महाराजा पृथु के वंशज दक्ष प्रजापति की साठ कन्याओं में सबसे विलक्षण थीं सती। इस अद्भुत एपिसोड में हम देखेंगे कि कैसे दक्ष के घोर विरोध के बावजूद, सती ने अपनी अटूट भक्ति और तपस्या से महादेव को पति रूप में प्राप्त किया। शिव-सती के दिव्य विवाह से लेकर दक्ष के मन में पनपते अहंकार और महादेव के प्रति उनकी घृणा तक, यह गाथा सृष्टि के एक महत्वपूर्ण मोड़ को उजागर करती है। सती के पिता के यज्ञ में अनिमंत्रित जाने के fateful निर्णय तक की पूरी कहानी! #SatiShiva #DakshaYajna #BhagavataPurana #HinduMythology #Mahadev #Adishakti
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00:00जब प्रजापती दक्ष ने आध्यशक्ती की कठिन तपस्या की, तब संपूर्ण ब्रह्मान उनके तपोबल के अनुठे तेज से आलोकित हो
00:08उठा।
00:09दक्ष की उग्रत अपस्या से प्रसन्न होकर, आध्यशक्ती भगवती परमेश्वरी अपने अलोकिक और परम दिव्य रूप में प्रकट हुई।
00:18आध्यशक्ती के वर्दान से दक्ष के राजभवन में अत्यंत सुन्दर और तेजों में पुत्री सती का जन्म हुआ।
00:26बाल्यकाल से ही राजकुमारी सती की अलोकिक कांती और सौमेता पूरे कनकेहल नगर को आनन्दित करने लगी।
00:35एक दिन देवर्शी नारद अपनी दिव्य वीना बजाते हुए दक्ष के राज महल में पधारे और भगवान शिव की महिमा
00:42का गान करने लगे।
00:44नारद जी के मुख से महादेव के दिव्य स्वरूप का वर्नन सुनते ही सती के हृदय में शिवप्रेम का प्रथम
00:51अंकुर प्रस्पुटित हुआ।
00:53राजसी सुक्सुविधाओ और वैभव के बीच भी सती का चित्त सदैव कैलाशपती भगवान शिव के ध्यान में ही मगन रहने
01:02लगा।
01:03सती ने पवित्र गंदा नदी के तटपर बालू से शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की मानसी पूजा प्रारंभ कर दी।
01:12संसार के बहुमूल्य आभूशन और राजसी वस्त्रभी सती के मन को भगवान शिव के प्रती उपजे वैराग्य से डिगा न
01:19सके।
01:21प्रजाप्ती दक्ष ने जब अपनी प्रिय पुत्री के मन में शिव के प्रती अगाध प्रेम देखा, तो उनका अहंकार इर्शा
01:28में बदल गया।
01:30दक्ष भगवान शिव के वैरागी स्वरूप, भस्मधारन करने और श्मशान वास से अत्यंत घेना करते थे।
01:38दक्ष ने अपने राजदर्बार में शिव की अभहेलना करते हुए अपने एश्वर्य और वैदिक शक्ती का अहंकार व्यक्त किया।
01:47सती की बहने जब योग्य देवों और गंधर्वों की चर्चा करती, तब सती का ध्यान केवल शिव की आराधना में
01:54ही लीन रहता।
01:56देवर्शी नारद ने सती को गुप रूप से उस कठोर व्रत की विधी बताई जिससे भगवान महादेव को प्रसन्न किया
02:04जा सके।
02:05सती ने राजमहल के वैभव का त्याग कर घने वन में जाकर भगवान शिव को पती रूप में पाने हेतु
02:12घोर तपस्या प्रारंब कर दी।
02:15वे प्रतिदिन बिल्वपत्र और पवित्र जल से शिवलिंग का अभिशेक कर निरंतर शिवनाम का जब करती थी।
02:23सती की निश्चल भक्ती की तपन ने कैलाश परवत पर समाधिस्थ भगवान शिव के हृदय को भी स्पंदित कर दिया।
02:32जब प्रजापती दक्ष को ग्यात हुआ कि सती शिव को पाने के लिए तप कर रही हैं, तो वे क्रोज
02:37से व्याकुल हो उठे।
02:39दक्ष ने वन में जाकर सती को अपनी तपस्या छोड़कर किसी समरिध देवता को चुनने का आदेश दिया।
02:48सती ने द्रिडता से उत्तर दिया कि उनका यह जीवन और सर्वस्व केवल और केवल भगवान शिव के श्रीचर्नों में
02:56समर्पित है।
02:57पुत्री सती का द्रिड संकल्प देखकर प्रजाप्ती दक्ष तीवर क्रोध और अपमान के भाव से भरकर अपने राजसी रत पर
03:05सवार होकर वन से लोट गए।
03:09पिता के चले जाने के पश्चात देवी सती ने शिव के ध्यान में लीन होकर एक विशाल वटवरिक्ष के नीचे
03:16अपनी कठोर तपस्या पुनह आरंभ कर दी।
03:20ग्रिश्मरितू की भीशन प्रचंड धूप और चारों और जलती अगनी भी सती के शिवप्रेम के अगनिसद्रिश संकल्प को डिगा न
03:28सकी।
03:29मूसलाधार वर्षा और आकाश में कडक्ती भयंकर बिजली के बीच भी सती जलमगन धर्ती पर अविचल भाव से ध्यानमगन बैठी
03:38रही।
03:39शीतकाल की जमा देने वाली बर्फ बारी में जब सारा वन ठिठुर रहा था, तब सती के शरीर से उत्पन्न
03:46तपोतेच पूरे वातावर्ण को उश्नता दे रहा था।
03:51तपस्या की पराकाष्ठा में सती ने कंद मूल और फलों का त्याग कर केवल व्रिक्षों से गिरे सूखे पत्तों का
03:58सेवन करना प्रारम्ध किया।
04:00अंतह सती ने सूखे पत्तों और जल का भी पूर्ण त्याग कर दिया, जिससे वे संपूर्ण ब्रहमांड में अपर्णा के
04:08नाम से विख्यात हुई.
04:10सती के इस असीम तपोबल से प्रकट हुई अगनी की ज्वालाएं तीनों लोकों में फैलने लगी और पूरा ब्रहमांड कमपायमान
04:18हो उठा.
04:20आकाश मार्ग से गुजरते हुए महान सप्तर्शिगन सती की ऐसी कठोर भक्ती और अटल साधना को देखकर आश्चर्यचकित रह गए.
04:30सती के तपोटेज की उश्मा से देवराज, इंद्र और समस्त देवता भयभीत हो उठे और स्वर्गलोग की नीम डग्मगाने लगी.
04:40देवर्शी नारद ने अपनी वीना पर सती के पावन प्रेम के गुनगान गाते हुए उनके इस संकल्प की भूरी-भूरी
04:47प्रशनसा की.
04:48अपने अपने धाम से स्रिष्टी के रचिता ब्रहमाजी और जगत पालक भगवान विश्नु सती की तपस्या की पूर्णता को देखकर
04:57परम संतुष्ट हुए.
04:59सती की तपो भूमी के प्रभाव से हिंसक वन्य जीव अपनी स्वाभाविक हिंसा भूलकर परस्पर प्रेम से सती के चारों
05:07और शांत बैठ गए.
05:09कैलाश परवत पर गेहन समाधी में लीन भगवान शिव के हिरिदय तक सती के निशकाम प्रेम की तडप और पुकार
05:16पहुँचने लगी.
05:18सती की अविचल भक्ती से द्रवित होकर सर्वेश्वर महादेव ने अपने नेत्र खोले और उनका ध्यान सती के पावन रूप
05:26पर टिक गया.
05:28महादेव का हिरिदय पिघलता देखनन्दी और समस्थ शिवगन कैलाश पर आनन्दित होकर नृत्य और जैजैकार करने लगे.
05:37गगन मंदल से अपसराओं और गंधरवों ने सती के उपर सुगंधित पारिजात पुष्पों की अविरल वर्षा आरंभ कर दी.
05:46सती के हिरिदय कमल में भगवान शिव का जोतिर्मय स्वरूप प्रकट हो गया और उनका संपूर्ण अस्तित्व शिवमय हो गया.
05:55समस्थ देवगणों ने हाथ जोड कर भगवान शिव से प्रार्थनाकी की वे सती की तपस्या को स्विकार कर उन्हें अपनी
06:02अरधांगिनी बनाएं.
06:04सती की निश्चल भक्ती से पूर्णतह संतुष्ठ होकर महादेव उन्हें मनवाचित वर्दान देने के लिए कैलाश से प्रस्थान करने को
06:13तत्पर हुए.
06:15ब्रहमा जी के नेत्रित्व में समस्थ देवगन कैलाश परवत की पावन उचाईयों की ओर बढ़े ताकी वे महादेव से सती
06:23के प्रेन को स्विकार करने का सामुहिक अनुरोध कर सकें.
06:27कैलाश के अलौकिक शांत वातावर्ण में पहुँचकर ब्रहमा जी ने शिव जी के दिव्य स्वरूप के समक्ष अत्यंत विनमृता से
06:35शीष जुकाया.
06:37भगवान शिव की अंतरमुखी द्रिष्टी धीरे-धीरे ब्रहमा जी और देवताओं की आकुल पुकार को सुनकर जगत की ओर लोटने
06:45लगी.
06:46पितामा ब्रहमा ने मधुरवानी में महादेव को समझाया कि सती कोई साधारन स्त्री नहीं, अपितु स्वयम पराशक्ती आदिशक्ती का ही
06:55अवतार है.
06:58ब्रहमा जी ने कहा कि स्रिष्टी के संचालन और संतुलन के लिए शिव और शक्ती का यह अलौकिक मिलन परम
07:05अनिवार्य है.
07:07भगवान विश्णु ने भी आगे बढ़कर ब्रहमा जी के कथन का समर्थन करते हुए शिव जी से सती को अपनी
07:14अर्धांगिनी बनाने का विनम्र निवेदन किया.
07:18देवताओं की प्रार्थना सुनकर महादेव ने सती की उस कठोर तपस्या का समर्ण किया जो उन्होंने केवल शिव को पाने
07:25के लिए की थी.
07:28ब्रह्मा जी ने सती के उस्त्याग और अनन्य प्रेम का वर्नन किया जिसने वन के हिंसक जीवों को भी शांत
07:34और अहिंसक बना दिया था
07:37महादेव के मन में सती की निशकाम भक्ती और तब की पवित्रता को देखकर अगात करुणा और स्नेह का भाव
07:45उमड पड़ा
07:46यह जानकर की शिव जी का मंद रवित हो रहा है समस्त देवगण हर्शित होकर जैजैकार करने लगे और पुषपवर्शा
07:54होने लगी
07:56भगवान शिव ने मंद मुस्कान के साथ ब्रहमा जी और देवताओं को आश्वासन दिया कि वे सती की मनोकामना शीघर
08:04पूर्ण करेंगे
08:06शिव जी की सहमती पाते ही ब्रहमा जी के चारों मुख प्रसन्नता से खिल उठे और उन्होंने इस निर्णय की
08:13भूरी-भूरी प्रशंसा की
08:16महादेव ने सपश्ट किया कि वे सती के सनिष्ट प्रेम के कारण ही ग्रिहस्थ धर्म को स्विकार करने के लिए
08:23तत्पर हुए है
08:26समस्ट आकाश मंडल गंधर्वों के मधुर गायन और अपसराओं के अलोकिक नरिती से गुंजुठा
08:33देवर्शी नारद ने अपनी वियाँ पर शिवसती के इस अमूल्य मिलन की गाथा गाते हुए त्रिपात तान छेड़ दी
08:41ब्रहमा जी ने आगे की योजना बनाते हुए शिव जी से निवेदन किया कि वे सती के समक्ष प्रकट होकर
08:48उन्हें वर्दान प्रदान करें
08:51कैलाश परवत का कणकन एक नए चेतना स्पंदन से भर गया जैसे पूरी प्रकृती अपने प्रभु के विवाह का स्वागत
08:59कर रही हो
09:01महादेव ने अपने स्थान से उठकर सती के आश्रम की ओर प्रस्थान करने की तयारी की जिससे देवगण अत्यंत प्रसन्न
09:09हुए
09:10ब्रहमा जी और अन्य देवताओं ने आगे बढ़कर भगवान शिव के चर्णों में पुनह प्रणाम किया और विवाह की तयारिया
09:18आरंभ की
09:20अब समन आ गया था जब देवाधिदेव महादेव अपनी अनन्य भक्त सती के समक्ष प्रकट होकर उनके युगों पुराने प्रेन
09:28को पूर्णता देने वाले थे
09:31जब महादेव के पावन चरण पृत्वी की ओर बढ़े तो मानो चराचर जगत में एक नई चेतना और दिव्यतरंग का
09:39संचार हो गया
09:41सती अपनी तपस्या में इतनी लीन थी कि उन्हें अपने आसपास के वातावर्ण में हो रहे इस अलौकिक और सुखत
09:49परिवर्तन का तुरंत भान न हो सका
09:52जब उनके हृदय में अनहद नाद गूंज उठा तब सती ने अपनी पल के खोली और सामने फैले असीम सुनहरे
10:00प्रकाश को आश्चर्यचकित होकर देखा
10:03उस दिव्य और तेजोमय प्रकाश के पुंज में से देवाधिदेव, महादेव, अत्यंत, शांत, सौमय और करुनामई रूप में प्रकट हुए
10:12अपने आराध्य और अनंत काल के प्रेमी को साक्षात सम्मुख पाकर सती की आखों से अश्रु बहने लगे और वेश्रधा
10:21पूर्वक उनके चर्णों में जुप गई
10:24महादेव ने अपनी मंद मुस्कान के साथ सती की ओर देखा, जिससे संपूर्ण तपोवन का कणकन उनकी असीम शांती और
10:33करुना से सराबोर हो उठा
10:36शिव जी ने अत्यंत मधोर और गंभीर स्वर में सती को संबोधित करते हुए कहा कि उनकी निस्वार्थ और कठोर
10:43तपस्या आज पूर्ण तर सफल हो चुकी है
10:48महादेव ने सती के युगों युगांतर के पवित्र प्रेम को सहश स्विकार करते हुए उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में
10:55अपनाने का वर्दान दिया
10:58भगवान शिव के इस मंगलकारी वचन को सुनकर सती का हृदय परम संतोष और अपार आनन से भर गया और
11:05उन्होंने हाथ जोड़कर अपनी कृतग्यता व्यक्त की
11:09इस अलोकिक मिलन के क्षण में स्वर्ग से देवताओं ने दोनों पर मंदार के पुष्पों की वर्षा की और गंधर्वों
11:17ने मंगलकान गाना प्रारंभ कर दिया
11:20व्यकुंट के स्वामी भगवान विश्णू भी अपने गरूर पर विराज मान होकर इस पावन द्रिश्य को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए
11:28और उन्होंने अपनी दिव्य सम्मती प्रदान की
11:32स्रिष्टी के रचिता ब्रहमा जी ने अपने चारों मुखों से पवित्र वेद मंत्रों का उच्चारन करते हुए शिव और सती
11:39के इस दिव्य गठ बंधन को आशिरवाद दिया
11:43देवराज इंद्र और अन्य सभी प्रमुख देवता अपने चम्चमाते रथों पर सवार होकर इस अनुपम मिलन की स्तुती करने लगे
11:53देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों पर हर हर महादेव की मधुर धुन छेड़ दी जिससे तीनों लोकों में
12:00हर्शोलास की लहर दोड़ गई
12:03सती का मुखमंडल शिव के प्रेम और आशिरवाद के तेज से इस प्रकार दमकने लगा मानो साक्षात आदी पराशक्ती प्रकट
12:11हो गई हो
12:13महादेव ने सती को आश्वस्त किया कि वे शीघ्र ही उनके पिता प्रजापती दक्ष के भव्य महल में अपनी बारात
12:20लेकर पूरे सम्मान के साथ पधारेंगे
12:24पिता दक्ष के घमंडी स्वभाव को सोच कर सती के मन में एक क्षण के लिए शंका उठी परंतु शिव
12:31के अभय हस्त को देख कर उनका भय तुरंत शान्त हो गया
12:35सती को अपने प्रेम की पूर्णता का विश्वास देकर महादेव पुनह अपनी दिव्य ध्यानमई मुद्रा में लीन होने के लिए
12:43अंतरधान हो गए
12:45तपोवन में उपस्थित सभी तपस्वी और रिशिमुनी सती के समक्ष नत्मस्तक हो गए और उन्हें भावी जगदंबा मानकर उनकी जैजैकार
12:55करने लगे
12:56इस प्रकार शिव और सती के विवाह का मार्ग प्रशस्थ हुआ और संपूर्ण ब्रहमांड अब तक के सबसे भव्य और
13:04दिव्य विवाहोत्सव की तैयारियों में जुट गया
13:07ब्रहमा जी और भगवान विश्णु ने समस्त देवस्मुदाय के साथ मिलकर देवलोक में शिवसती के इस परम पावन विवाह की
13:15दिव्य तैयारिया हर्शोल लास से प्रारंभ कर दी
13:19महाराज दक्ष ने अपनी प्रिय पुत्री सती के विवाह के लिए कंखल नगरी में एक अत्यंत भव्य, स्वर्णमंडित और रत्नों
13:27से सुसज्जित विवाह मंडप का निर्मान करवाया
13:31देव लोग की परम सुन्दरी अपसराओं और देवियों ने सती को दिव्य सुगंधित उक्टन लगा कर उन्हें एक अलोकिक वधु
13:39के रूप में अलंकृत करना प्रारंभ कर दिया
13:42उधर हिंगिरी कैलाश पर नंदी, धिंगी और अन्य गणों ने बड़े प्रेम से भगवान शिव के दिव्य स्वरूप पर पवित्र
13:50भस्न और शीतल चंदन का लेप लगाना प्रारंभ किया
13:55महादेव की इस अनूठी बारात में भूतप्रेत, पिशाच, अघोरी और विक्राल गण अत्यंत हर्शोल्लास के साथ दमरू बजाकर नित्य करते
14:04हुए एकत्रित होने लगे
14:06देवराज इंद्र के नेत्रित्व में समस्त प्रमुख देवी देवता अपने दिव्य और जाजवल यमान विमानों पर सवार होकर इस अनोखी
14:14बारात का हिस्सा बनने कैलाश परवत पहुँचे
14:18दिव्य श्वेत व्रिशब नंदी पर शान से विराजमान होकर महादेव शिव अपनी इस विचित्र और अत्यंत भव्य बारात के साथ
14:27कंखल नगरी की ओर प्रस्थान करने लगे
14:30जब महादेव की यह अलोकिक और विस्मयकारी बारात कंखल की सीमा पर पहुँची तो वहां का सारा वातावर्ण शंखनाद और
14:39दमरु की तुमुल ध्वनी से गूंज उठा
14:42प्रजापती दक्ष ने जब शिव जी के साथ आय उन धूलधूसरित भूतों और विक्राल गणों को देखा तो उनके भीतर
14:50का अहंकार और घेना उनके चहरे पर सपश्ट उभराई
14:54माता प्रसूती ने अपनी पुत्री के अखंड सुहाग की कामना करते हुए अत्यंत आदर और श्रद्धा पूर्वक आगे बढ़कर भगवान
15:03शिव की आरती उतारी और उनका भव्य स्वागत किया
15:07अपनी सक्षियों के घेरे में मंद कद्मों से चलती हुई नववधु देवी सती ने जब विवाह मंदप में प्रवेश किया
15:14तो उनकी अलोकिक कांती से पूरा राजमहल आलोकित होग उठा
15:20विवाह वेदी पर विराजमान होते ही जब महादेव और सती की प्रेम्मई द्रिष्टी आपस में मिली तो संपून स्रिष्टी में
15:28आदिशक्ती और परंपुरुष का शाश्वत मिलन साकार हो उठा
15:33स्रिष्टी के रचिता ब्रहमा जी ने मुख्य पुरोहित का आसन ग्रहन कर वेदमंत्रों के सस्वर उच्चारण के साथ विवाह के
15:40पवित्र यग्यकुंड में आहुतिया देना प्रारंब किया
15:45प्रजाप्ती दक्ष ने अपने भीतर छिपे अहंकार और भारी मन के साथ शास्त्रों में वर्नित विधी के अनुसार अपनी पुत्री
15:53सती का कन्यादान महादेड के हाथों में समपन्न किया
15:57पवित्र अग्निदेव की धधक्ती लप्टों को साक्षी मान कर शिव और सती ने साथ फेरे लिए जिससे प्रकृती और पुरुष
16:05का यह शाश्वत संबंध सदा के लिए अमर हो गया
16:10परमिश्वर शिव ने अत्यंत को मलता और अनुराग के साथ देवी सती की मांग में दिव्य सिंदूर भर कर उन्हें
16:17अपनी अर्धांगिनी के रूप में सादर स्विकार किया
16:21इस अलोकिक और पावन मिलन के पूर्ण होते ही स्वर्गलोक से देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की और गंधरवों ने
16:28मधुर मंगल गान गाना प्रारंभ कर दिया
16:32जगतपालत भगवान विष्णू और माता लक्ष्मी ने नवविवाहित युगल के समीप आकर उन्हें अखंड सौभाग्य, अनन्त ऐश्वर्य और सृष्टी के
16:41कल्यान का दिव्य आशिरवाद प्रदान किया
16:44जब नवविवाहित युगल महादेव, शिव और देवी सती एक साथ कैलाश के दिव्य रत्नजडित सिनहासन पर विराजमान हुए तो सभी
16:53रिशियों और मुनियों ने उनका सादर जयगोश किया
16:57इस प्रकार शिव और सती का यह परम दिव्य विवाह संपून ब्रहमान के इतिहास में अटूट प्रेम, परमत्याग और आदिशक्ती
17:05के एक नए स्वर्णिम युग का साक्षी बना
17:09शिव और सती कैलाश के भव्य शिखर पर नूतन प्रेम के स्वर्णिम आलिंगन में बंधे, अनंत सुख और वैवाहिक आनंद
17:17की दिव्य गहराईयों में विचर्ण करने लगे, जहां हर क्षन प्रेम और साधना का अनुपम संगम था
17:24कैलाश की हर कण में उनकी प्रेम कहानी गूंज रही थी, जहां प्रकृती स्वय उनके दिव्य मिलन की साक्षी थी
17:32और हर जीव इस पवित्र उर्जा से पुलकित हो रहा था
17:36दूसरी और अपने राजसी दर्बार में विराजमान, प्रजाप्ती दक्ष के मन में एक गहरा असंतोश और अपमान की भावना भीतर
17:45ही भीतर सुलग रही थी, जो उन्हें अशांत किये हुए थी
17:49दक्ष को शिव का तपस्वी स्वरूप, उनका श्मशानवासी गणों के साथ रहना और सामाजिक नियमों की उपेक्षा करना अपनी पुतरी
17:58सती के पती के रूप में कदापी स्विकार्य नहीं था
18:02उनके मन में शिव के प्रती घेना की अगनी निरंतर धधक रही थी, क्योंकि उन्हें महादेव का दिगंबर रूप और
18:10उनके भयंकर गण अपनी प्रतिष्ठा के विरुध लगता था
18:14दक्ष स्वयं को समस्थ प्रजाप्तियों में परम श्रिष्ठ मानते थे, जिनकी आग्या और मर्यादा का पालन करना ही स्रिष्ठी का
18:22मूल धर्म था
18:23शिव का अनाचार पूर्ण व्यवहार, उनकी ध्यानमगनता और संसारिक बंधनों से मुक्ती दक्ष को अपनी स्थापित व्यवस्था के लिए एक
18:33प्रत्यक्ष चुनौती लगती थी
18:36उन्हें यह सहन नहीं होता था कि उनकी पुत्री का पती होते हुए भी शिव उनके समक्ष सम्मान पूर्वक न
18:43जुकें और अपनी ही अलग राह पर चलते रहें
18:47जब सती कैलाश से अपने पिता के ग्रिह आती तो दक्ष उन्हें स्नेह के बजाय व्यंग्य और अप्रत्यक्ष ताने ही
18:55देते जिससे सती का हृदय व्यथित हो उठता
18:59दक्ष को यह भी असहनिय लगता था कि उनकी प्रिय पुत्री जो समस्त लोकों की राजकन्या थी एक ऐसे व्यक्ती
19:07के साथ रहती थी जो किसी भी सांसारिक वैभव का परित्याग कर चुका था
19:13अपनी पुत्री का शिव के प्रती अटूट प्रेम देख कर भी दक्ष का हृदय पिघलता नहीं था बलकि उनके भीतर
19:20का अहंकार और भी अधिक विक्राल रूप धारण कर रहा था
19:24इस अपमान और घेना की आग में जलते हुए दक्ष प्रजापती ने मन ही मन शिव को नीचा दिखाने और
19:32उन्हें संसार के समक्ष अपमानित करने का अफसर ढूंधना प्रारंभ कर दिया
19:37उन्होंने अपने विश्वस्त मंत्रियों और जोतिशियों से विचार विमर्ष करना आरंभ किया
19:43हर पहलू पर गेहन चिंतन करते हुए एक ऐसी योजना बनाने की ठानी जिससे शिव को अनायास ही अपमानित किया
19:50जा सके
19:52उनके मस्तिश्क में अचानक एक विशाल अश्वमेध यग्य आयोजित करने का विचार कौंधा जिसे विश्व के सभी देवी देवताओं और
20:01रिशियों को आमंत्रित कर गौरवशाली बनाया जा सके
20:04यह यग्य न केवल उनकी प्रजापती के रूप में सर्वोच्छिता को स्थापित करेगा बलकि उन्हें एक ऐसा मंच भी प्रदान
20:13करेगा जहां वे शिव को उनकी अयोग्यता का अनुभव करा सके
20:18उस यग्य में सभी देवताओं और महत्वपून व्यक्तियों को निमंत्रण भेजा जाएगा परंतु जानबूचकर महादेव शिव को आमंत्रण से वंचित
20:27रखा जाएगा जिससे उनका अपमान सुनिश्चित हो
20:32दक्ष के अहंकार की ज्वाला अब इतनी प्रचंड हो चुकी थी कि वह शिव को किसी भी कीमत पर अपनी
20:38श्रिष्टता सिद्ध करने का संकल्प ले चुका था
20:42समस्थ स्रिष्टी में एक अद्रिष्य तनाव मंदराने लगा जैसे किसी आने वाली भीशन घटना की पूर्वसूचनार्थ मंदरध्वनी गूंज रही हो
20:52कैलाश पर भी सती के हरिदय में एक अंजाना भय और बेचैनी उठने लगी जैसे किसी अप्रिय घटना की काली
21:00चाया उनके सुखी जीवन पर मंदराने लगी हो
21:04और इस प्रकार दक्ष का बढ़ता अहंकार और शिव के प्रती उनका द्वेश एक ऐसे अद्रिश संधर्ष की नीम रख
21:12चुका था जिसकी परिंती ब्रहमांड को हिला देने वाली थी
21:17अहंकार की अगनी में जलते हुए दक्ष प्रजाप्ती ने अपने राजमहल के स्वन सिनहासन पर बैठ कर भगवान शिव से
21:24प्रतिशोध लेने की योजना बनाई
21:27प्रजाप्ती दक्ष ने अपनी विशाल सभा में गूंजती वानी से कंखल तीर्थ में एक महायग्य ब्रहस्पतिसव के आयोजन की घोशना
21:36कर दी
21:37दक्ष के आदेश पर चतुर दूतों को तीनों लोकों में भव्य निमंतरन पत्र लेकर हर दिशा में भेजा जाने लगा
21:46स्वर्गलोक पहुँचकर दूतों ने देवराज इंद्र को इस महान यज्य का निमंतरन पत्र प्रस्तुत किया
21:53ब्रह्मलोक में दूतों ने स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रह्मा और पूज महर्शियों को सादर आमंतरित किया
22:01श्री वैकुंठ धाम में दूतों ने भगवान विश्नु और माता लक्षमी के चर्णों में जुपकर यग्य का संदेश अर्पित किया
22:10परंतु दक्ष ने अपने मंत्रियों को कठोर चेतावनी दी की कैलाश परवत की और कोई निमंतरन पत्र न भेजा जाए
22:18जब कुछ धर्मनिष्ठ महर्शियों ने भगवान शिव को त्यागने पर आपत्ती जताई तो दक्ष ने क्रोधित होकर उन्हें चुपकरा दिया
22:28दक्ष ने अहंकार से भरे स्वर में कहा कि अमंदलकारी और श्मशानवासी शिव इस दिव्य यग्य सभा के योग्य नहीं
22:35है
22:37कंखल के पवित्र तट पर विशाल यग्यवेदी और भव्य मंडपों का निर्मान कार्यतीवर गती से आरम हो गया
22:45कुशल शिल्पकारों ने पूरे यग्यस्थल को शुद्ध स्वर्ण क्रत्नों, रेश्मी वस्त्रों और सुगंधित पुष्पमालाओं से अलंकृत किया
22:55गंधर्वों और देवगायकों ने यग्य में प्रस्तुत किये जाने वाले पवित्र वैदिक मंत्रों और स्तुतियों का अभ्यास शुरू किया
23:03निमंत्रन पाकर समस्थ देवता, महर्शी और प्रजाप्ती अपने दिव्य रथों पर सवार होकर कंखल की ओर प्रस्थान करने लगे
23:13हिमाले के सुन्दर शिखरों के उपर से गुजरते हुए भांति-भांती के दिव्य विमानों से आकाश जग्मगा उठा
23:20उधर कैलाश के शान्त वातावर्ण में बैठी देवी सती के मन में बिना किसी ग्यात कारण के अशान्ती की तरंगे
23:28उठने लगी
23:30भगवान शिव अपनी स्वाभाविक ब्रहमांडिय चेतना में लीन लौकिक प्रपंचों से परे समाधी में विराजमान थे
23:38कैलाश के निकटवर्ती मार्ग से देवगण अपनी पत्नियों के साथ अत्यंत प्रसन्नचित होकर यग्य के लिए जा रहे थे
23:47उठसव के परिधानों में सजे देवताओं को जाते देख देवी सती के हरिदय में यह जानने की तीवर उतकंठा जागरित
23:54हुई
23:56इधर दक्ष ने पूर्ण हो चुके अपने विशाल यग्यस्थल का गर्व से निरीच्षन किया जहां सब कुछ तयार था सिवाई
24:03शिव की उपस्थिती के
24:06इस प्रकार प्रजाप्ती के अहम और शिव के अनादर से उत्पन्न महाविनाश का बीज कंखल की पवित्र भूमी पर बोया
24:13जा चुका था
24:15कैलाश के सुरमय शिखरों के उपर से भव्य दिव्य विमानों को कंखल की ओर जाते देख देवी सती का मन
24:22किसी अग्यात शंका से भर उठा
24:25अपनी सक्खियों से उन स्वर्णिन विमानों की दिशा का समाचार पाकर देवी सती के हृदय में अपने पिता के विशाल
24:33आयोजन को देखने की लालसा जागरत हुई
24:36इसी बीच देवर्शी नारद वीना की सुमधूर तान छेड़ते हुए कैलाश परवत पर अवतरित हुए और उन्होंने सती को कंखल
24:44के महायज्य का पूरा विवर्ण दिया
24:48देवर्शी नारद के मुख से यह सुनकर की ब्रहमांड के समस्थ देवी देवताओ को आमंतरित किया गया है
24:54सती का हृदय पिता के स्नेह को स्मरण कर प्रफुलित हो उठा
24:59किन्तु जैसे ही नारद मुणी ने बताया कि इस महायज्य में केवल भगवान शिव और उन्हें निमंतरन नहीं भेजा गया
25:07है
25:07सती के मन में गहरा वजरपात हुआ
25:11अपने पूजय पती देवाधिदेव महादेव का ऐसा निरादर सुनकर देवी सती का हृदय अत्यंत व्याकुल हो गया और उनकी आखों
25:19में अश्रु तैर आए
25:22सती के मस्तिष्क में अपने पिता दक्ष की पुरानी स्मृतिया कौंधने लगी और वे समझ नहीं पा रही थी कि
25:29उनका पिता इतना कठोर कैसे हो सकता है
25:34त्रेगुनातीप जगदीश्वर शिव को यग्य के भाग से वंचित रखने की पिता की कुबुद्धी पर सती को असीन दुख और
25:41पश्चाताप का अनुभव हुआ
25:43सती की व्याकुलता देखकर उनकी प्रिय सखी विजया ने उन्हें शांत करने का प्रयास किया और पिता के घर जाने
25:51की बात कही
25:53सती ने विचार किया कि एक पुत्री को अपने पिता और माता के घर जाने के लिए किसी आपचारिक निमंतरन
26:00की आवश्चक्ता नहीं होनी चाहिए
26:03अपनी माता प्रसूती की याद सती के हृदय में हिलोरे मारने लगी और वे अपनी बहनों से मिलने के लिए
26:10अत्यंत आतुर हो गई
26:13शिव के प्रती अपने अगाध प्रेम और पिता के इस अनुचित व्यवहार के बीच फंसी सती का हृदय धर्मसंकट से
26:20भर गया
26:22दूर कंखल से उठते यग्य के पवित्रध हुए की कलपना मात्र से ही सती का ध्यान अपने परिवार की ओर
26:29खीचा चला जा रहा था
26:31नारद मुनी ने सती को चेताया कि दक्ष का अहंकार अत्यंत उग्र रूप ले चुका है आथ बिना निमंतरन जाना
26:39उचित नहीं होगा
26:41परंतु सती के मन में यह द्रेड विश्वास था कि वे स्वय जाकर अपने पिता का भ्रम दूर कर सकती
26:48है और शिव का सम्मान पुनस्थापित कर सकती है
26:52अपने इस संकल्प को पूरा करने के लिए सती ने भगवान शिव के ध्यान स्थल की ओर अपने कदम बढ़ा
26:59दिये
27:11गुफा के भीतर भगवान शिव समाधी से शांत मुद्रा में बैठे थे जिनका निर्मल रूप सती के अशांत हृदय को
27:19कुछ क्षण के लिए शांत कर गया
27:22सती ने परमेश्वर शिव के निकट जाकर उन्हें प्रणाम किया किन्तु उनका मन कंखल जाने की इच्छा से व्याकुल बना
27:29रहा
27:31आखिरकार सती ने अपने कापते हुए स्वर में महादेव से पिता के यग्य में जाने की अनुमती मांगने के लिए
27:38अपना मुख खोला
27:51तूफान उनके शांत मानस को अशांत कर रहा हो। प्रेम और कर्तव्य के बीच पंसी सती की वेदना को भापते
27:59हुए शिव ने शांत भाव से उन्हें समझाया कि किसी के बुलाए बिना किसी उच्छव में जाना विशेशकर अपने पिता
28:06के घर अत्यंत अपमान जनक होता ह
28:10उन्होंने आगे कहा कि यदि निमंतरन जानबूच कर अपमानित करने के इरादे से नहीं भेजा गया हो तो ऐसे स्थान
28:18पर जाने से केवल स्वयंका ही नहीं बलकि अपने कुल का भी अनादर होता है
28:25महादेव ने सती को यह भी स्मरण कराया कि दक्ष के मन में उनके प्रती अब केवल घ्रेना और अहंकार
28:31शेश है और वहाँ जाने से उन्हें केवल अपमान के कटू घूठ ही पीने पड़ेंगे
28:38किन्तु सती अपने हृदय में पिता के प्रती अटूट प्रेम और एक बेटी के सहज अधिकार के साथ यह मानने
28:45को तयार न थी कि उनके पिता उन्हें इतना अपमानित कर सकते हैं
28:51उनका मन इस सोच से व्याकुल था कि शायद उनके पिता उन्हें भूल गए होंगे या किसी गलतफमी के कारण
28:58उन्हें निमंतरन नहीं भेजा होगा
29:01सती ने अत्यंत नमरता से महादेव से आग्रह किया कि उन्हें एक बार अपने पिता के घर जाकर स्थिती स्पष्ट
29:09करने और उनके प्रेम को पुनह जगाने का अफसर दिया जाएं
29:14महादेव ने सती के द्रिड संकल्प को देखा और उनके मन में उमरती भावनाओं को समझा फिर भी उन्होंने एक
29:22अंतिम प्रयास किया कि उन्हें इस कष्ट दायक यात्रा से रोका जा सके
29:27उन्होंने सती को पुनह समझाया कि दक्ष का अहनकार इतना प्रबल हो चुका है कि वे उन्हें किसी भी कीमत
29:35पर सम्मान नहीं देंगे बलकि सारवजनिक रूप से उनका अपमान ही करेंगे
29:41महादेव ने उन्हें आगाह किया कि यह अपमान केवल उनके व्यक्तिगत ह्रिदय को ही नहीं तोड़ेगा बलकि उनके दिव्यस्वरूप और
29:50शिवसती के पवित्र संबंध पर भी आच आएगी
29:54यह सुनकर भी सती के मन में अपने पिता के प्रती गहरा प्रेम और उनके अहंकार को मिटाने की तीवर
30:01इच्छा बलवती थी और वह अपने निरने पर अडिग रही
30:06सती ने सोचा कि एक पुत्री को अपने पिता के घर जाने के लिए किसी निमंतरन की आवश्शक्ता नहीं होती
30:13क्योंकि यह उनका स्वाभाविक अधिकार है
30:17उन्हें विश्वास था कि उनकी उपस्थिती से दक्ष का क्रोध शान्थ होगा और उनके बीच की कड़वाहट दूर होकर प्रेम
30:25का बंधन फिर से स्थापित होगा
30:28शिव ने उनके तर्प को सुना और जानते हुए भी कि यह यात्रा उनके लिए कश्टदाई होगी, सती की अटल
30:35निष्ठा और प्रेम के आगे नत्मस्तक हो गए
30:39उन्होंने अंतिमबार सती को दक्ष के हठी स्वभाव और अहमकार की अगनी से आगाह करते हुए, उन्हें अपनी सुरक्षा के
30:47प्रती सचेत रहने की चेतावनी दी
30:51सती ने महादेव के चर्णों में प्रणाम किया, उनका आशिरवाद प्राप्त किया और अपने हृदय में पिता के घर जाने
30:58की तीवर अभिलाशा लिये, द्रिड कदमों से बाहर की ओर चल पड़ी
31:04महादेव ने उदास मन से सती को जाते हुए देखा, उनके दिव्य नेत्रों में भविश्य की अन्होनी का स्पष्ट आभास
31:11जलक रहा था, जिसे वे रोक नहीं सकते थे
31:15गुफा से बाहर निकलते ही सती पर हिमालय की पवित्रवायू और सूर्य की स्वर्णिन किर्णे पड़ी, परंतु उनका मन अभी
31:23भी एक अन्जान भय और आशा के बीच जूल रहा था
31:28उनके साथ देवगण, गंधर्व और यक्ष भी उनकी यात्रा में शामिल हो गए, जो उनके साहस और निष्ठा से प्रभावित
31:36थे, परंतु उनके भविश्य को लेकर चिन्तित भी थे
31:40सती ने अपनी यात्रा आरंभ की, उनका हर कदम उनके पिता के प्रती गहरे प्रेम और अपने पती के प्रती
31:48अटूट निष्ठा का प्रतीक था, एक ऐसी यात्रा जो उन्हें अग्यात नेती की ओर ले जा रही थी
31:55कंखल के विशाल द्वार पर पहुँचते ही देवी सती को यग्यशाला से उठती हवन की पावन सुगंध और गुंजते वेद
32:02मंत्र सुनाई दिये
32:05जैसे ही सती ने उस भव्य यग्यमंडप में प्रवेश किया, चारों और स्वर्ण स्तंभों और प्रजवलित कुंडों की अलौकिक चमक
32:13फैली हुई थी
32:15सती का हृदय अपने पिता और स्वजनों को देखने के उत्साह में धड़क रहा था, उन्हें आशा थी कि सब
32:22उनका स्वागत स्ने से करेंगे
32:25परंतु सती के आगमन के साथ ही पूरी सभा में एक भारी और दर्दनाक सन्नाटा चा गया, मानो काल स्वयंथम
32:33गया हो
32:35प्रजापती दक्ष के भय से वहां उपस्थित सभी देव, यक्ष और महर्शी अपनी द्रिष्टी नीची करके चुपचाप सती की उपेक्षा
32:43करने लगे
32:44केवल उनकी माता महारानी प्रसूती ही अश्रुपूर्ण नेत्रों से दोड़ कर आगे आई और अपनी पुत्री को आलिंगन में भर
32:52लिया
32:54सती की बहने भी पिता के कठोर क्रोध के डर से अपनी जगहे पर ठिटकी रही और सती से नजरे
33:01चुराती रही
33:03सती ने भारी कदमों से मुख्य यग्यवेदी की ओर रुख किया, जहां देवताओं के लिए हविश्य के भाग रखे गए
33:10थे
33:11जब सती ने देखा कि समस्त ब्रह्मांड के स्वामी भगवान शिव के लिए कोई स्थान या हविर्भाग नहीं रखा गया
33:19था, तो उनका दिल काम उठा
33:22अत्यंत आहत होकर सती ने अपने पिता प्रजापती दक्ष की ओर देखा, जो अपने उचे स्वर्ण सिनहासन पर अहंकार में
33:30चूर बैठे थे
33:32सती ने कमपकमपाती वानी से अपने पिता से पूछा की त्रिगुन स्वामी भगवान शिव को इस महायग्य में क्यों आमंत्रित
33:40नहीं किया गया
33:42सती के इस प्रशन पर प्रजापती दक्ष का चहरा अत्यंत क्रोध और घ्रेना से काला पढ़ गया और उनकी आखें
33:49अंगारे बरसाने लगी
33:52दक्ष ने भरे दर्बार में खड़े होकर संपूर्ण देवों और रिशियों के समक्ष भगवान शिव का घोर तिरसकार करना आरंभ
34:00कर दिया
34:00दक्ष ने शिव को अमंगलकारी, श्मशानवासी और भसमधारी कहकर उनका उपहास उड़ाया और उन्हें वैदिक कर्मों के अयोग्य बताया
34:12राजा दक्ष ने सती को भी कोस्ते हुए कहा कि उनसे विवाह करना उनकी जीवन की सबसे बड़ी भूल थी,
34:19जिससे सती का हृदय चलनी हो गया
34:22दक्ष के इन विशैले और अपमान जनक शब्दों से पूरा यद्य मंड़क थर्थरा उठा और विशी मुनी भैभीत होकर सिर
34:30जुका गए
34:32अपने स्वामी और जगत पिता शिव का ऐसा भयंकर अपमान सुनकर देवी सती का हृदय अगाध दुहक और पीडा से
34:40भर गया
34:51उत्पन यह शरीर अब उनके लिए कलंक बन चुका है क्योंकि इसी से उन्होंने शिव का अपमान सुना है
35:00अत्यंत भीशन संताप में भरी सती ने सभा की ओर देखते हुए अपने प्राण त्याग ने और पिता का अहंकार
35:07ध्वस्त करने का द्रिड संकल्प लिया
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