिणाम था जो दैविय न्याय के चक्र
35:56का अटूठ हिस्सा है
35:58ब्रहमाजी ने देवों को आगे का मार्क सुझाया इंद्र की शुद्धी और देवलोग के लिए एक स्थिर समाधान की ओर
36:06इशारा करते हुए
36:08देवों ने इंद्र पर लगे ब्रहमहत्या के पाप और उनके छिपे हुए वर्तमान स्थान के बारे में अपनी गहरी चिंता
36:16व्यक्त की
36:17ब्रहमाजी ने स्पष्ट किया कि इंद्र अभी भी अपने ब्रहमहत्या के पाप का प्रायश्चित कर रहे हैं और उनकी शुद्धी
36:25अनिवार्य है
36:27उन्होंने देवों को इंद्र के पाप के शमन और उनकी वापसी के लिए विशिष्ट यग्य और अनुष्ठान करने का निर्देश
36:35दिया
36:36आशावान किंतु गंभीर मन से देवों और रिशियों ने ब्रहमाजी द्वारा सुझाए गए पवित्र अनुष्ठानों की तैयारी आरंभ कर दी
36:46असंख्य रिशी और देवगण एक भव्य यग्यशाला में एकत्र हुए जहां वे इंद्र की शुद्धी के लिए शक्तिशाली वैदिक मंत्रों
36:54का उच्चारण कर रहे थे
36:57यग्य की पवित्र अगनी तीवर ज्वालाओं के साथ प्रजवलित हुई उसकी दिव्य उर्जा देवलोग के वातावर्ण को शुद्ध करती हुई
37:05इंद्र के प्रायश्चित का आरंभ संकेत दे रही थी
37:09यग्य की पूर्णा हुती हुई देवों के मुख पर आशा की नई किरन चमक रही थी क्योंकि इंद्र की वापसी
37:17का मार्ट अब स्पष्ठ होने लगा था
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